जोगीबीर की दरी के पास बहुत ही दुर्गम कंटकाकीर्ण जंगल है। शायद ही कोई आदमी उधर जाने का साहस कर सकता है। उसी वनस्थली में, वृक्ष-लताओं से घिरी हुई एक झोंपड़ी है।
परंतु दूर से कोई देखे यह नहीं अनुमान कर सकता कि वहां कोई झोंपड़ी हो सकती है और उसमें कोई आदमी रह सकता है—एक ऐसा आदमी है, जिसके लिए राज्य की पुलिस परेशान है, जो एक भयानक क्रांतिकारी के नाम से भारत-भर में प्रसिद्ध हो चुका है—वह है राज नारायण।
अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
अवर्णनीय निर्जनता तथा अभेद्य निस्तब्धता से भी वह भयभीत या व्याकुल नहीं होता था, हमेशा मस्त रहता था। कभी-कभी जोगीबीर के झरने पर, जो उसकी झोंपड़ी से दो सौ गज की दूरी पर था, चला जाता। घंटों चुपचाप बैठकर न जाने क्या-क्या योजनाएं बनाता रहता।
विकट साहसी था राज। रात्रि की भयानक नीरवता, गीदड़ की विकट आवाज एवं जंगल की भीषण भयंकरता उसे विचलित नहीं कर पाती थी। उसके झोंपड़े में पर्याप्त खाद्य तथा अन्य आवश्यक सामग्रियां उपस्थित रहती थीं, जिससे वह अपना जीवनयापन कर रहा था।
उसने आधुनिक राजनीति में भयंकर क्रांति उत्पन्न कर दी थी, परंतु सामाजिक क्रांति में वह अपने को असफल अनुभव कर रहा था। आज कई दिनों से वह अपने ग्राम्य-जीवन के बारे में सोचने लगा था। उस ग्राम्य-बाला की याद आते ही उसके हृदय में भीषण उथल-पुथल मच गईं थी।
वह उस ग्राम्य-बाला को भूल नहीं सका था। उसके अल्हड़पन की विचित्रता उसका हृदय कुरेद रही थी। कितनी शोख है वह! कितनी सुंदर! कितनी चंचल।
दोपहर को वह झरने के किनारे बैठा हुआ उसी लड़की के विषय में सोच रहा था। उसे याद आया वह दिन जबकि उसकी टोपी पानी में बह गईं थी और वह स्वयं पानी में कूदकर उसे निकाल लाई थी। उसकी साड़ी पानी में लथपथ हो रही थी। छाती पर कपड़ा ऐसा कसकर चिपक गया था। कि देखकर उसका तृषित हृदय हाय-हाय कर उठा था।
उसके बाद—! उस दिन जब वह संध्या को छोटे ठाकुर से मिलने तालाब पर गया तो छोटे ठाकुर तो मिले नहीं, मिल गईं वह। कितनी निर्भीक है वह कि पीछे से आकर उसकी आंखें मूंद ली थीं।
आज वह एक क्रांतिकारी युवक, जिसके हृदय में स्वतन्त्रता की आग भभक रही थी। प्रेम और सौन्दर्य के लिए जिसके मन में कोई स्थान न था, परंतु आज! वहीं युवक अपने में एक प्रकार की शिथिलता एवं बेचैनी का अनुभव कर रह था। उसका हृदय छटपटा रहा था, किसी को अपनी बना लेने के लिए।
वह उठ खड़ा हुआ, पुनः बैठ गया। हाथों से झरने का पानी जोरों से उछालकर उसने अपने मुंह पर छीटें मारे और उन कष्टदायक विचारों की अपने से दूर भगाना चाहा, मगर न भगा सका। आवेश में आकर उसने अपने दोनों हाथ बांध लिए और बार-बार अपने हाथों को ही चूमने लगा।
एकाएक पीछे से सुरीली खिलखिलाहट की आवाज शान्त वातावरण में गूंज उठी। साथ ही मधुर स्वर फूट पड़ा—‘वाह, यह क्या हो रहा है?’
