शेरवानी कार से उतरकर तेज-तेज चलता हुआ भीतर पहुंचा। चौहान को देखकर वह ठिठककर रह गया। फिर आगे बढ़कर बोला‒“नेताजी, क्या यह खबर सच्ची है ?”
चौहान ने गम्भीरता से जवाब दिया‒“सच्ची है।”
शेरवानी इस प्रकार कुर्सी पर बैठ गया, मानो टांगों की जान निकल गई हो।
गुनाहों का सौदागर नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
उसने भर्राई हुई-सी आवाज में कहा‒“यह क्या हो रहा है ? तीन दिन से मेरा भानजा लापता है। हर पहचान वाले को तार दे-देकर मालूम किया, ट्रंक-कॉल किए, मगर कहीं पता नहीं चला और आज…आज यह इतना गजबनाक हादसा हो गया।”
“शेरवानी साहब, होनी को कौन टाल सकता है।”
“मगर यह हुआ कैसे ?”
“इन्स्पेक्टर दीक्षित ने पता नहीं क्यों उसे गोली मार दी ?”
शेरवानी उछल पड़ा‒“क्या ? इन्स्पेक्टर दीक्षित ने ?”
चौहान ने उसे ध्यान से देखकर पूछा‒“फिर आप हत्यारा किसे समझ रहे थे ?”
“अरे, मैं समझ रहा था। किसी दुश्मन के हाथों ऐसा हुआ है।”
“इन्स्पेक्टर दीक्षित ने भी कोई दुश्मनी ही निकाली होगी। और अब वह सेठ साहब के बेटे प्रेमप्रताप पर आरोप लगा रहा है।”
“नहीं…!”
“प्रेमप्रताप अपने घर पर ही है।”
“आपने बात की उससे ?”
“हां, वह पिछले चार घंटों तक जिस बॉर में बेहोश रहा था, उसके मैनेजर ने भी उसके बयान की पुष्टि कर दी है।”
शेरवानी सन्नाटे में रह गया।
इतने में थाने के कप्पाउंड में एक कार आकर रुकी, जिसमें से सेठ जगताप और प्रेमप्रताप उतरते हुए नजर आए। चौहान की आंखों में बिजली का कौंधा लपका। फिर वह शांत हो गया।
कुछ देर बाद प्रेमप्रताप, चेतन की लाश पर गिरकर फूट-फूटकर रो रहा था।
“मालिक ! आपसे संतलाल नामक आदमी मिलना चाहता है।”
“कहां से आया है ?”
“हरिजनों की बस्ती से ।”
“हरिजनों की बस्ती से ?”
सेठ जगताप चौंककर सीधा बैठ गया।
नौकर ने कहा‒“जी हां, मालिक ! कहता है लखनलाल ने भेजा है।”
“तुमनेे उससे कहा नहीं कि हम अभी-अभी श्मशान से लौटे हैं ? अपने दोस्त चौहान के बेटे की चिता जलवाकर !”
“मैंने कहा था, मालिक ! लेकिन वह नहीं मानता। कह रहा है, मिलकर ही जाऊंगा।”
अचानक अपने कमरे से प्रेमप्रताप ने निकलकर नौकर से कहा‒“उसे अन्दर बुला लो।”
नौकर चला गया तो सेठ जगताप ने कहा‒“बेटे ! आज तो…।”
प्रेमप्रताप ने बात काटकर कहा‒“मेरे दोस्त की चिता जली है न ?”
“हां, बेटे !”
“डैडी ! क्या आप चाहते हैं कि कुछ और निर्दोषों की चिताएं जल जाएं ?”
“क्या मतलब ?”
“अगर आज मेरी और दीपा की सगाई की बात टाली गई तो वे लोग इसे बहाना समझेंगे। अब यह मामला सिर्फ लखनलाल के घर का नहीं रहा। पूरी बिरादरी ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है।”
“तो क्या तुम दीपा से सगाई के लिए अपनी खुशी से तैयार हो ?”
“नीति…डैडी ! यह नीच बिरादरी के लोग, जिसकी अपनी कोई इज्जत नहीं होती, किसी इज्जत वाले की इज्जत उछालकर खुश होते हैं।”
“लेकिन हरिजनों की बस्ती में जाकर सगाई करना क्या हमारा अपमान नहीं है ?”
