दोनों युवक एक साफ चट्टान पर आकर बैठ गए। उनमें से एक था राज और दूसरे थे छोटे ठाकुर!
‘अब तो काफी दूर आ गए ह्मो।’ छोटे ठाकुर ने कहा—‘ और कितनी दूर चलना है?’
‘बस अब थोड़ी दूर है—कल एक अजीब घटना घटी,? आलोक! जिसका जिक्र करना ही मैं भूल गया।
‘कैसी घटना थी वह?’ पूछा छोटे ठाकुर ने।
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‘कल सोहटा गांव के उस तालाब की ओर घूमता हुआ निकल गया था। चार बजे थे। तालाब पर कोई न था। मैं ध्यानमग्न होकर तालाब के किनारे बैठा था। एकाएक मेरा ध्यान भंग हो गया, यह देखकर कि दूर खड़ा हुआ एक देहाती किसान मुझे ध्यानपूर्वक घूर रहा है।
‘देहाती किसान?’
‘हां, आलोक! वह जरूर कोई जासूस था, क्योंकि जब मैं तालाब पर से लौटने लगा,तो मैंने देखा वह छिपे-छिपे मेरा पीछा कर रहा है। सब कुछ समझ गया मैं, अतः उसे भुलावा देने के लिए इधर-उधर चक्कर काटने लगा। अंत में लउरिया गांव में पहुंचकर मैं उसे चकमा देने में सफल हो गया। काफी रात गये बाहर निकला और अपने स्थान पर लौट आया।’
‘यह तो तुमने बड़ी चिंताजनक बात सुनाई।’
‘पर कोई चिंता करने की बात नहीं, जब तक रिवाल्वर मेरे पास है, कोई मेरा बदन छू भी नहीं सकता और यह स्थान भी ऐसी जगह पर है कि पुलिस सिर पटककर मर जाएगी, पर उसका पता न पा सकेगी।’
‘अरे वह देखो। वे लोग कौन हैं?’ चौंककर छोटे ठाकुर बोले। दोनों ने देखा, कुछ दूर पर हथियारबंद सिपाहियों के दो दस्ते इधर ही आ रहे हैं। अंग्रेज पुलिस इंस्पेक्टर भी उनके साथ में है।
‘अब क्या करना चाहिए?’ छोटे ठाकुर बोले। उनके स्वर में तनिक भी घबराहट न थी—‘उन्होंने हमें देख लिया है।’
‘छोटे ठाकुर, तुम भागो यहां से। मुझे अकेले निपट लेने दो। मेरे पास रिवाल्वर और काफी कारतूस हैं।’
‘यह नहीं हो सकता, राज! मैं तुम्हें इनके हाथों में पड़ने नहीं दूंगा।’ छोटे ठाकुर ने कहा—‘अच्छा देखो, मैं भागता हूं। वे पहले मेरा ही पीछा करेंगे। तुम मौका पाकर अदृश्य हो जाना।’
राज के कुछ कहने से पहले ही छोटे ठाकुर भाग खड़े हुए। इंस्पेक्टर को छोटे ठाकुर को भागते हुए देखकर समझा कि असली अपराधी वहीं है, अतः सिपाहियों को ललकारा और आप भी उनके पीछे दौड़ चला। असली अपराधी राज की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। वह न जाने किधर जाकर अदृश्य हो गया।
‘छोटे ठाकुर बहुत तेज भाग रहे थे। इंस्पेक्टर ने जब देखा कि यों इसे पकड़ सकना बहुत कठिन है, तो उसने अपनी पिस्तौल निकाली ।
धांय-धांय की आवाज हुई और छोटे ठाकुर चीखकर जमीन पर गिर पड़े।
सिपाहियों ने पास पहुंचकर उन्हें हथकड़ी पहना दी।
छोटे ठाकुर के पैर में गोली लगी थी। घाव मामूली था।
घोर जंगल में यह घटना घटी थी, अतः आसपास किसी को मालूम न हो सका कि छोटे ठाकुर गिरफ्तार हो गए हैं। इंस्पेक्टर ने जेब से एक फोटो निकाली, जो वास्तव में राज की थी। उसने छोटे ठाकुर को गौर से देखा, फिर फोटो की ओर देखकर बोला—‘यही है वह, ले चलो।’
छोटे ठाकुर बेहोश थे। सिपाहियों ने उन्हें उठाया और लेकर चल पड़े।
उसी दिन शाम को, जब वैदराज अपने रोगियों से छुट्टी पाकर आराम कर रहे थे तो एक विचित्र रोगी ने वहां प्रवेश किया। सिर पर कसकर वह रूमाल बांधे हुए था, मुंह पर बेतरतीब दाढ़ी-मूंछें थीं। बदन जूड़ी बुखार की तरह कांप रहा था, खूब कसकर कम्बल अपने बदन पर लपेटे हुए था।
‘क्या हुआ है तुम्हें?’ पूछा वैदराज ने।
‘जूड़ी बुखार, वैदराज! मेरा कांपना नहीं देख रहे हैं आप?’ उसकी जबान भी कांप रही थी—‘मेहरबानी कर जल्द कोई दवा दीजिए।’
दो-चार लोग जो वैदराज के पास केवल गप्प लड़ाने आए थे, उठकर चले गए। वैदराज रोगी को लेकर कोठरी में आए। कोठरी में आते ही रोगी एकदम चंगा हो गया। उसने कम्बल एक ओर फेंक दिया और लपक कर अंदर से किवाड़ बंद कर दिए और सांकल चढ़ा दी। वैदराज घबराहट भरे स्वर में बोले—‘यह कैसा जूड़ी बुखार है? कौन हो तुम?’
