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वसंत काका—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Basant Kaka-Grehlakshmi ki Kahaniyan

पूरे घर-परिवार की जिम्मेदारी उठानेवाले वसंत काका के जीवन से जैसे वसंत कोसों दूर था। उनका मौन और शांत स्वभाव कई बार उनकी मनोदशा और खालीपन को बयां कर देता था, लेकिन जल्द ही उनके इस खालीपन को भरने के लिए कोई आनेवाला था, उनके जीवन में वसंत बनकर।

सुबह-सुबह ही दादी का फोन आ गया था, हेलो अनमोल बेटा, तुरंत घर चले आओ, आलोक घर आ रहा है। बस यह समाचार देकर दादी ने जल्दी से फोन रख दिया। आलोक दादा  घर आ रहे हैं, सुनते ही अचरज और खुशी के मिश्रित भाव मेरे चेहरे पर आंख-मिचौली खेलने लगे। वैसे तो हर माता-पिता के हृदय के द्वार अपनी संतान के लिए अपार स्नेह के साथ सदैव खुले रहते हैं वो भी निश्छल दुआओं के साथ, परंतु वसंत काका के लिए उनकी संतान ही उनके जीवन का नासूर बन गई थी। वसंत काका के हृदय के द्वार उनकी संतान के लिए सदैव के लिए बंद हो गए थे।

आलोक दादा के घर आने की खबर से वसंत काका की क्या प्रतिक्रिया होगी इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल था। 

अब तो मुझे बस जल्दी से जल्दी घर पहंने की व्याकुलता थी। जिस क्षण की बरसों से प्रतीक्षा थी वो क्षण अब आनेवाला था। बचपन में आलोक दादा के विषय में बस सुना भर था कि वे काका के पुत्र हैं पर उनको मैंने क्या परिवार के किसी भी सदस्य ने भी उन्हें कभी देखा नहीं था। यहां तक कि काका ने भी नहीं देखा था।

ट्रेन जैसे-जैसे रफ्तार पकड़ रही थी, मेरे विचार भी उतनी ही रफ्तार से गतिमान हो रहे थे। बचपन की स्मृतियां अपने गहरे चिन्ह छोड़ देती हैं। मेरे मानस पटल पर तो सिर्फ वसंत काका की छाप थी। मेरे लिए तो वसंत काका सर्वोपरि थे। छूटते खेत-खलियानों, पेड़-पौधों, नदी, पहाड़ों सभी पर मुझे उनकी स्मृतियां नृत्य करती नजर आ रही थीं।

वसंत काका, पिता जी के बड़े भाई, एक सामान्य कद-काठी वाले व्यक्ति थे। हालांकि रंग-रूप जरूर सामान्य था परंतु उनके व्यक्तित्व में एक अजीब चुंबकीय आकर्षण था। उनका रौबदार रूतबा, उनकी बातें, उनकी कार्यशैली तथा उनके रहने का ढंग सबको अपनी ओर आकर्षित कर देता था। दादा जी के देहांत के उपरांत पूरे घर की समस्त जिम्मेदारी वसंत काका ने बखूबी निभाई थी। पूरे परिवार को एक मोती की तरह प्रेम की डोर में पिरोकर रखा था उन्होंने। पिता जी वसंत काका से सात वर्ष छोटे थे इसलिए उन्हें तो वो बिलकुल अपनी संतान की तरह समझते थे। सभी उनका सम्मान करते थे और उनकी आज्ञा की अवहेलना कोई नहीं करता था। मुझ पर वसंत काका का अपार स्नेह था पर मैं काका के विशेष स्नेह और लाड़ का अधिकारी था। जब कभी भी मां से डांट पड़ती मैं झट वसंत काका के कमरे की तरफ भाग जाता और काका मां से कहते, ‘रहने दे बहू, छोटा सा बच्चा है। यह ठिठोली नहीं करेगा तो क्या हम करेंगे। 

