जोगीबीर की दरी का पहाड़ी भाग आज कई सौ सशस्त्र पुलिस के जवानों से भर गया है। अंग्रेज पुलिस-सुपरिण्टेंडेंट भी साथ हैं, डी. काक है उसका नाम! सफेद कपड़ा पहने हुए एक खुफिया भी है साथ।
‘किधर है, वह झोंपड़ी जिसमें वह फरार कैदी छिपा है?’ डी. काक ने पूछा उस खुफिया से।
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‘वह सामने है, सर! उस बीहड़-सी झाड़ी के पीछे।’
डी. काक ने पुलिस को कुछ संकेत किया। पल-भर में पुलिस ने उस बीहड़ झाड़ी को तीन ओर से घेर लिया। झाड़ी के पीछे की ओर पहाड़ था। उसी झाड़ी के बीच में थी राज की गुप्त झोंपड़ी। दिन भर गुफा में और रात इसी झोंपड़ी में रहता था वह।
डी. काक ने पुनः संकेत किया। पुलिस ने अपनी बन्दूकों उस झाड़ी की ओर निशाना साधा। यद्यपि उस घनी झाड़ी के बीच क्या था, यह किसी को दिखाई नहीं पड़ रहा था, फिर भी डी. काक ने चिल्लाकर कहा—‘झाड़ी में कौन है? बाहर निकलो!’
किसी का साहस झाड़ी को चीरकर बीच में जाने का नहीं हो रहा था। उस दुर्दान्त क्रांतिकारी से सभी भयभीत थे। स्वयं डी. काक भी।
‘धांय!’ रिवाल्वर छूटने की आवाज आई। डी. काक के दो सिपाही आहत होकर जमीन पर लुढ़क पड़े। गोलियां झाड़ी में से आई थीं।
‘फायर!’
‘कड़-कड़-कड़क दुम्म!’ एक साथ सैकड़ों फायर हुए। सारा वन प्रांत भयंकर गर्जन से गुंजित हो गया।
‘धांय! धांय!’ पुन रिवॉल्वर की आवाज आई। आवाज के साथ ही चार सिपाही जमींन सूंघने लगे।
‘फायर?’ और जोर से चिल्लाए डी. काक।
‘दुम्म।’ सैकड़ों बन्दूकें एक साथ आग उगल उठीं।
‘धांय।’
‘दुम्म।’
‘धांय।’
‘दुम्म।’
‘…….।’ झाड़ी में से गोलियों की बौछार समाप्त हो गईं थी।
‘दुम्म।’
‘…….।’
‘मालूम होता है, उसके पास का कारतूस खत्म हो गया है।’ डी. काक बोले—‘सावधानी से आगे बढ़ो सब लोग।’
परंतु उसी समय किसी भयानक हाथी की चिंघाड़ से वन प्रांत गूंज उठा। सब चौंक पड़े। पुलिस दल ने देखा, सामने से एक विकराल हाथी सूंड ऊपर उठाये, चिंघाड़ता हुआ उन्हीं की ओर दौड़ा आ रहा है। एक अकेले क्रांतिकारी को पस्त करने के लिए आया हुआ वह पुलिस दल हाथी को देखकर पस्त-हिम्मत हो गया और उसमें अस्थिरता बढ़ गईं।
‘सब लोग अपनी जगह पर रहो।’ डी. काक ने आज्ञा दी—‘हाथी पागल हो गया है, जब इधर आए तो फायर कर देना।’
हाथी चीखता-चिंघाड़ता उनकी ओर ही दौड़ा आ रहा था। जब पांच सौ गज की दूरी पर रह गया, तो सिपाहियों ने अपनी बन्दूकें ऊंची कीं।
‘खबरदार! हाथी पर गोली न चलाना, नहीं तो एक-एक को बरछे से छेद डालूंगा—!’ पीछे से किसी की कठोर आवाज सुनाई पड़ीं।
डी. काक ने घूमकर देखा, ठाकुर हाथ में बरछा लिए, दौड़े चले आ रहे थे। उनके पीछे खासी भीड़ दौड़ती आ रही थी। सिपाहियों ने बन्दूकें नीची कर लीं।
ठाकुर दौड़ते हुए पास आ गए। सिपाहियों को देखकर भीड़ वहीं ठिठक गईं। सांस रोके हुए डी. काक ठाकुर का अतुलित साहस देख रहे थे। भला पागल हाथी के समीप जाने की किसकी हिम्मत हो सकती थी।
ठाकुर निर्भय होकर दौड़े जा रहे थे। उधर से क्रोधोन्माद हाथी दौड़ा आ रहा था, दोनों में से कोई भयभीत न था। केवल सौ गज का फासला अब रह गया था। हाथी के रंग-ढंग बकरे नजर आ रहे थे।
‘लौट आओ ठाकुर!’ भीड़ चिल्लाई—‘भागकर अपनी जान बचाओ।’
मगर ठाकुर ने जैसे सुना ही नहीं। हाथी एकदम पास आ गया था। हाथी सूंड ऊपर उठाकर, चिंगघाड़ता हुआ ठाकुर की ओर दौड़ा। ठाकुर ठिठक गए। भाले वाला हाथ ऊंचा किया और गरज कर बोले—‘ठहर जाओ, बहादुर! कहता हूं, ठहर जाओ।’