रोगी हंसता हुआ आकर गद्दी पर वैदराज के सामने बैठ गया। मुंह से नकली दाढ़ी-मूंछें हटा लीं, बोला—‘बहुत छिपकर आया हूं मामा!’
‘राज तुम?’ चौंक पड़े वैदराज—‘बात क्या है? कोई नई घटना हुई है क्या?’
‘गजब हो गया है। मामा! छोटे ठाकुर ने मेरी जगह अपने को पुलिस के हाथों सौंप दिया है। मुझे बचाने के लिए ही उन्होंने यह आत्म-त्याग किया है।’
‘यह बहुत बुरा हुआ है। अड़े ठाकुर जो न कर डालें, वह थोड़ा है, यद्यपि छोटे ठाकुर के छूट जाने में कोई कठिनाई नहीं होगी। जहां उन्होंने यह बताया कि मैं आलोक हूं, तुरंत उन्हें छोड़ दिया जाएगा।’
‘मगर वे बतायेंगे नहीं, मामा! मेरे लिए वह नादान दोस्त सब कुछ कर सकता है। वह जीवन भर जेल में सड़ता रहेगा, मगर यह न बतायेगा कि वह असल अपराधी नहीं है। बहुत जिद्दी है वह, मामा!’
‘और कोई डर नहीं, डर है तो ठाकुर का। छोटे ठाकुर को एकाएक गायब पाकर वे जल-भुन जाएंगे। छोटे ठाकुर को छुड़ाने के लिए मैं जमीन-आसमान एक कर दूंगा, परंतु उनके छूट जाने पर जब बड़े ठाकुर उनसे इतने दिनों की गैरहाजिरी का कारण पूछेंगे, तो क्या बतायेंगे, छोटे ठाकुर!’
बहुत देर तक परामर्श होता रहा। सन्ध्या हो चली थी। तभी बन्द दरवाजे पर थपकी की आवाज सुनाई पड़ीं। वैदराज ने जाकर दरवाजा खोला। आगन्तुक को देखते ही सन्न रह गए थे। बाहर बड़े ठाकुर खड़े थे हाथ में लाठी लिए। हाथी एवं एक लठैत दरवाजे पर खड़े थे।
‘जुहार हो बड़े ठाकुर!’
‘जुहार, वैदराज!’ कहते हुए ठाकुर दरवाजा ठेलकर अंदर घुस आए। राज पर उनकी नजर पड़ीं तो ताड़नायुक्त स्वर में बोल उठे—‘खूब रहा! शाम हो गईं और तुमने सुबह से अब तक हवेली पर कदम नहीं रखा। मैं और तमाम लठैत खोजते-खोजते परेशान हो रहे है और तुम यहां बैठे हुए वैदराज से गप्पें मार रहे हो? क्यों छोटे ठाकुर!’