राज ने पीछे मुड़कर देखा। वहीं थी वह, जिसे वह अभी-अभी याद कर बेचैन हो उठा था।
उसके मुख पर अव्यक्त मुस्कान खिल उठी।
वह बोला—‘आओ तुम्हारी ही बात सोच रहा था।’
वह लड़की घटा ही थी। लकड़ियां लेने वह जंगल में आई हुई थी। वह आकर निर्भीकता से राज की बगल में बैठ गईं। उसने राज की नाक की ओर गौर नहीं किया। अब वह सूरत उसे इतनी प्यारी हो गईं थी और उसे मालूम ही क्या था कि एक ही सूरत के दो आदमी भी हो सकते हैं।
आपको पानी से बहुत प्रेम है। कभी झरने के किनारे, कभी तालाब के किनारे। आखिर पानी से इतना प्रेम क्यों है?’ घटा ने कहा।
‘केवल पानी से ही नहीं, एक और चीज से मुझे बहुत प्रेम है—।’ राज खिसककर घटा के पास आ गया। घटा के नेत्र चंचलता से नाच उठे।
‘और किससे?’ पूछा घटा ने।
‘तुमसे—!’ राज बोला और उसने घटा का हाथ पकड़कर धीरे से अपनी हथेलियों के बीच दबा लिया।
‘मुझसे! मैं कहां की सुंदर हूं कि मुझसे प्रेम करने लगे।’ घटा बोली—‘तुम बहुत भारी डाकू हो।’
‘डाकू!’ सुनकर सहम गया राज।
‘हां, तुमने मेरी आंखों की नींद चुरा ली है, तुमने मेरे दिल पर डाका डाला है?’
‘ओह!’ कहकर राज ने उस यौवनोन्मत्त शरीर को उठाकर अपनी गोद में रख लिया और उसे अपनी बांहों के बीच बांध लिया। दोनों के पिपासातुर होंठ बड़ी देर तक आपस में जुड़े रहे। दोनों के सीने की तीव्र धड़कनें एक दूसरे से मौन हो बातें करती रही।
एकाएक राज इस तरह छिटककर उठ खड़ा हुआ जैसे उससे विद्युत-प्रवाह छू गया हो। उसे अपने कर्तव्य का ज्ञान हो आया। उसे किसी फिल्म में देखी-सुनी हुई ये बातें याद आईं, जिसत्र्नका तात्पर्य था कि भावना से कर्तव्य ऊंचा है! उफ! वह एक अनजान ग्राम्य बाला की जवानी के साथ कैसा विकट परिहास कर रहा है।
वह सिर पकड़कर एक दूसरी चट्टान पर बैठ गया। घटा उसके पास घबराई हुई आई, बोली—‘यह क्या हो गया एकाएक आपको?’
‘कुछ नहीं, सिर दर्द कर रहा है। इस वक्त तुम जाओ, फिर भेंट होगी।’ राज ने कहा। उसका चेहरा पीला पड़ गया था।
‘अच्छा! मैं जरा ऊपर पहाड़ पर जाती हूं। लकड़ी तोड़कर दो घंटे में आ जाऊंगी। आपके लिए ‘ममरी’ की पत्ती लेती आऊंगी, उससे सिर-दर्द अच्छा हो जाएगा। आप यहीं रहियेगा, भला!’ कहकर घटा चली गईं।
बड़ी देर तक वह आत्मग्लानि में डूबा रहा। झरने के किनारे बैठा रहा। उसने निश्चय कर लिया कि अब वह उस लड़की के विषय में नहीं सोचेगा और न कभी इस झरने के किनारे आयेगा, न उस तालाब पर जाएगा।

इस दृढ़ निश्चय से उसे कुछ शांति मिली। वह अपने छिपने के स्थान की ओर बढ़ा। झोंपड़ी में आकर देखा छोटे ठाकुर उसकी प्रतीक्षा में बैठे हैं।
‘चार घंटे मुझे यहां आए हो गए, मगर तुम्हारा कहीं पता नहीं—।’ छोटे ठाकुर बोले।
राज उसके पास आकर बैठ गया। दोनों में बड़ी देर तक बातें होती रहीं। अंत में छोटे ठाकुर बोले—‘अच्छा, अब चलता हूं। तुम ज्यादा इधर-उधर मत घूमा करो। मैं जरा झरने की तरफ जा रहा हूं। मौसम बड़ा अच्छा है।’
‘मैं भी साथ चलूं?’
