अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

ठाकुर ने दिल भर न कुछ खाया, न पिया। उनकी आंखों में न जाने कहां की करुणा साकार हो उठी थी। ठाकुर का पहाड़ सा शरीर एक दिन में ही मुरझा गया था। आंखों के चारों और झुर्रियां पड़ गईं थीं। वे बैठक में व्यग्रता से टहलते रहे। एक क्षण के लिए भी गद्दी पर न बैठे। रात को बिस्तर पर पांव तक नहीं रखा।

अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

प्रातःकाल हो गया था। अब भी ठाकुर बैठक में टहल रहे थे। इसी समय लठैत ने भीतर प्रवेश किया।

‘आया वह?’

‘जी सरकार! बाहर खड़ा है—!’ लठैत ने उत्तर दिया।

‘भेजो उसे!’

लठैत चला गया। भीखम अन्दर आया। अब वह गांव का पद दलित भीखम न था। शुभ्र परिधान धारण किए हुए वह शहराती जैसा मालूम पड़ता था।

‘जुहार हो बड़े राजा!’

‘जुहार भीखम चौधरी!’ ठाकुर ने चुभती दृष्टि से भीखम को देखा।

भीखम को लगा जैसे उनकी आवाज भर्राई हुई है, उनके स्वर में पहले की-सी वह तीव्रता नहीं रह गईं, जैसे उनके शुष्क नेत्रों के पीछे आंसुओं का अगाध सागर छिपा है।

‘विश्वास नहीं था, भीखम चौधरी कि तुम आओगे।’ अब ठाकुर गद्दी पर बैठ गए थे।

‘भला बड़े ठाकुर का हुक्म मिले और मैं न आऊं? ऐसी हिमाकत कैसे कर सकता हूं—।’ भीखम नम्रतापूर्वक बोला।

ठाकुर का व्यवहार उसे आज बहुत गम्भीर मालूम हुआ।

‘अब बड़े ठाकुर न कहो, चौधरी! ठाकुर कहो…ठाकुर! अब छोटे ठाकुर रहे ही कहां? उस पर अब मेरा अधिकार ही कहां रह गया! अब तो वह तुम्हारे हैं।’

‘ऐसा न कहो, बड़े राजा! भला हम लोग आपकी सीमा से कहीं बाहर हैं? क्या हुक्म है…? कहिए!’ भीखम बोला।

ठाकुर धीरे से शुष्क हंसी हंस पड़े—‘मेरे हुक्म की अब कीमत ही क्या रही, चौधरी?’ ठाकुर उठकर पुनः टहलने लगे—‘सुना है, इसी महीने आलोक की शादी होने वाली है?’

सुनकर कांप उठा भीखम।

‘घटा और आलोक की जोड़ी तुम्हें भी पसंद आ गईं है, चौधरी? देश-जाति की कुछ भी परवाह न की तुमने?’ ठाकुर के स्वर में एकाएक तीव्रता आ गईं।

‘दुहाई बड़े ठाकुर की! इसमें मेरा कुछ भी कसूर नहीं। सब कुछ छोटे ठाकुर की राय से हो रहा है, राजा।’ भीखम निर्भयतापूर्वक बोला।

‘छोटे ठाकुर और घटा तो अभी जवान हैं, नासमझ हैं, मगर तुम तो बूढ़े हो चले हो चौधरी? सात पुश्त तक में कभी ऐसा हुआ था तुम्हारे? कभी ठाकुर और काछी में शादी-ब्याह की बातचीत सुनी?’

‘अब तो सब कुछ हो रहा है, ठाकुर!’ व्यंग्यात्मक स्वर में बोला भीखम।

‘हो रहा है सब कुछ!’ ठाकुर उपेक्षा से बोले—‘मेरी इज्जत पर पानी फेर दिया तुम लोगों ने। याद रखना, भीखम चौधरी! मैं सर्वनाश कर दूंगा, मगर यह शादी नहीं होने दूंगा।’

भीखम का शरीर अज्ञात भय से सिहर उठा।

ठाकुर पुनः गद्दी पर जाकर बैठ गए। शांत भाव से बोले—‘भीखम चौधरी! शायद तुम्हें याद होगा कि तुमने एक हजार रुपए मेरे पास धरोहर रखे थे।’

‘उसकी चर्चा न चलाओ ठाकुर! मैं पाई-पाई पा चुका हूं।’

‘पा चुके हो? मेरी तरह झूठ कब से बोलना सीखा तुमने, चौधरी?’