राज समझ गया कि ठाकुर उसे आलोक समझ रहे हैं।
वह घबरा उठा, परंतु वैदराज ने उसे संकेत कर सावधान कर दिया।
वैदराज भी इस समय किंकर्तव्य-विमूढ़ से हो रहे थे, परंतु शीघ्र ही स्वस्थ होकर बोले—‘छोटे ठाकुर प्रातःकाल जब यहां आए तो उस समय उनकी नाक में तीव्र पीड़ा हो रही थी। कोई आदमी नहीं था, इसी से आपको खबर न दे सका।’ वैदराज ने कुछ समझकर ही नाक के दर्द का बहाना किया था।
‘नाक में दर्द?’ ठाकुर बोले।
‘जी हां सरकार! इनकी नाक में फोड़ा होने का भय है—।’ वैदराज कहने लगे—‘आप जरा चारपाई पर बैठिए, मैं इनकी नाक पर पट्टी लगा दूं तो यह भी आपके साथ चले जाएंगे।’
‘बहुत अच्छा!’ ठाकुर बाहर चारपाई पर बैठ गए।
वैदराज कपड़े की एक पट्टी पर कोई मलहम लगाते हुए धीरे से बोले—‘तुम्हें बड़े ठाकुर के घर जाना होगा और तब तक आलोक बनकर रहना होगा, जब तक छोटे ठाकुर जेल से छूटकर नहीं आ जाते। मैं उनको छुड़ाने का भरसक प्रयत्न करूंगा। तुम्हें कोई पहचान न सके ऐसा प्रयत्न करना होगा। वैसे सूरत-शक्ल में तुम छोटे ठाकुर से मिलते ही हो। केवल तुम्हारी नाक में जरा-सा फर्क है, इसलिए मैं उस पर पट्टी लगाए देता हूं। तुम पट्टी बदलवाने के बहाने दिन में एक बार मिल अवश्य लिया करना।’
‘मगर मामा!’
‘घबराओ नहीं, छोटे ठाकुर बनकर रहने पर पुलिस तुम्हारा कुछ भी न कर सकेगी।’ उन्होंने राज की नाक पर लम्बी-सी पट्टी लगा दी और उसे लेकर बाहर आए।
बड़े ठाकुर और राज हाथी पर जा बैठे! हाथी चल पड़ा। हवेली पर पहुंचकर दोनों उतर पड़े। राज का हृदय धड़क रहा था आज वह एक अनजानी जगह में अपरिचित लोगों के बीच जा रहा था।
‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, अपने कमरे में जाकर सो रहो।’ ठाकुर ने आज्ञा दी।
राज क्या जाने कि छोटे ठाकुर का कमरा किधर है? वह असमंजस में पड़ गया।
‘अच्छा चलो मैं ही तुम्हें पहुंचा देता हूं।’ कहकर ठाकुर आगे-आगे चले और पीछे-पीछे राज दोनों एक प्रशस्त कमरे में आए। राज को चारपाई पर लेट जाने का आदेश देकर वे चले गए।
छोटे ठाकुर की तबीयत खराब होने की बात सुनकर थोड़ी ही देर में घर के सभी सदस्य उन्हें देखने आ गए। ठकुराइन अम्मा ठकुराइन तथा अन्य नौकर-चाकर तरह-तरह के सवाल करने लगे। सवालों से राज ने घबराकर सिरदर्द का बहाना कर दिया।
फिर क्या था? बूढ़ी ठकुराइन अम्मा ने सिरका और तिल के तेल में एक कपड़ा भिगोकर उसके सिर पर रख दिया और बहुत ना-नुकर करने पर भी उसे लवंग की आंटी पिलाकर ही छोड़ा।
दूसरे दिन प्रातःकाल सभी प्रमुख समाचार पत्रों में भयानक क्रांतिकारी राज नारायण की गिरफ्तारी का समाचार बड़े-बड़े अक्षरों में प्रकाशित हुआ—भयानक क्रांतिकारी राज गिरफ्तार! उसको पकड़ने के लिए पुलिस ने गोली चलाई आदि शीर्षकों से पत्रों के कॉलम रंगे हुए थे।
जेल में आने पर, आलोक को जेल के हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया गया था, क्योंकि उसके पैर में जख्म था। उसका आपरेशन हुआ, जहां से गोली निकाली गईं।
एक सप्ताह में आलोक कुछ-कुछ टहलने लायक हो गया। लाख पूछने पर भी उसने यह नहीं बताया कि वह असल अपराधी नहीं है। उसे राज के प्रति हार्दिक सहानुभूति थी। वह अपने मित्र के लिए सब कुछ सहन करने के लिए तैयार था।
