अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

बड़े ठाकुर अभी-अभी बैठक में आकर बैठे थे। सूर्यनारायण अभी तक उदय नहीं हुए थे। ठाकुर की आदत बहुत सवेरे उठकर नित्य-क्रिया से छुट्टी पाकर कागज-पत्र देखने की थी। आज भी वे छोटी-सी सन्दूक पर रोकड़-बहीं सामने रखे हुए, वे कुछ देख रहे थे। बैठक में और कोई न था।

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‘भीखम चौधरी सरकार से मिलना चाहते है।’ सहसा एक लठैत ने अंदर आकर सूचना दी।

‘इतने सबेरे?’ ठाकुर कुछ सोचने लगे—‘अच्छा भेज दो।’

लठैत बाहर चला गया। ठाकुर ने बही बंद करके सन्दूक की बगल में रख दी, फिर पुकारा—‘सम्पत।’

‘आया सरकार!’ एक दूसरा लठैत आ उपस्थित हुआ।

‘देखो, मेरी लाठी लाकर उस कोने में खड़ी कर दो।’

लठैत ने एक लम्बी लाठी लाकर कोने में खड़ी कर दी और वह बाहर चला गया। ठाकुर ने लाठी की ओर देखकर सन्तोष की सांस ली। ठाकुर अपने आसामियों से सदैव सावधान रहा करते थे, क्योंकि उनकी क्रूरता ने आसामियों में प्रतिशोध की भावना भर दी थी।

‘जुहार ठाकुर!’

‘जुहार चौधरी! किधर से भूल पड़े?’

‘आपके दरसन की बड़ी साध थी, ठाकुर!’ भीखम ने जमीन पर बैठते हुए कहा—‘इधर से जा रहा था, सोचा, चल के हालचाल ले लूं।’

‘भंटा लग गया, चौधरी?’

‘लग गया ठाकुर! आपकी दया से बड़ा जोरदार हुआ है। परसों रात की बरसात ने बहुत लाभ किया।’ भीखम रुककर, फिर बोला—‘परसों सरकार को वैदराज के घर रात में, सो भी बरखा में भीगते हुए अकेले जाते देखा था, क्या किसी की तबीयत खराब थी, सरकार!’

कांप उठे ठाकुर! बोले—‘नहीं, एक बहुत ही आवश्यक काम आ पड़ा था, चौधरी।’

‘मैं भी एक जरूरी काम से ही आया हूं, ठाकुर!’ आगे खिसककर धीरे से बोला भीखम चौधरी।

‘मैंने अनुमान लगा लिया था—।’ ठाकुर ने कहा—‘नहीं तो तुम कामकाजी आदमी भला खेत में काम करना छोड़कर, इस धुंधलके में मेरे पास कैसे आते?’

भीखम चौधरी ने एक थैली निकालकर ठाकुर के सामने रख दी। बोला—‘एक हजार रुपए हैं, ठाकुर! पेट काट-काटकर इकट्ठा किया है इन्हें। मेरे पास यों ही पड़े हुए थे। सोचा, आप के यहां रख दूं तो चोरी-चकारी से बचा रहूंगा।’

‘मेरे ऊपर इतना विश्वास है तुम्हारा चौधरी?’

‘राजा का विश्वास कैसे न करूं, सरकार!’

ठाकुर ने थैली खोलकर रुपए गिने। पूरे एक हजार थे। उन्हें सन्दूक में रखकर बोले—‘कोई रुक्का लिख दूं, चौधरी?’

‘रुक्का क्या होगा, ठाकुर!’

‘अगर मैं बेईमानी कर जाऊं तो?’

‘गरीब किसान के रुपये मारकर क्या करोगे आप, बड़े ठाकुर!’ भीखम बोला—‘हुक्म हो, तो चलूं। हल और बैल, दोनों खेत पर पहुंच गये होंगे।’

जाते हुए भीखम चौधरी ने जुहार करके दो रुपये ठाकुर के हाथ पर रख दिए ठाकुर ने रुपए रेशमी अचकन की जेब में डाल लिए। भीखम हवेली से बाहर आ रहा था, तो छोटे ठाकुर मिल गए।

भीमख ने जुहार की।

छोटे ठाकुर बोले—‘जुहार चौधरी काका! कहो, इतने सबेरे कैसे आए थे?’

‘कुछ काम था, छोटे राजा।’ भीखम ने कहा और पुनः जुहार कर चला गया।

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