उन दोनों के जाने के बाद प्रेमप्रताप ने रिसीवर उठाया और डायल घुमाया। रिसीवर कान से लगा लिया।
कुछ देर बाद दूसरी तरफ से किसी लड़की की आवाज आई‒“हैलो…!”
गुनाहों का सौदागर नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
प्रेम ने धीरे से कहा‒“क्या अमृतजी घर पर हैं ?”
“आप कौन हैं ?”
“मैं प्रेमप्रताप हूं।”
“क्या कौन प्रेमप्रताप ?”
“आप शायद रीता देवी हैं ?”
“जी, हां। आप कौन से प्रेमप्रताप हैं ?”
“रीता बहन ! वैसे तो मैं वही मुजरिम प्रेमप्रताप हूं, जो आपके बापू की दुकान लूटने के चक्कर में पकड़ा गया था।”
“क्या ?” रीता शायद भड़क उठी थी‒“आपकी हिम्मत कैसे हुई यहां फोन करने की ?”
“आपका नाराज होना उचित है, रीता बहन। लेकिन आप सिर्फ अमृतजी को इतना ही बोल दीजिए कि मैं उनसे कुछ बात करना चाहता हूं। अमृतजी का रिएक्शन देखकर आपका मेरी तरफ से भी गुस्सा खत्म हो जाएगा।”
कुछ जवाब न मिला तो अमृत ने फिर से कहा‒“प्लीज, दर मत कीजिए। मैं छुपकर फोन कर रहा हूं।”
“होल्ड कीजिए। वह नीचे दुकान पर हैं। बुलाती हूं।”
“शुक्रिया ! लेकिन सबके सामने मेरा नाम न बताएं।”
लगभग एक मिनट बाद आवाज आई‒“हैलो…कौन…प्रेमप्रताप ?”
“हां, अभी रीता बहन से मुलाकात हो गई थी।”
“मैं से समझा लूंगा। उसे कुछ नहीं मालूम न ?”
“उसका दिल साफ हो जाना चाहिए।”
“तुम बताओ। तुमने क्यों फोन किया है ?”
“दरअसल शायद तुम्हें अमर ने बताया होगा कि मेरे ऊपर आक्रमण हुआ था।”
“हां, बताया था।”
और अमर ने एक पॉकेटमार से असलियत उगलवा ली थी ?
“मालूम है। हमला चौहान ने कराया था। कल शाम के अखबार में न्यूज भी आई है।”
“वही अखबार लेकर चौहान दौड़ा हुआ यहां आ गया हमदर्दी जताने।”
“अच्छा…!”
“और मैंने उसकी ही राजनीतिक चाल से उसे मात दे दी।”
“कैसे…?”
“मैंने कह दिया कि पॉकेटमार ने बताया था, नासिर के द्वारा शेरवानी साहब ने मेरे ऊपर कातिलाना हमला करा दिया था।”
“बहुत समझदार हो गए हो तुम भी।”
“यह सब अमर की संगत का प्रभाव है।”
“मैं आज ही अमर को यह खबर दे दूंगा।”
“अमर को एक खबर और देनी है।”
“क्या…?”
“कल रात ग्यारह बजे से पुराने शहर का कुख्यात गुण्डा नासिर गायब है और डैडी समझ रहे हैं कि उसे शेरवानी साहब ने छुपा दिया है।”
“यह भेद तुमसे पहले अमर को और फिर मुझे मालूम हो गया था।”
“क्या मतलब ?”
“नासिर अब इस दुनिया में नहीं है।”
“प्रेम ने चौंककर कहा‒“नहीं…!”
“हां ! उसे शेरवानी ने जहरीली शराब पिलाकर मार डाला। उसकी लाश उसके चाकू के साथ शेरवानी की कोठी की ही एक क्यारी में दबी है। लेकिन तुम किसी प्रकार की चिंता नहीं करो।”
“ओ॰ के॰ !”
प्रेमप्रताप ने जैसे ही रिसीवर रखा, वैसे ही बाहर से जोरदार शोर की आवाज आई। प्रेेमप्रताप चौंक पड़ा। शोर जगताप और चौहान ने भी सुन लिया। वे लोग भी आ गए और जगताप के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं।
उसने प्रेम से कहा‒“यह कैसा शोर है ?”
