तालाब पर पंचायत बैठी थी। खासी भीड़ थी। गांव में खूब सनसनी थी। ठाकुर की जमींदारी के सभी चौधरी, साहू-सहकार एवं अमीर-गरीब आमंत्रित थे। बहुत से लोग उत्सुकतावश भी आ गए। ‘ठाकुर साहब अभी तक नहीं आए।?’ पंडित रामरक्षा शास्त्री जो पूरी जमींदारी के पुरोहित एवं धर्म के ठेकेदार थे, पूछ बैठे। अपना पराया नॉवेल […]
Author Archives: कुशवाहा कान्त
अपना पराया भाग-13
‘बड़ी मसक्कत कर रहे हो, भीखम चौधरी! इतने सवेरे ही काम कर जुट गये?’ आते ही वैदराज बोले। ‘क्या करूं वैदराज! घर बैठने से पेट तो भरेगा नहीं—।’ भीखम बोला, फिर पुकारा—‘बिटिया, जरा मचिया तो दे जा।’ अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1 ‘आई काका!’ मचिया लेकर […]
अपना पराया भाग-12
कजली का महीना था! युवतियों के सुरीले गले से निकली हुई कजली की मधुर ध्वनि लोगों के हृदय में एक अजीब गुदगुदी पैदा कर रही थी। सेहटा गांव के तालाब पर इस समय अपार देहाती भीड़ उमड़ पड़ीं थी। आज के दिन वहां बहुत बड़ा मेला लगता है। अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने […]
अपना पराया भाग-11
बड़े ठाकुर अभी-अभी बैठक में आकर बैठे थे। सूर्यनारायण अभी तक उदय नहीं हुए थे। ठाकुर की आदत बहुत सवेरे उठकर नित्य-क्रिया से छुट्टी पाकर कागज-पत्र देखने की थी। आज भी वे छोटी-सी सन्दूक पर रोकड़-बहीं सामने रखे हुए, वे कुछ देख रहे थे। बैठक में और कोई न था। अपना पराया नॉवेल भाग एक […]
अपना पराया भाग-10
आज बीस साल पहले की घटनाएं ठाकुर की आंखों के सामने नाच उठीं। ‘क्या करूं कुछ समझ में नहीं आता, वैदराज…। ठाकुर हाथ मलते हुए खड़े थे वैदराज के सामने—‘पहले तो बच्चा ही नहीं होता था। ठकुराइन ने जब बहुत टोना-टोटका किया तो यह लड़का पैदा हुआ…मगर देखता हूं कि भाग्य ही खोटा है, वैदराज!’ […]
अपना पराया भाग-9
आसमान पर बादल गड़गड़ा उठे। छम-छम पानी ‘बरसने’ लगा। हवा की सनसनाहट तीव्र हो उठी। चारो और जल-ही-जल उमड़ पड़ा। वैदराज अपनी गद्दी पर बैठे हुए भंग की तरंग में पानी का आनन्द ले रहे थे। बौछारों से ऊबकर दरवाजा बंद कर दिया था। अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक […]
अपना पराया भाग-8
मस्तक पर परेशानी से चुहचुहा आए पसीने को पोंछते हुए बड़े ठाकुर बोले—‘क्या कहा? कुछ वसूल नहीं हुआ? एक पाई भी नहीं?’ ‘नहीं सरकार!’ कारिन्दा भयमिश्रित स्वर में बोला। ‘यह आलोक क्या घास खोदने वहां गया था?’ बड़े ठाकुर ने जोर से अपना मुक्का सामने रखी हुई सन्दूक पर दे मारा। अपना पराया नॉवेल भाग […]
अपना पराया भाग-7
वैदराज भंग के बहुत शौकीन थे। दोनों समय उनकी छनती थी। अभी-अभी भंग छानकर तैयार ही हुए थे कि दरवाजे पर कोलाहल सुनाई पड़ा। लपक कर बाहर आए तो देखा कि छोटे ठाकुर तथा कारिन्दा आदि उपस्थित हैं। जुहार करके उन्हें गद्दी पर सम्मानपूर्वक बैठाया। अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस […]
अपना पराया भाग-6
भोली-भाली ग्रामीण युवती घटा उस लापरवाह युवक को न भूल सकी, जिससे तालाब पर उसकी भेंट हुई थी। यद्यपि वह युवक अधिक कुछ न बोला था, फिर भी उसकी ओर घटा का हृदय आकर्षित हो रहा था। आखिर क्यों…? यह उसके लिए प्रश्न-चिन्ह था। ‘बिटिया!’ घटा न जाने किन विचारों में तल्लीन थी कि भीखम […]
अपना पराया भाग-5
ठाकुर दीप नारायण सिंह जब जलपान करने आए तो उन्होंने ठकुराइन से पूछा—‘आलोक जलपान कर चुका?’ ‘हां!’ ठकुराइन ने छोटा-सा उत्तर दिया। ‘है कहां वह?’ ठाकुर ने पूछा। ‘ठकुराइन अम्मा के पास बैठा है।’ ठकुराइन ने कहा। अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1 ठाकुर दीप नारायण सिंह […]
