अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

भीखम और घटा अभी-अभी खाना खाकर लेटे ही थे कि दरवाजे पर खटखटाहट की आवाज आई। भीखम बोला—‘देख तो बिटिया कौन आया है इस आधी रात को?’

घटा ने आकर दरवाजा खोला।

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हाथ के लालटेन के प्रकाश में आगन्तुक को देखते ही वह मारे खुशी के चीख उठी और लालटेन रखकर उससे लता की तरह लिपट गईं। आगन्तुक आलोक था। घटा को स्वप्न में भी विश्वास न था कि वह इतनी जल्दी लौट आएगा। अभी केवल पच्चीस दिन तो उसे गए हुए ही थे।

आलोक सामान भीतर लेकर आया तो भीखम चारपाई से उठ बैठा और आश्चर्यचकित मुद्रा में उसने पूछा—‘इस बार इतनी जल्दी कैसे छुट्टी मिल गईं, छोटे राजा?’

‘अब तो हमेशा के लिए छुट्टी मिल गईं, चौधरी काका!’ आलोक ने कहा।

‘हमेशा के लिए!’ हर्षोत्फुल हो उठी घटा।

‘हमेशा के लिए!’ भीखम बोला—‘चलो अच्छा ही हुआ, छोटे ठाकुर! हम लोग भी तुम्हारे बिना बहुत उदास रहते थे।’

आलोक और भीखम चौधरी अभी बात कर ही रहे थे, इतने में आलोक के लिए रसोई घर से कुछ खाना घटा लाकर रख गईं।

खाना खाकर आलोक चारपाई पर लेटा, तो भीखम से पूछा उसने—‘इधर गांव की कुछ खबर मिली काका?’

‘कुछ नहीं। गांव से तो अब कोई लाभ ही नहीं रहा, छोटे राजा! सबकी माया छोड़ दी। वैदराज से भी भेंट नहीं की। पता नहीं गांव में क्या हो रहा है?’ भीखम बोला।

‘मैं कल बनारस जाऊंगा, चौधरी काका!’ आलोक ने कहा—‘अब कुछ-न-कुछ तो करना ही होगा। सोच रहा हूं, होमियोपैथिक दवाएं और कुछ पुस्तकें ले आऊं और एक दवाखाना खोल दूं।’

‘जैसी तुम्हारी इच्छा ठाकुर, मैं मूरख आदमी क्या सलाह दे सकता हूं।’

दूसरे दिन आलोक बनारस गया। गुदौलिया पर एम. भट्ठाचार्य की दुकान से उसने आवश्यक दवाओं सहित एक बक्स खरीदा और दो पुस्तकें। एक तो नारायण चन्द्र घोष लिखित काम्पेरेटिव मेटेरिया मेडिका एण्ड थेराप्युटिक्स और दूसरी महेशचन्द्र भट्टाचार्य प्रणीत पारिवारिक भैषजतत्व। इनके अतिरिक्त एक थर्मामीटर, एक स्टेथिसकोप, एक पाटल ग्लोबुल्स, एक बोटल सुगर आफ मिल्क, दो बोटल डिस्टिल वाटर, ग्लेसरीन ओलिव ऑयल तथा अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदकर शाम की गाड़ी से वह मिर्जापुर लौट आया।

घर आकर देखा तो घटा बुखार में बुत पड़ीं थी। पीठ में कार बक उमड़ रहा था। सूजन बढ़ती चली जा रही थी। आलोक ने चटपट किताब खोली और लक्षण मिलाने बैठ गया। फोड़े में असह्य दर्द था, लाली थी, सूजन थी प्रदाह था। चटपट उसने बेलाडोना की 60 नम्बर की एक खुराक घटा को दे दी।

दो घंटे बाद पीड़ा कुछ कम हो गईं, मगर सूजन बढ़ती ही गईं। प्रातःकाल आलोक ने देखा तो फोड़ा काफी बड़ा हो चुका था, तब उसने हिपर सल्फ्यूरिस केल्केरियम 1000 नम्बर की एक खुराक दे दी।

दूसरे दिन प्रातः काल सूजन गायब थी—फोड़ा बैठ चुका था। वह उसकी पहली विजय थी।

‘तुमने जिला लिया इसे छोटे ठाकुर!’ भीखम ने कहा।

‘नहीं तो, मैं मर ही जाती!’

