अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

आलोक भावुक था। वह पिता का दुर्व्यवहार सहन न कर सका। उसके हृदय में संकल्प की दृढ़ता थी, दृढ़ता के साथ-साथ अटल निश्चय था। इन सबके रहते हुए भी वह अपने में एक प्रकार की शून्यता का अनुभव कर रहा था।

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हवेली से निकलकर वह सीधे मिर्जापुर शहर की ओर चल पड़ा। शहर वहां से चौदह मील पश्चिम की ओर था। वह रास्ता बीहड़ पहाड़ी था, परंतु दृढ़ प्रतिज्ञ आलोक ने सारा रास्ता पैदल ही तय किया। रात दस बजते-बजते वह शहर पहुंच गया।

शहर में आकर उसके सामने यह समस्या उपस्थित हुई कि रात्रि कहां व्यतीत करे। उसने जेब टटोली तो मालूम हुआ कि बीस रुपए उसकी जेब में है। इन रुपयों पर ही उसका भविष्य निर्भर था। वह उन्हें व्यर्थ में क्यों खर्च करता। लाचार वह स्टेशन की ओर बढ़ा। वेटिंग रूम में आकर एक बैंच पर लेट गया।

रात भर वह जागता रहा और सोचता रहा—सोचता रहा और जागता रहा। प्रातःकाल हुआ तो उसके नेत्र लाल थे। हृदय में उथल-पुथल थी। अब तक यह एक निश्चित न कर सका था कि उसे क्या करना चाहिए।

बनारस में उसके कुछ रिश्तेदार थे। टिकट लेकर वह बनारस रवाना हो गया। कई दिन तक बनारस में घूमता-फिरता रहा, परंतु वहां भी उसका मन न लग सका। एक दिन सन्ध्या को वह अकस्मात लखनऊ के लिए रवाना हो गया और अगले दिन सुबह वह लखनऊ पहुंच गया।

‘कहां जाओगे बाबू?’ इक्के वाले ने पूछा।

‘फौज में भर्ती के दफ्तर—।’ अनायास ही उसके मुंह से निकल गया, यद्यपि उसकी हार्दिक इच्छा फौज में भर्ती होने की न थी।

आधे घंटे में ही वह भर्ती के दफ्तर के सामने था। एक दलाल उसका हाथ पकड़कर उसे अन्दर ले गया।

‘कौन से विभाग में आप प्रवेश पाना चाहते हैं?’ उसने पूछा।

‘एयरफोर्स में।’ आलोक ने कहा।

अब तक उसने फौज में भर्ती होने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। लड़ाई जोरों पर थी। भर्ती धुंआधार हो रही थी।

आलोक को अफसर के सामने पेश किया गया। एक मामूली-सी परीक्षा के पश्चात, मेडिकल परीक्षा हुई। उसके अंग-प्रत्यंग की जांच की गईं।

मेडिकल ऑफिसर ने उसे फिट बताया।

वह उसी दिन, ‘इंडियन एयर फोर्स’ में ‘जनरल ड्यूटीज क्लर्क’ के पद पर भर्ती कर लिया गया।

उसे ट्रेनिंग करने के लिए लाहौर भेजा गया। उसके साथ गोण्डा के कुछ और भी नवयुवक थे। लाहौर में उसे ड्रिल एवं परेड आदि की शिक्षा दी जाने लगी थी। लाहौर में बाल्टन नामक स्थान पर इण्डियन एयर फोर्स का कैम्प था। गर्मी के दिन थे। लाहौर की गर्मी आलोक के लिए एक समस्या बन गईं थी।

लाहौर आने पर उसे कम्बल, मेस-टिन, मग, प्लेट, छुरी-कांटा चम्मच और पहनने के लिए फौजी पोशाकें आदि मिलीं। यहां जाकर, फिर मेडिकल परीक्षा हुई, टेस्ट हुआ और तब अन्तिम रूप से यह निश्चित हुआ कि आलोक के लिए ‘जनरल ड्यूटीज क्लर्क’ की ट्रेनिंग उपयुक्त होगी।

आलोक सैनिक संसार में पहुंच गया। वहां की कड़ी पाबन्दी तथा नियम देखकर उसे पछतावा होने लगा कि वह कहां से यहां आकर फंस गया? उसे घर की याद सताने लगी। भागने की बात सोचने लगा वह, मगर भागना असम्भव था।

घटा की याद उसे बहुत सताती थी। कभी-कभी अकेले में वह बैठकर खूब रोता, ताकि हृदय का आवेग कुछ कम हो जाए। लाहौर के कैम्प के पास पानी का बहुत अभाव था।

