seenk ke khilaune
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

आज कजली बहुत प्रसन्न है, और क्यों न हो? उसने सेठे से निकलने वाले सीके लाने में अपने बाबूजी की मदद जो की है। वहीं सेठे, जिसकी कलम से उसके बाबूजी ने बचपन में तख्ती पर सुन्दर लिखाई की है। उसने नदी के किनारे ऊँची मेड़ों पर उगे सेठों से सींके निकलवाने में कितनी मेहनत की है, उसे सब याद है।

आज ही दशहरे का त्यौहार है।

कजली के मन में खुशियों के पटाखे फूट रहे हैं। इसकी भी एक खास वजह है। इससे पहले तो कहीं ले जाने की बात पर ‘तुम अभी नन्ही हो’, ‘वहाँ बच्चों का क्या काम’, ‘छोटे बच्चे वहाँ नहीं जाते’ जैसे जुमलों से बड़े भैया या फिर दादी ने रोके रखा। पर आज बाबूजी ने स्वयं कहा है“कजली, तुझे दशहरे के मेले में ले चलूँगा। तूने मेरी मदद की है न?”

कजली के मन में लड्डू फूट रहे हैं। उसने शीशे के सामने अपनी पूरी तस्वीर देखी, क्या आज वह सचमुच बड़ी हो गई है?

अम्मा ने कहा- “कजली, तुझे जाने की तो जल्दी है, लेकिन पहले धौरी को चारा-पानी तो दे दे। तेरी ओर देख-देखकर कब से रम्भा रही है।”

“आज नहीं, आज तू दे दे अम्मा!” कहकर कजली ने बाबूजी की साईकिल को कपड़े से पोंछकर चमकाना शुरू कर दिया।

पर एक नज़र उसने धौरी पर ज़रूर डाली।

वह जुगाली बन्द करके कजली को निहार रही थी। जैसे कहना चाह रही हो–“मुझे भी ले चलोगी न?”

“कहाँ गई कजली?” बाबूजी ने पुकारा–“दोपहर हो गई है। मेले में पहले नहीं गए तो खिलौनों की बिक्री कम होगी।” ।

“आई बाबूजी!’ कजली की आवाज़ में खनक और कामों में तेजी है। उसने इतनी ही देर में माँ की रसोई के लिए बाहर लगे सरकारी नल से पानी, साईकिल की सफाई, धौरी को चारा-भूसा और अपने उस इकलौते कपड़े को भी पहन लिया था, जिसे वह हर अच्छे अवसर पहनती थी।

बाबूजी ने सीके से बनाए गए खिलौनों को, सलीब जैसे आकारवाले डण्डे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक सलीके से लटका रखा है। तोता, साँप, पपीहरी, झुनझुना…सभी डण्डे से बँधे लहरा रहे हैं। मोर तो बस उड़ना ही चाह रहा है। बाबूजी का मन प्रसन्न है। उम्मीद है, खिलौने उन्हें अच्छे दाम दे जाएँगे, कुछ तो तंगी कम होगी।

“बाबूजी, मेले के पैसे तो दे दो।” कजली ने मचलते हुए कहा।

“ओ हाँ हाँ, लो… ।” उन्होंने कुर्ते की जेबों में हाथ डाला और तुरन्त निकाल लिया, जैसे अन्दर बैठे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। जेब तो किस्मत की तरह खाली थी। बहाना बनाकर बोले-“अरे, पहले मेले तो चल सही…।”

बाबूजी ने डण्डे को, साईकिल के कैरियर से, रस्सियों से बाँध दिया। कजली आगे बैठी। बैठने में आराम रहे, इसलिए उन्होंने अपना अंगोछा उस पर लपेट दिया था।

कजली रोमांचित थी। आँखों में जिन्दा सपने और सच हो रही कल्पनाएँ थीं। साईकिल की ‘ट्रिन–ट्रिन’ उसे बहुत मधुर लग रही थी, जैसे वह किसी हवाई जहाज़ पर उड़ी जा रही हो।

