googlenews
अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

कजली का महीना था!

युवतियों के सुरीले गले से निकली हुई कजली की मधुर ध्वनि लोगों के हृदय में एक अजीब गुदगुदी पैदा कर रही थी। सेहटा गांव के तालाब पर इस समय अपार देहाती भीड़ उमड़ पड़ीं थी। आज के दिन वहां बहुत बड़ा मेला लगता है।

घटा अन्य ग्राम्य-युवतियों के साथ रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर, कजली गाती हुई मेले की ओर चली जा रही थी। उनके सुरीले गीत सुनकर कितने ही मनचले देहाती युवक उनके पीछे-पीछे चलने लगे थे, ताकि वे भी उन युवतियों की सुरीली कजलियों का रसास्वादन कर सके।।

छोटे ठाकुर भी मेले में आए थे। उनके भीमकाय हाथी को देखकर ही लोग समझ जाते थे कि या तो बड़े ठाकुर या छोटे ठाकुर पधारे हैं। उनके आने से पहले मेले में जो हो-हुल्लड़ था, वह सब एकाएक बंद हो गया। वातावरण ने केवल युवतियों के मधुर स्वरागिनियां ही तैर रही थीं। कितने युवक उस भीमकाय हाथी की ओर देखकर उंगली उठाकर अपने अनजान साथियों को बता रहे थे कि वह देखो, दाढ़ीराम गांव के जमींदार का हाथी।

‘हां-हां। बड़ा बिगड़ैल है।’ एक देहाती अपने साथी से कह रहा था—‘ऐसा हाथी तो मैंने कहीं देखा नहीं। अभी पिछले साल मात गया था। मात होकर इधर-उधर दौड़ने लगा। कितने खेत उजाड़ डाले। दस आमियों को सूंड से पकड़कर पटक दिया, मगर ठाकुर का बहुत दबदबा है। सब कुछ होकर भी जैसे कुछ नहीं हुआ।’

‘फिर हाथी बस में कैसे आया?’ उत्सुकता में भरकर पूछा उसके दूसरे साथी ने।

‘सिवा बड़े ठाकुर के और किसी की हिम्मत न पड़ीं कि उसके पास जाएं। बड़े ठाकुर हाथ में लम्बा बरछा लेकर दौड़े। कई बरछा मारने के पश्चात वह काबू में आया।’

मेले की भीड़ बढ़ रही थी। छोटे ठाकुर हाथी पर बैठे हुए घूम-घूमकर मेले की चहल-पहल देख रहे थे। जगह-जगह पर युवतियों का झुण्ड कजली गाने में तल्लीन था। जिस झुण्ड के पास ठाकुर का हाथी खड़ा हो जाता, उस झुण्ड की युवतियों अपने को धन्य समझ, बैठतीं। कुछ इनाम पाने की आशा से उत्साहित होकर और भी झूम-झूमकर गाने लगतीं।

एक झुंड के पास आकर ठाकुर का हाथी आ खड़ा हुआ। यह घटा और उनकी सहेलियों का झुण्ड था। घटा के नेत्र ऊपर उठे, छोटे ठाकुर के नेत्र नीचे झुके और दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया।

कजली खत्म हो चुकी थी। घटा की सहेलियों ने घटा से एक और कजली गाने का अनुरोध किया। घटा ने एक मधुर कटाक्ष किया छोटे ठाकुर की ओर, जिसे केवल छोटे ठाकुर ने देखा और उसकी चोट का अनुभव किया। घटा ने कजली गाना प्रारम्भ किया—

अब तो चढ़त जात जवानी,

छूटत जात लरिकइयां बा,

घटत जात मोर करिहइयां बा, ना!

छोटे ठाकुर को समझते देर न लगी कि कजली स्वयं उसे ही लक्ष्य कर गाई जा रही है। उसका लड़कपन सचमुच छूटा जा रहा था और उस पर जवानी छाती जा रही थी। कमर पतली पड़ती जा रही थी और वहां का मांस वक्षस्थल पर खिंचता चला आ रहा था।

भीड़ में से एक व्यक्ति ध्यानपूर्वक छोटे ठाकुर और घटा की हरकतों का निरीक्षण कर रहा था। घटा का एक-एक कटाक्ष और छोटे ठाकुर की एक-एक मुस्कान उसकी तेज नजरों से छिपी न थी। वे थे वैदराज बदबद।

‘जुहार हो छोटे ठाकुर!’

