Motivational Story in Hindi: सोलह वर्षीय आदित्य स्कूल से घर में घुसते ही दादाजी के कमरे में गया, “ दादू! आज मैं अपने दोस्त अरनव को आपसे मिलवाने लाया हूं। यह आपके शहर मेरठ का रहने वाला है। अब यह लोग कुछ सालों से देहरादून में रह रहे हैं। दादू अपनी ऐनक आंखों पर चढ़ाते हैं और सामने एक खूबसूरत आकर्षक लड़के को देखते ही यकायक उनके मुंह से निकलता है, “जीतू!!”…
“जी?” अरनव पूछता है।
“अरे कुछ नहीं बेटा तुम्हें देखकर लगा अपने बचपन के दोस्त जितेंद्र प्रकाश को देख रहा हूं।” “जितेंद्र प्रकाश!!! सोचता हुआ अरनव पूछता है, “उनका पूरा नाम जितेंद्र प्रकाश गुप्ता तो नहीं, मेरठ से स्कूल पास करा और फिर रुड़की से इंजीनियरिंग?” दादू एकदम बोले, “ हां! हां! वही मेरा दोस्त जीतू”…अरनव बोला, “वह मेरे दादाजी थे”… “थे!! मतलब?” दादू ने थोड़ा घबरा कर पूछा।
अरनव ने बताया,“कईं साल पहले वह स्वर्ग सिधार गए”। दादू भरी आवाज़ में बोले, “ओहो! तुम बिल्कुल उसके हूबहू दिखते हो, वही शक्ल, कद-काठी। तभी तुम्हें देखते ही लगा जीतू को देख रहा हूं।”सोलह वर्षीय आदित्य स्कूल से घर में घुसते ही दादाजी के कमरे में गया, “ दादू! आज मैं अपने दोस्त अरनव को आपसे मिलवाने लाया हूं। यह आपके शहर मेरठ का रहने वाला है। अब यह लोग कुछ सालों से देहरादून में रह रहे हैं। दादू अपनी ऐनक आंखों पर चढ़ाते हैं और सामने एक खूबसूरत आकर्षक लड़के को देखते ही यकायक उनके मुंह से निकलता है, “जीतू!!”…
“जी?” अरनव पूछता है।
“अरे कुछ नहीं बेटा तुम्हें देखकर लगा अपने बचपन के दोस्त जितेंद्र प्रकाश को देख रहा हूं।” “जितेंद्र प्रकाश!!! सोचता हुआ अरनव पूछता है, “उनका पूरा नाम जितेंद्र प्रकाश गुप्ता तो नहीं, मेरठ से स्कूल पास करा और फिर रुड़की से इंजीनियरिंग?” दादू एकदम बोले, “ हां! हां! वही मेरा दोस्त जीतू”…अरनव बोला, “वह मेरे दादाजी थे”… “थे!! मतलब?” दादू ने थोड़ा घबरा कर पूछा।
अरनव ने बताया,“कईं साल पहले वह स्वर्ग सिधार गए”। दादू भरी आवाज़ में बोले, “ओहो! तुम बिल्कुल उसके हूबहू दिखते हो, वही शक्ल, कद-काठी। तभी तुम्हें देखते ही लगा जीतू को देख रहा हूं।”
वह बहुत छोटा था जब उसके दादाजी गुज़र गए थे। उसने घर जाकर अपने पिता राजीव को सारी बातें बताई तो वह समझ ही नहीं पा रहे थे क्योंकि उसने तो बचपन में अपनी मां के जाने के बाद से अपने पिता का बुढ़ापा ही देखा था।
राजीव ने कुछ सोचकर आदित्य के दादाजी को अपने घर आने का न्योता दिया। दादू के आने से पहले राजीव ने आज पहली बार अपने पिता का संदूक स्टोर रूम से निकाला था। इतने सालों से पढ़ाई के लिए और फ़िर नौकरी के चक्कर में कभी इधर तो कभी उधर रहा, इस तरफ़ वह ध्यान ही नहीं दे पाया था।
उसने तो बड़े होते होते पिता का बुढ़ापे वाला ही रूप देखा था…सर पर उनके बहुत कम और हल्के बाल जिसमें चांदनी ज़्यादा थी और कालापन अपनी रंगत छोड़ता जा रहा था; आंखों पर हमेशा ही नज़र का चश्मा रहता था और वह भी बहुत आम सा चश्मा था; आम से कपड़े पहनते थे जिसमें उनका पेट अलग सा कमीज़ के बटन से बाहर झांकता था; चलते वक्त थोड़ा झुककर चलते थे जैसे ज़िंदगी से हार चुके हों, लगता था कभी तेज़ दौड़े भी होंगे या नहीं; कांपते हाथ और लड़खड़ाती ज़बान उनके बुढ़ापे में कुछ और गिनती बढ़ाती थी; पिता का बुढ़ापा खाने में भी दिखता था, ना तो उन्हें कोई स्वाद की समझ थी और नहीं शिकायत।
राजीव अपने पिता का संदूक देख ही रहा था की दरवाज़े की घंटी बजी….