‘काका आपके ही लाड़-प्यार ने बिगाड़ दिया इसे। देखो न पता नहीं कहां से एक छोटा-सा कुत्ते का बच्चा उठा लाया है और उसे मेरे पलंग पर बिठा दिया। रामदीन को कहकर बड़ी मुश्किल से पीछे वाले बाग में छुड़वाया है। खबरदार जो दोबारा लेकर आया उसे। छी… सारा पलंग गंदा कर दिया। 

‘न अब न करेगा ये दोबारा ऐसी शरारत। इस बार जाने दे। क्यों रे ललुआ नहीं करेगा न तंग अपनी मां को  काका हल्के से गाल पर थपकी दे कर बोले। 

‘काका वो पानी में भीग रहा था और मुझे उस पर तरस आ गया  मैंने मासूमियत से जवाब दिया तो काका ने मुझे गोद में उठा लिया।

घर के हर सुख-दु:ख में काका पूरी तरह से सम्मिलित होते तो जरूर थे पर मुझे हमेशा उनकी उपस्थिति अनुपस्थिति के समान लगती। पर न जाने क्यों हमेशा उनकी उदास पनीली आंखों में सदैव एक खालीपन और सूनापन छाया रहता तथा हृदय हमेशा विचलित। काका कभी हंसते-हंसते अचानक उदास हो जाते तो कभी घंटों खुले आसमान को निहारते, ऐसा लगता मानो किसी प्रश्न का उत्तर खोज रहे हों।

उम्र में छोटा होने के बाद भी मुझे काका की उदासी और उनके खालीपन का बोध हो जाता था। शायद इसकी वजह काका और मेरे बीच की वात्सल्य और ममत्व की मजबूत डोर थी।

बालमन जिज्ञासु मन होता है। कई बार दादी से पूछता, ‘दादी बताओ न बसंत काका इतने चुप क्यों रहते हैं। क्यों आलोक दादा को काका हॉस्टल से घर नहीं लाते?  मेरी बात सुनकर दादी का चेहरा उदास हो गया।

‘जाने दे ललुआ, तू अभी इन सब बातों के लिए बहुत छोटा है। जब बड़ा होगा न तो धीरे-धीरे सब समझ में आ जावेगा तुझे। 

‘नहीं-नहीं दादी बताओ न, देखो न अब तो मेरी मूंछें भी आने लगी  मेरा बालमन हठ करता पर दादी मेरी बात सुनकर मुस्कुरा देतीं।

‘रहने दे बेटा जिद नहीं करते। ये तेरे काका की हार्ट लॉक मेमोरीज हैं, जो कैद ही रहें तो बेहतर है।  पिता जी दादी का साथ देते हुए बोले।

पर एक दिन अचानक आए एक छोटे से खत ने पूरे परिवार में भूकंप ला दिया। खत रामी काकी, वसंत काका की पत्नी का था। घर छोड़कर जाने के एक वर्ष बाद ही उन्होंने काका को खत सिर्फ यह संदेश देने के लिए लिखा था कि ‘आपका पुत्र जीवित है और उसका नाम आलोक है  बस और कुछ नहीं लिखा था। ना कोई अता-पता, न ही कोई सुख समाचार। वैसे काकी के कुकृत्य के आगे इस बात को सत्य मानना नामुमकिन था।

‘मुझे तो इस संदेसे में कोई सच्चाई नहीं लगती। जिस जीव का अस्तित्व ही मिट गया उसके विषय में क्या सोचना। वसंत इस बात को निराधार मानकर सब भूल जाओ कि कोई खत-वत आया था  दादी ने काका के हृदय में उठती तूफानी लहरों को रोकते हुए बोला, ‘ठीक कह रही हैं मां, भाई साहब आप उस तरफ से अपना  ध्यान हटा लें  पिता जी ने दादी के सुर में सुर मिलाया क्योंकि वे जानते थे  कि पहले तो बेहद मुश्किल से काका को सम्भाला था परंतु अगर इस संदेसे में जरा भी सच्चाई होगी तो काका को संभालना मुमकिन न होगा।