‘ओह, वैदराज मामा?’ छोटे ठाकुर के रंग में भंग पड़ गईं, तुरंत हाथी बैठाया। छोटे ठाकुर नीचे उतरे और वैदराज की लेकर एक एकांत स्थान में आए।

‘राज कहां है, मामा?’ छोटे ठाकुर ने पूछा।

‘जोगीबीर की दरी में, तुमने ही तो उसको वहां रहने की सलाह दी थी…’ वैदराज बोले—‘वह तुम्हारी बहुत बड़ाई करता था, छोटे राजा। कहता था कि छोटे ठाकुर मामूली आदमी नहीं हैं, वे नर-रत्न हैं।’

‘मेरे सौ रुपये उसे मिल गये थे?’

‘मिले थे…मैंने खाने-पीने का पूरा सामान उसके पास पहुंचा दिया है, अगर वह ठीक से रहेगा तो कोई उसका पता भी न पा सकेगा।’

‘उसके पास सूचना भेज दीजियेगा कि एक बार मुझसे आकर मिल ले।’

‘आज ही शाम को मिल लेगा। यह तालाब, घड़ी रात गये सूना हो जाता है, यहीं दोनों की मुलाकात उपयुक्त होगी। मैं खुदी उसे जाकर कह दूंगा।’ वैदराज बोले।

‘ठीक है…।’ छोटे ठाकुर ने कहा—‘मैं इसी जगह चला आऊंगा।’

उस दिन…!

सन्ध्या और रात्रि की आपस में आंख-मिचौली हो रही थी। तीज का चन्द्रमा तीन घंटे बाद उगने वाला था। चारों और धीरे-धीरे अंधेरा फैल रहा था, फिर भी आकृति देखकर पहचानने भर को प्रकाश काफी था। सेहटा गांव के तालाब की यह भूमि, जिस पर आज प्रातःकाल कितनी ही सुंदर युवतियों के कोमल पग पड़े थे, इस समय एकदम सुनसान थी

घटा दिन भर गांव में घूम-घूमकर झूले झूलती रही…कजली गाती रही। संध्या होने पर जब वह घर आई तो देखा कि गगरे में जरा भी पानी नहीं है। तुरंत ही उसने गगरा उठाया और तालाब की ओर भागी।

तालाब के किनारे आकर एक युवक को देखा, वह ठिठक गईं। युवक एकाग्र मन से कुछ सोच रहा था। उसे घटा के आगमन की कुछ भी खबर न थी। घटा ने समझा कि यह युवक और कोई नहीं छोटे ठाकुर हैं, परंतु वह था राज। इस समय वैदराज के कथनानुसार जोगीबीर से चलकर छोटे ठाकुर से मिलने आया था।

बेचारी घटा को क्या मालूम था कि विधाता भी प्रपंची है और उसके साथ परिहास करने के लिए उसने एक ही सूरत शक्ल के दो युवकों की सृष्टि कर दी है।

उसने धीरे से गगरा सीढ़ी पर रख दिया और धीरे-धीरे आकर राज के पीछे खड़ी हो गईं। राज को कुछ पता न चल सका। घटा ने साहस कर उसके नेत्र पीछे से मूंद लिए।

राज चौंक पड़ा। नर्म हाथों का स्पर्श पाकर वह और भी आश्चर्यचकित हो उठा। घटा ने आंखों से हाथ हटा लिए और खिलखिला कर हंस पड़ीं।

युवक पूर्ववत् गम्भीर बना रहा।

‘पहचान नहीं सके क्या?’ घटा ने आश्चर्य से पूछा।

वह युवक को छोटे ठाकुर ही समझ रही थी। वह क्या जानती थी कि पागल-सा दीखने वाला यह युवक एक भयानक क्रांतिकारी है, जिसके पीछे आज सारे प्रान्त की पुलिस लगी हुई है, जिसका कुशल समाचार जानने के लिए जनता व्यग्र रहती है।