सामने आदित्य अपने दादू के साथ खड़ा था, “ नमस्ते अंकल! आइए, आओ बेटा” राजीव ने उनको अंदर बुलाया। चाय नाश्ते की बीच राजीव ने अपने पिता की बात छेड़ी, “पिताजी के साथ आप कब से कब तक थे?” दादू ने बताया, “ चौथी क्लास में हम दोनों की पहली बार मुलाकात हुई और फ़िर हम कब एक दूसरे के हमराज़ बन गए पता ही नहीं चला। जैसे यह बच्चे हैं ना इसी तरह घरों में हमारा आना जाना, साथ खेलना, घूमना, लड़कियों के सामने शान दिखाना… सब स्कूल कॉलेज तक हम साथ थे। फ़िर नौकरी के लिए शहर अलग ज़रूर हुए पर हम दोनों चिट्ठी पत्री से जुड़े थे। धीरे-धीरे परिवार की ज़िम्मेदारियों में उलझते चले गए और बातचीत बहुत ही कम हो गई थी।
उसके निधन का दो दिन पहले अरनव से पता चला तो मन में आया कि तुमसे मिलने आऊं उसके बारे में जानूं लेकिन लगा कि अब उसके बिना क्या मतलब है मेरा” बोलते बोलते दादू की आंखें नम हो गईं।
इस बीच राजीव ने पिता का संदूक खोला। उसमें एक पैकेट में कुछ तस्वीरे थीं, कुछ चिट्ठियां, सर्टिफिकेट और दो डायरियां थीं। एक हाथ से बना खूबसूरत मेक्रम का डिब्बा था जिस पर ‘विद लव.. जीतू’ लिखा था।
राजीव ने जब एक तस्वीर निकाली तो उसे लगा मानो अरनव को देख रहा हो। नीचे तारीख और पिता का नाम देखकर वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या वह फ़ोटो सचमुच उसके पिता की है। बूढ़े पिता की जगह एक आकर्षक नौजवान जिसने उस वक्त के फैशन को पूरे तरीके से अपना रखा था उसको देखकर राजीव सोच में था कि तभी दादू उत्तेजित होकर बोले, “ मेरा दोस्त!!!जीतू! न जाने कितनी लड़कियां मरती थीं इसकी खूबसूरती पर.. और फोटो निकाल बेटा, देखूं तो और क्या-क्या यादें हैं उसकी। एक कोई फ़ोटो तो मेरी और जीतू की भी साथ में होगी।”
कहीं फ़ोटो में राजीव को कम सफ़ेद बालों वाले अपने पिता की जगह काले चमकदार घने बालों वाला जीतू दिखा तो किसी में चेहरे की लकीरों की जगह साफ़ सुंदर चेहरा जिस पर नज़र का नहीं बल्कि महंगा धूप का चश्मा था; छरहरी मज़बूत काठी पर जींस और चटक शर्त पर जैकेट थी जो बुढ़ापे के ढीले शरीर की तस्वीर से बिल्कुल अलग थी; पैरों में चप्पल की जगह बूट और हाथों में छड़ी की जगह मोटरसाइकिल की चाबी थी।
वह सब देखकर वह स्तब्ध था। तभी दादू ने मेक्रम का डिब्बा उठाया, “ यह तुम्हारे पिता ने अपने हाथों से तब बनाया था जब उसने पहली बार तुम्हारी मां के आगे शादी का प्रस्ताव रखा था। इसमें गुलाब के फूल भी था।” डब्बा खोला तो कागज़ में लिपटा फूल था। “पापा इतने शौकीन थे…!! राजीव सोचते हुए बुदबुदाया। दादू बीच में बोले, “शौकीन! अरे जान था वह हर महफ़िल की.. नाच, गाना, गिटार बजाना.. ऐसा शायद कोई काम हो जो उसे आता ना हो।”
