अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

कारिन्दा सिर झुकाकर बाहर जाने लगा, तो बड़े ठाकुर ने पुकारा।

‘सुनो!’

कारिन्दा रुक गया।

‘देखो, कल कलेक्टर साहब आने वाले हैं। जोगीबीर की दरी के पास उनका शिविर लगेगा।’

अपना पराया नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

‘वहां तो ठीक नहीं होगा, सरका पर! सोहट या महवारी गांव के तालाब पर शिविर लगे तो ठीक होगा।’

‘अच्छा वहीं सही—!’ ठाकुर बोले—‘वह जगह खूब साफ करा दो। अब अहीरों को सूचना दे दो कि घर एक-एक घड़ा दूध वहां पहुंचा दे और काछी लोग एक-एक पंसेरी तरकारी। इसके अलावा सारी जमींदारी में, फी घर पांच रुपये नजर करने का मेरा हुक्म पहुंचा दो। आज शाम तक सब कार्य पूरा हो जाना चाहिए।’

‘बहुत अच्छा, सरकार!’

‘अब तुम जाओ, जरा छोटे ठाकुर को इधर भेज देना।’

कारिन्दा चला गया। थोड़ी देर बाद छोटे ठाकुर ने वहां प्रवेश किया।

‘छोटे ठाकुर!’

‘दिन-पर-दिन तुम्हारी शिकायतें मेरे पास पहुंच रही हैं। तुम अकेले ही जहां मन आता है, घूमते रहते हो। अपनी इज्जत का जरा भी ख्याल नहीं है, तुम्हें? तुम यह नहीं समझते कि तुम ठाकुर के बेटे हो, जहां जाना हो, वहां हाथी पर जाना चाहिए। साथ में लठैत होने चाहिए।’

‘एक आदमी के लिए हाथी और लठैतों का होना क्या जरूरी है, पिताजी…?’ छोटे ठाकुर ने साहस कर पूछा।

‘तुम पागल हो।’ ठाकुर सरोष बोले—‘तुम सभी काम अपनी मर्जी से करते हो, परंतु तुम्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि तुम अभी अपने पिता के आश्रित हो, पिता के धन पर गुलछर्रे उड़ाते हो।’

थोड़ा रुककर, फिर बोले—‘कल कलेक्टर साहब हमारी जमींदारी का निरीक्षण करने आ रहे हैं। तुनक-मिजाज हाकिम हैं। अपने खद्दर के सारे कपड़े उतारकर रेशमी कपड़े पहन लेना, इसे मेरी आज्ञा समझो।’

छोटे ठाकुर बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चले गए।

दूसरे दिन कलेक्टर साहब आए। डी. जी. कागहिल आई. सी. एस. उन दिनों कलेक्टर थे। उनका खूब स्वागत हुआ। प्रजा को सता-सताकर दूध, तरकारी, चावल, बकरे और रुपये वसूल किए गए थे। बड़े ठाकुर दौड़-दौड़कर सब काम अपने हाथों कर रहे थे। बहुत से ग्रामीण बेगार में पकड़ लाए गए थे।

एकाएक छोटे ठाकुर को खद्दर के परिधान में आते हुए देखकर बड़े ठाकुर क्रोध से कांप उठे मगर लाचार थे। छोटे ठाकुर ने आकर साहब को अंग्रेजी तरीके से अभिवादन कर तबीयत का हाल पूछा। साहब एक हिन्दुस्तानी को इतनी अच्छी अंग्रेजी बोलते सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ, फिर क्या था, अंग्रेजी में बातें होने लगीं।

‘जमींदारी का काम कैसा चल रहा है, छोटे ठाकुर?’ साहब ने पूछा।

‘आजकल पूंजीपतियों का बोलबाला है, साहब! गरीबों का गुजर कहां?’

‘गरीबों के प्रति आप बहुत सहृदयता रखते हैं?’

‘हर एक इंसान यदि वह इंसान है तो उनकी हालत देखकर अवश्य सहानुभूति प्रकट करेगा। मुझे उम्मीद है कि आप भी।

‘हां! हां! हमारे देश में गरीबों और अमीरों में कोई पृथकता नहीं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।’

‘मगर यहां तो बात ही उल्टी है साहब! गरीबों का खून चूसकर ये पूंजीपति धनवान बनते हैं। आपके लिए जो इतना दूध, तरकारी, चावल, आटा, बकरे आदि सामान लाए हैं, सब प्रजा से जबरदस्ती वसूल किए गए हैं। इतने ग्रामीण, जो दौड़-दौड़कर काम कर रहे हैं, सब बेकार में पकड़े गए हैं।’

‘अच्छा…!’ साहब बोले—‘मुझे आपके विचार बहुत पसंद आए छोटे ठाकुर! मुझे उम्मीद है कि बड़े ठाकुर के बाद आप समझ से काम लेंगे।’

‘यदि आपकी कृपा रही तो—।’

‘मुझे वे हिन्दुस्तानी ज्यादा पसंद हैं, जो चापलूसी की बातें नहीं करते, जो अपने देश की उन्नति चाहते हैं, जो अपने देश की बनी हुई चीजें इस्तेमाल करते हैं। आपको खद्दर के कपड़े पहने देखकर मुझे बेहद खुशी हुई है, मैं तड़क-भड़क से घृणा करता हूं।’ कहकर छोटे ठाकुर से उन्होंने हाथ मिलाया।

छोटे ठाकुर ने कलेक्टर साहब को आशातीत नम्र तथा विनयशील पाया।

बड़े ठाकुर की समझ में कुछ नहीं आ रहा था, वे मुंह बाएं दोनों के मुख को आश्चर्यचकित भाव से खड़े देख रहे थे। यह देखकर उन्हें और भी आश्चर्य हुआ कि कलेक्टर साहब ने कभी उनसे हाथ नहीं मिलाया था, परंतु आज छोटे ठाकुर से उन्होंने हाथ मिलाया।

Leave a comment