राज को कोई पहचान न सका था। उस चतुर युवक ने सारी परिस्थितियां आश्चर्यजनक रीति से संभाल ली थीं। उसे यह भी मालूम हो गया कि आलोक पर जितना प्यार ठकुराइन अम्मा करती है, उतना ठकुराइन और ठाकुर नहीं। राज दिन में एक बार वैदराज के यहां नाक पर पट्टी लगवाने के लिए बाहर अवश्य जाता और उनसे प्रार्थना करता कि वे आलोक की मुक्ति के लिए यथाशीघ्र प्रबन्ध करें।
जमींदारी भर में छोटे ठाकुर की नाक पर जख्म होने की खबर फैल गईं थी। घटा ने भी खबर सुनी थी। नित्य-प्रति उसके ही दरवाजे पर थे छोटे ठाकुर का हाथी जाता था। बोलने का मौका न पाकर वह केलव दर्शन से ही सन्तोष कर लेती थी। राज भी जान गया था कि उसकी प्रेयसी का घर यही है, जिसका अभी तक उसने नाम भी नहीं पूछा था।
एक दिन ठकुराइन और ठाकुर में चुपके-चुपके बातें हो रही थीं—
‘पहले आलोक को देखकर उसके प्रति मेरे दिल में प्रेम नहीं उभर पाता था—।’ ठाकुर बोले—‘लेकिन जब से उसकी नाक पर घाव हो गया है, तब से जब भी उसे देखता हूं, तो हार्दिक स्नेह उमड़ पड़ता है, उसे देखकर। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था, ठकुराइन।’
‘यही बात तो मैं भी आपसे कहने वाली थी।’ ठकुराइन ने कहा—‘आजकल मुझे भी आलोक के प्रति अगाध स्नेह उमड़ पड़ता है। ऐसा पहले कभी नहीं होता था, ठाकुर! अब जब उसे देखती हूं तो जान पड़ता है कि जैसे मेरी छाती में दूध उतर आया है। आखिर है तो वह अपना ही बेटा न, ठाकुर! तो, फिर ऐसा क्यों न हो?’

‘मैं देखता हूं कि आज की वह बहुत चिंतित रहता है। मुंह दिन-पर-दिन सूखता जा रहा है।’
‘जिद्दी भी तो वह ऐसा है कि नाक का घाव दिखाता ही नहीं। यदि घाव गहरा हो तो मेरी राय है कि शहर चलकर किसी अनुभवी डॉक्टर को दिखला दिया जाए।’
‘परंतु वह शहर जाने को राजी नहीं होता था। इस तरह दो सप्ताह व्यतीत हो गए और एक दिन वैदराज कलेक्टर साहब के बंगले पर पहुंच ही गए। पांच रुपए इनाम नजर करने पर अर्दली ने कलेक्टर साहब को वैदराज के आने की सूचना देना मंजूर किया।
शीघ्र ही वैदराज की बुलाहट हुई। वैदराज ने अंदर जाकर साहब को अभिवादन किया।
अभिवादन स्वीकार करते हुए साहब ने पूछा—‘बोल वैदराज! कैसे तकलीफ किया?’
हाथ जोड़ बहुत ही विनम्र स्वर में वैदराज बोले—‘मुझे ठाकुर दीप नारायण सिंह ने भेजा है, हुजूर!’
‘ओह ठाकुर साहब ने!’ साहब हंसकर बोले—‘क्या फरमाया है उन्होंने?’
‘उनकी तबीयत ठीक नहीं है, नहीं तो वे खुद ही हुजूर की सेवा में हाजिर होते।’ वैदराज ने कहा।
‘मगर उन्होंने फरमाया क्या है?’
‘बात यह है कि छोटे ठाकुर को पुलिस इंस्पेक्टर साहब दो सप्ताह हुए राज नामक डाकू समझकर पकड़ लाए हैं। आज तक बड़े ठाकुर को यह बात मालूम नहीं थी, कल मालूम हुई है, इसलिए आपको इत्तला करने में देर हुई।’
‘अच्छा…।’ मैं पुलिस इंस्पेक्टर को अभी फोन करता हूं।’
साहब देर तक टेलीफोन पर बातें करते रहे। तत्पश्चात रिसीवर रखकर बोले—‘इंस्पेक्टर कहते हैं कि उन्होंने ठीक अपराधी को पकड़ा है। मैंने उन्हें अपराधी का फोटो लेकर जेलखाने पर आने को कह दिया है। हम लोग भी अभी चलते हैं।’
तुरंत ही साहब की कार तैयार हुई! साहब और वैदराज कार में आकर बैठ गए। कार जेल की ओर भाग चली।
जिस समय कलेक्टर साहब जेल में पहुंचे, उस समय तक इंस्पेक्टर साहब नहीं आए थे। साहब ने जेलर को हुक्म दिया कि वह क्रांतिकारी कैदी राज को ले आये।
तुरंत ही छोटे ठाकुर उपस्थित किए गए। देखते ही साहब चौंक पड़े, फिर अंग्रेजी में बोले—‘छोटे ठाकुर आप?’