ठाकुर ने अपनी तिजोरी खोली। एक थैली भीखम के आगे रखकर बोले—‘ब्याह-शादी कर रहे हो। रुपये की जरूरत पड़ेगी, चौधरी! दस हजार हैं इस थैली में, एक हजार तुम्हारी धरोहर और नौ हजार में घर का हरजाना और शादी का खर्चा।’

भीखम ने चौंककर ठाकुर की ओर देखा, ठाकुर शांत थे। उनके मुख पर न हास्य था, न करुणा और न क्रोध। भीखम बोला—‘इतना न दबाओ ठाकुर! बहुत नमक खाया है तुम्हारा।’

‘तुम्हारी जगह-जमीन सब तुम्हें वापस करता हूं, चौधरी एक अच्छा-सा मकान बना लो। किराये के मकान में शादी करना ठीक नहीं।

भीखम ने आश्चर्यचकित मुद्रा से ठाकुर की ओर देखा। उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ठाकुर आज इतने उदय कैसे हो गए?

जो कुछ भी हो, उसे विश्वास करना ही पड़ा, ठाकुर के मुंह से अपनी जमीन वापस पाने की बात सुनकर उसे परम हर्ष हुआ।

‘अगले सोमवार से घर बनाने का काम शुरू हो जाना चाहिए।’ ठाकुर बोले—‘मुझे विश्वास है कि तुम मेरा कहां टालोगे नहीं और पहले की तरह गांव में रहने लगोगे।’

‘जरूर आऊंगा सरकार! किसान के पास जब तक जमीन रहे, वह दूसरी ओर ताकेगा भी नहीं…! मगर यह रुपया रख लो, सरकार!’

‘चुप रहो!’ ठाकुर की आवाज एकाएक तीव्र हो गईं—‘मेरी इज्जत तो ले ही रहे हो, अब क्या मेरा ईमान भी लेने का इरादा है तुम्हारा?’

‘सम्पत!’ ठाकुर ने पुकारा। लठैत तुरंत आ उपस्थित हुआ।

‘देखो! चौधरी के पास रुपये हैं। इनके साथ जाकर उन्हें शहर तक पहुंचा आओ।’ आज्ञा देकर ठाकुर अंदर चले गए।

भीखम कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं रह गया था।

आलोक के कुछ मित्र, जिसके ऊपर आलोक ने अपनी शादी के प्रबन्ध का कुल भार दे रखा था, वे सभी बैठे थे। आलोक और भीखम भी उपस्थित थे।

‘ठाकुर का कुछ भेद न मिल सका—।’ भीखम बोला—‘उन्होंने मेरे रुपए, जगह-जमीन सब लौटा दी है। बहुत-सी अन्य बातें भी हुईं, मगर मैं यह न समझ सका कि वे खुश हैं या नाराज।’

‘मेरी राय तो यह है—!’ एक मित्र ने कहा—‘जब ठाकुर ने आपकी जगह-जमीन लौटा दी है और घर बनवाने के लिए काफी रुपए भी दे दिए हैं, तो आप गांव में एक अच्छा-सा घर बनवाना शुरू कर दें। घर बन जाने पर घटा को लेकर वहीं रहे और वहीं से शादी हो। आलोक इसी मकान में रहेगा और यहीं से बारात जाएगी।’

‘हां! यह ठीक है।’ सब मित्रों ने एक स्वर से समर्थन किया।

दूसरे दिन भीखम गांव लौटा गया। मजदूर लग गए। बखरी बनने लगी। इस बीच ठाकुर ने न तो कभी भीखम को बुलवाया और न तो स्वयं आए। पता लगा कि उनकी तबीयत आजकल खराब रहती है।

शीघ्र ही एक अच्छी बखरी बनकर तैयार हो गईं। घटा और भीखम अब उसी में रहने लगे। भीखम शादी का सामान जुटाने लगा और आलोक के मित्रगण भी शादी के प्रबन्ध में जी-जान से जुट गए। शादी की तिथि निश्चित हो गईं। निमन्त्रण पत्र बांट दिए गए।

जिस दिन से राज गिरफ्तार हुआ, ठाकुर ने कभी ठीक से भोजन नहीं किया। आधा पेट खाकर बैठक में टहलते रहते। चारपाई पर तो मुश्किल से कभी लेटते। कभी-कभी दो-दो दिन बिना अन्न-जल के बिता देते। ठाकुर की पेड़ के तने-सी काया सूखकर टहनी हो गईं थी।

ठाकुर चारपाई पर गिरे तो, फिर उठे नहीं। उनकी हालत दिन-पर-दिन खराब होती गईं। कभी-कभी तो उन पर जैसे खून सवार हो जाता था। रह-रहकर प्रलाप करने लगते थे।

उस दिन चारपाई पर ठाकुर चुपचाप लेटे थे। वैदराज आए, धीरे से चारपाई पर बैठ गये—‘कैसी तबीयत है, बड़े ठाकुर?’ पूछा उन्होंने।

‘तबीयत की क्या पूछते हो, वैदराज? जी अब ऊब गया है, इस जीवन से।’

‘अब तो अपने पराये का ध्यान छोड़ो, ठाकुर…! आलोक को अपनाकर, मुंह में आग देने वाले का प्रबंध कर लो।

‘अपने-पराये का सवाल तो मेरी जिंदगी के साथ जाएगा, वैदराज! तुमने मुझे बहुत तड़पाया!’ ठाकुर अधिक बोलने के कारण हांफने लगे।

‘आज आलोक की शादी है ठाकुर!’