हाथी ने सुना ही नहीं। पास आकर जोर से चिंघाड़ मारी। ठाकुर का बरछे वाला हाथ तेजी से आगे बढ़ा। पलक मारते भर में लम्बा बरछा हाथी के मस्तक में पूरा का पूरा घुस गया।
क्रोधोन्मत हाथी ने ठाकुर को सूंड में लपेटकर ऊपर उठा लिया। भीड़ हाहाकार कर उठी। सिपाहियों ने अपनी आंखें मूंद लीं।
‘फायर! हाथी पर फायर करो।’ गरजे डी. काक।
सिपाहियों ने आंखें खोलकर बन्दूकें सीधी की और घोड़ों पर उंगली रखी ही थी कि एक कड़कड़ाती आवाज वातावरण में गूंज गईं।
‘खबरदार! गोली न चलाना, हाथी काबू में आ गया है।’
लोगों ने आश्चर्य के साथ देखा कि ठाकुर उन्मत्त हाथी की गर्दन पर सवार है और हाथी भीगी बिल्ली की भांति उन्हें लिए हुए आगे बढ़ा जा रहा है। उनकी उन्मत्तता, उग्रता अब शांत हो गईं थी।
पास आकर ठाकुर ने बैठने का इशारा किया। वह चुपचाप बैठ गया। ठाकुर नीचे उतरे तो वह, फिर खड़ा हो गया। भीड़ में से एक आदमी जंजीर ले आया। ठाकुर ने स्वयं अपने हाथों से हाथी के पैरों में जंजीर डाल दी। हाथी चुपचाप खड़ा रहा।
‘आप इतने सिपाहियों को लेकर यहां क्यों आए हैं?’ ठाकुर ने डी. काक से पूछा। वैदराज भी भीड़ में से निकलकर ठाकुर के पास चले गये।
‘जेल से भागा हुआ एक क्रांतिकारी यहीं गुप्त रूप से रहता है, उसे ही पकड़ने आए हैं हम।’ डी काक ने उत्तर दिया।
‘आप जानते हैं कि यह मेरी जमींदारी है। आपने मुझे खबर तक नहीं की।’
‘यह गलती जरूर हुई है, मगर डर यह था कि देर होने से कहीं वह भाग न जाए।’ डी. काक बोले।
‘कहां है वह क्रांतिकारी?’ पूछा ठाकुर ने।
‘इसी झाड़ी में एक झोंपड़ी है, उसी में वह रहता है।’ डी. काक ने कहा।
‘मैं देखता हूं उसे…।’ कहकर ठाकुर झाड़ी की ओर बढ़े।
‘आप उसके नजदीक न जाएं, रिवाल्वर है उसके पास।’ कहकर डी. काक ने ठाकुर का हाथ पकड़ लिया।
‘रिवाल्वर से आप भय खा सकते हैं, मिस्टर काक! पर ठाकुर नहीं।’ ठाकुर ने गर्दन ऊंची कर शान से कहा।
‘ठाकुर साहब! इतना गाफिल होना खतरनाक होगा…।’ डी. काक बोले—‘हमारी सैकड़ों की फौज उस एक आदमी का कुछ भी न बिगाड़ सकी और उसने जो फायर किए, उससे मेरे छह आदमी काम आ चुके हैं।’
‘ठाकुर ने जीना सीखा है, तो मरना भी जानता है, मिस्टर काक!’ कहकर ठाकुर झाड़ी में घुसे पड़े।
निर्भय राज बीच झाड़ी में खड़ा था। भाग निकलने के लिए परिस्थितियों पर विचार कर ही रहा था कि ठाकुर अकस्मात उसके सामने आकर खड़े हो गए।
‘तुम…?’ उसे देखकर ठाकुर चौंक पड़े—‘तुम क्रांतिकारी हो।’
‘हां।’ राज ने सीना तानकर स्वीकार किया।
‘मेरे साथ आओ।’ ठाकुर ने कहा।
‘ठाकुर साहब…।’ वह गरजा—‘मैं चाहूं तो आपको शूट कर अभी निकल भाग सकता हूं, पर ऐसा करूंगा नहीं—! क्योंकि आप मेरे ऐसे मित्र के पिता हैं, जिसके लिए मेरे प्राणों का कोई मूल्य नहीं। मेरा निकल भागना, आपको तबाह कर देगा। पुलिस के ये कुत्ते, आपको कभी क्षमा नहीं करेंगे।’
वह उसके पीछे-पीछे इस तरह झाड़ी से बाहर आया जैसे किसी ने इच्छाशक्ति का प्रयोग कर, उसे वश में कर लिया हो।
‘यह लीजिए, आपका आसामी!’ ठाकुर ने डी. काक से कहा।
डी. काक ने आगे बढ़कर राज के हाथों में हथकड़ी भर दी।
सिपाही उसे घेरकर खड़े हो गए।

वैदराज अब तक चुपचाप खड़े थे। अब दौड़कर ठाकुर के पास आये और व्यंग्यात्मक स्वर में बोले—‘ठाकुर! डाकू पकड़ने में तुम बहुत माहिर हो! जानते हो यह युवक कौन है, जिसके नाम से पुलिस भी कांपती है?’ ठाकुर के कान के पास मुंह ले जाकर उन्होंने कहा—‘यह तुम्हारा ही बेटा है।’
‘नहीं! कौन है यह?’
