अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

वैदराज से क्रांतिकारी राज आज पुनः मिलकर हाल-चाल लेने आया था। वे दोनों बंद कमरे में बैठे बातें कर रहे थे।

वैदराज बोले—‘अभी शनिचर की बात है। ठाकुर ने क्रोध में आकर बेचारे निरपराध भीखम चौधरी को खूब पिटवाया था। सारा बदन सूज आया है बेचारे का। चारपाई से उठ भी नहीं सकता।’

अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

‘बड़ा अत्याचार हो रहा है तब तो मामा! राज दांत पीसते हुए बोला—‘इसको बंद करना पड़ेगा।’

इस समय वह लम्बी दाढ़ी वाले विचित्र रोगी की वेषभूषा में था। बेचारे राज को क्या पता था कि भीखम ही उसकी प्रेयसी का पिता है।

‘कुछ हो नहीं सकता राज!’ वैदराज बोले—‘किसकी मजाल है कि ठाकुर के सामने सिर उठा सके।’

‘सभी को आपने नामर्द समझ रखा है, मामा? अन्याय की भी सीमा होती है और सहनशक्ति की भी।’

‘होती है, ठीक कहते हो, मगर उग्र न होकर शांति से काम लेना मैं समयानुकूल समझता हूं।’

सहसा दरवाजे के बाहर खिड़की बजने का स्वर सुनाई पड़ा। देखा, बड़े ठाकुर का हाथी दरवाजे पर खड़ा है। ठाकुर हाथी से उतरकर धीरे से कमरे में आ गए। वैदराज ने जुहार की और गद्दी पर बैठने का उन्हें संकेत किया।

राज ने रोगियों की-सी अवस्था बना ली थी। बदन पर कंबल लपेट लिया था। बदन इस तरह कांप रहा था, जैसे जूड़ी चढ़ी हो, या जैसे लकवा मार गया हो।

बड़े ठाकुर ने ध्यानपूर्वक उस मूंछ-दाढ़ी युक्त रोगी की ओर देखा।

ठाकुर का चेहरा अत्यंत गंभीर था।

‘बाहर जाओ तुम?’ अत्यंत रुखाई से ठाकुर ने उस रोगी को आज्ञा दी।

रोगी चुपचाप बैठा रहा, जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। उसके शरीर का कम्पन पूर्ववत था।

‘मैं कहता हूं, बाहर जाओ! बहरे हो, सुनते नहीं!’ गरजे ठाकुर!

‘वह गूंगा और बहरा दोनों है, ठाकुर! तबीयत भी उसकी बहुत खराब है। कोई हर्ज नहीं, उसे रहने दो।’ वैदराज ने कहा।

‘वैदराज—!’ ठाकुर बोले—‘आलोक का पता नहीं लग सका है अभी तक। ठाकुर घराने की प्रतिष्ठा नष्ट की तो की, पर वह चला क्यों गया? मैंने उसे जाने के लिए तो नहीं कहां था।’

‘आलोक का कसूर कोई बहुत बड़ा नहीं था, बड़े ठाकुर!’

‘क्या कहते हो, वैदराज! कहते क्या हो तुम!’

वैदराज ने उस रोगी को बाहर जाने का संकेत किया। जो रोगी ठाकुर के कहने पर स्थिर बैठा रहा, वह वैदराज के एक इशारे पर तुरंत चला गया।

‘जवानी में सभी इस प्रकार की भूल कर बैठते हैं, ठाकुर!’ वैदराज ने कहा—‘आलोक को आप अपना नहीं पराया समझते थे, तभी आपने उसे इतना कड़ा दण्ड दिया। दुनिया का कोई भी व्यक्ति इस उम्र में पहुंचकर यह नहीं कह सकता कि वह दूध का धोया है। खुद आपने भी वैसी ही गलती की होगी। जवानी के दिन बेहोशी के दिन होते हैं, बड़े ठाकुर!’

‘चुप रहो, वैदराज! बहकी बातें मैं सुनने का आदी नहीं।’

जोरों से हंस पड़े वैदराज—‘सुनो ठाकुर…! आज एक जमाने से जिस भेद को छिपाता आ रहा हूं, उसे कान खोलकर सुन लो। आप तो जानते ही हैं कि आलोक चमार का बेटा है न?’