कहकर घटा ने काका की आंख बचाकर छोटे ठाकुर की ओर इस दृष्टि से देखा कि वह सिहर उठा—बाहुपाश में कस लेने की उसकी लालसा बलवती हो उठी। वह बेहोशी में आगे बढ़ा भी, पर ‘काका’ की उपस्थिति ने उसकी सब लालसाओं पर पानी फेर दिया।

एक हफ्ते बाद मकान के बाहरी हिस्से में आलोक का दवाखाना खुल गया। कुछ ही दिनों में हाथ का चमत्कार देख रोगियों की संख्या बढ़ने लगी। ख्याति दूर-दूर तक फैल गईं।

भीखम अब नौकरी छोड़कर दवाखाने में आलोक की सहायता करने लगा। आमदनी दिन-दूनी रात चौगुनी होने लगी। एक कंपाउंडर भी रख लिया था।

आलोक के साधारण खद्दर के वस्त्रों से एवं मित्र भाषण से सभी प्रभावित थे। घटा के लिए आलोक ने एक अध्यापिका रख दी थी, जो सुबह-शाम उसे आकर पढ़ा जाया करती थी। घटा की बुद्धि प्रखर थी। शीघ्र ही वह पढ़ने-लिखने लगी। घर में एक ब्राह्मणी खाना पकाने के लिए रख ली गईं।

दिन बीतते गए, परंतु आलोक अपने गांव न गया और न गांव से ही कोई आया।

‘अब तो तुम काफी पढ़-लिख गईं हो…।’ दवाखाने से अवकाश पाकर आलोक ने घटा को अकेली पाकर कहा।

‘जी हां, अब मुझे उस अध्यापिका की जरूरत नहीं।’ घटा ने सलज्ज भाव से उत्तर दिया।

‘क्यों?’ पूछा आलोक ने।

‘क्योंकि अब मुझे पढ़ा नहीं सकती। अब मैं आपसे ही पढ़ लिया करूंगी।’ घटा ने कहा। इस समय उसकी वेशभूषा एवं बातचीत से कोई यह नहीं कह सकता था कि यह वहीं ग्रामीण युवती घटिया है।

‘मुझसे नहीं पढ़ सकोगी, तुम।’

‘क्यों नहीं? तुम तो पढ़ाने के अतिरिक्त भी बहुत कुछ पढ़ा सकते हो।’ मुस्कराकर बोली वह।

‘तो इधर आओ, आज से ही पाठ आरम्भ कर दूं।’ कहकर आलोक के व्यग्र हाथों ने लाज से सिमटी हुई घटा को सीने से लगा, चूम लिया।

‘यही पढ़ना चाहती थी, न तुम?’ आलोक ने अपना बन्धन दृढ़ करते हुए कहा।

‘…..।’ उसने शोखी से मूक उत्तर दे दिया।

दोनों के नेत्र एक-दूसरे की काली पुतलियों में झांक रहे थे।

घटा की उठी हुई छातियां आलोक का सीना चूम रही थीं।

‘मैं सोचता हूं कि अब मैं अपनी शादी कर लूं।’ आलोक ने कहा।

‘मैं भी अपनी शादी कर लूंगी।’ घटा ने कहा।

‘किससे शादी करोगी तुम?’

‘आपसे…! और आप…?’

‘तुमसे।’

दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े। दूसरे ही क्षण दोनों दो शरीर एक जान एक हो गए।

आलोक दवाखाने में बैठा था। भीखम कुछ सामान लेने बाजार गया हुआ था। लौटकर आया तो बोला—‘सुना है, ठकुराइन अम्मा की तबियत बहुत खराब है छोटे ठाकुर!’

‘कैसे मालूम हुआ तुम्हें?’

‘अभी-अभी जैकरन अहीर बाजार में मिला था। उन्हीं के लिए कोई दवा लेने ठाकुर ने उन्हें शहर भेजा था।’ भीखम बोला।

‘और क्या कहां उसने?’