“उसके सर्टिफिकेट तो देखो.. दौड़ हो या टेनिस, डांस हो या गिटार सब में पहले या दूसरे नंबर पर आता था मेरा दोस्त और खाना… जब उसका दिल हो तो क्या ज़बरदस्त बनाता था। उसके हाथ की दाल पांच सितारा होटल को भी फेल कर दे।”
राजीव सोचने लगता है, “खेलकूद, गिटार बजाना… पापा तो कांपते हाथ पैरों से अपना काम मुश्किल से कर पाते थे और अटक अटक के बोलते थे। इतना अच्छा खाना बनाने वाले खाने के शौकीन पापा बेस्वाद खिचड़ी और दाल सब्जी सब कुछ खा रहे थे।”
दोस्तों की लिखी हुई चिट्ठियां, डायरी में हाथ से लिखे हुए गीत और शायरी पढ़कर राजीव जवान जीतू को बूढ़े जितेन्द्र से मिला नहीं पा रहा था।
दादू किस्से बताते जा रहे थे और आज पहली बार पिता का बुढ़ापा पिता की जवानी से बिल्कुल अलग था जो राजीव ठीक से समझ नहीं पा रहा था। कुछ घंटे बाद उसने दादू को दोबारा आने का न्योता देकर विदा करा।
अगले दिन वो बढ़ई के पास गया और उसे कुछ खास हिदायतें दीं। कुछ दिनों बाद कमरे के कोने में रखे स्टूल पर उसने एक लकड़ी का फ़ोटो फ्रेम रखा जिसमें पिता की सारी तस्वीरें सजी थीं, पीछे की तरफ जेब थी जिसमें सर्टिफ़िकेट्स थे और नीचे दो गहरी दराज़े थीं जिनमें चिट्ठियां और डायरियां थीं। उस फ़ोटो फ्रेम पर बड़े अक्षरों में लिखा था… ‘जीतू से जितेंद्र तक का सफर’।वह बहुत छोटा था जब उसके दादाजी गुज़र गए थे। उसने घर जाकर अपने पिता राजीव को सारी बातें बताई तो वह समझ ही नहीं पा रहे थे क्योंकि उसने तो बचपन में अपनी मां के जाने के बाद से अपने पिता का बुढ़ापा ही देखा था।
राजीव ने कुछ सोचकर आदित्य के दादाजी को अपने घर आने का न्योता दिया। दादू के आने से पहले राजीव ने आज पहली बार अपने पिता का संदूक स्टोर रूम से निकाला था। इतने सालों से पढ़ाई के लिए और फ़िर नौकरी के चक्कर में कभी इधर तो कभी उधर रहा, इस तरफ़ वह ध्यान ही नहीं दे पाया था।
उसने तो बड़े होते होते पिता का बुढ़ापे वाला ही रूप देखा था…सर पर उनके बहुत कम और हल्के बाल जिसमें चांदनी ज़्यादा थी और कालापन अपनी रंगत छोड़ता जा रहा था; आंखों पर हमेशा ही नज़र का चश्मा रहता था और वह भी बहुत आम सा चश्मा था; आम से कपड़े पहनते थे जिसमें उनका पेट अलग सा कमीज़ के बटन से बाहर झांकता था; चलते वक्त थोड़ा झुककर चलते थे जैसे ज़िंदगी से हार चुके हों, लगता था कभी तेज़ दौड़े भी होंगे या नहीं; कांपते हाथ और लड़खड़ाती ज़बान उनके बुढ़ापे में कुछ और गिनती बढ़ाती थी; पिता का बुढ़ापा खाने में भी दिखता था, ना तो उन्हें कोई स्वाद की समझ थी और नहीं शिकायत।
राजीव अपने पिता का संदूक देख ही रहा था की दरवाज़े की घंटी बजी….
