भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
मेरी तीसरी नवशिशु पोती ने, इस नयी दुनिया में, अपने दादा की गोद में जब धीरे-धीरे अपनी हिरनी-सी चमकती हुयी आँखें खोली तो उसके दादा उसे एकटक निहारकर बोले-देखो तो… ये मुझसे कह रही है दादाजी! मेरा और आपका तो कोई पिछले जन्म का कोई गहरा रिश्ता है लो आ गयी मैं आपको अपना बनाने। उसके दादा ने खुश होते हुए कहा-अरी, तेरा-मेरा तो वह रिश्ता है जो भगवान और आत्मा का होता है। तूँ तो मेरी लाजो है। फूल सी कोमल, चाँद सी चमक और श्याम सी सवर्ण मेरी पोती का जवाब नहीं।
मैं ही उसे नहलाती-धुलाती, खिलाती, उसके दादा उसे अपनी बाहों का झूला झुलाते, अपने पास सुलाते। ये देखकर उसकी दो बड़ी बहने उससे जलती और कहती-दादाजी! ऐसा क्या है लाजो में जो हम सुनीता और पुनीता में नहीं है। दादाजी उन तीनों के सिर पर हाथ रखकर प्यार से पुचकारते और कहते- अरे बेटा तुम तो लक्ष्मी हो मेरे घर आँगन की, एक से बढ़कर एक। पर ये तो मेरी लाज है।
पाँच वर्ष की होने पर जब उसे प्राथमिक विद्यालय में दाखिला दिलवाया गया तो माता-पिता का बताया नाम सीता, गीता न लिखवा कर दादाजी ने अपना रखा नाम लाजो ही लिखवाया। स्कूल की सभी अध्यापिकाएँ उसे बहुत प्यार करती थी, अपनी गोद में बैठाकर पढ़ाती थी वे उसे। प्रथम कक्षा से ही लाजो पढ़ाई में अव्वल आने लगी।
क्या बनेगी मेरी लाजो बड़ी होकर दादाजी रीझकर पूछते? और लाजो मुँह फुलाकर गर्व से कहती-दादाजी! मैं तूफां में दीप जलाऊँगी, चाँद तारों को छुऊँगी, पंछी की तरह उड़ूँगी नील गगन में, मैं पायलेट बनूँगी दादाजी। फिर जहाज में बैठाकर सारा आकाश घुमाऊँगी और सारी दुनिया दिखाऊँगी ऊपर से। उस छोटी सी लाजो की ये बड़ी-बड़ी अरमान भरी बातें सुनकर उसके दादा फूले न समाते।
और एक दिन अचानक हार्ट अटैक से दादाजी की चलती नब्ज़ थम गयी। तीसरी कक्षा की लाजो के पिताजी उसे स्कूल से घर लिवा लाए… ये कहकर कि तेरे दादाजी की तबियत खराब है। जब वह घर आई तो आँगन में उदासी छाई थी, चुप्पी की चादर ओढ़े दादाजी जमीन पर लेटे हुए थे। पड़ोस वाले श्याम अंकल कह रहे थे कि दादाजी लंबी यात्रा पर चले गये हैं। वह बालमन कुछ समझ न सकी और पूछ बैठी-क्या अंकल! मेरे दादाजी मानसरोवर गये हैं या अमरनाथ? मैं गमगीन बालिका लाजो के सामने अपने आँसू रोक न पाई। लाजो को कलेजे से लगाकर लंबी यात्रा का अर्थ समझाते हुए मैंने बताया-बेटी तेरे दादा जी एक ऐसी यात्रा पर चले गये हैं जहाँ से कोई लौटकर वापिस नहीं आता।
ये सुनकर लाजो जोर से रोई – नहीं…मैं दादाजी के बिना एक पल भी नहीं रह सकती।
यह सच भी था कि लाजो अपने चहेते दादाजी के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। बिछोह की शूल ऐसी चुभी कि चारपाई पकड़ ली लाजो ने, अति गहन दुख की परिणति यह हुई कि सूखकर काँटा हो गयी वह एक सप्ताह में।