‘नहीं।’
राज ने कोई प्रतिवाद नहीं किया।
छोटे ठाकुर झोंपड़ी से बाहर आकर झरने की ओर चल पड़े।
जिस समय छोटे ठाकुर झरने पर आए तो सूरज डूबने को था। थोड़ी देर झरने के किनारे वे बैठे रहे, फिर हवेली की ओर लौटने लगे। थोड़ी दूर आ चुकने पर सहसा उन्हें एक सुरीला गाना सुनाई पड़ा—‘अब तो चढ़त, जात जवानी या, छुटत जात लड़िकइयां वा, घटत जात करि हइयां बा ना…।’
कुछ आगे बढ़ने पर उन्होंने देखा, घटा एक चट्टान पर बैठ कर कजली गाकर थकान मिटा रही है।
पास जाकर छोटे ठाकुर बोले—‘तुम बहुत अच्छा गाती हो घटा। क्या अप्सरा जैसा गला पाया है तुमने।’
मुस्करा पड़ीं वह—‘अब आप हवेली को लौट रहे हैं न?’
‘हां, बहुत देर तक झरने के किनारे बैठा रह गया।’
‘मैंने आपको बहुत खोजा, लेकिन आप वहां मिले नहीं, इसलिए यहां बैठी थी कि लौटेंगे तो आप इसी राह।’
‘ओह! तो तुमने मुझे देखा था?’
‘वाह! बड़े भोले बनते हैं, आप।’ घटा बोली—‘कहिए अब सिर का दर्द कैसा है?’
‘सिर का दर्द—?’ सोचने लगे छोटे ठाकुर—‘ओह, हां। कल रात एकाएक पीड़ा हो आई थी, अब तो ठीक है।’
‘मैं आपके लिए ‘ममरी’ की पत्ती लेती आई हूं। लीजिए, खा लीजिए। सिर का दर्द अच्छा हो जाएगा।’
‘परंतु अब तो सिर में दर्द नहीं है।’

‘नहीं, नहीं, आपको खानी पड़ेगी।’ घटा ने जबरदस्ती छोटे ठाकुर को ‘ममरी’ की पत्ती खिला ही दी।
‘आप कभी-कभी बड़े बेचैन-से दिखाई पड़ते हैं, आखिर क्यों?’ घटा ने अपनी शंका व्यक्त कर दी।
‘कुछ तो तुम्हारे प्रेम ने और कुछ सांसारिक चिंताओं ने मुझे बेचैन कर रखा है, घटा।’
‘आप मेरी चिंता न किया करें।’
‘तुम्हारी सूरत तो रात में भी मेरे सामने नाचती रहती है।’ कहते हुए छोटे ठाकुर ने उसकी ठुड्डी पकड़कर ऊपर उठा ली और उसके गुलाबी हो गए गालों पर चुम्बन की एक मुहर लगाकर बोले—‘पिताजी मुझे शादी करने के लिए विवश कर रहे हैं।’
‘तो कर लीजिए शादी।’
‘शादी करूंगा तो केवल तुमसे।’ छोटे ठाकुर ने उसे बांहों में कसते हुए दृढ़ता से कहा।
‘मैं विधवा हूं, राज! मुझसे शादी कर तुम बदनाम हो जाओगे।’
‘तुम्हारे लिए सभी बदनामी स्वीकार है मुझे, मेरी रानी!’
कहकर छोटे ठाकुर ने घटा को अपने सीने से कसकर लगा लिया।