‘इसमें कोई शक है क्या, वैदराज?’

‘हां, है शक! आलोक चमारिन के गर्भ से जरूर पैदा हुआ है, मगर वह चाकर का बेटा नहीं हो सकता—नहीं हो सकता, बड़े ठाकुर! चमारों के लड़के मैले-कुचैले, काले-कलूटे होते हैं। ऐसा नहीं कि जैसा आलोक है।’

‘फिर भी क्या तुम इस बात को निश्चयपूर्वक कह सकते हो कि आलोक चमार का बेटा नहीं है?’ प्रश्न किया ठाकुर ने।

‘हां, मैं दावे के साथ कह सकता हूं। आलोक लाखन चमार का बेटा नहीं हो सकता, लाखन तो आजन्म नपुंसक रहा। वह जन्म से नपुंसक था।

‘नपुंसक?’

‘हां, मैं स्वयं उसकी दबा किया करता था—‘वैदराज निश्चयात्मक स्वर में बोले—‘पहले-पहल जब मैंने लाखन के मुंह से उसकी स्त्री के गर्भवती होने की खबर सुनी तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। खुद लाखन भी आश्चर्य-चकित था कि उसमें प्रजनन शक्ति के न होते हुए भी, उसकी स्त्री गर्भवती कैसे हो गईं? उसने मुझे बताया कि उसे अपनी स्त्री के चरित्र पर सन्देह है। मैंने उसे चुप रहने की चेतावनी दी। दिन बीतते गए।

एक दिन आधी रात को लाखन ने आकर मुझे सूचना दी कि उसकी स्त्री प्रसव पीड़ा से छटपटा रही है। मैं तुरंत उसे देखने गया। उसकी स्त्री पीड़ा से चिल्ला रही थी। उसकी आंखों में पाप की स्पष्ट छाया विद्यमान थी। मैंने दवा दी। उसका पाप, आकर्षण और सुंदर रूप धारण कर इस संसार में आया, एक बालक के रूप में करुण क्रन्दन करता हुआ। मैं आश्चर्यचकित था, उस शिशु का गोरा बदन और लुभावना स्वरूप देखकर।

प्रसव के बाद से ही उसकी दशा खराब होती गईं। बच्चे के पैदा होने के आठ घंटे बाद, जब उसे विश्वास हो गया कि अब वह नहीं बचेगी तो उसने मुझे और लाखन को अपने पास बुलाया। पश्चाताप-मिश्रित करुणस्वर में हम दोनों को ही उसने अपनी दर्दनाक कहानी कह सुनाई। उसने जो पाप किया था, उस पाप के लिए उसके हृदय में दारुण पश्चाताप था। पर पाप-कर्म में उसका कोई अपराध नहीं था। अपराध था उस नराधम का, जिसने उस पर बलात्कार किया था और जो अब भी समाज का कर्णधार बनकर स्वच्छन्दतापूर्वक जीवन बिता रहा है।

उसने अपनी पाप कथा बताकर सदा के लिए आंखें मूंद लीं, परंतु मृत्यु के पूर्व उसने मुझसे वचन ले लिया था कि मैं उस पुरुष से अवश्य बदला लूं, जिसने उसका धर्म लूटकर उसकी दीन-दुनिया उजाड़ दी थी। सुनना चाहते हो कि वह कौन दुराचारी था…।’

‘चुप रहो, चुप रहो वैदराज!’ कांपकर ठाकुर ने अपने नेत्र बंद कर लिए।

वैदराज ने आगे बढ़कर उनके कंधे पर हाथ रख दिया और व्यंग्यात्मक स्वर में बोले—‘घबरा गए, बड़े ठाकुर!’

ठाकुर उठ खड़े हुए और बहुत ही नम्र बनकर बोले—‘देखो वैदराज! जो हुआ, सो हुआ। उस घटना को भूल जाने में ही दोनों का हित है।’, फिर बात बदलते हुए बोले—‘सुनने में आया है कि आजकल भीखम की देखभाल तुम कर रहे हो।’

‘गरीब आदमी है, इसलिए करता हूं। आपने ठीक ही सुना है, बड़े ठाकुर!