‘पहचान लिया…।’ युवक बोला—‘तुम बड़ी चंचल हो।’

‘अपनी कहिए…। आज सवेरे मेले में कैसी कजली की बहार रही।’

‘मेले-तमाशे में मुझे दिलचस्पी नहीं…।’ युवक ने अनमने भाव से कह दिया—‘मैं तो यहां अपने एक मित्र थे मिलने आया हूं। वह मेरा अभिन्न मित्र है। हम दोनों एक प्राण दो शरीर हैं।’

‘मैं जानती हूं उस मित्र को…?’ युवक बोला—‘बताओ तो कौन है वह मेरा मित्र।’

‘मैं…। मुझसे ही तो मिलने आये हैं आप?’

‘तुमसे…?’ अवहेलना की हंसी हंसते हुए वह बोला—‘तुमसे भला मैं क्यों मिलना चाहूंगा?’

READ MORE

युवक अत्यंत गम्भीर था, मगर अल्हड़ देहाती युवती यह न समझ सकी। उसने आवेग से युवक का दाहिना हाथ अपने पुष्ट वक्षस्थलों पर खींचकर दबा लिया। बोली—‘बहुत रूठ गये हो, छोटे ठाकुर!’

युवक पर जैसे मदहोशी-सी छा गईं। युवती के पुष्ट वक्षस्थल का सम्पर्क पाकर उसका हाथ कांप उठा, उसका बदन सिहर उठा, अपने अंदर उसने एक कमजोरी का अनुभव किया, ऐसी कमजोरी, जिसे उसने स्वप्न में भी न जाना था। उसका शरीर उस मचलते यौवन को अपनी बांहों में समेट लेने के लिए व्याकुल हो उठा।

एकाएक युवक ने होश में आकर मन-ही-मन सोचा—वह एक फरार कैदी है, उसे क्या अधिकार है कि वह एक युवती के यौवन के साथ परिहास करे। आज वह यहां है, कल न जाने कहां होगा?

उसने निष्ठुरतापूर्वक झटककर अपना हाथ छुड़ा लिया और तेजी से घाट की सीढ़ियां चढ़कर घटा की दृष्टि से ओझल हो गया। इस समय कर्तव्य का विशाल पथ उसके सामने था।

यद्यपि सुन्दरी घटा के सम्पर्क ने उसे अप्रत्याशित रूप से प्रभावित किया था, उसके यौवन ने उसकी आंखों में चकाचौंध पैदा कर दी थी, उसकी चंचलता ने उसका हृदय जीत लिया था, फिर भी वह विवश था। अपने साथ वह घटा का संसार कैसे नष्ट कर सकता था?

घटा को युवक का इस प्रकार चले जाना बुरा लगा, साथ ही स्वयं पर ग्लानि भी हुई। वह देर तक तालाब के किनारे बैठी रही। अंधेरा कुछ-कुछ गाढ़ा हो चला था, फिर भी आकाश-मार्ग पर प्रदीप्त उज्ज्वल तारों से थोड़ा प्रकाश झिलमिला रह था। भयानक नीरवता फैली हुई थी, फिर भी घटा भयभीत न थी। वह ग्राम्य-बाला थी, छम-छम बरसते हुए बादलों की गर्जन सुनकर चरी के घने खेत में घुस जाने का भी साहस रखती थी।

पीछे खटका हुआ। घटा ने घूमकर देखा कि वहीं युवक।

मगर इस बार आने वाला युवक वास्तव में छोटे ठाकुर थे, जों कि राज से मिलने आये थे।

‘आखिर आ गये न…?’ घटा बोली—‘मैं तो समझती थी कि छोटे राजा रूठकर चले गये हैं, अब लौटकर नहीं आयेंगे?’

‘भला मैं तुमसे कभी रूठ सकता हूं, घटा।’ छोटे ठाकुर बोले और आकर घटा की बगल में बैठ गये।

‘मैं जानती थी कि आप जरूर आयेंगे—।’ घटा बोली—‘क्योंकि आपका स्वभाव ही न्यारा है। कभी रूठते हैं, कभी खुश होते हैं।’ घटा समझ रही थी कि छोटे ठाकुर ही उसका हाथ झटककर चले गये थे, वह, फिर उसे मनाने आए हैं। उसे क्या मालूम था कि वह युवक राज था और यह है छोटे ठाकुर? वह तो दोनों को ही छोटे ठाकुर समझे हुए थी।

‘तुम्हें अंधेर में डर नहीं लगता, घटा?’