बात तो आई-गई होकर भी आई-गई नहीं हो पाई। कहीं न कहीं सबके मन में एक बात बैठ गई कि काका का पुत्र आलोक जीवित है खास तौर पर सबसे ज़्यादा काका विचलित हो गए।

जो हार्ट लॉक मेमरीज अब तक काका के हृदय में कैद थीं, एक-एक करके किसी भयावह पक्षी की तरह पंख लगा कर उड़ने लगीं, जिन्हें दादी और पिता जी वापिस लॉक करने में लग गए। मुझमें उस समय ज्यादा समझ तो नहीं इसलिए मेरे लिए तो वो एक रहस्य ही बना रहा। पर हां, आलोक नाम यदा- कदा सुनने में आ जाता था। जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ और समझने लायक हुआ काका के जीवन की कहानी का रहस्य भी खुलता गया।

कुछ इस तरह थी काका की कहानी कि- लगभग पैंतीस वर्ष पूर्व वसंत काका का विवाह गांव की रामी काकी से हुआ था। हमारा शहर बहुत बड़ा तो नहीं था पर हां, काकी के गांव से बड़ा जरूर था। अल्हड़, कमसिन काकी मात्र पंद्रह वर्ष की उम्र में काका दुलहन बन गईं। काका और काकी की उम्र में लगभग पंद्रह वर्ष का अंतराल था। दोनों का स्वभाव एकदम विपरीत था। काका एकदम शांत सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी थे तो काकी हिरणी जैसी चंचल और शोख थीं। उम्र में बड़े होने के कारण काका परिपक्व थे तथा उचित-अनुचित का सही ज्ञान था उन्हें। अपितु दसवीं तक पढ़ी काकी में बचपना कूट-कूट कर भरा था। अपने उच्छृंखल व्यवहार के कारण ससुराल में जिम्मेदारियों का एहसास काकी से अनछुआ ही रहा।

‘देखो बिटिया, तुम इस घर की बड़ी बहू हो। किसी भी प्रकार का तुम्हें यहां कोई कष्ट न होगा। इस घर के वृक्ष को अगर तुम अपने स्नेह और अपनत्व से सींचोगी तो फलस्वरूप तुम्हारे सींचे परिवार रूपी वृक्ष पर प्रेम और अपनत्व का फल लगेगा। अपनी जिम्मेदारियों को तुम्हें स्वयं समझ कर पूर्ण निष्टा से निभाना होगा। घर के सदस्यों को हृदय से अपनाना होगा। यही यह सुघड़ गृहणी की पहचान है  दादी उन्हें समय समय पर स्नेहपूर्वकसमझाती क्योंकि वे उनकी अलहड़ता के पूर्ण रूप से परीचित थीं।

वे बातों को समझने का और उन्हें निर्वाह करने का प्रयत्न तो करती परंतु उनका चंचल स्वभाव बीच में विघ्न बन जाता। नि:संदेह उनके मन में कुछ और ही विचार उत्पन्न हो रहे थे जिनका पता तब चला जब उन्होंने वसंत काका से अपनी इच्छा जाहिर की, ‘सुनिए, मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। अगर किसी को कोई आपत्ति न हो तो मेरा दाखिला ग्याहवीं कक्षा में करवा दीजिए   काका ने उनके इस निवेदन को सहर्ष स्वीकार कर लिया क्योंकि वे जानते थे कि उनके परिवार में पढ़ाई का कोई विरोध नहीं करेगा। फिर काका भी तो चार्टेड एकाउंटेंट थे और पढ़ाई के महत्त्व को भली-भांति समझते थे।