‘पर मुझे यह पसंद नहीं।’ ठाकुर की भंगिमा एकाएक कठोर हो गईं—‘ अब अगर तुमने उनकी मदद की, तो ठीक नहीं होगा, वैदराज!’

वैदराज ने ठाकुर की आंखों में देखा। उसमें जैसे खून उतर आया था, परंतु वैदराज पर इसका कोई असर नहीं हुआ। घृणा से उन्होंने आंखें फेर लीं।

ठाकुर ने इस घृणा को लक्ष्य किया और पैर पटकते हुए बाहर चले गए।

राज अब तक बाहर बैठा था। वह इस वार्तालाप का एक अंश भी न सुन सका था, यद्यपि वह सुनने को बहुत इच्छुक था। बड़े ठाकुर के चले जाने पर वह अंदर आया। देखा? वैदराज गम्भीर बने कुछ सोचते हुए बैठे हैं।

‘क्या बात हुई वैदराज मामा—?’ बोला राज—‘बहुत गम्भीर हो रहे हैं आप?’

‘कुछ पूछो मत राज! इस जमींदार का गिरगिट जैसा रंग बदलता देखकर विद्रोह करने और अक्ल ठिकाने कर देने को जी चाहता है, जी चाहता है कि सारी प्रजा को भड़का कर उसकी हवेली घेर लू और हवेली की एक-एक ईंट उखाड़कर उस नर-पिशाच के सिर पर दे मारूं!’ वैदराज उत्तेजित वाणी में बोले।

‘आज तो तुम अपना सारा धैर्य खो बैठे हो, मामा!’

‘धैर्य की भी सीमा होती है, राज! मैं देख रहा हूं कि अब कुछ ही दिनों में मेरे धैर्य का बांध टूट जाएगा…।’ वैदराज ने कहा—‘अब तक उसके हजारों अत्याचार मैंने देखे—गरीबों पर जुल्म ढाते हुए किसानों की चमड़ी उधेड़ते हुए, लूटपाट मचाते हुए, सब अपनी इन्हीं आंखों से देखा है। अब न देख सकूंगा। खुद मेरे बेटे की भी जान इसी निर्दयी ठाकुर के कारण गईं। आज कहकर गया है कि अगर मैंने भीखम की दवा-दारू की, तो ठीक नहीं होगा।’

‘जाने दो मामा! बड़े आदमियों से उलझना ठीक नहीं।’ सावधान किया राज ने।

राज ने वैदराज को तो मना अवश्य किया, परंतु इसके हृदय में स्वयं ठाकुर के प्रति ऐसी घृणा का उदय हुआ कि जैसी कभी न हुई थी। उसके क्रांतिकारी हृदय में क्रांति की दबी आग एकाएक पुनः भड़क उठी। मामा के मुख से गरीबों की दुर्दशा का वर्णन सुनकर उसका रक्त खौल उठा। वह धीरे से उठा और बिना कुछ कहे चला गया।

वैदराज उसी स्थान पर सोचते हुए बैठे रहे। दिन की उज्ज्वलता ने क्रमशः! संध्या की कालिमा का रूप धारण कर लिया। वैदराज उठे मिर्जई बदन पर कसी, दुपट्टा कंधे पर रखा, फिर भीखम के घर की ओर बढ़ चले।

भीखम की हालत अभी तक अच्छी न थी, यद्यपि वैदराज की दवा से क्रमशः सुधार हो रहा था। आंखों में आंसुओं का अगम-सागर लिए घटा भीखम के पायताने बैठी थी। वैदराज आए जो वह वहां से हट गईं।

‘कैसी तबीयत है, भीखम चौधरी—?’ पूछा वैदराज ने।

‘अच्छी है वैदराज! आपका हाथ लगा है तो ठीक हो ही जाऊंगा—।’ भीखम बोला—‘आज तो बड़े ठाकुर इधर आए थे।’

‘क्या तुम्हारे पास भी आए थे?’ वैदराज ने पूछा।

‘हां, वैदराज!’ कहते थे कि मैंने अक्षम्य अपराध किया है, धमकी दे गए हैं मुझे तबाह करने की।’

‘हूं—!’ वैदराज की यह हुंकार बहुत ही अर्थमय थी।

वे चुपचाप दबा की पुड़िया खोलने लगे।

दवा भीखम को खिलाकर बोले—‘एक बात पूछूं भीखम चौधरी?’