‘तुम्हारा और ठकुराइन का बेटा…।’ वैदराज घृणायुक्त हंसी हंसते हुए बोले—‘यही है वह मृत बालक, जिसकी जगह तुम्हारे ही पाप-पुत्र ने ले रखी है—! ये बातें बहुत धीरे-धीरे और सबसे अलग हटकर हो रही थीं, जिन्हें कोई सुन नहीं सकता था।
‘यही है? यही है वैदराज?’
‘हां, यही है वह, राज नाम है इसका।’
ठाकुर की आंखों में पानी भर आया। वे राज की ओर बढ़े।
‘बेटा राज।’
राज आश्चर्यचकित था। वह रहस्य से एकदम अनभिज्ञ था। ठाकुर के प्रति उसके हृदय में असीम घृणा तथा विद्वेष का भाव था। ठाकुर को अपने नजदीक देखकर वह गरज कर बोला—‘दूर रहो, निर्दयी, शैतान कहीं के, पास न आना, नहीं तो हाथ में पड़ीं हथकड़ी से तुम्हारी खोपड़ी तोड़ दूंगा। गरीबों को सताने वाले नर-पिशाच का बेटा कहलाने के पूर्व मैं इस दुनिया से उठ जाना चाहूंगा। तुम्हारे जैसे गद्दारों से ही तो जननी-जन्मभूमि त्राहि-त्राहि कर रही है?’ क्रोध से हांफने लगा राज!
ठाकुर ने अपनी आंखें मूंद लीं। सिर पकड़कर बैठ गए। वैदराज पास आकर बोले—‘देखा ठाकुर, यह है तुम्हारा बेटा! कितना साहसी, कितना वीर और कितना विशाल है इसका हृदय, तुम्हारे पास रहता, तो तुम जैसा निर्दयी होकर रह जाता। आज गौर से देखो उसे वह पुलिस के लिए आतंक है, जनता उसकी पूजा करती है, देश का यह सच्चा लाल है। भयानक क्रांतिकारी है यह तुम्हारा बेटा! तुम्हारी सात पुश्त की कलंक-कालिमा धुल गईं, ठाकुर!’ कहकर वैदराज जोरों से हंस पड़े।
‘चुप रहो, वैदराज! मुझे पागल न बनाओ, बहुत दुख दे चुके हो, तुम। ऐसा न कहो कि मैं बेकाबू होकर तुम्हारा गला दबा दूं।’ गरज पड़े ठाकुर!
भयानक अट्टहास किया वैदराज ने, अट्टहास सुनकर, उपस्थित पुलिस दल और उनके अधिकारी भी आश्चर्यचकित रह गए।
पुलिस राज को लेकर आगे बढ़ी। राज की कमीज के बटन के होल में कोकाबेली के फूल लगे हुए थे। उसे निकालकर उसने वैदराज को देते हुए कहा—‘आलोक और घटा की शादी में मेरा यह तुच्छ उपहार उन्हें दे देना, मामा!’

सिपाहियों की टोली उस वतन के दीवाने युवक को लेकर आंखों से ओझल हो गईं।
ठाकुर जीवन में आज दूसरी बार सुबक-सुबक कर रो रहे थे।
यहां केवल तीन प्राणी थे—ठाकुर, वैदराज और हाथी। ठाकुर शीघ्रता से हाथी पर जा बैठे और वैदराज को पीछे बैठने का संकेत किया।’
वे निस्संकोच आकर उनके पीछे बैठ गए।
हाथी इशारा पाते ही उठ खड़ा हुआ और झूमता हुआ हवेली की ओर चल पड़ा।
‘भीखम शहर में कहां रहता है, जानते हो वैदराज?’ पूछा ठाकुर ने। उनका स्वर आर्द्र था।
‘जानता हूं।’
‘तुम आज ही उसके पास चले जाओ और उससे कह देना कि मैंने उसे बुलाया है। आलोक और घटा को कुछ न मालूम हो!’
‘बहुत अच्छा!’ वैदाराज ने कहा।