एक मोड़, दो मोड़, तीन मोड़..और फिर कैण्ट क्षेत्र शुरू। रामलीला मैदान में हो रहे शोर-शराबे की मिली-जुली ध्वनियाँ यहाँ तक पहुँच रही थीं। जगह-जगह पुलिसवाले भीड़ को सही दिशा में जाने का संकेत कर रहे थे।

बाबूजी को अपने एक दूर के परिचित के घर साईकिल खड़ी करनी पड़ी। अब शेष यात्रा पैदल करनी थी। पर इसमें भी अपना आनन्द था। कजली के पैरों में मानो साईकिल के पहियों की चाल आ गई हो। वह टुकुर-टुकुर ताकती आगे बढ़ रही थी। रामलीला मैदान भीड़ से खचा-खच भरा हुआ था। कान-पड़ी आवाज़ भी सुनना मुश्किल था। लाईन की लाईन दूकानें सजी हुई थीं। बाबूजी अभी एक कोने खड़े ही हुए कि मेले के ठेकेदार ने रसीद देते हुए कहा-“चालीस रूपए दो।”

“चालीस रूपए..!” बाबूजी अचकचा गए, फिर कहा-“अच्छा, थोड़ी देर बाद ले लेना। बिक्री तो हो जाने दो।’

“अब जब भी दो, रसीद तो कट चुकी है।” वह आगे बढ़ चला।

रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के विशाल पुतले दूर से ही दिख रहे थे।

पर कजली की नाक तो तरह-तरह की मिठाईयों की सोंधी सुगन्ध और चाट-पकौड़ी की चटपटाहट के पीछे बाग तुड़ाकर दौड़ रही थी। उनके स्वाद की कल्पना मात्र से जीभ कसमसा रही थी।

बाबूजी ने जेब में हाथ डाला। अभी केवल तीस रूपए हैं, मेले के ठेकेदार के लिए भी पूरे नहीं।

उन्होंने कजली को देखा । वह पास में, ज़मीन पर चादर बिछाकर बैठी थी। उसका ध्यान बाबूजी पर बिल्कुल नहीं था। उसकी निगाहें तो मेले की चक-पक में खोई हुई थीं। पर कभी-कभी लगता, जैसे वे निगाहें शून्य में कुछ निहार रही हों।

“अरे शांती तुम!’ अचानक उसे देख कजली उछल पड़ी।

“चाचा जी नमस्ते।” शांती ने पूछा-“यह अकेली आई है?”

“हाँ, बेटी।”

“इसे घुमाने ले जाऊँ, मेरी बुआ साथ हैं।”

“हाँ, तू तो मुहल्ले की है, तुझसे क्या, ले जा, बिल्कुल ले जा…।” अचानक बाबूजी बोल उठे-“पहली बार आई है, इसका हाथ पकड़े रहना शांती!”

चलने से पहले उन्होंने दस-दस के दो नोट आगे बढ़ाए-“ले कजली, अपनी मनपसन्द चीज़ ले लेना।” फिर मन में बुदबुदाए–‘ठेकेदार को बाद में दे दूंगा।

ढलती शाम के साथ-साथ बाबूजी का दिल डूब रहा था, माथे की सिलवटें गहरी हो रही थीं। अब तक आठ खिलौने ही बिके हैं। चालीस ठेकेदार को, बीस कजली को, बचे बीस से क्या होगा!

शाम का झुटपुटा छा चुका था। कजली धूल से मटमैली हो चुकी चादर पर कब आ बैठी, बाबूजी को पता भी नहीं चला।

फिर उधर रावण आदि के पुतले जले, इधर भीड़ का एक जत्था खरीदारी करता घर की ओर वापस चल पड़ा। बाबूजी हसरत से हर एक चेहरा पढ़ते कि शायद कोई इधर देखे, पर सामने लगी ‘चाइना माल’ की दूकान पर बैट्री-चलित एक से एक आकर्षक और सस्ते खिलौने सजे थे, जो बच्चे क्या, बूढों को भी खींच रहे थे। दुकानदार ढेरों खरीदारों को संभाल नहीं पा रहा था। वह खिलौने देता और लगभग बिना गिने ही रूपए गल्ले में दूंस देता।