‘पूछो वैदराज!’

‘सच-सच बताओगे?’

‘आज तक मैं कभी झूठ नहीं बोला हूं, आपके सामने सच न बोलूं इसका कोई कारण नहीं, वैदराज?’ भीखम बोला।

‘बड़े ठाकुर के पास, सुनता हूं, तुम्हारे कुछ रुपए जमा हैं!’ सच्चाई की पुष्टि के लिए वैदराज ने बात मुंह से निकाल ही दी।

भीखम चीख पड़ा—‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ, वैदराज?’

‘सजग कानों से कभी कोई बात छिपी नहीं रहती, भीखम। ‘वैदराज बोले—‘क्या यह सच है?’

‘सच है—।’ भीखम धीरे से बोला—‘एक हजार हैं, वैदराज!’

‘कल सवेरे जाकर तुम अपना रुपया मांग लाओ!’

‘मांग लूंगा वैदराज! जल्दी क्या है? वे बड़े राजा हैं, हमारा एक हजार मार लेंगे तो मैं गरीब नहीं हो जाऊंगा। अभी तो मैं चल -फिर भी नहीं सकता हवेली तक जाने की कौन कहे!’

‘आगा-पीछा न करो, चौधरी! कल सवेरे डोली पर चले जाना और ठाकुर से अपने रुपए मांगना, मैं कहारों को आज ही सहेज दूंगा।’

‘जैसा कहोगे वैदराज, वैसा ही करूंगा।’ भीखम ने शिथिल वाणी में कहा।

वैदराज उठ खड़े हुए। बाहर आकर जूते पहने और चल दिए। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि एक निर्जन पेड़ के नीचे खड़ी होकर घटा सिसक रही है। उन्हें देखते ही वह पास चली आई।

‘बड़ी गलती हो गईं मुझसे वैदराज मामा!’ बोली वह।

‘गलती!’ वैदराज आत्मीयता के स्वर में बोले—‘गलती तो सभी से होती है बिटिया! मैं भी क्या करता—। रामरक्षा पंडित और जैकरन ने तुम्हें पहले ही छोटे ठाकुर के साथ देख लिया था। मैं लाचार हो गया। वैसे कई दिन पहले ही मैंने तुम दोनों को सांझ के समय तालाब पर देखा था, मगर किसी से कुछ नहीं कहा। हां, छोटे ठाकुर को अवश्य सावधान कर दिया था।’

‘काका के सामने मैं बड़ी अपराधी हूं, मामा—।’ घटा दीन वाणी में बोली—‘मेरे ही लिए उन्हें मार खानी पड़ीं है।’

‘तुमने कोई पाप नहीं किया है, बिटिया! तुमने प्रेम किया है, प्रेम कोई बुरा कर्म नहीं। दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने प्रेम कभी नहीं किया और सब बुरे काम करते रहे, पाप की गंदगी में डूबे रहे, मगर आज शान से समाज में अपना सिर ऊपर उठाए चल-फिर रहे हैं। वे ही समाज के कर्णधार बने हैं। न्यायप्रिय न्यायाधीश बनने का ढोंग रचते हैं, ये लुच्चे।’ अंतिम बात उन्होंने दांत पीसकर कही थी।

वैदराज चले गए। घटा अपने घर की ओर लौटी। रास्ते में उसने एक विचित्र आदमी को देखा, जो रास्ते में खड़ा उसे घूर रहा था। लम्बी-लम्बी दाढ़ी थी, शरीर पर कम्बल लिपटा हुआ था, हाथ-पैर कांप रहे थे जैसे लकवा मार गया हो।

सिहरकर घटा ने अपनी दृष्टि हटा ली और जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाती हुई चली गईं।

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