“यह अपमान की तरह सहन करना पड़ेगा, डैडी ! अगर उन लोगों ने हम से दुश्मनी पर कमर बांध ली तो हम हर वक्त पुलिस प्रोटेक्शन थोड़ेे ही साथ लिए फिरेंगे।”
इतने में एक सांवला-सा अधेड़ आदमी अन्दर आया, जो सूरत से अक्खड़ और बदतमीज मालूम होता था।
उसने आते ही एक सोफे पर बैठते हुए कहा‒“मुझे लखनलालजी ने भेजा है।”
जगताप का चेहरा इस तरह गुस्से से लाल हो गया, जैसे वह अभी संतलाल को नौकरों से उठवाकर बाहर फेंक देगा। लेकिन वह सिर्फ होंठ भींचकर रह गया।
प्रेमप्रताप ने संतलाल से पूछा‒“आप लखनलालजी के रिश्तेदार हैं ?”
“जंवाईराज ! यूं तो हमारी सारी बिरादरी एक-दूसरे की रिश्तेदार है। वैसे मैं दीपा का मौसा भी हूं और म्यूनिसिपल कारपोरेशन के स्वीपरों की यूनियन का सैक्रेटरी भी हूं।”
इस बार जगताप ने तनिक गुस्से से पूछा‒“कैसे आए हो ?”
“सेठ साहब ! क्या आपको याद नहीं रहा ? आज दीपा और प्रेमबाबू की सगाई होनी है।”
“सेठ ने कहा‒“क्या तुम्हें मालूम नहीं कि आज हमारे दोस्त चौहान का बेटा एक पीड़ाजनक मौत मरा है। हम दोनों अभी श्मशान से आ रहे हैं।”
“सेठजी ! जीवनमृत्यु तो इस संसार में लगे रहते हैं। नेताजी चौहान आपके दोस्त हैं और उनके बेटे की हत्या हो गई है। वह भी थोड़ी देर पहले ही श्मशान से लौटे हैं। लेकिन नहा-धोकर वह अब तक हमारी बस्ती में पहुंच चुके हैं सगाई के संस्कारों में सम्मिलित होने के लिए !”
जगताप सन्नाटे में रह गया।
संतलाल ने फिर से कहा‒“सात बजे शाम का शुभ-मुहूर्त है सगाई का। हमारी सारी बिरादरी जमा हो चुकी है। गांव-देहात के मेहमान भी आ गए हैं। प्रेस वालों की भीड़ पहले ही जमा हो चुकी है। मैंने दूरदर्शन वालों को भी सूचना दे दी थी। इस संस्कार की झलकियों को वे भी कवर करेंगे, क्योंकि यह सगाई पूरे देश के लिए एक मिसाल होगी।”
कुछ पल रुककर वह कुछ चुनौती भरी मुस्कान के साथ बोला‒“और अगर यह शुभ कार्य किसी बहाने टाला गया तो इन्हीं पुलिसवालों और दूरदर्शवालों को दीपा अपनी विपदा सुनाएगी कि किस प्रकार आपके बेटे ने उसका अपहरण किया था। उसकी लाज लूटी थी।
“और आपने लिखित दी थी कि आप दीपा को अपनी बहू बनाएंगे। इसलिए उसके बाप ने आपके बेटे के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की थी। फिर आप जानते हैं कि हरिनगर के हरिजनों की प्रतिष्ठा की यह समस्या पूरे देश की प्रतिष्ठा की समस्या बन आएगी।”

फिर वह उठता हुआ बोला‒“छः बज रहे हैं। सगाई की रीति का मुहूर्त सात बजे संध्या का है। अब आप वहां पहुंचे या न पहुंचें‒यह आपकी इच्छा है।”
प्रेमप्रताप ने गम्भीरता से कहा‒“नहीं, मौसाजी ! हम लोग आधे घंटे में पहुंच रहे हैं।”
संतलाल ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और बाहर निकल गया। जगताप के होंठ सख्ती से भिंचे रह गए थे।
