अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

दूसरे दिन तीन बजे आलोक बम्बई पहुंच गया। मित्र उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुए, पर आलोक का कलेजा धड़क रहा था। नीनी से मिलने के लिए उसका मन आतुर हो रहा था।

शाम का खाना खाकर सब लोग घूमने के लिए निकल पड़े। सिर, फिरोजशाह मेहता रोड पर, उस जगह पर आए, जहां करीम जी हाउस था, फिर पास ही राक्सी में आकर सब लोगों ने ‘कादम्बरी’ नामक चित्र देखा।

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प्रातःकाल जिस समय आलोक ऑफिस पहुंचा, नीनी कार्य व्यस्त थी। चाहकर भी वह उससे बोलना नहीं चाहता था, इसलिए नहीं कि घटा उस पर अधिकर किए हुए थी, बल्कि इसलिए कि उसने उसके पत्र की उपेक्षा की थी—पत्रोत्तर नहीं दिया था।

‘माफ कीजिए, सारजेण्ट!’ अकस्मात वह कह उठा और उसके पास आ खड़ा हुआ।

‘किस बात की माफी मांगी जा रही है, मिस्टर आलोक?’ उसने मुस्कराते हुए पूछा।

‘मैंने गुस्ताख़ी जो की है।’

‘कैसी गुस्ताख़ी?’

‘ऑफिस में आकर भी मैं आपसे नहीं बोला।’

‘यदि न बोलना ही गुस्ताख़ी है, तो जाओ माफ किया मैंने।’ कहकर ऐसी चितवन से नीनी ने उसकी ओर देखा कि वह विचलित-सा हो गया। दोनों एक साथ मुस्करा पड़े।

इसी तरह दिन बीतते गए। नीनी और आलोक पूर्ववत् एक दूसरे के लिए दुर्भेद्य बने रहे।

एक दिन जबकि ऑफिस में आलोक और अन्य कर्मचारी कार्य-व्यस्त थे—एकाएक बादल गरजने जैसी भयंकर आवाज होने लगी। बड़े-बड़े मकान हिल उठे। शीशे की खिड़कियां चूर-चूर हो गईं।

‘बम गिरा’, ‘बम गिरा’ के शोर से ऑफिस का वातावरण क्षुब्ध हो गया।

आलोक शान्त था, तनिक भी घबराया न था, यद्यपि वह उसके जीवन में ऐसी प्रथम घटना थी। अंग्रेजों के दिल पर दहशत सी छा गईं। टाइपिस्ट छोकरियां—जिसे भी आगे पाया, उससे लिपट गईं।

दो क्षण पश्चात् ही पूर्ववत् शांति छा गईं, परंतु पांच मिनट बाद ही पुनः एक धमाका हुआ, जैसे हजारों, तोपें एक साथ गरज उठी हों। पुनः खलबली मच गईं। पूर्व की ओर से आकाश पर धुएं का गुब्बारा-सा छा गया। सारा आकाश तीव्र गंध एवं धुएं से भर उठा।

आग बुझाने वाले दस्ते दौड़ पड़े। बड़े-बड़े दमकलों के शोर से वातावरण अशांत हो गया। चारों और भय से सनसनी फैल गईं। ऑफिस से बाहर आने पर आलोक को मालूम हुआ कि बन्दरगाह में गोला-बारूद से भरे जहाज में आग लग गईं है।

ज्यों-ज्यों शाम होने लगी, त्यों-त्यों आकाश पर धुएं के साथ-साथ लालिमा भी बढ़ने लगी, सन्ध्या होते-होते पूर्वाकाश आग की लपटों से लाल हो उठा। मालूम हुआ जैसे भयानक दावाग्नि जीभ लपलपाती, आकाश छूने की चेष्टा कर रही हो।

आधी रात के समय कैम्प में एकाएक खतरे का घंटा बज उठा। जो जिस पोशाक में था, उसी पोशाक में उठकर गार्ड रूम की ओर दौड़ा। सब लोग लारियों में भर-भर कर बन्दरगाह पर पहुंचाए गए। कितने ही अंग्रेज तथा भारतीय आग बुझाने में जुट गए—प्राणों की तनिक भी परवाह न थी उन्हें, जैसे कर्तव्य सर्वोपरि था।

आलोक ने विध्वंस का जो दृश्य देखा, वह वर्णनातीत था।

यद्यपि आर्मी, नेवी, एयरफोर्स तथा सिविल-फोर्स की टोलियां अथक परिश्रम कर रही थीं, परंतु अग्नि की लपटें जैसे प्रलयंकारी होती जा रही थीं।

रात भर आलोक भी अविराम परिश्रम करता रहा, परंतु आग को न बुझना था, न बुझी।

दूसरे दिन पुनः आलोक ध्वंस हुए स्थानों पर गया। आग तब तक जल रही थी। आसपास के कई फलांग तक के मकान धराशायी हो गए थे। चारों और छोटे-बड़े ढूहे दृष्टिगोचर हो रहे थे।

तीसरे दिन जब आलोक ऑफिस पहुंचा, तो कार पोल ने उसे खबर दी कि वह नौकरी से बरखास्त कर दिया गया है। आलोक आश्चर्यचकित हो उठा। अपने बरखास्त होने का कारण उसकी समझ में न आया। भरती होते समय आलोक ने अपने नाम-ग्राम का पता गलत लिखवाया था, जान-बूझकर। जब जांच हुई तो स्थानीय पुलिस की रिपोर्ट मिली कि इस नाम का कोई भी मनुष्य यहां नहीं रहता। अधिकारियों को आलोक के इस आचरण पर सन्देह हुआ। यही था उसके बरखास्त होने का कारण।

आलोक को उसके अफसर ने बुलवाया। उन्होंने बहुत अफसोस जाहिर किया कि आलोक को राय दी कि वह एक अर्जी इस आशय की दे दे कि उसके केस पर पुनः विचार किया जाए। आलोक ने अर्जी दे दी। उसकी अर्जी पुनर्विचार के लिए न्यू दिल्ली भेज दी गईं।

इस बीच आलोक ने कुछ दिन की छुट्टी ले ली, छुट्टी मंजूर हो गईं। वह घर आकर घटा तथा भीखम को देख गया। वापस बम्बई आने पर न उसने सुना कि नीनी की आज शादी है, किसी क्रिश्चियन के साथ! सुनकर उसका हृदय टूक-टूक हो गया।

उफ! इस छोकरी ने उसे कितना गहरा धोखा दिया। दिखावटी प्रेम प्रदर्शित कर उसने उसे, फिरकनी की तरह मचाया—उल्लू बनाया और अब दूध की मक्खी की तरह निकालकर दूर फेंक दिया! आज जाना उसने कि अंग्रेजी वातावरण में पली ये छोकरियां, कभी एक की होकर नहीं रह सकतीं। इनका विश्वास करना अपने आपको धोखा देना है।

एयरफोर्स हेडक्वार्टर से आलोक की अर्जी नामंजूर हो गईं। आलोक से फौजी कपड़े तथा सनद इत्यादि जमा करा ली गईं और उसे बरखास्त कर दिया गया।

आलोक उसी दिन मिर्जापुर को रवाना हो गया।

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