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ड्राइंग रूम

हमारे एक लंगोटिया यार हैं ठाकुर भानुप्रताप सिंह, आज के जमाने का ‘डाइपर फ्रेंड। जनाब पुराने जागीरदार खानदान से ताल्लुक रखते हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हुए न जाने उन्हें कब साहित्य के कीड़े ने काट लिया। चुनांचे मित्र को कविताएं लिखने का बुखार चढ़ गया। रूमानी प्रेम और इश्क में पगी मित्र की कविताओं पर कॉलेज की ही एक पूजा नामक सहपाठिनी फिदा हो गई। मित्र ने भी प्रेमधर्म का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए प्रेम को उसकेअंतिम मुकाम यानी विवाह तक पहुंचाया। विवाह अंतर्जातीय था लिहाजा खानदानी परंपराओं से बगावत करने के घातक परिणाम हुए। कोर्ट मैरिज को लगभग दो साल हो रहे हैं। मित्र के माता-पिता ने उसकी देहरी पर कदम तक नहीं रखा लेकिन जब विश्वस्त सूत्रों से मित्र के माता-पिता के कानों में ये खबर पहुंची कि ठाकुर भानुप्रताप सिंह बाप बनने वाले हैं और वे दादा-दादी तो रिश्तों पर जमी बर्फ दिल्ली जैसे शहर की कड़ाके की ठंड में भी पिघलने लगी।
आजकल मोबाइल, व्हाटसएप, फेसबुक का चलन है। लोग आपस में इन्हीं माध्यमों से चेटिंग शेटिंग करके एक-दूसरे की कुशलक्षेम पूछ लेते हैं। तो मित्र जब सुबह-सुबह घर पर बगैर किसी पूर्व सूचना के पधारे तो मैं उन्हें देखकर थोड़ा चिंतित हो गया। दरवाजा खोलते ही मैंने पूछा, ‘यार इतनी सुबह-सुबह कैसे? न कोई मोबाइल न एसएमएस… सब खैरियत तो है? मित्र बोला, ‘सब ठीक है यार… मैं तो बस तुझे ये बताने आया था कि हमारे पिताश्री और माताजी कल दिल्ली पधार रहे हैं?
मित्र के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रहीं थी। मैंने कहा, ‘ओ यार ये तो खुशी की बात है। मैं न कहता था कि घुटने हमेशा पेट की ओर ही मुड़ते हैं। आखिर हैं तो मां-बाप ही न… कब तक नाराज रहते? लेकिन यार तू तो बड़ा टेंशन में लग रहा है… क्या हुआ?
‘अब क्या बताऊं यार… बड़े ही धर्मसंकट में फंस गया हूं। तू तो जानता ही है कि पूजा अपने पेरेंट्स से कितनी ज्यादा अटैच्ड है। शादी के शुरू-शुरू के दिनों की बात है। उन दिनों वो पेरेंटस को कुछ ज्यादा ही मिस कर रही थी। उसका मन बहल जाए इसलिए मैंने उसके डैडी-मम्मी की तस्वीर ड्राइंग रूम में अपने पेरेंटस की फोटो के बराबर में दीवार पर टांग दी। वो घर में चलते फिरते उस तस्वीर को देखकर खुश हो जाती थी।
मित्र अपनी बात पूरी करता, इससे पहले मेरा नारीवादी उदार हृदय उछालें मारने लगा। मैंने बात बीच में ही काट दी- ‘यार इसमें प्रॉब्लम क्या है? तूने तो एक समझदार पति का फर्ज अदा किया है। पति-पत्नी को समान धरातल पर ले आया। ठीक ही तो है… अब जैसे तेरे मां-बाबूजी वैसे ही पूजा के पेरेंटस। अगर पति के घर में यदि पत्नी के पेरेंटस की फोटो भी ड्राइंग रूम में लगी हो तो इसमें हर्ज क्या है?

‘हर्ज है मेरे दोस्त… परेशानी है। तू जिसे इतना आसान समझ रहा है, न बात उतनी सरल नहीं है। हम ठहरे ठाकुर खानदान के। कभी हमारे गांव में चलकर देख। बैठक में हमारे दादा परदादाओं की सात पुश्तों की तस्वीरें लगी हुई हैं। लेकिन मजाल है कि तुझे मेरे घर में ननिहाल पक्ष का एक भी फोटो टंगा मिल जाए। देखना ड्राइंग रूम में टंगी सास-ससुर की फोटो कैसे मेरे गले का फंदा बनने वाली है। मैं उसे हटाना चाहूं तो हटा नहीं सकता। पूजा क्या सोचेगी। समझ में नहीं आ रहा है यार, क्या करूं। आगे कुंआ है पीछे खाई।
मैंने मित्र का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘डर मत प्यारे। तूने तो सास-ससुर की फोटो घर में टांगने की नई परम्परा का सूत्रपात किया है। तू नहीं जानता तूने नारी को समान अधिकार दिये जाने की दिशा में कितना बड़ा काम किया है। फोटो वहीं लगी रहने दे। देखना तेरे शहंशाह आलम स्त्री के प्रति तेरी उच्च सोच के मुरीद हो जाएंगे। शायद इस वक्त मेरी जुबान पर साक्षात सरस्वती का वास था। मेरा कहा सच हुआ। ठाकुर भानुप्रताप सिंह के माता-पिता के घर में प्रवेश करते ही पूजा ने सिर पर पल्लू रखकर उनके पैर छुए। आशीर्वाद देते समय उनकी नजर ड्राइंग रूम में पूजा के पेरेंटस की तस्वीर पर पड़ी तो अपनी मूंछों को ऐंठते हुए बोले, ‘हूं… तो यही हैं तुम्हारे ग्रेट पेरेंटस जिन्होंने सुशील और गुणवान बहु दी है। कुछ महीनो बाद जब मैं भानुप्रताप से मिला तो उसका सीना गर्व से फूला था, बोला- ‘यार मैं गांव गया था। बैठक में मेरे नाना-नानी की फोटो लग गई है।