दादी कम पढ़ी-लिखी होने के बाद भी बेहद समझदार और सुलझी हुई स्त्री थीं। काका ने काकी का दाखिला शहर के सबसे अच्छे विद्यालय में करवा दिया। बारहवीं में आते-आते काकी के स्वभाव में अजीब सा परिवर्तन आने लगा जो काका की नजरों ने तो नहीं अपितु दादी की अनुभवी पारखी नजरों से छुप न सका। काकी घंटों आइने के आगे बैठकर अपने आपको निहारा करती तो कभी-कभी बेवजह मुस्कुराने लगती। घर के कामों में तो काकी का मन बिलकुल ही न लगता और संगीत में तो उनकी विशेष रुचि उत्पन्न हो गई थी।

लता जी का अनमोल नगमा, ‘आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे, बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए  अक्सर गुनगुनाया करतीं।

दादी समझतीं सब थीं परंतु प्रत्यक्ष रूप से किसी से कुछ नहीं कहती थीं।

‘देख वसंत, रामी ने बारहवीं भी पूरी कर ली है। अब पढ़ाई-वढ़ाई तो होती रहेगी, अपना परिवार बढ़ाने का विचार कर। छोटे के विवाह में तो अभी वक्त है। मैं भी तो दादी बन पोते-पोतियों के संग खेलने का सौभाग्य प्राप्त करूं।  दादी ने हालात को संभालते हुए बोला, ‘अम्मां परिवार बढ़ाने के लिए तो अभी उम्र पड़ी है। बस एक बार वो स्नातक हो जाए फिर देखेंगे काका के उत्तर ने दादी को निरुत्तर कर दिया।

दो वर्ष बीत गए किंतु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। होनी बहुत बलवान होती है। कॉलेज के अंतिम वर्ष में काकी गर्भवती हो गई। समस्त परिवार खुशियों के विमान में बैठ कर उड़ने लगा। वसंत काका तो यह सोच-सोच फूले नहीं समा रहे थे कि काकी के गर्भ में उनका अंश, उनका अस्तित्व पल रहा था। वो तो काकी का धन्यवाद देते नहीं थक रहे थे की काकी उनको दुनिया की सबसे अनमोल खुशी देने जा रही है, उनकी संतान। काका ने तो आने वाले बच्चों का नामकरण भी कर दिया था, बेटे का नाम आलोक और बेटी हुई तो कीर्ति।

परंतु काकी के चेहरे की रेखाएं एक अलग ही कहानी को जन्म दे रही थी। काकी के गर्भवती होने में दादी की सोच पर अंकुश लगा दिया था। पर यह सोच की शायद उम्र और गर्भावस्था का मिला जुला असर है उन्होंने बात आई गई कर दी।

‘बेटा अब तुम एक जान नहीं हो। तुम्हारे गर्भ में एक नन्हीं सी जान और सांसे ले रही है। अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना अब तुम्हारा और हम सभी का दायित्व है। अब कॉलेज सिर्फ तुम परीक्षा देने जाना  बहुत ही स्नेहपूर्वक दादी ने उन्हें समझाया।

कॉलेज जाने पर प्रतिबंध लगने की बात सुनकर काकी को तो जैसे सांप सूंघ गया। अब वो नित्य कॉलेज जाने के बहाने ढूंढ़ती पर असफल हो जाती। कॉलेज ना जाने से वो अवसादग्रस्त होने लगी।

‘वसंत छोरा, बहू को कुछ दिन मायके भेज दो। थोड़ा वातावरण बदलेगा तो चित्त भी स्थिर हो जावेगा। मां-बाप से मिलेगी तो खुश हो जावेगी। 

‘ठीक है मां जैसी आपकी मर्जी। मैं जाने का प्रबंध करता हूं। 

पर काकी जाना नहीं चाहती थीं। उनके विरोध पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। अत: उन्होंने हथियार डालते हुए कहा, ‘मां जी, मेरी परीक्षा नजदीक है इसलिए जाने से पहले फॉर्म भरना अनिवार्य है  उन्होंने न जाने के लिए अपना आखिरी ब्रह्मïास्त्र छोड़ा।

‘ठीक है बहू, सुबह जाकर फॉर्म भर आना। पर समय से आ जाना। शाम चार बजे की तुम्हारी ट्रेन है  दादी का प्रतिउत्तर सुन उनका ब्रह्मïास्त्र भी निष्फल हो गया।