“मुझे पता नहीं। मैंने भी अभी-अभी सुना है।”
चौहान ने थूक निगलकर कहा‒“ऐसा लगता है, जैसे किसी बड़ी भीड़ ने धावा बोल दिया है।”
जगताप ने कहा‒“लगता तो ऐसा ही है।”
चौहान ने प्रेम से कहा‒“सोच क्या रहे हो, तुरन्त पुलिस को फोन करो।”
प्रेम रिसीवर उठाने ही लगा था कि अचानक बाहर से एक नौकर दौड़ता हुआ आया और जगताप से सम्बोधित होकर बोला‒“वह…वे लोग हैं।”
जगताप ने पूछा‒“कौन लोग ?”
“वही मालिक…हरिजन हैं…हजारों हैं।”
वे लोग चौंक पड़े।
जगताप ने कहा‒“हरिजन यहां क्या करने आए हैं ?”
प्रेमप्रताप ने बाहर की तरफ बढ़ते हुए कहा‒“नहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा।”
“डैडी ! वे लोग क्यों आए हैं‒यह तो मालूम हो ?”
“जरूर किसी ने भड़काया है। तुम पुलिस को फोन करो।”
“डैडी ! पुलिस के आने से वे लोग और भी ज्यादा भड़क जाएंगे।”
चौहान जल्दी से बोला‒“ठहरो…ठहरो…वे लोग क्या चीख रहे हैं।”
उन लोगों ने कान उधर ही लगा दिए। बाहर से आवाजें आ रही थीं‒“प्रेमप्रताप को बाहर लाओ।”
“हम प्रेेमप्रताप को देखना चाहते हैं।”
“प्रेमप्रताप कैसा है ?”
“हमें प्रेमप्रताप की खैरियत चाहिए।”
प्रेमप्रताप ने ठंडी सांस ली और बोला‒“सुन रहे हैं आप ?”
चौहान बोला‒“शायद उन लोगों ने कल शाम का अखबार देख लिया है।”
जगताप ने कहा‒“लेकिन कहीं यह उनकी कोई चाल न हो।”
प्रेमप्रताप ने कहा‒“डैडी ! आप तो ख्वामख्वाह इतना डर रहे हैं।”
फिर वह आगे बढ़कर बाहर निकला तो उसके पीछे जल्दी-जल्दी जगताप भी निकलता हुआ अपने नौकर से बोला‒“मेरी बंदूक लेकर आओ।”
चौहान भी उनके पीछे-पीछे निकल आया।
प्रेमप्रताप ने फाटक के पास जाकर अन्दर से फाटक का ताला खोला। फाटक खुला तो हजारों आदमियों की भारी भीड़ सामने नजर आई, जिसमें सबसे आगे दीपा थी।
दीपा के होंठों से कंपकंपाती आवाज निकली‒“प्रेम बाबू !”
फिर वह आगे बढ़ी और अत्याधिक बेचैनी से प्रेम की छाती से लगकर भर्राई हुई आवाज में बोली‒“शुक्र है भगवान तेरा। मेरी जान ही निकल गई थी।”
प्रेमप्रताप ने दीपा की पीठ थपकी और बोला‒“कुछ नहीं हुआ। मैं ठीक हूं।”
लखनलाल ने बढ़कर प्रेमप्रताप के सिर पर हाथ फेरा। साथ ही जन समूह पूरे उत्साह के साथ चिल्लाने लगा‒“प्रेमप्रताप…जिंदाबाद…!”
“प्रेमप्रताप की…जय…!”
“प्रेमप्रताप…अमर रहे…!”
“प्रेमप्रताप का बोलबाला…”
“प्रेम के दुश्मनों का…मुंह काला…!”
“प्रेम अब हमारा…जंवाई है…”
“प्रेम की तरफ नजर उठाने वाले के हम टुकड़े-टुकड़े कर देंगे।”
“हमें आक्रामकों के नाम बताओ।”
प्रेेमप्रताप ने लखनलाल से कहा‒“बाबूजी ! इन लोगों को समझाइए। मैं बिल्कुल ठीक हूं।”
“लेकिन बेटे, तुम पर हमला किसने किया था ?”
“कुछ लुटेरे थे जो सिर्फ मेरा वह पाऊच छीनकर ले गए जिसमें दस हजार रुपए की रकम थी‒और कुछ भी नहीं।”
“तुम्हें तो कोई कष्ट नहीं दिया ?”