कैम्प में उस समय बीस हजार के लगभग रंगरूट आ गए थे, इसलिए खाने-पीने का भी इंतजाम ठीक न था। घंटों तक लाइन में खड़ा रहना पड़ता था और इसके बाद जो कुछ मिलता था, वह उसे अच्छा नहीं लगता था।

शिक्षक ज्यादातर अंग्रेज थे, जो अभी-अभी विलायत से आए थे। उनकी अंग्रेजी को समझ लेना आसान बात नहीं थी।

पहले-पहल जब सारजेण्ट डेनियल ने आलोक का नम्बर लेकर पुकारा—‘टू-टू-टू-थ्री नाइन’ तो आलोक समझ ही न सका कि यह उसका नम्बर है। 22239, परंतु दो-चार दिन में ही वह सब कुछ समझने लग गया।

उसे यहां तनिक भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसने विचार किया कि वह एक पत्र घर पर लिख दे, परंतु, फिर तुरंत विचार बदल गया। घर पर किसे मालूम था कि आलोक सेना में भर्ती हो गया है।

धीरे-धीरे उसके कुछ मित्र बन गए जिससे वह कुछ खुश रहने लगा। सत्यनारायण, दीनानाथ उपाध्याय, किशोरी लाल, लूथर और नागराज। राव। उसके प्रिय मित्र थे। आज कल उसे विकट खांसी आने लगी थी। रात-रात भर उसे नींद नहीं आती थी।

एक दिन 1200 कर्मचारियों और इतने ही सैनिकों को लेकर एक स्पेशल ट्रेन बेंगलोर को रवाना हुई। आलोक भी इसी टोली में था। दो दिन ट्रेन पर लगे। तीसरे दिन वह टोली बेंगलोर पहुंच गईं। यहां भी अंग्रेज शिक्षक थे, परंतु इनका व्यवहार अत्यंत नम्र था। यहां की जलवायु बहुत अच्छी थी, जिससे उसकी खांसी दिन-पर-दिन कम होती गईं।

यहां उसे ड्रिल की शिक्षा दी जाने लगी। मिस्टर आरकिन्स उसके शिक्षक थे। लगभग तीस आदमी उनके शिक्षण में थे। वे एक अत्यंत ही नम्र स्वभाव के स्काटलैंड के निवासी अंग्रेज थे। पांच हफ्ते आलोक बेंगलोर में रहा और उसे कोई असुविधा नहीं हुई। अब उसका मन सैनिक जीवन में अभ्यस्त होता जा रहा था। पहले जो कार्य उसे असुविधाजनक मालूम पड़ते थे, अब वहीं सुविधाजनक मालूम पड़ने लगे। खांसी भी छाती पर अमृतान्जन मलने से कम हो चली थी। उसे घर की याद अब नहीं आती थी। नये मित्रों के बीच वह धीरे-धीरे बाह्य दुनिया को भूलता जा रहा था। बंगलौर में उसे ड्रिल और रायफल-परेड की पूरी शिक्षा दी गईं।

पांच हफ्ते बाद उसे सिकन्दराबाद भेज दिया गया। यहां उसकी फाइनल ट्रेनिंग शुरू हुई। शिक्षक थे सार्जेन्ट माइल्स। वे बड़े तीव्र स्वभाव के अंग्रेज थे, परंतु उदार भी थे।

सिकन्दराबाद में आने पर आलोक की खांसी एकदम अच्छी हो गईं। अब वह मिलिट्री सर्विस में एक प्रकार का आनन्द-सा अनुभव करने लगा। प्रातःकाल उठने पर नित्यक्रिया से निवृत हो वह शेविंग करता, जूते पर पालिश करता और फौजी वस्त्र धारण कर परेड पर चला जाता। यह उसका प्रतिदिन का कार्यक्रम था।

धीरे-धीरे ग्यारह हफ्ते सिकन्दराबाद में व्यतीत हुए। एक पहाड़ की तराई में किसी नवाब का ‘हरमनुमा’ महल था। उसी में सब रहते थे। अब आलोक की ट्रेनिंग खत्म हो चुकी थी, अतः अब उसकी नियुक्ति बम्बई में हुई। उसके अभिन्न साथी छूट रहे थे…नये साथी मधुकर पाण्डे, जेम्स एन्थनी, परोरा अब्दुल गनी, इकबाल अहमद, जगन्नाथ मुखर्जी, अतुलचन्द्र दास, हरि सिंह, मोहनलाल जायसवाल तथा गोविन्द चन्द्र मिश्र साथ जा रहे थे।

एक दिन बम्बई मेल इन दसों युवकों को लेकर बम्बई की विशाल नगरी में जा पहुंची।

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