Hindi Poem: बेटा हो बेटी हो दोनों में अंश तुम्हारे हैं
फिर भला बिटिया क्यों पराई होती है
नौ माह गर्भ में बेटा-बेटी दोनों रहते हैं
अंतर नहीं समझो यह बेटी नहीं पराई है
घर में जब भी बच्चे किलकारी गूंजती
नीरस जीवन में खुशियों की वर्षा होती
ममता से परिपूर्ण वात्सल्य तरंग उठती
उस चरम आनंद की अनुभूति बेटी देती
माँ-पापा दादा-दादी की बिटिया दुलारी
अपने मीठी बोली से बेटी सबको हर्षाती
सुख दुःख में साथ निभाती बन परछाई
फिर बेटी भला क्यों पराई होती है
बेटी जग में माँ बाप का नाम अमर करती
सीता से ही आज जनक सबकी जुबान पर
भला कौन पूछता है सीता के भाई का नाम
सबके कुछ कर्तव्य यहां पूरे कर जाना है
चार दिनों का जीवन भेदभाव के बीज न बो
बेटा हो या फिर बेटी दोनों को स्नेह लुटाना
बच्चों के हृदय में ईश्वर स्वयं विराजित हैं
भेदभाव को छोड़कर बिटिया को अपनाना
समझना जरूरी बिटिया नहीं पराई होती है