“मैं आपके सामने खड़ा तो हूं। कोई खरोंच तक नहीं है।”
“मगर अखबार में तो लिखा था…”
“बाबूजी ! अखबार वाले तो बात का बतंगड़ बना देते हैं। आइए, आप लोग अन्दर चलिए और इन सबको समझाकर लौटा दीजिए।”
“ये लोग अब आसानी से नहीं जाएंगे।”
“मैं समझाऊं इन्हें ?”
“बेटे ! इन लोगों ने कुछ आदमी तय किए हैं, जिनमें से दस आदमी हर वक्त यहां तुम्हारे बंगले पर बंदूकों के साथ पहरा देंगे। और तुम कहीं जाओगे तो दो सशस्त्र आदमी तुम्हारे साथ जाया करेंगे तुम्हारी रक्षा के लिए !”
“बाबूजी ! मेरे लिए इतना बड़ा खतरा नहीं है।”
दीपा ने उससे कहा‒“जो कुछ तय हो हो चुका है। आप उसे नहीं बदल सकते। और सुनिए…अब मैं भी आपके ही बंगले में रहूंगी। एक मिनट आपको अकेला नहीं छोडूगीं।”
“दीपा ! तुम ख्वाम-ख्वाह…”
दीपा ने धीरे से कहा‒“मैं अमर भैया से मिल चुकी हूं।”
प्रेमप्रताप सन्नाटे में रह गया।
फिर लखनलाल ने चौकीदार के स्टूल पर खड़े होकर भीड़ को समझाया और बड़ी मुश्किल से वे लोग वापस जाने पर सहमत हुए। फिर भी पहरे के लिए जो दस आदमी नियत किए गए थे, वे कम्पाउंड के अन्दर आ गए। उनके पास लाइसेंस वाली बंदूकें भी थीं।
उस समय चौहान का चेहरा देखने योग्य था।
शाम ढले अमर और अमृत पार्क में मिले। अमृत ने अमर को प्रेमप्रताप के टेलीफोन के बारे में बताया तो अमर ने कहा‒“बहुत समझदारी के काम लिया है प्रेम ने !”
“बेशक…!”
“चौहान ने यहां भी दांव खेल ही दिया। खबर खुद ही छपवाई और खुद ही खैरियत मालूम के लिए जगताप के पास पहुंच गया।”
“ओहो, वह खबर उसने छपवाई थी ?”
“हां, वह परेशान था कि पॉकेटमार को कार में उठाकर ले जाया गया है। वह गायब है। फिर भी जगताप ने क्यों रिपोर्ट नहीं कराई इस हमले की।”
“खूब…!”
“यह भी अच्छा हुआ कि उस समय वहां चौहान मौजूद था, जब हजारों हरिजनों की भीड़ प्रताप की खैरियत मालूम करने पहुंची।”
“ओहो…!”
“मैंने दीपा को जैसा समझाया था, उसने वैसा ही किया। अब वह प्रेम के साथ ही रहेगी और प्रेम की सुरक्षा के लिए दस हरिजन नौजवान बंदूकों के साथ तैनात रहेंगे। दो सशस्त्र नौजवान प्रेम के बाहर निकलने पर उसके साथ कार में रहा करेंगे।”
“यह कहो, उसने चौहान के हाथ काट दिए।”
“जरूरी था, क्योंकि चौहान चुप नहीं बैठ सकता था। मैं अगर सिर्फ प्रेमप्रताप की सुरक्षा के लिए ही सारा समय लगा रहता तो और कुछ न कर पाता।”
“अच्छा, सुनो। मैंने प्रेम को नासिर के बारे में बताकर भूल तो नहीं की ?”
“बिल्कुल नहीं। अब प्रेम पर हम पूरा भरोसा कर सकते हैं। दीपा उसके बंगले में ही रहेगी तो उस बंगले में होने वाली गतिविधियों से हमें सूचित करती रहेगी।”
कुछ देर रुककर अमृत ने कहा‒“पिछले एक सप्ताह से सिविल लाइन एरिया में किसी वारताद की खबर नहीं सुनी।”
“वारदातों के जिम्मेदार ऊपर जा चुके हैं। एक बदल चुका है। उसके अलावा अब शहर का गुंडा नासिर भी नहीं रहा। वह अपने ही संरक्षक के हाथों मारा गया।”
“अब शहर में भी कुछ अन्तर पड़ेगा ?”