‘डर क्यों लगेगा—?’ घटा का शरीर छोटे ठाकुर से एकदम सटा हुआ था—‘अपनी कहिए।’

मैं तो यहां कभी न आता, मगर आना पड़ा। एक मित्र से मिलना था, परंतु वह यहां दिखाई नहीं पड़ता।’

‘फिर आप ऊल-जलूल बातें करने लगे। बार-बार मित्र-मित्र क्यों कह रहे हैं, छोटे राजा? सीधे क्यों नहीं कहते कि मुझसे मिलने आये थे।’ घटा ने छोटे ठाकुर के कंधे पर अपना सिर रख दिया।

छोटे ठाकुर ने उसे अपने पास खींचकर अंधेरी रात की नीरवता में उस युवती के होंठों का रस चुरा लिया।

सिहर उठी घटा।

रोमांचित हो उठे छोटे ठाकुर! मुस्कराते हुए बोले—‘हां, तुम्हीं से मिलने आया था, तुम कितनी सुंदर हो घटा।’

बड़ी देर तक दोनों अपनी सुध-बुध भूले रहे। घंटों बाद जब वे दोनों घर जाने के लिए उद्यत हुए तो काफी अंधेरा हो गया था। सन्नाटा बहुत भयानक लग रहा था। घटा ने गगरा भर लिया और ठाकुर के साथ तालाब से ऊपर आई। दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े, उबड़-खाबड़ पगडंडी पर चलने लगे।

एकाएक छोटे ठाकुर के कंधे पर एक कंकड़ी आकर लगी। छोटे ठाकुर ने घूमकर देखा। पास के दीर्घाकार वृक्ष के पीछे एक मनुष्य आकृति खड़ी थी, जो उन्हें संकेत से अपने पास बुला रही थी।

घटा का ध्यान उधर नहीं था। वह तो अप्राप्य को पाकर विभोर उठी थी।

छोटे ठाकुर ने उससे कहा—‘तुम चलो, मैं अपनी कलम तालाब पर भूल आया हूं, अभी लेकर आता हूं।’

घटा ने विश्वास कर लिया और कटाक्ष करती हुई वह चली गईं। छोटे ठाकुर उस अस्पष्ट आकृति की ओर बढ़े। पास जाकर देखा, वैदराज थे वे।

वैदराज को देखकर कांप उठे छोटे ठाकुर!

‘कौन थी वह छोटे ठाकुर? घटिया थी न?’

छोटे ठाकुर चुप रहे।

‘राज मिला था तुमसे।’

‘नहीं।’ छोटे ठाकुर को उत्तर देना ही पड़ा।

‘वह मेरे कहने के अनुसार ठीक समय पर तालाब पर आया था, परंतु तुम नहीं आए थे। लाचार वह लौटकर मेरे घर गया, तब मैं खोजता हुआ इधर आ निकला। देखा, तुम घटा के साथ प्रेमालाप में लीन थे…।’

छोटे ठाकुर सन्न रह गए। तो क्या इस बूढ़े खूसट चुगलखोर ने उसका सारा कार्यकलाप देख लिया था।

‘घबराओ नहीं छोटे राजा। किसी से कहूंगा नहीं। वैदराज की जीभ इतनी औछी नहीं है, मगर तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। तुम ठाकुर के बेटे हो और वह काछी की बेटी! ब्याह भी तो नहीं हो सकता, व्यर्थ बदनामी हाथ लगेगी।’

‘प्रेम जात-पात नहीं देखता, वैदराज मामा!’

‘नहीं देखता, यह मैं जानता हूं…प्रेम अन्धा होता है यह भी मैं जानता हूं, पर अनहोनी को होनी में बदलना आसान नहीं, छोटे ठाकुर! खैर जाने दोस्त चलो, घर पर राज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।’

दोनों चुपचाप अन्दाज से अंधेरे में पगडंडी पर चल पड़े।

Leave a comment