‘जी हां।’
‘आपने पहले किसी को यह बताया क्यों नहीं कि आप असली अपराधी नहीं हैं।’
छोटे ठाकुर ने कुछ उत्तर नहीं दिया। सिर नीचा कर लिया।
‘कुछ दिनों से—।’ कहकर वैदराज ने अपने सिर की ओर इशारा किया और साहब समझ गए कि इनका दिमाग कुछ दिनों से खराब है।
इंस्पेक्टर आ गया, सलाम करके बोला—‘यह असल अपराधी है, हुजूर।’ और उसने फोटो निकालकर साहब के सामने कर दिया।

उस फोटो पर नजर पड़ते ही साहब चौंक पड़े।
वैदराज बोले—‘हुजूर! दोनों की नाक को गौर से देखें?’
गौर से देखने पर साहब को मालूम हो गया कि यह असल अपराधी नहीं है। साहब और इंस्पेक्टर ने माफी मांगी और वैदराज से बोले—‘बड़े ठाकुर से हमारा सलाम बोलना और अर्ज़ करना कि हमसे भारी गलती हो गईं है। हम माफी चाहते हैं।’
उसी समय छोटे ठाकुर छोड़ दिए गए।
वैदराज चुपके-चुपके रातों-रात छोटे ठाकुर को घर ले आए।
रात को भोजनोपरांत छोटे ठाकुर बोले—‘अब पिताजी से निपटना रह गया है। पता नहीं मेरी अनुपस्थिति पर वे कितना क्रुद्ध होंगे?’
‘चिंता न करो, छोटे ठाकुर! आजकल तुम्हारी गद्दी पर राज विराज रहा है।—नाक पर पट्टी बांधकर।’ वैदराज ने कहा।
‘राज!’ आश्चर्य से बोले छोटे ठाकुर—‘क्या उसे कोई पहचान नहीं सका?’
‘कोई नहीं…वह रोज सवेरे नाक पर पट्टी लगवाने के बहाने आता है। कल उसे रोक लूंगा और तुम चले जाना।
‘धन्य है तुम्हारी बुद्धि वैदराज!’
प्रातःकाल हाथी पर चढ़कर राज आया! आलोक से वह एकांत कमरे में मिला। दोनों अभिन्न हृदय मित्र एक दूसरे के गले से आ लगे। दोनों के नेत्रों में आनन्दाश्रु उमड़ पड़े।
‘तुम बहुत बड़े शरारती हो।’ राज बोला—‘उस दिन तुमने अपने को पुलिस के हवाले कर दिया था?’
‘तुम क्या कम शैतान हो? मेरे घर में दो सप्ताह से अधिकार जमा रखा है। बोलो क्या चुराया है तुमने?’
‘सिर्फ एक चीज।’
‘वह क्या?’
‘तुम्हारी तस्वीर!’ राज ने कहा और जेब से एक तस्वीर निकालकर छोटे ठाकुर को दिखा दी।
‘तुम्हारा पागलपन अभी तक नहीं छूटा है। भला मेरी फोटो की क्या जरूरत पड़ गईं? तुम अपना ही मुंह आइने में देख लेते!’
‘आइने में तुम्हारे जैसी सुंदर नाक नहीं दिखाई पड़ती।’ कहकर राज हंसने लगा।
‘अब कहां जाओगे?’ पूछा छोटे ठाकुर ने।
‘वहीं उसी स्थान पर। वह अभी तक निरापद है।’
कुछ और बातचीत करने के बाद आलोक हाथी पर आकर बैठ गया। लोगों को यह देखकर बड़ी खुशी हई कि छोटे ठाकुर की नाक का घाव अच्छा हो गया और पट्टी से छुट्टी मिल गईं है।