“शायद ! क्योंकि पहले जगताप, शेरवानी, चौहान‒तीनों मिलकर ही सबकुछ करा रहे थे। अब स्थिति बिल्कुल अलग है। चौहान…प्रेम और जगताप का दुश्मन। जगताप शेरवानी का दुश्मन है। शेरवानी चौहान का दुश्मन।”
अमृत हंसकर बोला‒“तुमने तीन षड्यंत्राकारी दिमागों की चूलें ढीली कर दी हैं। अगर तुम भी किसी षड्यंत्रकारी दल से संबद्ध होते तो क्या होता ?”
“मेरा जन्म शायद अपराधियों के इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए हुआ था। उसे शक्ति पहुंचाने के लिए नहीं हुआ था।”
“सच कहते हो तुम। अच्छा, अब अगला कदम क्या होगा ?”
“कुछ दिन सुन-सुन लेनी पड़ेगी। फिर कुछ तय करेंगे ?”
फिर वे लोग कुछ और मामलों पर विचार-विमर्श करने लगे।
चौहान के कमरे के बंगले के विशेष भेंटकर्ताओं के कमरे में नासिर के आठ साथी बैठे थे। आठों विभिन्न अपराधों में सजाएं भी काट चुके वे। पुलिस की थर्ड-डिग्री ने उन्हें काफी मजबूत भी कर दिया था और वे लोग विभिन्न अपराधों के माहिर भी थे।
चौहान कह रहा था‒“तो तुम लोगों में किसी को भनक भी नहीं मिली कि नासिर कहां गया ?”
एक ने जवाब दिया‒“जी, नहीं।”
दूसरा बोला‒“उस रात अगर हमें जरा-सा सन्देह भी हो जाता तो हम लोग नासिर का पीछा जरूर करते और पता ही लगाते कि वह निबटने के बहाने कहां जा रहा है।”
“और उस पॉकेटमार का भी नहीं, जिसे प्रेमप्रताप अपनी कार के बोनट पर लटकाये हुए भागता हुआ चला गया था ?”
“जी, नहीं। अगर प्रेमप्रताप इस तरह न भाग खड़ा होता तो अब तक उसकी राख का भी पता न होता कि कहां गई।”
तीसरा बोला‒“हमें अपने चेतनजी की रक्षा के लिए भी नियुक्त किया होता तो उन्हें कुछ न होता।”
चौहान ने हाथ ऊपर उठाकर कहा‒“अच्छा, जो होना था हो चुका। लेकिन मेरा नाम चौहान है। मैंने बड़े-बड़े नेताओं के दांत खट्टे किए हैं और इस मोर्चे पर भी मैं हारना नहीं चाहता।”

“हमें बताइए क्या करना है ?”
“अब तुम में से एक को नासिर की जगह लेनी है। यह फैसला तुम लोग आपस में ही करके मुझे बताओ कि कौन नासिर की जगह लेगा।”
एक ने कहा‒“यह गोगा नासिर की जगह लेगा।”
बाकी लोग भी बोल उठे‒“हम सहमत हैं। हम गोगा को अपना सरदार मानते हैं।”
चौहान ने नोटों की एक गड्डी निकालकर उसके सामने डाली और बोला‒“ये अस्सी हजार हैं। दस-दस हजार आपस में बांट लो।”
गड्डी गोगा ने उठा ली और बोला‒“अब हमें स्कीम बताइए।”
चौहान ने कहा‒“पिछले सप्ताह से सिविल लाइन में कोई वारदात नहीं हुई। अब दो दिन से पुराने शहर में भी सन्नाटा है।”
“कहां से शुरुआत करें ?”
सिविल लाइन से। शहर के दोनों हिस्से अब तुम आठों के जिम्मे हैं। तुम चार-चार का ग्रुप बनाओ या जैसा भी उचित समझो।”
“ठीक है।”
“सिविल लाइन में किसी भी खतरे के समय इन्स्पेक्टर दीक्षित संभाल लेगा और शहर में इन्स्पेक्टर सिंह। इन दोनों को मैं आज खबर किये दे रहा हूं।
“ठीक है। अब हमें आज्ञा दीजिये।”
“काम आज ही से शुरू होना चाहिए।”
“आप इत्मीनान रखिये।”
“शुरुआत के लिए भी मैं ही तुम्हें टिप देता हूं।”
“फरमाइए…?”
“हालात का रुख वाला सुखीराम की दुकान की लूट से ही बदला था। अब दोबारा शुरुआत भी लाला सुखीराम के परिवार से ही हानी चाहिए।”
“किस प्रकार ?”
“सुखीराम की बेटी‒रीता। वह आठ बजे से दस बजे रात तक राजघाट रोड के एक कोचिंग सेंटर में जाती है।”
“फिर…?”