‘अरे, छोटे ठाकुर! वह तो सीधे मुंह बोला तक नहीं। बड़ी जल्दी में था। सिर्फ इतना ही कहकर चला गया।’ भीखम ने कहा।

आलोक कुछ सोचता रहा, कुछ क्षण बाद झटके से उठ खड़ा हुआ और बोला—

‘चौधरी काका! तुम यहां का काम संभालना। मैं गांव जाता हूं, पता नहीं कब तक लौटूं।’

‘तुम गांव जाओगे, छोटे ठाकुर?’ भीखम को आश्चर्य हुआ उसके इस आकस्मिक निश्चय पर।

‘जाना ही पड़ेगा भीखम काका! ऐसी विपत्ति के समय मान करना क्या उचित होगा? ठकुराइन दादी ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है, मेरे लालन-पालन में उन्होंने रात-दिन एक किया है। पिता की मुझे परवाह नहीं, पर उस स्नेहमयी मां और दादी की उपेक्षा कर मैं पाप का भागी नहीं बनूंगा, काका!’

दादी की चिंताजनक अवस्था का समाचार सुन, आलोक ने पिता के बर्बर व्यवहार की ओर से आंख मूंद ली। उसने दवाओं का एक छोटा-सा बक्स हाथ में लिया और दाढ़ीराम गांव की ओर चल पड़ा।

झिंगुरा स्टेशन तक तो वह इक्के पर आया, परंतु आगे तीन कोस का रास्ता पैदल तय करना था। अतः वह तेजी से चल पड़ा। उसे विश्वास था कि वह ज्यों ही गांव में प्रवेश करेगा, लोग उसे चारों और से घेर लेंगे और अनेक प्रकार के प्रश्न पूछ-पूछकर उसे परेशान कर डालेंगे।

परंतु वह आश्चर्य-चकित हो उठा, यह देखकर कि किसी ने उस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। गांव में प्रवेश करते ही जो मिलता, वह आदर के साथ झुककर जुहार करता और आगे बढ़ जाता। इसके अतिरिक्त, कोई कुछ न बोलता। एकाध ने उसे रोककर ठकुराइन अम्मा की तबियत का हाल पूछा—जैसे वह हमेशा से ही उस गांव में रहता आ रहा हो, जैसे वह कहीं गया ही न था, जैसे उसका इतने दिनों पर गांव वापस आना उन लोगों के लिए कोई कौतूहल जनक बात नहीं थी।

हवेली के दरवाजे पर वह पहुंचा तो पहरेदार ने मोढ़े पर से उठकर, उसे सलाम बजाया और चुपचाप खड़ा रहा। आलोक आश्चर्य के साथ-साथ व्यग्र हो उठा। व्यग्रता से उसने पहरेदार से पूछा।

‘बड़े ठाकुर कहां हैं?’

वे अभी नहीं लौटे हैं, छोटे ठाकुर!’ लठैत ने उत्तर दिया।

‘नहीं लौटे? तो, फिर गए कहां हैं? साफ-साफ क्यों नहीं बताया? सवाल कुछ जवाब कुछ?’

व्यर्थ समय न बरबाद करके वह हवेली के अंदर चला गया। ठकुराइन अम्मा के दरवाजे पर खासी भीड़ थी। उन्हें देखकर लोगों ने चुपचाप रास्ता दे दिया। वह आकर ठकुराइन अम्मा की चारपाई पर बैठ गया। तबियत बहुत खराब थी। बचने की आशा न थी। आलोक की मां भी वहीं थीं। उन्होंने पूछा—‘बहुत जल्दी लौट आए आलोक?’

आलोक सोचने लगा—इस प्रश्न का मतलब क्या है? आज सभी लोग उसके साथ अनोखा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?

‘बड़े ठाकुर कहां रह गए?’ पुनः पूछा ठकुराइन ने।

आलोक क्या बोलता। वह तो स्वयं आश्चर्यचकित था।

‘दवा लाए हो?’

आलोक, फिर भी चुप रहा।

‘वैदराज से भेंट नहीं हुई क्या?’

‘……।’

‘अरे तुम बोलते क्यों नहीं, चुप क्यों हो? बड़े ठाकुर ने कुछ कहा-सुना है क्या?’

