हाय! इस साल अचार कैसे डलेगा। कहीं सारे कच्चे आम नीचे गिर गए तो मजा ही खराब हो जाएगा। कैसे बड़े-बड़े आम लटक रहे हैं, जरा ही देर में हवा इन्हें गिरा देगी। तभी चाची या बुआ में से किसी की आवाज सुनाई देती, अरे! भी क्यूं हवा को आने से रोक रही हो। अच्छा है ना, इतनी गर्मी से राहत मिलेगी, मौसम भी अच्छा हो जाएगा। फिर मां कहती, तुम्हें अच्छे मौसम की पड़ी है, अच्छे अचार की नहीं। डाल के कच्चे आम की बात ही अलग होती है। गिरने के बाद ना तो क्वालिटी रह जाती, ना ही स्वाद। प्रार्थना करो 10-15 दिन और आंधी-तूफान न आए। मन तो यही है कि तुम सबको डाल के आम का अचार बनाकर खिलाऊं और यह कहकर फिर आसमान की तरफ एकटक देखने लगतीं।
अपने दिल की बात उससे भी कहने का प्रयास करतीं। जब तक अचार न पड़ जाता करीब-करीब रोज बातों का यही सिलसिला घर में रहता और साथ ही जोरशोर से मां की तैयारियां भी चलती रहतीं। बाजार से तेल मंगाकर छानना तो कभी मसालों को साफ कर कूट-कूट कर भरते जाना तो कभी आस-पड़ोस में बैठ मालूम करते रहना कि किस-किसने डाल लिया। किसी ने कोई नया मसाला तो नहीं मिलाया वगैरा-वगैरा..! तभी अचानक मुझे कुछ याद कर हंसी आ गई, जब भरी दोपहरी में सहेलियां आतीं तो मां कहती, जाओ ऊपर जाकर आराम से खेलो… पर तभी जोर की आवाज सुनाई देती, अरे! फटाफट नीचे आओ यहीं कमरे में बैठकर खेलो।
मैं तो भूल गई थी ऊपर खेलकर सारा गन्दा कर दोगी जगह-जगह पैर के निशान लग जाएंगे। अभी बस कुछ ही दिन में अचार सुखाने जाना है। छत साफ रहे वही अच्छा है और जब तक नीचे ना आ जाते, लगातार हमें बुलाती रहतीं। छत की चिन्ता करती ही रहतीं। खैर! वो दिन भी आता, जब बाजार जा एक-एक आम छांटती, फिर घर लाकर धोकर साफ करतीं और बड़े ही जतन से काट-काटकर रखती जातीं।
मजेदार बात यह है कि जिस समय अचार डालने का वक्त आता जिस जगह डलना होता वहां कर्फ्यू लग जाता। सभी को 3-4 घन्टे वहां आने की मनाही हो जाती। वो स्थान बिल्कुल साफ-स्वच्छ रखा जाता। एक सुखद अनुभूति पूर्ण संतुष्टि तथा लगावपूर्वक अचार तैयार होता और कच्चे आम के ही कई तरह के अचार डाले जाते मसलन….! ज्यादा तेल का अचार तो कम तेल वाली घिसे आम की मीठी चटनी तो कटहल-चने के साथ वाला किन्तु सबसे ज्यादा हींग का अचार पसन्द किया जाता जिसमें सिर्फ नमक, लाल मिर्च व हींग ड़ाली जाती वो अचार तो लाजबाव बनता था। हम सभी को खासकर मुझे बहुत प्रिय था, चाहे रोटी हो या परांठे पकौड़े हों या बेसन-मूंग के चीले, सभी के साथ खाया जाता। इस तरह साल दर साल मां के हाथ के तरह-तरह के अचार खाते हुए हम भाई-बहन समय के साथ बड़े होते गए। मैं हॉस्टल चली गई। छुट्टियों से जब भी वापस जाती सहेलियां भी अचार का बेसब्री से इन्तजार करती मिलतीं।
खैर! पढ़ाई होते ही पहले भैया की, फिर मेरी शादी हो गई। ससुराल से जब भी आना-जाना होता, मां कांच के मर्तबान में सभी तरह का अचार दिया करतीं, खासकर हींग का अचार सबसे ज्यादा। कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई कि मां से अचार डालना सीख लूं, क्योंकि बना-बनाया मिलता ही रहा हां! भाभी ने जरूर मां को देखते हुए अचार डालना सीख लिया और उनके हाथ में भी वही स्वाद कुछ-कुछ आने लगा था। तभी ड्राइवर की आवाज से ध्यान भंग हुआ। अतीत से वर्तमान में लौटी….! पूछ रहा था कौन से घर के आगे गाड़ी रोकूं..! पता बताते हुए वही दहलीज-गलियारा देखते हुए व्यथित आंखे भर आईं।
सब कुछ वही का वही था, यहां तक कि वही मेज.. वही डिब्बे। बस! नहीं थी तो मां….! मां का आंचल घर में चारों ओर सुनाई देती उनकी कर्णप्रिय आवाज। सबसे मिलकर बातें कर मन को सुकून हुआ। अच्छा लगा अगले दिन चलतेे हुए मन नहीं मान-समझ रहा था आंखें हींग के अचार वाले मर्तबान को ही देखे जा रही थीं सबसे नजर बचाते हुए आंखों को वहीं टिकना अच्छा लग रहा था। दिल बारम्बार सोच रहा था अब कोई कहने ही वाला है…..
ये अचार तो लेती जा।तेरा हींग का अचार भर दिया है खूब खाती रहना परन्तु शायद गाड़ी में बैठने तक यह मेरा भ्रम ही था, ना तो किसी ने मेरे बारे में सोचा ना ही कहा, यहां तक कि थोड़ा सा खाने या चखने के लिए भी नहीं बोला। फिर से अपने मन को समझाया कि बीती बातें याद कर कोई फायदा नहीं, सिवाय दुखी मन के कुछ नहीं मिलेगा। पर सब जानते-समझते भी दिल को नहीं मना पा रही थी। बेकाबू अधीर मन समझ नहीं रहा था। आखिरकार अपने को रोक ना सकी सब क्या सोचेंगे। इसकी भी परवाह ना करते हुए एकाएक गाड़ी से उतर मेज पर रखे सभी अचार के डिब्बों कोे बारी-बारी हाथों से छूते हुए स्पर्श करती गई। उन्हें इच्छा भर निहारती रही। ऐसा लग रहा था मानो मां को ही साक्षात् देख लिया। उनका चेहरा उनकी आवाज-अहसास सब इन्हीं अचार के मद्देनजर मुझे मिल गया। पल दो पल का साथ महसूस हो गया। कुछ मिनट रुककर फिर से एक बार अचार के सभी मर्तबानों पर हाथ फिराते हुए भारी मन से गाड़ी में बैठ यादों से दूर होने के लिए चल दी……।
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