बाबूजी भी इस तमाशे को अपरिचित-से देख रहे थे। कभी-कभी कजली को अपनी ओर एकटुक देखते हुए देखते, तो झूठी हँसी चेहरे पर बिखेर देते। वह ऊपर से तो शांत दिख रहे थे, पर मन में समुद्र मंथन था। जहाँ अमृत की एक बूंद भी नहीं…थी तो बस मूर्छित करनेवाली आज की कड़वी सच्चाई। उन्होंने मन ही मन कोई फैसला कर लिया था- ‘आज से यह कलाकारी बन्द । मैं भी शहर से यही खिलौने लाकर बेचूंगा।’

अब तक पुतले जलकर राख बन चुके थे। एक-आध चिंगारियाँ ही शेष थीं, जो इस मौसम में चलने वाली कुछ अधिक भारी पछुआ हवा से सुलग-सुलग उठती थीं। ठेलेवालों ने पेट्रोमैक्स जला लिया था, जिसके आस-पास लोगों से अधिक, उड़ने वाले कीट-पतंगे थे।

बाबूजी लौट चले घर की ओर। उनके एक हाथ में खिलौनों का भरा-पूरा डण्डा था, तो दूसरा हाथ अपनी बेटी के सिर पर फिसलता हुआ स्नेह उलींच रहा था।

“बाबूजी, आज मेले में बहुत मज़ा आया…!” कजली ने अपनी मुट्ठियों को खोलकर दस-दस के दो नोट आगे कर दिए–“इसकी तो मुझे ज़रूरत ही नहीं पड़ी, शांती दीदी जो साथ थी..और फिर अगर वह न होती तो इतने बड़े मेले में मैं तो खो ही जाती बाबूजी..!” कजली बोले जा रही थी और बाबूजी का दिल सिसक रहा था। उन्होंने कजली को भींच लिया।

“ऐ खिलौने वाले, ज़रा ठहरो तो..!”

अचानक एक आवाज़ सुनकर दोनों ठिठक गए। पलटकर देखा तो एक पुरुष और महिला अपने दो बच्चों के साथ खड़े थे।

बाबूजी ने उन्हें पहचानने की कोशिश की, पर वे इस शहर के नहीं लग रहे थे। आपस में अंग्रेज़ी में बातें कर रहे थे, जिनका मतलब दोनों नहीं समझ रहे थे। हाँ, उनके कई बार दोहराने से बाबूजी को एक शब्द ज़रूर याद हो गया था-“एण्टीक पीस ।”

“इन खिलौनों का क्या दाम लोगे?”

“जी…सभी का…!” बाबूजी ऐसे घबरा गए, मानो वे लोग उनका मज़ाक उड़ा रहे हों।

“हाँ, सभी का।”

“जी, दस रूपए का एक…।”

“सारे मेरी गाड़ी में रख दो।’ उस पुरुष ने दूर खड़ी चमचमाती गाड़ी की ओर इशारा किया। फिर पाँच सौ का नोट आगे बढ़ा दिया।

“पर बाबू साहब, यह तो कुल चार सौ के हैं।”

“रख लो।” उसने कहा-“मेरी मैडम को ये पसंद आ गए न!”

गाड़ी सनसनाती हुई निकली तो बाबूजी उसके धूल में एक क्षण को खो गए। वह इस पूरी घटना से अवाक् थे। कभी हाथ में लिए पैसे देखते, तो कभी साईकिल में लगे खाली डण्डे को, या फिर कजली की सूनी आँखों को। उन्हें पैसे मिलने की इतनी प्रसन्नता नहीं थी, जितनी कजली को मेले से कछ न दिला पाने की टीस। उनका दिल उसकी समझदार मासूमियत पर तड़प रहा था।

पर उन्हें क्या पता कि उम्मीदों, कल्पनाओं, आकांक्षाओं के कितने बड़े सागर को उसने आँखों में ही सुखा लिया था। वह बाबूजी के साथ मस्त-मगन लौट रही थी। उसकी आँखों में आज के मेले की पूरी तसवीर वैसे ही साफ झलक रही थी और नाक अब भी महसूस कर रही थी, मिठाईयों की सोंधी सुगन्ध.. ।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’