आलोक इन अनोखी बातों से घबड़ा उठा। बोला—‘मेरी समय में नहीं आ रहा है कि आप लोग धोखे में हैं या मैं धोखे में हूं? आप सभी लोग ऐसी बातें कर रहे हैं जैसे मैं यहीं था, कहीं बाहर गया ही न था।’

‘गए तो थे!’ ठकुराइन ने कहा—‘अभी सुबह ठाकुर के साथ हाथी पर बैठकर वैदराज के घर पर दवा लेने गए थे।’

‘बात क्या है?’ ठाकुर का तीव्र स्वर सुनाई पड़ा।

लोगों ने देखा, दरवाजे पर आश्चर्यचकित मुद्रा में ठाकुर खड़े थे। उनकी बगल में खड़ा था राज—वर्तमान छोटे ठाकुर!

राज को देखते ही आलोक सारी परिस्थितियां समझ गया। राज ने आंख से कुछ इशारा किया। आलोक ने इशारे का मतलब समझ लिया। क्षण-मात्र में उसने ऐसा भाव-परिवर्तन कर लिया, जैसे वह राज को जानता ही न हो।

आश्चर्यचकित ठाकुर के चेहरे पर क्रोध की लालिमा दौड़ गईं। वे आगे बढ़े। चिल्लाकर बोले—‘तुम दोनों में से आलोक कौन है?’

राज उठकर खड़ा हो गया।

‘पहले ही से कहता आ रहा हूं कि मैं आलोक नहीं हूं,? मगर मुझे तो पागल समझ लिया था, आप लोगों ने।’ राज ने कहा।

‘धोखेबाज कहीं के!’ ठाकुर चिल्लाए।

‘धोखा आपने खुद खाया है ठाकुर! मेरा क्या दोष है?’ राजा घृणायुक्त स्वर में बोला—‘मैं तो एक क्षण भी इस नरक में नहीं रहना चाहता था। जहां दिन-रात गरीबों पर पाशविक अत्याचार होते रहते हैं, वहां क्या कोई शरीफ इन्सान रह सकता है?’

‘जबान को बहकने न दो युवक, नहीं तो मेरा गुस्सा बहुत खतरनाक है।’

‘आपके गुस्से की परवाह गरीब करते हैं, मैं गरीब होते हुए भी गरीब नहीं हूं। ईंट का जवाब पत्थर से देना जानता हूं।’

‘निकल जाओ यहां से!’ गरजे ठाकुर!

राज उलटे पांव लौट चला। राज के चले जाने पर ठाकुर को लगा जैसे उसके हृदय का कोना-कोना जल उठा है। उन्होंने आलोक की ओर देखा। जाने क्यों, हृदय में भयंकर उथल-पुथल मच गईं। उन्होंने आलोक से कुछ नहीं पूछा। यह भी नहीं पूछा कि वह इतने दिनों तक कहां था।

झल्लाए हुए बैठक में आकर वे गम्भीर चिंता में निमग्न हो गए।

चार दिनों तक ठकुराइन अम्मा का शरीर, जीवन और मृत्यु के बीच झूलता रहा। अंत में मृत्यु की विजय हुई।

आलोक को बिलखता छोड़कर स्वजनों के आंसुओं की तनिक भी परवाह न कर, बूढ़ी ठकुराइन शनिवार आधी रात को चांद और तारों की दुनिया में चली गईं।

क्रिया-कर्म सम्पूर्ण होने के दो दिन बाद तक आलोक वहां रहा मगर अब तक बड़े ठाकुर ने उससे एक प्रश्न भी नहीं पूछा था, न एक शब्द ही बोले थे।

ठकुराइन ने आलोक से कुछ प्रश्न अवश्य पूछे थे, जिसका उसने सन्तोषजनक उत्तर नहीं दिया।

सोलहवें दिन प्रातःकाल आलोक ने चलने की तैयारी कर दी। ठकुराइन उसका पैर पकड़कर रोने लगी, परंतु उसका हृदय तिल मात्र भी न पसीजा। ठकुराइन दौड़ी हुई ठाकुर के पास आयी और घबराई हुई आवाज में बोली—‘अब तो उसे रोक लो ठाकुर, वह जा रहा है।’

‘जाने दो।’ ठाकुर गम्भीर स्वर में बोले।

आलोक चला गया। किसी ने उसे नहीं रोका। वह घटा और भीखम के पास लौट आया।

घटा और भीखम ने ठकुराइन अम्मा की मृत्यु पर घंटों आंसू बहाए।

आलोक ने उनसे राज वाली घटना नहीं बताई।

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