एक घंटा बीता, फिर दो-तीन-चार-पांच… घंटे बीत गए पर काकी घर वापिस लौट कर न आई। जब ट्रेन का समय भी निकल गया तो घरवालों को चिंता के काले बादलों ने घेर लिया। उस समय मोबाइल फोन की सुविधा तो थी नहीं, जो काकी को फोन करके पूछ लेते। अत: उन्हें ढूंढ़ने जाना पड़ा। काफी पूछताछ के बाद अंतत: वे काकी की सबसे प्रिय सखी के पास गए। वहां उसने दादी और काका जो बताया उसे सुन उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। यह सुन कि काकी पिछले तीन-चार वर्षों से अपने सहपाठी मनोज से अत्यंत प्रेम करती है और अब वे अपना गर्भपात करवा कर मनोज के संग विवाह कर अपना जीवन यापन करना चाहती है। काका इस बेवाफाई के विश्वासघात को सुन जड़वत हो गए। इस हृदयघात ने उनके प्राण नहीं लिए बस यही गनीमत थी। काका गहरे अवसाद में चले गए। दादी से उनका यह दु:ख देखा नहीं जा रहा था इसलिए उनको इससे उबारने के लिए दादी ने जल्दी ही पिताजी का विवाह करवा दिया। और फिर मैं उनके जीवन के मरुस्थल को एक मुस्कुराते निर्मल झरने की शीतलता प्रदान करने आ गया।

वक्त गुजरता गया। सभी ऋतुएं अपने निर्धारित समय पर आतीं और चली जातीं। परंतु काका के जीवन में कुदरत की इन रसीन ऋतुओं के लिए कोई उमंग नहीं थीं। उनके लिए तो वसंत ऋतु भी पतझड़ के समान थी। उनकी वेदना ने उन्हें समय से पूर्व ही बुढ़ापे में धकेल दिया था। कंधे झुक गए थे तथा उनके व्यक्तित्व ने अपना सारा आकर्षण खो दिया था।

मैं भी अपनी आगे की पढ़ाई के लिए देहरादून  आ गया। इतने वर्षों में न कभी रामी काकी का जिक्र हुआ और न ही आलोक दादा का। 

वर्षों बाद एक बार फिर से काकी का खत आया, शायद अंतिम खत। काकी अपनी मृत्यु के बेहद नजदीक थी। उनके कर्मों की लीला ने उन्हें कैंसर जैसी भयानक बीमारी की चपेट में ले लिया था। वर्षों से अपने उठाए हुए उस कदम के पश्चाताप की अग्नि में जल रहीं थी। मृत्यु के पश्चात मुक्ति की आशा में उन्होंने वसंत काका को खत लिखा था।

‘वसंत जी, जानती हूं इतने वर्षों बाद अचानक मेरे खत आने से आपको अचरज हो रहा होगा और साथ ही नफरत के भाव भी आपके हृदय में उमड़ रहे होंगे। जो मैंने आपके साथ किया वो नफरत और घृणा योग्य ही है। एक पत्नी, एक बहू होने के समस्त हक तो मैं वर्षों पहले ही खो चुकी हूं। क्षमा मांगने के तो मैं लायक ही नहीं हूं क्योंकि जो विश्वासघात मैंने आपके साथ किया वो क्षमा योग्य है नहीं। ईश्वर ने मुझे मेरे किए की सजा दे दी है। जीवन के अंतिम समय में मुक्ति की आस में आपके समक्ष हृदय खोल रही हूं। क्षमा दान की अपेक्षा तो नहीं है लेकिन यदि आप अपने हृदय से मेरे लिए द्वेष समाप्त हो जाए तो मेरी मृत्यु सरल हो जाएगी।