मैं परेशान, गमगीन लाजो की मौन-मूक प्रश्नवाचक नजरों का सामना नहीं कर पाती थी। मैं उस दिन मंदिर से जैसे ही घर आई, अचानक बारीक सी आवाज में लाजो चिल्लाई-दादाजी चलिये… आप मेरे साथ घर चलिये, बहुत ढूँढ़ा मैंने आपको, बड़ी मुश्किल से मिले हैं अब मैं आपको अपने साथ लेकर ही जाऊँगी। आप हमेशा मेरे पास ही रहियेगा। यूँ कहते-कहते लाजो की सूखी देह का पुतला चारपाई में उठ बैठा। पानी…पानी। मैंने लाजो को पानी पिलाया और सिर पर हाथ फेरते हुए पूछ ही लिया- बिटिया कोई सपना देखा क्या? पसीना पोंछते हुए लाजो धीरे से बोली- हाँ दादी मैं एक बहुत ही सुंदर बागीचे में घूमकर आई हूँ वहाँ रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे, ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी, पक्षी चहचहा रहे थे और मेरे दादाजी पौधों में पानी दे रहे थे। मैंने उन्हें पहचान लिया, मैं उनके पैरों से लिपट गयी, उन्हें साथ लिवाने की जिद की। दादाजी ने मुझे बहुत प्यार किया और बोले- मेरी लाजो मैं हमेशा तेरे साथ हूँ। …मगर ये क्या?
यहाँ तो दादाजी नहीं हैं। मैंने उसे ढाँढस बंधाया और समझाया कि अब तुझे तेरे दादाजी का आशीर्वाद मिल गया, अब तूँ अवश्य ही ठीक हो जाएगी।
अगले दिन सुबह मैंने लाजो के चेहरे पर राई के दाने के बराबर चमक देखी। फिर तो दिन-प्रतिदिन लाजो के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। छः महीने लग गये लाजो को पूर्णत: ठीक होने में। उसे फिर से स्कूल में दाखिला दिलवाया गया। लाजो ने प्रथम श्रेणी में हायर सकैंडरी पास की। इतने में लाजो के पिताजी ने उसके लिए एक रिश्ता ढूँढ लिया था। लाजो को जब यह मालूम हुआ तो उसने बहुत विरोध किया था इसका। शिकायती स्वर में वह अपने पापा से बोली- पापा अभी से आप मुझे शादी के बंधन में बाँध देंगे तो मेरा कैरियर अधूरा रह जाएगा, मैं कुछ भी न कर पाऊँगी और मेरा दादाजी से किया पायलेट बनने का सपना भी बिखर जाएगा।
मैंने लाजो की तरफदारी करते हुए बेटे को समझाया- बेटा ठीक ही तो कह रही है ये, इसे पढ़ने दे रे अभी।
बेटे ने कहा- माँ इसके होने वाले ससुर से मैंने एक वादा लिया है आगे भी लाजो की पढ़ाई जारी रखने का। सम्पन्न और कम पढ़े-लिखे परिवार में जाएँगी तो बहुत खुश रहेगी, वे सभी बहुत सम्मान करेंगे इसका। पापा ने बेटी को समझाते हुए कहा- चिंता मत करो बेटी तुम शादी के बाद भी आगे पढ़ सकोगी, तेरे सपने अवश्य सच होंगे, तुम्हारे अरमान अवश्य ही आसमान में उड़ेंगे। लाजो अपनी मेहनत से, अपने मन में, अपने सतरंगी सपनों में रंगभरी उड़ान भरने लगी।
अँगूठी रस्म पर लाजो की होने वाली सास ने रीझते हुए कहा- अरे ये तो साक्षात राधा रूप है, वही तीखे नयन- नक्श, श्याम सलोना रंग, हिरनी सी मोटी-मोटी चमकीली आँखें, पूरी साढ़े पाँच फुट लंबाई और कमर पर पड़ी ये काले लंबे घने बालों की नागिन सी चोटी। इसकी जितनी भी तारीफ करूँ, कम है। मेरे बेटे का नाम कृष्ण है इसलिए मैं तो इसका नाम राधा ही रखूँगी।
