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तमाचा: Hindi Story
Tamacha

Hindi Story: कई बार परिवर्तन लाने में पूरा जीवन बीत जाता है तो कभी एक छोटी सी चीज बड़ा परिवर्तन ले आती है। मेरे साथ भी यही हुआ। उस एक तमाचे ने मेरा पूरा जीवन ही बदल दिया।

‘हैलो, मैम मेरा नाम वनिता है, मैंने आपकी पत्रिका के लिए एक कहानी ‘सपने’ भेजी थी। क्या आपको मेरी कहानी पसंद आई?’
‘सपने… जी हां, वो कहानी, एक मिनट…, सॉरी वनिता जी हम आपकी कहानी नहीं छाप सकते।
‘पर क्यों मैम, फिर से रिजेक्ट हो गई मेरी कहानी। मैम, मैंने अपनी कहानी में एक सामाजिक मुद्दे से प्रेरित है। मैम, मेरी हार्दिक इच्छा है की मेरी कहानी आपकी पत्रिका का हिस्सा बने।
‘देखिए वनिता जी, दरअसल हम इस तरह की कहानी पहले भी छाप चुके हैं। आप अच्छा लिखती हैं। आपके आस-पास इतनी चीजें होती हैं और घटित भी होती है, जिस पर एक अच्छी सी कहानी गढ़ सकतीं हैं, इसलिए राइट समथिंग डिफरेंट कुछ ऐसा जो पाठकों को बांध सके। यू आर अ गुड राइटर वनिता जी, सो राइट समथिंग इनोवेटिव एंड इंप्रेसिव। मैं जानती थी कि मेरा जवाब उन्हें मायूस कर देगा पर जवाब तो देना ही था।
‘ओके मैम, शायद मेरी ये कहानी आपकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, पर मैं कुछ और डिफरेंट लिखने की कोशिश करूंगी। पर मैम आपसे एक विनती है, हो सके तो एक बार थोड़ा समय निकाल कर इत्मिनान से आप मेरी कहानी दोबारा जरूर पढ़िएगा, मैंने बहुत मन और जज्बातों से लिखी है। प्लीज मैम।’
‘जी जरूर’ कह कर मैंने फोन रख दिया।
वनिता जी की विनती भरी आवाज से मेरा हृदय कुछ विचलित हो गया। उनका अपनी कहानी पर विश्वास और आत्मविश्वास मुझे उनकी कहानी दोबारा पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा था। मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा की कहीं मैंने या हमारी टीम ने उनकी कहानी को रिजेक्ट करने में कोई जल्दबाजी तो नहीं कर दी। एक बार दोबारा उनकी कहानी को पढ़ने की उत्सुकता में मैंने ऑफिस में जल्दी-जल्दी अपने सभी काम खत्म किए। काम खत्म करते-करते शाम घिर गई थी। बाहर थोड़ी-थोड़ी रिमझिम-रिमझिम बारिश होने लगी थी। सुबह से ही ठंडी तेज हवाओं के साथ बादल आसमान में डेरा जमाए हुए बैठे थे, पर बरसने का समय उन्हें अब मिला था। मौसम अत्यंत खुशनुमा हो गया था। मैंने अत्यंत गर्व के साथ अपनी कार की चाभी और अपना लैपटॉप उठा कर कांता बाई को फोन किया।
‘हैलो, हां कांता बाई, मैं बस दस मिनट में घर पहुंच रही हूं, आप बस वो मेरे वाली ब्लैक कॉफी तैयार रखना।’
घर पहुंच कर, फ्रेश होकर मैं बाल्कनी में बैठ गई। सामने ढलता सूरज समुद्र के आगोश में समाता हुआ अत्यंत खूबसूरत लग रहा था। ठंडी-ठंडी हवाएं और लहरों का ताल-मेल मेरी सारी थकान मिटा रहे थे।
‘भाभी आपकी कॉफी!’