आपका रिश्ता आने पर पिताजी ने अपना सौभाग्य मान कर उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था। बड़े घर से संजोग तय होने की खुशी में वे आपके और मेरे बीच के उम्र का अंतर भी भूल गए। पिता जी के समक्ष मैं कुछ बोल नहीं पाई और अल्हड़, नासमझीवाली उम्र में मैं आपकी ब्याहता बन गई। पढ़-लिख कर कुछ बनना मेरा सपना था पर इस विवाह ने एक सपने देखने वाले उन्मुक्त पंछी को पिंजरे में कैद कर दिया था। सपने टूटने और उम्र के फासले की दर्दनाक टीस ने मेरे हृदय में भीतर तक गहरा गई थी। मैं चाह कर भी आपको स्वीकार नहीं कर पा रही थी। पर आपके नि:स्वार्थ प्रेम, अपनेपन और मेरी पढ़ाई जारी रखने के फैसले से मेरे हृदय में आपके लिए धीरे-धीरे वो टीस खत्म हो ही रही थी कि अचानक मनोज मेरे जीवन में काला साया बन कर आ गया। यह उम्र ही ऐसी होती है, जो हमारे विवेक को हर लेती है। और मैं उसके व्यक्तित्व से, उसकी बातों से प्रभावित हो प्रेम सागर में हिचकोले भरने लग गई तथा अपने विवाहित होने के पवित्र रिश्ते को भूल कर उससे  प्रेम करने का गुनाह कर बैठी। और उसके साथ विवाह करने के सपने संजोने लगी। भाग्य कुछ और ही संकेत देना चाह रहा था। और इसी बीच आलोक मेरे गर्भ में आ गया। हम बनारस उसके किसी मित्र के यहां चले गए। वहां विवाह  करने के लिए उसने मुझसे गर्भपात करवाने को कहा किंतु अधिक मास के गर्भ होने के कारण गर्भपात करना संभव नहीं था। किसी और के बच्चे की मां को अपनाने के लिए वो कतई तैयार न था। धीरे-धीरे उसमें बदलाव आने लगे और मैं पगली एक हिरणी की तरह कस्तूरी की खोज में भटकती रही। उसके बदले स्वरूप को समझ न पाई। अत: वो मुझे बीच मंझधार में छोड़कर चला गया। उसके धोखे से बिलकुल टूट गई थी मैं। गर्भ में पल रहे शिशु के कारण अपनी जीवन लीला भी समाप्त न कर सकी।  भटकते-भटकते एक महिला आश्रम में शरण लेली। वहीं अपना शेष जीवन व्यतीत कर दिया। आलोक के दुनिया में आने की खबर आप तक पहुंचा दी थी। यह जानते हुए कि आप शायद इस संतान को अपना न पाएं। आलोक आपका ही पुत्र है यह बात उतनी ही सत्य है जितना ईश्वर का स्वरूप। अगर आप आलोक को पितृत्व की छांव में थोड़ी भी शरण दे दें तो मैं निश्चिंत हो कर इस जीवन को अलविदा कह सकूंगी। -रामी 

काकी के खत को पढ़ने के बाद काका किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। ईश्वर ये कैसी परीक्षा ले रहा था उनकी। इतने वर्षों से जिसके लिए 

उनका हृदय में बंद वात्सल्य तड़प रहा था 

आज क्यों एक खत के बाद वो बाहर आने के 

लिए बेचैन है। क्या रामी ने जो भी खत 

में लिखा वो सत्य है या…? क्या वाकई 

आलोक उनका ही अंश है? क्या सच में

 रामी का हृदय में पश्चाताप था या फिर यह कोई नया प्रपंच है?

ऐसे कई अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर में उलझे काका को उत्तर आलोक ने खुद उनके सामने आ कर दे दिया। वही नैन-नक्श, वही, कद-काठी, वही शारीरिक रचना, यहां तक कि रंग-रूप भी बिलकुल वसंत काका जैसा। दादी को तो लगा कि युवा वसंत साक्षात उनके सामने खड़ा हो। आलोक के चरण स्पर्श ने 

काका के वर्षों के खालीपन को क्षण भर में एक नई किरण से भर दिया।

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