“बस, आज रात उसे सुहागिन बना दो। बहुत सुन्दर है। तबियत खुश हो जाएगी।”
“बेहतर है। आज रीता ही सही।”
“बस, अब तुम जा सकते हो। मुझे रोजाना की रिपोर्ट मिलनी चाहिए।”
वे लोग उठ गए।
रात के ठीक दस बजे अमृत ने मोटरसाइकिल कोचिंग सेंटर के बाहर रोक ली। रीता को पहुंचाने और वापस ले जाने अमृत खुद ही आता-जाता था।
कुछ देर बात कोचिंग की क्लासें खत्म हुईं और सेंटर में से लड़के-लड़कियों की भीड़ निकलती नजर आई।
अमृत ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और रीता पीछे बैठ गई। मोटरसाइकिल चल पड़ी। जैसे ही मोटरसाइकिल आर॰ टी॰ ओ॰ से आगे आकर राजघाट रोड से मद्रास रोड की दिशा में मुड़ी।
अचानक एक तरफ से किसी ने मोटरसाइकिल के आगे चौखट-सी फेंकी।
मोटरसाइकिल का अगल पहिया उसके ऊपर चढ़ गया। अमृत सन्तुलन न बनाए रख सका। मोटरसाइकिल एक तरफ गिरी। साथ अमृत और रीता भी गिरे। रीता के मुंह से चीख निकल गई, क्योंकि वह कलाबाजी खा गई थी। पुस्तकें भी गिर गई थीं।
इससे पहले कि अमृत संभलता, अंधेरे में से दो लड़कों ने निकलकर रीता को पकड़ा। एक ने रीता को मुंह दबोच लिया। दो ने अमृत को घेरकर उसकी छाती पर रिवाल्वर और पीठ पर चाकू रख दिया।
एक ने गुर्राकर कहा‒“चुपचाप घर चले जाओ, साले साहब।”
अमृत ने थूक निगलकर कंपकंपाती आवाज में कहा‒“क…क…कौन हो तुम लोग ?”
दूसरे ने जवाब दिया‒“तुम्हारे होने वाले जीजा।”
“खामोश…!”
“हा…हा…हा…बुरा मत मानो, साले साहब। हर साले की बहन के कपड़े एक-न-एक दिन तो उतरते ही हैं।”
“मैं…मैं…तुम लोगों को जिन्दा नहीं छोडूंगा।”
“मगर हम लोग तुम्हें भी जिंदा छोड़ रहे हैं। तुम्हारी बहन को दो घण्टे के बाद जिंदा मौरिस रोड के चौराहे पर छोड़ जाएंगे।”
“हरामजादो ! मैं तुम लोगों का खून पी जाऊंगा।”

“जरूर पीना। पहले अपनी बहन को तो पीने दो।”
फिर एक ने मोटरसाइकिल उठाई और रिवाल्वर दिखाकर अमृत से बोला‒“चलो, शराफत से बैठो और चले जाओ, वरना तुम्हारे सामने ही हमें तुम्हारी बहन नंगी करनी पड़ जाएगी।”
अचानक उसके मुंह से ‘हिच’ की आवाज निकली और वह किसी न नजर आने वाली चीज को अपने गले में बुरी तरह निकालने की कोशिश करता हुआ अंधेरे की तरफ खिंचता चला गया।
रीता थरथर कांप रही थीं
रिवाल्वर वाले ने चिल्लाकर कहा‒“अबे…ओ सुंदर !”
उसका ध्यान दूसरी तरफ देखकर अमृत ने एक हाथ उसके रिवाल्वर पर डाला और दूसरे हाथ का भरपूर घूंसा उसके जबड़ेे पर रसीद किया।
उसके हाथ से रिवाल्वर निकल गया और वह बिलबिलाकर पीछे हटता चला गया।
अमृत ने रिवाल्वर का रुख उन दोनों की तरफ किया, जिन्होंने रीता को पकड़ रखा था और गुर्राकर बोला‒“छोड़ो इसे, वरना फायर करता हूं।”
दोनों ने बौखलाकर रीता को छोड़ दिया‒“भैया…!”