‘यहीं टेबल पर रख दो कांताबाई’ उनसे कह मैं अपना लैपटॉप खोलने में मशगूल हो गई। प्रशांत टूर पर गए थे और बच्चे दूसरे शहरों में अपनी-अपनी नौकरियों में खुश और व्यस्त थे, अर्थात मेरे एकांत में विघ्न डालने वाला कोई नहीं था। मैंने कौतूहल वश लैपटॉप में वनिता जी की कहानी दोबारा पढ़नी शुरू कर दी। कहानी की शुरुआत अत्यंत साधारण सी थी किंतु जैसे-जैसे कहानी आगे पढ़ती गई मैं उसमें खोती चली गई। मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे कहानी की मुख्य किरदार नंदिनी नहीं मैं हूं और वो कहानी मेरा संघर्ष भरा अतीत। कहानी में नंदिनी जिस तरह अपने अस्तित्व और अपने सपनों के लिए लड़ती है, मैं भी तो ऐसे ही लड़ी थी अपने लिए, अपने अस्तित्व के लिए और अपने सपनों को पूरा करने के लिए। नंदिनी एक लेखिका बनना चाहती थी। उसने सरस से प्रेम विवाह किया किंतु उसके पुरुषप्रधान, बेहद रूढ़िवादी ससुराल वालों ने उसके सभी सपने पैरों तले कुचल दिए।
मेरे…मेरे भी तो सपने ऐसे ही बेरहमी से कुचले गए थे। ये सोचते हुए मेरी आंखें नम होने लगी और कब मैं कहानी में खोई मैं अपने अतीत की गलियारों में भटकने लगी, मुझे आभास ही नहीं हुआ।
लेखिका बनना मेरा बचपन का सपना था। एक लेखक अपने शब्दों की कल्पना से अकल्पनीय विचारों के सागर में हिलोरे भरता है। मुझे भी शब्दों की खूबसूरती को कहानियों और कविताओं में पिरोना बहुत प्रिय था। अकसर जो भावनाएं हम मुंह से बोल कर व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं, शब्दों के माध्यम से हम उसे व्यक्त कर अपने हृदय को सुकून देते हैं। हिंदी साहित्य मेरा प्रिय विषय था और इसी में मैंने बी.ए. किया।
मां-पापा भी अत्यंत खुले विचारों वाले थे। उनके लिए भी मेरा पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना विवाह करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण था। अत: मां-पापा मेरे विवाह को लेकर निश्चिंत थे पर हमारे समाज में एक कुंवारी लड़की भले ही अपने मां-पापा पर बोझ न हो किंतु वो समाज और रिश्तेदारों की आंखों में खटकने लगती है।
देहरादून वाली बुआ अकसर मां को कहती, ‘भाभी छोरी को इतना पढ़ाओगी तो अच्छा छोरा मिलना भी मुश्किल हो जाएगा। बहुत हो चुकी अब पढ़ाई-शढ़ाई, उम्र हो रही है अब इसकी हाथ पीले कर दो। देखो भाभी एक बार जो उम्र बीत गई तो कोई ढंग का रिश्ता भी नहीं मिलेगा।’
‘हो जाएंगे जिज्जी, हाथ भी पीले हो जाएंगे। बस पढ़ाई के एक-दो साल बचे हैं, फिर करेंगे धूमधाम से रागिनी की शादी।’ मां का उत्तर सुन बुआ उन्हें एक-दो बात सुनाती और मन मसोज कर फोन रख देती। मां हमेशा मुझे आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करती और पापा मुझे मेरी लेखनी को पत्रिकाओं के माध्यम से दुनिया से परिचित करवाने के लिए प्रोत्साहित करते। इसी बीच मैंने एम.ए. में दाखिला ले लिया। कॉलेज थोड़ा दूर होने के कारण पापा ने वो दूरी भी कम कर दी, मुझे कार चलाना सिखा कर एक नई कार दिलवा दी। मेरे दिन तो जैसे पंख लगा कर उड़ने लगे। इसी उड़ान में मेरा साथी था प्रशांत। कॉलेज में ही हमारी दोस्ती हुई और फिर कब उस दोस्ती ने प्रेम का रूप ले लिया, हमें आभास ही नहीं हुआ। प्रशांत देखने में जितना खूबसूरत और आकर्षक था, उसके विचार उससे भी ज़्यादा खूबसूरत और सुलझे हुए थे।