‘शादी!’ चौंककर उठ बैठे ठाकुर—‘शादी है आज?’

‘हां…!’ वैदराज ने कहा—‘भीखम के घर खूब साज-सजावट है। बारात अब आ ही रही होंगी। फूल-फुलवारी, आतिशबाजी—सब कुछ है, ठाकुर!’

‘सब कुछ है! बहुत खुशी की बात है वैदराज! परंतु एक तरफ बरबादी और दूसरी ओर शादी का एक विचित्र संगम है।’ ठाकुर अस्त-व्यस्त स्वर में बोले।

उसी समय—

दूर से बाजों की गूंज सुनाई पड़ने लगी।

आलोक की बारात लेहटा गांव की सीमा पर आ गईं थी। उस समय शाम हो चली थी।

‘वह देखो आतिशबाजी, ठाकुर!’ वैदराज ने हर्षोत्फुल होकर कहा।

ठाकुर ने देखा, अनगिनत छोटी-बड़ी रंग-बिरंगी चिनगारियां आकाश पर छिटक रही थी। ठाकुर को लगा जैसे उनके दिल के शत-शत खण्ड होकर आकाश पर अग्नि-स्फुल्लिंग की तरह छिटक रहे हैं।

दूसरे क्षण उनका शरीर चेतनाहीन हो चारपाई पर लुढ़क पड़ा। वैदराज ने दवा दी, परंतु तीन घंटे के पहले उन्हें होश न आ सका।

दूसरे दिन प्रातःकाल!

ठाकुर की तबीयत ठीक न थी। चारपाई पर निश्चेष्ट लेटे हुए थे। एक लठैत को पुकारा। लठैत आया तो उससे उन्होंने पूछा—‘उधर का क्या हाल है, सम्पत?’

‘किधर का हाल, सरकार?’ लठैत कुछ समझ न सका।

‘उधर का…?’ उत्तेजित हो उठे ठाकुर—‘भीखम के घर का!’

‘कल छोटे ठाकुर की शादी हो गईं सरकार!!’

‘हो गईं…? हो गईं शादी!’ बहुत उत्तेजित हो उठे ठाकुर!

आवेश में चारपाई पर से उठ खड़े हुए, परंतु शिथिलता के कारण गिर पड़े।

‘पानी…।’

एक लठैत अन्दर जाकर नींबू का शरबत ले आया ठाकुर ने शरबत पीकर कुछ शांति का अनुभव किया ।

‘सम्पत! ‘

‘जी सरकार…।’

‘मेरी मिर्जई पहना दे।’

लठैत ने देखा ठाकुर का चेहरा क्रोध एवं आवेश से लाल हो रहा है। उसने चुपचाप मिर्जई लाकर उन्हें पहना दी। ठाकुर चारपाई पर से उठ खड़े हुए। पैर कांपे, मगर पुनः संभल गए।

‘मेरी लाठी लाओ, सम्पत!’

लठैत अंदर जाने लगा।

‘सुनो।’ ठाकुर ने उसे रोका—‘उसमें बरछा भी लगा लाना। तुम लोग भी तैयार हो जाओ, अपनी लाठियों में बरछे लगा लो?’

लठैत चुपचाप भीतर चला गया।

‘कहां जाओगे, ठाकुर?’ ठकुराइन दरवाजे पर खड़ी थीं।

ठाकुर प्रज्ज्वलित नेत्रों से ठकुराइन की ओर देखकर बोले—‘खून करने का इरादा है ठकुराइन! बहुत दिनों से मेरे भाले को खून का स्वाद नहीं मिला…आज जी भरकर इसे खून पिलाऊंगा।’

‘अनर्थ न करो ठाकुर! वह भी अपना ही लड़का है।’

‘वह चमार का लड़का है, ठकुराइन! अपना लड़का होता तो ऐसा न करता!’

लठैत ठाकुर की लाठी ले आये। एक लम्बा बरछा लगा था उसमें।

ठाकुर ने लाठी पकड़ ली।

‘तुम लोग तैयार हो?’ पूछा उन्होंने।

‘जी सरकार! हाथी भी तैयार है।’

‘हाथी की जरूरत नहीं, आओ मेरे पीछे-पीछे!’ घूम पड़े ठाकुर!

