प्रेमप्रताप जब थ्री-व्हीलर से उतर कर अपने बंगले में पहुंचा तो जगताप उसे देखकर इस प्रकार उछल पड़ा, जैसे कोई अजूबा देख लिया हो‒“अरे, तुम यहां कैसे ?”
प्रेमप्रताप ने विस्मय प्रकट करते हुए कहा‒“मैं समझा नहीं, डैडी।”
“मेरा मतलब है, तुम कहां से आ रहे हो ?”
गुनाहों का सौदागर नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
“एक बॉर है। पता नहीं, कब कितनी पीता हुआ बॉर में पहुंच गया था। पीते-पीते बेहोश हो गया। वहां के मैनेजर ने मुझे दफ्तर के एक सोफे पर लिटा दिया।”
“थोड़ी देर में मुझे होश आया तो मैं उठकर इधर की ओर भाग आया।”
जगताप की आंखें हैरत से फटी रह गईं। उसने होंठों पर जुबान फेरकर कहा‒“इसका मतलब है, तुम कहीं और गए ही नहीं ?”
पप्पी ने फिर हैरत से कहा‒“आखिर, मैं और कहां जाता ?”
“क्या तुम्हें चेतन नहीं मिला ?”
“नहीं तो…”
“और तुम्हें यह भी याद नहीं कि शेरवानी साहब ने तुम्हें कुछ बताया था ?”
“शेरवानी अंकल ने ? क्या बताया था मुझे ?”
“उन्होंने तुम्हें जो कुछ बताया था‒“बिल्कुल याद नहीं ?”
“पूछ तो रहा हूं। ऐसा क्या बताया था उन्होंने ?”
इससे पहले की जगताप कुछ बोलता, एकाएक टेलीफोन की घंटी की आवाज आई और जगताप बुरी तरह उछल पड़ा।
फिर उसने रिसीवर उठाकर कहा‒“हां, मैं जगताप…”
दूसरी तरफ से चौहान की ठंडी आवाज आई‒“मैं…आपका दोस्त…चौहान !”
जगताप के दिमाग को झटका-सा लगा। उसने कहा कहिए, मिस्टर चौहान !”
“क्या आपको मालूम है कि मेरे बेटे चेतन का खून हो गया ?”
“जगताप सचमुच उछलकर खड़ा हो गया‒“क्या ? चेतन का खून हो गया ?”
“जी, हां।”
“मगर कहां ? कब ? कैसे ?”
“अकरोली के रास्ते में…नहर के पश्चिमी किनारे पर कुछ घंटे पहले…!”
“हे भगवान, किसने मार डाला ?”
“इंस्पेक्टर दीक्षित ने !”
“लेकिन क्यों ?”
“इंस्पेक्टर दीक्षित का कहना है कि चेतन का खून आपके बेटे प्रेेमप्रताप ने किया है।”
“मेरे बेटे प्रताप ने ?”
“जी हां…!”
“तो इंस्पेक्टर दीक्षित क्यों पकड़ा गया ?”
“उसका कहना है कि उसने चेतन को गोली चलाते देखा। रिवाल्वर अपने कब्जे में लेकर उसने प्रताप को हिरासत में लेना चाहा। लेकिन पता नहीं किसने उसकी कनपटी पर पत्थर मारकर उसे बेहोश कर दिया और उसके हाथ में रिवाल्वर थमाकर भाग गया।”
“यह बात आपको कैसे मालूम हुई ?”
“मुझे किसी ने फोन पर खबर दी थी।”
“क्या खबर दी थी ?”
“यही कि अमुक स्थान पर चेतन की लाश पड़ी है। उसे इन्स्पेक्टर दीक्षित ने मारा है और इन्स्पेक्टर दीक्षित के गोली चलाने से पहले चेतन ने इन्स्पेक्टर को पत्थर खींचकर मार दिया था। बेहोश होते-होते उसने चेतन पर गोली चला दी।”
“फिर आप प्रताप को क्यों कातिल समझ रहे हैं ?”
“यह दीक्षित का बयान है।”
“अरे, प्रताप तो कुछ घंटे पहले यहीं था। उसने बहुत पी ली थी। यहां से बाहर चला गया। बॉर में और ज्यादा पीकर बेहोश हो गया। बॉर में मैनेजर ने उसे सोफे पर लिटा दिया। अभी उसे होश आया तो वह सीधा घर चला आया।”
“अच्छा…!”
“क्या आपको विश्वास नहीं हुआ ?”
“प्रताप कहां है ?”
“मेरे पास खड़ा है।”
“उसे फोन दीजिए।”
“देता हूं।”
जगताप ने थूक निगलकर प्रताप की तरफ फोन बढ़ाते हुए कहा‒“चौहान अंकल से बात करो।”
प्रताप ने रिसीवर लेकर कहा‒“हैलो, अंकल चौहान !”
“प्रताप ! तुम पिछले चार घंटे से कहां थे ?”
“ब्लू-मून बॉर में। मदहोशी की दशा में यहां से निकला था। फिर पता नहीं, कैसे बॉर में पहुंच गया। वहां और पीकर बेहोश हो गया। मैनेजर ने मुझे अन्दर लिटा दिया। अभी वहीं से आ रहा हूं।”

“बॉर का मैनेजर पुष्टि कर देगा ?”
“आप उसे थाने बुलाकर मालूम कर लीजिए।”
“क्या तुम आज चेतन से मिले ही नहीं ?”
“मैं अपने होश में ही नहीं था।”
“चेतन का खून हो गया है।”
“नहीं…!” प्रेमप्रताप सचमुच रो पड़ा और जगताप उसे ध्यान से देखता रहा। दूसरी तरफ खामोशी रही। बड़ी मुश्किल से प्रताप ने सिसकियों के बीच कहा‒“मुझे विश्वास नहीं होता, अंकल !”
उसकी लाश शरदपुर के थाने में है। इन्स्पेक्टर दीक्षित खूनी की हैसियत से पकड़ा गया है। मगर वह तुम्हारे ऊपर आरोप लगा रहा है।”

“तो फिर आप मुझे गिरफ्तार करा दीजिए। आप कहें तो मैं इकबालिया बयान भी दे दूं।” कहते-कहते वह फिर से रो पड़ा।
चौहान ने धीरे से कहा‒“धीरज रखो, बेटे !”
फिर सम्पर्क कट गया।
प्रेमप्रताप ने रिसीवर जगताप को दिया और धम्म से सोफे पर बैठकर नन्हे बच्चे की तरह फूट-फूटकर रोने लगा।
जगताप के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। आंखें फटी हुई थीं।