‘रागिनी, देखो इस पत्रिका में कहानी प्रतियोगिता आई है। तुम एक अच्छी सी कहानी लिख कर भेज दो। मुझे यकीन है तुम्हारी कहानी जरूर चयनियत होकर इसमें छपेगी। भई, आखिर तुम लेखक लोगों का हुनर होता है अपने शब्दों से अकल्पनिक को काल्पनिक में परिवर्तित कर लोगों को क्षितिज की सैर कराने का।’ वो बोलता जा रहा था और मैं अपलक उसे निहार रही थी।
‘प्रशांत, तुम शादी के बाद भी मेरा ऐसे ही साथ दोगे ना। मेरे सपनों को उड़ान भरने में मेरे साथी बनोगे ना।’
‘रागिनी, मैं तुमसे अत्यंत प्रेम करता हूं और फिर जब मैं अपने सपने जीना चाहता हूं, उनमें खूबसूरत रंग भरना चाहता हूं तो तुम्हारे सपनों को बेरंग करने का गुनाह मैं कैसे कर सकता हूं।’ उसने बड़े प्यार से मेरा हाथ अपने हाथ में रख ये बात बोली तो मुझे तो मानो मेरी दुनिया ही मिल गई।
‘अरे हां, इन सब बातों में मैं ये बताना तो भूल गया मैंने हमारी शादी के लिए बाऊ जी को भी राजी कर लिया। बस अब जल्दी ही तुम्हें दुल्हन बना कर ले जाऊंगा।’ उसकी बात सुन कर मेरी खुशी सातवें आसमान में थी और मेरे सपने इंद्रधनुष में विचरण करने लगे थे।
‘भाभी-भाभी, आप अपना फोन नहीं उठा रही थीं तो भैया ने लैंडलाइन पर फोन कर आपसे बात करवाने को कहा है।’ कांता बाई की बात से मैं उस कहानी की दुनिया से बाहर यथार्थ के धरातल पर वापिस आ गई।
मैंने अपना फोन उठाया तो देखा उसमें प्रशांत की पांच मिस्ड कॉल्स थी। प्रशांत और मेरा पति-पत्नी के रिश्ते से ज्यादा दोस्ती का रिश्ता था। हमने हमेशा एक दूसरे पर अपनी इच्छाओं को थोपने की जगह, एक दूसरे की इच्छाओं का सम्मान किया। हमारे बीच के प्रगाढ़ प्रेम की यही मजबूत नींव थी।
‘हैलो प्रशांत! क्या हुआ जो इतनी सारी मिस्ड कॉल्स कर दी’ प्रशांत को फोन पर मैंने कहा।
‘अरे यार तुम्हारी फिक्र हो रही थी। न्यूज में लगातार मुंबई में जोर से बारिश की न्यूज आ रही थी, बस इसलिए।’
‘डोंट वरी प्रशांत, मैं घर पर ही हूं और बिल्कुल ठीक हूं।’
‘शुक्र है! अच्छा चलो अपना ध्यान रखना, यहां थोड़ी नेटवर्क प्रॉब्लम है, रखता हूं। लव यू रागिनी, गुड नाइट।’
‘गुड नाइट एंड लव यू टू प्रशांत।’
प्रशांत का यही प्रेम मेरी ताकत है। उसका निश्छल प्रेम मुझे अतीत की सब कड़वाहट भुला देता है। मैंने कहानी पुन: पढ़नी शुरू की।
परिवार की सहमति से नंदिनी और सरस ने विवाह कर लिया। दोनों स्वप्नलोक में विचरण करने लगे। समय जैसे पंख लगा कर उड़ने लगा। सरस के घर का परिवेश रूढ़िवादी और पुराने ख्यालों के साथ तानाशाह भी था। बदलते जमाने, बदलती सोच के बीच में आज भी काफी परिवार और उनकी सोच है जो न बदलाव देखते हैं और न बदलाव चाहते हैं। वो तो बस लकीर के फकीर बने बैठे हैं। दुनिया चाहे चांद पर पहुंच गई पर वे लोग अभी भी अपनी झूठी, खोखली शाख में जी रहे हैं। सरस का परिवार भी उन्हीं में से एक था। उसके परिवार में स्त्रियों का स्थान केवल चूल्हे-चौके तक सीमित था। उनको सपने देखना और उन सपनों को पूरा करने का कोई हक नहीं था। सरस के बाऊ जी का एकछत्र राज था, पर सरस नंदिनी का पूरा साथ देता। जब कभी भी नंदिनी उदास होने लगती तो वो बड़े प्रेम से उससे कहता, ‘नंदिनी धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।’ सरस के प्रेम की छांव में वो मुस्कुराते हुए ससुराल में सामंजस्य बैठाने की कोशिश करने लगती। किंतु समय के साथ-साथ अब उसका दम घुटने लगा था। उसका अस्तित्व और उसके सपने सब खत्म से हो रहे थे।