सामने आदित्य अपने दादू के साथ खड़ा था, “ नमस्ते अंकल! आइए, आओ बेटा” राजीव ने उनको अंदर बुलाया। चाय नाश्ते की बीच राजीव ने अपने पिता की बात छेड़ी, “पिताजी के साथ आप कब से कब तक थे?” दादू ने बताया, “ चौथी क्लास में हम दोनों की पहली बार मुलाकात हुई और फ़िर हम कब एक दूसरे के हमराज़ बन गए पता ही नहीं चला। जैसे यह बच्चे हैं ना इसी तरह घरों में हमारा आना जाना, साथ खेलना, घूमना, लड़कियों के सामने शान दिखाना… सब स्कूल कॉलेज तक हम साथ थे। फ़िर नौकरी के लिए शहर अलग ज़रूर हुए पर हम दोनों चिट्ठी पत्री से जुड़े थे। धीरे-धीरे परिवार की ज़िम्मेदारियों में उलझते चले गए और बातचीत बहुत ही कम हो गई थी।
उसके निधन का दो दिन पहले अरनव से पता चला तो मन में आया कि तुमसे मिलने आऊं उसके बारे में जानूं लेकिन लगा कि अब उसके बिना क्या मतलब है मेरा” बोलते बोलते दादू की आंखें नम हो गईं।
इस बीच राजीव ने पिता का संदूक खोला। उसमें एक पैकेट में कुछ तस्वीरे थीं, कुछ चिट्ठियां, सर्टिफिकेट और दो डायरियां थीं। एक हाथ से बना खूबसूरत मेक्रम का डिब्बा था जिस पर ‘विद लव.. जीतू’ लिखा था।
राजीव ने जब एक तस्वीर निकाली तो उसे लगा मानो अरनव को देख रहा हो। नीचे तारीख और पिता का नाम देखकर वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या वह फ़ोटो सचमुच उसके पिता की है। बूढ़े पिता की जगह एक आकर्षक नौजवान जिसने उस वक्त के फैशन को पूरे तरीके से अपना रखा था उसको देखकर राजीव सोच में था कि तभी दादू उत्तेजित होकर बोले, “ मेरा दोस्त!!!जीतू! न जाने कितनी लड़कियां मरती थीं इसकी खूबसूरती पर.. और फोटो निकाल बेटा, देखूं तो और क्या-क्या यादें हैं उसकी। एक कोई फ़ोटो तो मेरी और जीतू की भी साथ में होगी।”
कहीं फ़ोटो में राजीव को कम सफ़ेद बालों वाले अपने पिता की जगह काले चमकदार घने बालों वाला जीतू दिखा तो किसी में चेहरे की लकीरों की जगह साफ़ सुंदर चेहरा जिस पर नज़र का नहीं बल्कि महंगा धूप का चश्मा था; छरहरी मज़बूत काठी पर जींस और चटक शर्त पर जैकेट थी जो बुढ़ापे के ढीले शरीर की तस्वीर से बिल्कुल अलग थी; पैरों में चप्पल की जगह बूट और हाथों में छड़ी की जगह मोटरसाइकिल की चाबी थी।
वह सब देखकर वह स्तब्ध था। तभी दादू ने मेक्रम का डिब्बा उठाया, “ यह तुम्हारे पिता ने अपने हाथों से तब बनाया था जब उसने पहली बार तुम्हारी मां के आगे शादी का प्रस्ताव रखा था। इसमें गुलाब के फूल भी था।” डब्बा खोला तो कागज़ में लिपटा फूल था। “पापा इतने शौकीन थे…!! राजीव सोचते हुए बुदबुदाया। दादू बीच में बोले, “शौकीन! अरे जान था वह हर महफ़िल की.. नाच, गाना, गिटार बजाना.. ऐसा शायद कोई काम हो जो उसे आता ना हो।”
“उसके सर्टिफिकेट तो देखो.. दौड़ हो या टेनिस, डांस हो या गिटार सब में पहले या दूसरे नंबर पर आता था मेरा दोस्त और खाना… जब उसका दिल हो तो क्या ज़बरदस्त बनाता था। उसके हाथ की दाल पांच सितारा होटल को भी फेल कर दे।”
राजीव सोचने लगता है, “खेलकूद, गिटार बजाना… पापा तो कांपते हाथ पैरों से अपना काम मुश्किल से कर पाते थे और अटक अटक के बोलते थे। इतना अच्छा खाना बनाने वाले खाने के शौकीन पापा बेस्वाद खिचड़ी और दाल सब्जी सब कुछ खा रहे थे।”
दोस्तों की लिखी हुई चिट्ठियां, डायरी में हाथ से लिखे हुए गीत और शायरी पढ़कर राजीव जवान जीतू को बूढ़े जितेन्द्र से मिला नहीं पा रहा था।
दादू किस्से बताते जा रहे थे और आज पहली बार पिता का बुढ़ापा पिता की जवानी से बिल्कुल अलग था जो राजीव ठीक से समझ नहीं पा रहा था। कुछ घंटे बाद उसने दादू को दोबारा आने का न्योता देकर विदा करा।
अगले दिन वो बढ़ई के पास गया और उसे कुछ खास हिदायतें दीं। कुछ दिनों बाद कमरे के कोने में रखे स्टूल पर उसने एक लकड़ी का फ़ोटो फ्रेम रखा जिसमें पिता की सारी तस्वीरें सजी थीं, पीछे की तरफ जेब थी जिसमें सर्टिफ़िकेट्स थे और नीचे दो गहरी दराज़े थीं जिनमें चिट्ठियां और डायरियां थीं। उस फ़ोटो फ्रेम पर बड़े अक्षरों में लिखा था… ‘जीतू से जितेंद्र तक का सफर’।
