भीखम अब चलने-फिरने लायक हो गया था। वैदराज को दवा तथा घटा की अनवरत सेवाओं ने भीखम को शीघ्र ही खड़ा कर दिया। अब कभी-कभी लाठी लेकर खेतों पर जाने लगा था वह। उस दिन लाठी लिए हुए वह अपने ईख के खेत की मेंड़ पर खड़ा था। खेत को देखकर स्वयं उसे भी आश्चर्य […]
Author Archives: कुशवाहा कान्त
अपना पराया भाग-23
बम्बई का विशाल रेलवे स्टेशन देखते ही आलोक आश्चर्यचकित हो उठा। सिकन्दराबाद से उनके प्रस्थान की सूचना यथासमय बम्बई भेज दी गईं। थी अतः उन्हें लेने के लिए मिलिट्रीवैन स्टेशन पर तैयार खड़ी थी। दसों युवक उस पर सवार हो निश्चित स्थान पर पहुंच गये। उस दिन लोगों को छुट्टी दे दी गईं, क्योंकि सफर […]
अपना पराया भाग-22
चार कहार एक डोली लिए हुए ठाकुर की हवेली पर आ रुके भीखम कराहता हुआ लाठी के सहारे नीचे उतरा और ठाकुर की बैठक की ओर बढ़ा। ठाकुर अकेले बैठक में थे। भीखम को इतना सवेरे आया देख उनकी भौहें तन गईं! ‘जुहार हो बड़े ठाकुर!’ भीखम बोला। अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने […]
अपना पराया भाग-21
वैदराज से क्रांतिकारी राज आज पुनः मिलकर हाल-चाल लेने आया था। वे दोनों बंद कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। वैदराज बोले—‘अभी शनिचर की बात है। ठाकुर ने क्रोध में आकर बेचारे निरपराध भीखम चौधरी को खूब पिटवाया था। सारा बदन सूज आया है बेचारे का। चारपाई से उठ भी नहीं सकता।’ अपना पराया […]
अपना पराया भाग-20
आलोक भावुक था। वह पिता का दुर्व्यवहार सहन न कर सका। उसके हृदय में संकल्प की दृढ़ता थी, दृढ़ता के साथ-साथ अटल निश्चय था। इन सबके रहते हुए भी वह अपने में एक प्रकार की शून्यता का अनुभव कर रहा था। अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1 […]
अपना पराया भाग-19
बड़े ठाकुर आज भी अत्यंत व्यग्र थे। हाथ मलते हुए बैठक में टहल रहे थे। सदा ऐंठी रहने वाली मूंछें अभी नीची थीं। बदन पर रेशमी मिर्जई थी। हाथ की लाठी कोने में रखी हुई थी। उसी समय कारिन्दा ने प्रवेश किया। ‘मिला वह?’ ठाकुर ने पूछा। अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के […]
अपना पराया भाग-18
वैदाराज अत्यधिक आश्चर्यचकित हो उठे। पंडित रामरक्षा शास्त्री और जैकरन अहीर को इस मध्याह्न बेला में आया देखकर। जैकरन अहीर वैदराज का पांव पकड़कर बोला—‘दुहाई वैदराज की! मेरा न्याय अभी हो। मैंने छोटे ठाकुर को घटिया के साथ तालाब पर देखा है। अब बड़े ठाकुर से कहिए कि वे छोटे ठाकुर का भी न्याय करें—उसी […]
अपना पराया भाग-17
दोनों युवक एक साफ चट्टान पर आकर बैठ गए। उनमें से एक था राज और दूसरे थे छोटे ठाकुर! ‘अब तो काफी दूर आ गए ह्मो।’ छोटे ठाकुर ने कहा—‘ और कितनी दूर चलना है?’ ‘बस अब थोड़ी दूर है—कल एक अजीब घटना घटी,? आलोक! जिसका जिक्र करना ही मैं भूल गया। ‘कैसी घटना थी […]
अपना पराया भाग-16
कारिन्दा सिर झुकाकर बाहर जाने लगा, तो बड़े ठाकुर ने पुकारा। ‘सुनो!’ कारिन्दा रुक गया। ‘देखो, कल कलेक्टर साहब आने वाले हैं। जोगीबीर की दरी के पास उनका शिविर लगेगा।’ अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1 ‘वहां तो ठीक नहीं होगा, सरका पर! सोहट या महवारी गांव […]
अपना पराया भाग-15
जोगीबीर की दरी के पास बहुत ही दुर्गम कंटकाकीर्ण जंगल है। शायद ही कोई आदमी उधर जाने का साहस कर सकता है। उसी वनस्थली में, वृक्ष-लताओं से घिरी हुई एक झोंपड़ी है। परंतु दूर से कोई देखे यह नहीं अनुमान कर सकता कि वहां कोई झोंपड़ी हो सकती है और उसमें कोई आदमी रह सकता […]