कहां वो विवाह से पहले एक आजाद पंछी की तरह उड़ती रहती। लैपटॉप और गाड़ी उसके दोस्त थे। पर यहां, ससुराल में लैपटॉप और गाड़ी तो बाऊ जी ने पहले दिन ही ये कह कर ‘औरतों की शोभा घर का काम होता है। जो लैपटॉप पास में होगा तो ये औरतें बिगड़ जाएगी। न जाने क्या-क्या होता है इसमें और गाड़ी चलाना औरतों को नहीं पुरुषों को ही शोभा देता है। वो कहते हैं ना जिसका काम उसी को साजे।’ ये सब कह कर उसके दोनों दोस्त, उसका लैपटॉप और गाड़ी उन्होंने अपने पास जब्त कर लिए थे। और वो एक मूकदर्शक बनी सब कुछ देख रही थी, उसे लगा जैसे किसी ने उसके पंख काट दिए हों। वो भीतर ही भीतर छटपटाने लगी। सरस भी डर के कारण अपने बाऊ जी समक्ष कुछ न बोल पाया। उसके सारे सपने बड़ी बेरहमी से बाऊ जी ने पैरों तले कुचल दिए थे। उसके द्वारा की गई हर कोशिश बेकार हो जाती और उसे सिर्फ निराशा मिलती। उसके भीतर का लेखक अब फड़फड़ाने लगा था। वो कहते हैं ना ‘लाख रोक लो पर नाचने वाले के पैर नहीं रुक सकते और लिखने वालों की कलम।’
वो अब चोरी-चोरी लेखन का कुछ अंश अपने फोन या फिर डाक के माध्यम से पूरी करने लगी। अब उसके भीतर बाऊजी के डर और उसके अस्तित्व और सपनों में जंग होने लगी। कभी डर का पलड़ा भारी होता तो कभी सपनों का। इसी जद्दोजहद में वक्त बीत रहा था।
एक दिन सुबह-सुबह बाऊ जी के गुस्से भरी कर्कश आवाज ‘नंदिनी, नीचे आओ’ से पूरा घर कांप गया। नंदिनी को हिंदी साहित्य लेखन में योगदान के लिए ‘हिंदी लेखक पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा रहा था और उसकी तस्वीर अखबार में छपी थी। बाऊ जी का पुरुष अहम ये कतई स्वीकार नहीं कर पाया कि उनकी आज्ञा की अवहेलना हुई। उनके घर की एक औरत को सम्मान दिया जा रहा था। कितनी स्वार्थी सोच थी उनकी। उनका क्रोध अपने चरम सीमा पर था। बाऊ जी क्रोधित हो कर बोले, ‘नंदिनी, तुमने हमारी आज्ञा का उल्लंघन करने की हिम्मत कैसे की? तुम्हारी इस तस्वीर ने आज हमारे मुंह पर तमाचा मारा है। हमारी इज्जत पर तमाचा मारा है। किसकी इजाजत से अपना लेखन साहित्य भेजती थी तुम।’
‘बाऊ जी, वो इसमें नंदिनी का कोई दोष नहीं। मैं भेजता था उसका लिखा लेखन साहित्य। बाऊ जी लेखन नंदिनी की सांसों में बसता है और…’
कांपते-कांपते बाऊ जी की बात को बीच में काट कर जैसे ही सरस बोला, उनका क्रोध नियंत्रण से बाहर हो गया। उस दिन अपनी सभी मर्यादाओं को तोड़ कर उन्होंने एक जोरदार तमाचा सरस के मुंह पर लगा दिया। उस तमाचे की गूंज से थर्र-थर्र कांपती नंदिनी वहीं जड़वत हो गई। पसीने-पसीने हो गई थी वो। उसकी आंखों के समक्ष अंधेरा छा गया था।
वनिता जी की कहानी पढ़ते-पढ़ते मेरे कानों में भी वर्षों पुराने प्रशांत को लगे उस तमाचे की गूंज गूंजने लगी। मेरी आंखों के समक्ष अंधेरा छाने लगा। पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो गया था मेरा। मेरा अतीत मेरी आंखों के समक्ष घूमने लगा।