हाथ में लम्बा बरछा लिए हुए आगे-आगे ठाकुर चले जा रहे थे और उनके पीछे-पीछे बरछा धारी पांचों लठैत।

महफिल जमी थी। वाद्य और संगीत से वातावरण रसमय हो रहा था। आलोक तथा अन्य मित्रगण आनन्द-विभोर थे। घबराए हुए वैदराज ने वहां प्रवेश किया। आलोक और भीखम को बुलवाया उन्होंने।

एकांत में आकर बोले—‘छोटे ठाकुर! गजब होना चाहता है। बड़े ठाकुर पागल से हो गये हैं। वे और पांचों लठैत बरछा लेकर इधर ही लपके आ रहे हैं।’

‘अब क्या होगा?’ भीखम घबराई हुई आवाज में बोला—‘ठाकुर को रोकने का ताब किसमें है?’

‘मुझमें है!’ दृढ़तापूर्वक आलोक बोला।

‘क्रोधित ठाकुर के नजदीक तुम्हारा जाना ठीक नहीं छोटे ठाकुर!’ वैदराज बोले—‘इस समय अनर्थ करके ही दम लेंगे बड़े ठाकुर!’

‘वे मेरे पिता हैं!’ आलोक ने कहा—‘मैं जाऊंगा। पिता कैसा भी क्रोधी न हो, बेटे के कलेजे में बरछा नहीं मार सकता। तुम लोग चुपचाप मेरे पीछे आओ। किसी को कुछ मालूम न हो।’

आलोक तेजी से उस ओर बढ़ा, जिधर से क्रोधित ठाकुर शीघ्रता से पैर बढ़ाते हुए चले आ रहे थे। वैदराज और भीखम आलोक के पीछे-पीछे दौड़े, ठाकुर ने दूर से ही आलोक को आते देखा। उनकी आंखों में खून उतर आया।

आलोक पास आ गया था। ठाकुर ने अपना बरछा ऊंचा किया। आलोक दौड़कर ठाकुर के पैरों पर गिर पड़ा। ठाकुर चिल्लाए—‘दूर हो, दूर हो कुल-कलंकी!’

आलोक न उठा, पैरों से चिपका रहा। ठाकुर का बदन कांप उठा। शिथिलता की एक लहर सी उनकी रग-रग में दौड़ गईं। हाथ कांप उठे। बरछा छूटकर गिर पड़ा। हृदय की हिंसक प्रवृति हवा के साथ उड़ चली। झुककर उन्होंने आलोक को उठा लिया। दूसरे ही क्षण लोगों ने देखा कि पिता और पुत्र अपने-पराये का विचार त्यागकर एक-दूसरे से लिपटे हुए हैं। ठाकुर का बदन कांप रहा था, आंखों से आंसू बह रहे थे, होंठों पर अर्ध-प्रस्फुटित मुस्कराहट खिल उठी थी। लठैत चुपचाप पीछे खड़े थे।

‘वैदराज!’ ठाकुर ने भर्राए गले से पुकारा।

वैदराज चुपचाप आगे बढ़ आये। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बह रहे थे।

‘मैं बहुत कमजोर हो रहा हूं वैदराज, मुझे सहारा दो।’ ठाकुर ने कहा।

वैदराज ने आगे बढ़कर उनका बोझ अपने कंधे पर संभाल लिया।

‘ठकुराइन को खबर कर दो, वैदराज…! घर में खूब सजावट करें। बहू हवेली में जाएगी।’

लठैतों में हर्ष उमड़ पड़ा। वैदराज तो नहीं, लठैत ही हवेली की ओर दौड़ चले।

‘भीखम चौधरी।’ ठाकुर ने पुकारा।

भीखम दौड़कर ठाकुर के पैर छूने चला तो ठाकुर ने खींचकर उसे छाती से लगा लिया—‘माफ करना, समधी! कल तबीयत बहुत खराब थी, इसलिए बारात में नहीं आ सका। पागलपन में जो भूल हो गईं, उसे क्षमा करो समधी।’

भीखम ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया।

सब लोग भीखम के घर आए। ठाकुर को इज्जत के साथ एक कमरे में बैठाया गया। थोड़ी ही देर में घूंघट काढ़े हुए घटा वहां आई और ठाकुर के पैरों पर अपना सिर रख दिया।

ठाकुर ने मिर्जई की जेब से सोने की ग्यारह गिन्नियां निकालकर घटा के हाथ पर रख दीं। बोले—‘उठो बिटिया…! आज मैं अपना रक्त मांस तुम्हें सौंपकर सारी चिंताओं से मुक्त हो रहा हूं। इसे—मेरी इस धरोहर को, अपनी जान देकर भी सुरक्षित रखना।’

बाहर शहनाई की मधुर ध्वनि अब भी गूंज रही थी।

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