बेबस, मजबूर लाजो पारिवारिक आदर्श, सभ्य-संस्कृति, सच्ची-सादगी और लोकलाज का लबादा ओढ़े शादी की डोली में बैठी, सारी इच्छाएँ दबाए वह रुख्सत हुयी। मैंने अपनी प्यारी पोती लाजो को ढेरों आशीर्वाद दिये।
उसकी डोली अभी कुछ ही दूर पहुँची थी कि गाड़ी चला रहे देवर की आवाज सुनाई दी “भैया! मारुति गाड़ी दी है चलता-फिरता डब्बा” वह भी दादा के नाम चौ. नथवासिंह। ये बात सुनते ही लाजो के पैरो तले से जमीन खिसक गयी। घर की दहलीज पर गाड़ी रुकी, कान में सास की कर्कश आवाज गूँजी- तुम ही ले आओ उस अभागन को मैं उस बिन भाई की बहन को उतारने नहीं जाऊँगी।
सास के कटाक्ष ने लाजो के भाग्य पर थप्पड़ मारा और वह अपने आपको कोसने लगी। घर में प्रवेश कर मेरी लाजो ने सिर झुकाकर प्रणाम किया तो सास ने मुँह सिकोड़ते हुए कहा- बस, बस रहने दे ढोंगबाजी को, दिखावा करने की जरूरत नहीं है। मजबूर लाजो मन मसोस कर रह गयी। वह चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने लाजो अभी झुकी ही थी कि सास ने पैर पीछे खिंचते हुए डाँटा- आगे मत बढ़ना, बिन भाई की बहन अभागन होती है, मेरे पैर छूकर तूँ मुझे भी अभागन बना देना चाहती है। अरी चुड़ैल कौन तेरे तीज त्योहार लेकर आएगा और कौन भरेगा तेरे भात। तेरे बाप को क्या यही घर मिला था बहकाने, फुसलाने को? अँगूठी रस्म पर तेरी माँ ने बर्फी में मिलाकर न जाने मुझे क्या खिला दिया था कि तुझ मनहूस में मुझे राधा नजर आने लगी थी। सच्चाई उगलूँ तो तेरी माँ ने तुम्हारे पड़ोसी सरदार जी की बड़ी बेटी बबली को दिखाया था हमें तेरी जगह। वरना तो ऐसी काली-कलूटी को मैं सात जन्म भी अपने घर की बहू नहीं बनने देती। अरी…एक तो तेरे भाई नहीं, दूसरा तूँ काली माई अर्थात एक तो करेला कड़वा और दूजे नींव चढ़ा।
इतनी वाचाल, असभ्य और अशिष्ट सास के व्यंग्य बाणों ने मेरी भोली-भाली लाजो के दिमाग को छलनी कर दिया।
शादी के बाद जब पहली बार फेरा डालने आई लाजो तो मुझसे लिपटकर जोर से रोई और बोली- दादी माँ मुझे उस घर में अब दुबारा मत भेजना, नहीं तो मैं मर जाऊँगी, अपनी इस लाजो की लाज रख ले दादीमाँ, मैं पूरी उम्र आपके पास रह लूँगी परंतु उस घर में नहीं जाऊँगी। मैंने लाजो को समझाते हुए कहा- बेटी भारतीय समाज में युवतियों के लिए यह आदर्श रहा है कि जिस चौखट पर उसकी डोली पहुँचे वहीं से उसकी अर्थी उठे। लाजो ने रोते हुए पूछा- दादी माँ अपना ये समाज ऐसा क्यों है? दादी माँ मैं लड़ूँगी इस घटिया समाज से, बस मुझे आपका साथ चाहिए और देखना इसी समाज में मैं अपना एक सम्मानीय स्थान बनाऊँगी। लाजो के मन का गुबार निकला तो मैंने उसे धीरे-धीरे समझाया- बेटी! वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता, बदलाव ही सृष्टि का नियम है और हमें इस बदलाव का स्वागत करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए, बेटी सहनशीलता और मौन के वृक्ष पर सदा खुशी व उन्नति के फूल खिलते हैं।