प्रेमप्रताप ने कहा‒“आप भी तैयार हो जाइए, डैडी ! मैं नहाने जा रहा हूं।”
फिर वह अपने कमरे की तरफ चला गया।
दीपा और प्रेमप्रताप की सगाई बड़ी धूमधाम से हुई। वह सारी धूमधाम हरिजनों की तरफ से ही थी। सेठ जगताप की तरफ से सिर्फ एम॰ एल॰ ए॰ चौहान सम्मिलित हुआ था, क्योंकि उस सगाई का सेठ के जानकार क्षेत्रों में किसी को पता ही नहीं था।
प्रेसवालों ने सैकड़ों फोटो-ग्राफ ले डाले और दूरदर्शन वालों ने सगाई की पूरी रीति कवर की, जिसमें सेेठ जगताप से ज्यादा आगे-आगे चौहान रहा।
रीति के बाद दूरदर्शन की एक कार्यकर्ता लड़की ने अलग-अलग उस सगाई के बारे में सबकी प्रतिक्रियाएं जाननी चाहीं।
प्रेमप्रताप से उसने सवाल किया‒“आप एक उच्च जाति के और इतने बड़े सेठ के इकलौते बेटे हैं। आप इस सगाई के लिए कैसे राजी हो गए ?”
“किसी भी अच्छाई को जाति-पांत की तराजू में नहीं तोला जा सकता। दीपाजी में वे सारी खूबियां हैं जो एक अच्छी जीवन साथी में होनी चाहिए। उनकी खूबियों के आधार पर मैंने उन्हें अपनी जीवन साथी चुनना पसन्द किया है।” प्रेमप्रताप ने गम्भीरता से जवाब दिया।

लड़की ने दीपा से पूछा‒“आप इस सम्बन्ध से कैसा अनुभव कर रही हैं ?”
दीपा ने गम्भीरता से जवाब दिया‒“वही, जो एक अच्छे जीवन साथी को पाकर एक लड़की महसूस करती है। हम दोनों एक दूसरे के मंगेतर हैं। इस समय न तो मैं हरिजन हूं, न ही मेरे मंगेतर ऊंची जाति के हैं। एक अच्छा जीवन साथी और एक अच्छी ससुराल मेरा अधिकार था, जो मुझे मिल गया।”
संवाददाता ने सेठ जगताप से पूछा‒“आपके मन में दीपा को बहू बनाने का विचार कैसे आया ?”
जगताप ने जवाब दिया‒“दीपा मेरे बेटे की पसन्द है और अपने बेटे की खुशी को मैं अपनी पसन्द समझता हूं।”
फिर चौहान से पूछा गया‒“नेताजी ! इस सम्बन्ध के बारे में आपके क्या विचार हैं ?”
चौहान की आंखों में मगरमच्छ के आंसू नजर आए। उसने कहा‒“प्रेेमप्रताप और मेरा स्वर्गवासी बेटा एक-दूसरे के गहरे दोस्त थे। अगर दीपा बेटी को पहले प्रेमप्रताप ने पसन्द न किया होता तो इसे मैं अपने घर की बहू बनाता।”
“दीपा को मेरा बेटा कितना पसन्द करता था, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मेरे बेटे ने प्रेमप्रताप के लिए अपनी पसन्द की तो बलि दे दी, लेकिन आज उसने खुद भी अपने आपको गोली मारकर आत्महत्या कर ली।”
इससे पहले कि संवाददाता कुछ और पूछती, चौहान के कुछ चमचों ने जोरदार नारा लगाया‒“नेताजी चौहान की…जय…!”
दूसरे ही पल हजारों हरिजनों का गगनभेदी नारा गूंज उठा‒“नेताजी चौहान…की जय !”
“हमारे नेता…जिंदाबाद !”
“हमारा नेता…चौहान !”
“चौहान का बेटा…अमर रहे !”
“चौहान का बेटा…अमर रहे !”
जगताप के होंठ कठोरता से भिंचकर रह गए। इतने में शेरवानी अपने धर्म के सैकड़ों लोगों को लेकर आ गया और वे लोग हरिजनों से गले मिलने लगे।