‘बस प्रशांत के बाऊ जी बस…बस बहुत हो गया। आज इस तमाचे की गूंज एक तूफान लेकर आई है। आज आपने प्रशांत को नहीं मेरे मुंह पर तमाचा मारा है। मेरी परवरिश को तमाचा मारा है। औरतों की इज्जत करना, उनका सम्मान करना मैंने प्रशांत को सिखाया था। मैंने इसे सिखाया था कि औरत के भीतर भी प्राण होते हैं, जिसमें संवेदना और सपने पलते हैं और उन सपनों को पूरा करना कोई गुनाह तो नहीं। अरे पति-पत्नी तो एक दूसरे के पूरक होते हैं। पति-पत्नी का रिश्ता प्रेम पर टिका होता है। एक दूसरे के सम्मान पर टिका होता है। खैर, आप क्या समझेंगे इस प्रेम को। आज तक इस परिवार के पुरुषों ने औरतों को सदा पैर की जूती समझा है। कभी भी उन्हें वो मान-सम्मान और खुशी नहीं दी जिसकी वे हकदार थीं। अम्मा जी भी ये सहते-सहते चली गई और मैं भी ऐसे ही चली जाऊंगी। पर रागिनी के साथ ये सब अन्याय नहीं होने दूंगी। मेरे सपने तो आपने अपने पैरों तले कुचल दिए पर रागिनी, अपने सपने जिएगी भी और उन्हें पूरा भी करेगी। आज भी अगर मैं चुप रहती तो रागिनी का अस्तित्व, उसके सपने, उसका आत्म-सम्मान सदा के लिए आपके क्रोध की बलि चढ़ जाते। आखिर क्या गुनाह किया है रागिनी ने? अरे हमें तो उस पर गर्व होना चाहिए की हमारे परिवार की बहू ने हमारे परिवार का नाम रोशन किया है। लेकिन नहीं, यहां तो एक अंधा, खोखला अहंकार बसता है। बस अब बहुत हो गया प्रशांत के बाऊजी। रागिनी और प्रशांत अब यहां नहीं रहेंगे।
रागिनी ये लो अपना लैपटॉप और अपनी गाड़ी की चाभी और पूरे करो अपने सपने और सार्थक करो अपना जीवन। प्रशांत जा ले जा इसे इस पिंजरे से निकाल कर और अपने पंख पसार कर उड़ने दे इसे खुले आसमां मेंÓ उस दिन ये कह कर मां फूट-फूटकर रोने लगी। उस दिन उनके भीतर का वर्षों पुराना ज्वालामुखी फटा था। मां के इस अप्रत्याशित रूप से बाऊ जी का अहम चूर-चूर हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे एक जोरदार तूफान के बाद शांति छा गई हो।
‘रागिनी चलो’ ये कह कर प्रशांत मुझे मुंबई ले आया। उस हादसे का मानसिक तनाव मुझ पर हावी होता जा रहा था। मैं गहरे अवसाद में थी। प्रशांत के प्रेम की गहराई, उसका अपनापन, उसका साथ मुझे उस अवसाद से बाहर खींच लाया। प्रशांत के अथाह प्रेम और निष्ठा ने मुझे कभी टूटने नहीं दिया वरना हमेशा मुझे सहलाया और सम्भाला था। मां के भी अकसर फोन आते और वे गर्व के साथ मुझे ढेरों आशीर्वाद देतीं। आज, आज मैं अपने सपने जी रही हूं। मेरा भी एक अस्तित्व है, एक सफल पत्रिका की मुख्य संपादक के रूप में, बिलकुल कहानी की नायिका नंदिनी की तरह। कई बार परिवर्तन लाने में पूरा जीवन बीत जाता है तो कभी एक छोटी सी चीज बड़ा परिवर्तन ले आती है। मेरे साथ भी यही हुआ। उस एक तमाचे ने मेरा पूरा जीवन ही बदल दिया। कहानी पढ़ कर एक अजीब सी शांति थी मेरे मन में। मैंने तुरंत वनिता जी को ई-मेल किया- वनिता जी, आपकी कहानी मैंने दोबारा पढ़ी। आपकी कहानी बहुत अच्छी है। मैं अपनी टीम को भी आपकी कहानी दोबारा पढ़ने के लिए कहूंगी। अगर सफलता इस बार नहीं तो अगली बार अवश्य मिलेगी। अपनी आशा को निराशा में कभी परिवर्तित मत होने दीजिएगा। असफलता के कारण कभी अपने सपनों की बलि मत दीजिएगा। एक दिन वो जरूर पूरे होंगे।
होप फॉर द बेस्ट एंड ऑल द बेस्ट।

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