मेरी दीक्षा और उपदेश लेकर, अपनी सफलता के उत्कर्ष को वैवाहिक जीवन की खुशियों के लिए त्याग लाजो दुबारा ससुराल चली गयी और निस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ी। अपनी सहज और स्वभाविक गुण क्षमता से लबरेज लाजो ने पूरे तीस साल गृहस्थ तपस्या की। उसके अत्यधिक परिश्रम और दुखदायी पारिवारिक माहौल ने उसे समय से पहले बूढ़ी बना दिया। जब भी वह मायके आती उसके चेहरे की झुर्रियां और अधिक बढ़ी पाती। मैं उसे कहती- बेटी लाजो! अपने नाम की सार्थकता रखते-रखते तूने अपने शरीर को ठूँठ पेड़ सा बना लिया है। तो वह कहती- ओ…हो दादी माँ, क्या करना है श्याम से चमकीले वर्ण का, क्या करना है हड्डियों के इस नश्वर शरीर का। आखिर एक दिन तो ये मिट्टी में ही मिल जाना है। हम सबसे कठिन धर्म गृहस्थ आश्रम निभाते हुए अपने अथक परिश्रम द्वारा अपनी आत्मा को कंचन, कुंदन बना ले और इसका परमात्मा में विलय करें, यही तो जीवन का मकसद है।
और एक दिन… ट्रिन…ट्रिन फोन की घंटी बजी। फोन मैंने ही उठाया। उधर से आवाज आई-आपकी लाजो बोल रही हूँ। सबसे पहले आपको ही एक खुशखबरी सुनानी है, पर दादी माँ मुझे बनावटी हंसी हंसने के लिए न कहियेगा। सुनों आपके जुड़वा धेवता-धेवती आकाश और व्योमिका दोनों पायलेट बन गये हैं। दादी माँ मेरी तीस वर्ष पहले की संभावनाएँ आज उन दोनों बच्चों में मुझे मिल गयी हैं, दादी माँ उनकी पहली उड़ान आज शाम चार बजे है उन्होंने दो टिकट भिजवाए हैं एक मेरे लिए और एक मेरी आदर्श दादी अर्थात आपके लिए। आप एक बजे तैयार रहियेगा। आकाश और व्योमिका हम दोनों को लेने आएँगे, वे हमें जहाज में घुमाएँगें और ऊपर से हमारे दादाजी अपने आशीर्वाद के फूल बरसाएँगें।
लाजो की बात सुनकर मैं फूली न समाई और बोली- अच्छा बेटी लाजो आज तुझे प्रभु प्रसाद मिल ही गया जो किसी खुशनसीब को ही मिलता है। बोली लाजो- दादी माँ मुझे शोहरत और सामाजिक सम्मान बहुत मिला और साथ में कर्मठता का कर्तव्यफल भी मिला, परंतु कैरियर में तो मैं रूढ़िवादी परम्परा की बेड़ियों की जकड़न के कारण खरी न उतर सकी। फिर भी गुणों का खजाना बनने की कोशिश करती रही मैं। गुणों की अवधारणा में कितनी खरी उतरी मैं ये तो मेरे बच्चे और आप लोग ही समझ सके हैं। और जिनसे मुझे शिकायत रही, उन्होंने कभी भी मेरी बात सुनना गवारा ही न समझा और न ही कभी मुझे खुले दिल से अपनाया।
मैंने कहा- बेटी लाजो पूरी दुनिया में तुझसी एक नहीं, यह दोष तो जोहरी का है कि वह अपनी पारखी नजर से असली हीरे की परख नहीं कर पाता।
अच्छा… दादी माँ ये दोनों बहन-भाई आ ही गये, अब आप जल्दी से तैयार हो जाईयेगा, हम आ रहे हैं आपको लेने। गुड बाय…।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