रीता तड़पकर अमृत से आकर लिपट गई।
अमृत ने कहा‒“घबराओ मत। अब यह कुत्ते तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।”
अगले ही पल अन्धेरे में से कोई भारी-सी चीज एक बदमाश के सिर पर लगी और वह छटपटाकर अपना सिर दोनों हाथों से पकड़े हुये सड़क पर लेट गया। दूसरे की भी यही दशा हुई। तीसरा, जो पहले ही घूंसा खा चुका था, भागने की पोजीशन में नजर आया तो उसकी टांगों पर लगभग दो फुट का एक मजबूत और मोटा-सा डंडा आकर टकराया और वह औंधे मुंह गिरा।
अन्धेरे में से किसी की आवाज आई‒“तुम अपनी बहन को लेकर चले जाओ। ब्लैक टाइगर इन लोगों को देख लेगा। इनका रिवाल्वर अंधेरे में आवाज की दिशा में फेंक दो। ये लोग मेरे रिवाल्वर की मार पर हैं, जो भागने की कोशिश करेगा, उसे गोली मार दूंगा।”
अमृत ने रिवाल्वर अंधेरे में फेंक दिया। मोटरसाइकिल स्टार्ट की और रीता से बोला‒“चलो, बैठो…।”
रीता कंपकंपाती हुई बैठ गई।
मोटरसाइकिल की रोशनी जब मौरिस रोड के चौराहे से निकल गई तो अचानक अंधेरे में एक काली पतलून-कमीज वाला निकला, जिसके चेहरे पर काला रूमाल बंधा हुआ था। आंखों पर काले शीशेे की ऐनक।
उसके रिवाल्वर का रुख उन तीनों की तरफ था। चौथे का गिरेबान उसके हाथों में था। उसने चौथे को उन तीनों की तरफ धक्का दिया और गुर्राया‒“जिसने भी दस मीटर से आगे भागने की कोशिश की उसका भेजा एक गोली चाट लेगी। अब तुम में से एक वह डंडा उठाकर मुझे दो।”
एक ने डंडा उठाकर दे दिया। स्याहपोश बाएं हाथ से रिवाल्वर पकड़े रहा। दाएं हाथ से उसने आगे वाले बदमाश के कंधे पर डंडा मारा। वह छटपटाकर चीखा ओर उसका दायां हाथ इस तरह झटक गया, मोनो कंधे की हड्डी के चटकने की आवाज आई और वह सड़क पर गिरकर छटपटाने लगा।
फिर यही हाल दूसरे का हुआ, तीसरे का, फिर चौथे का। कुछ देर बाद वे चारों आने एक-एक हाथ, एक-एक पांव तुड़वाए सड़क पर बेहोश पड़े थे।
अमर ने उनकी कमर पर ठोकर मारी और आराम से चल पड़ा।
एक पब्लिक टेेलीफोन-बूथ के सामने आकर उसने इधर-उधर देखा। अन्दर घुसकर उसने रिसीवर हुक से उतारकर डायल घुमाया। जैसे ही दूसरी तरफ से आवाज आई‒“हैलो…।” उसने सिक्का छेद में डाला।
अमर ने कहा‒“अरे, नेताजी। आपने अभी तक पी नहीं ?”
“कौन हो तुम…?”
“गोगा…!”
“ओहो, गोगा…क्या हुआ ?”
“सफलता।”
“लाला की लड़की उठा ली ?”
“बिल्कुल…?”
“अरे, गधे। मुझे फोन करने की क्या जरूरत थी ?”
अमर ने हल्का-सा कहकहा लगाया तो चौहान ने खीझकर कहा‒“हंस क्यों रहा है ?”
अमर ने जवाब दिया‒“इसलिए कि लाला कि लड़की खैरियत के साथ घर पर पहुंच गई।”
“हें…अब, फिर उठाया क्यों था ?”
“नेता के दास नेताजी का हुक्म टाल सकते थे ?”
कुछ चौंककर कहा गया‒“कौन हो तुम ?”
अमर न अचानक गंभीरता से कहा‒“ब्लैक टाइगर !”
“यह क्या बला है ?”
“इस बला के बारे में गोगा के चारों गुंडों से पूछ लेना। मैंने तुम्हें इसलिए फोन किया है, नेता कि मैंने तुम अपराधियों का चक्रव्यूह तोड़ने के लिए जन्म लिया है।”
“क्या बकते हो ?”
राजघाट से मौरिस रोड की तरफ के मोड़ पर तुम्हारे चारों पार्सल पड़े हैं। चाहो तो उन्हें अभी उठवा लो, चाहे पड़ा रहने दो। गुड-नाइट !”
फिर उसने रिसीवर रख दिया और आराम से बाहर निकलकर सड़क पर चल पड़ा।
