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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

एक छोटे से गांव में रहती लाजवंती जिसे प्यार से लोग लाजू कहकर बुलाते थे। मां के पल्लू और पिता की छत्रछाया में 16 साल की वह कब हो गई, उसे पता भी नहीं चला। खाते-पीते घर की तंदुरुस्त लाजो का अंग-अंग यौवन से खिल उठा था। इसका उसे कोई अंदाजा ही नहीं था। मन तो जैसे डाल डाल उड़ती किसी बुलबुल जैसा था।

सोलवा सावन अभी लगा ही था, कि राज सिंह के साथ लाजो शादी के मंडप में बैठ चुकी थी। बाल विवाह से एक कदम आगे लाजो की सगाई तो माँ के पेट में ही हो गई थी। उसकी माँ राजकुंवर और राज सिंह की माँ प्रेमकुंवर ने गर्भावस्था के दौरान हीएक दूसरे के पेट पर तिलक करके वचन दे डाला था, कि यदि दोनों को बेटा-बेटी हुए तो शादी पक्की,और अगर दोनों को बेटे और बेटियां हुई तो शादी कैंसल। युवराज सिंह को बिना देखे ही, उसे बिना जाने ही माँ की कोख में ही लाजो राज सिंह की हो गई थी।

छोटी सी लाजो पर अचानक ही ससुराल के बंधनों का बोझ पड़ा था। फिर भी वह हंसती खेलती कब उसमें रच बस गई… इसका उसे पता ही न चला। उसे अपने आसपास की दुनिया, समाज, लोग सब कुछ खूबसूरत लगने लगा था।

उम्र के बीसवे पड़ाव पर तो वह एक खूबसूरत प्यारे से बेटे की माँ बन चकी थी। और अब तो दसरा गर्भ भी इसके अंदर पल रहा था। पर लाजो इससे बेखबर थी। उसे तो जैसे अपने बेटे के रूप में अपना बचपन वापस मिल गया था। बेटे के साथ खेलते हुए, घर का काम करते हुए, कभी-कभी ननद, जेठानी और सास के तानो को सुनते हुए वक्त जैसे पंख लगाए उड़ रहा था।

राजसिंह और लाजो की कद काठी में भी काफी अंतर था। मानो धरती आकाश का अंतर। लाजो तो पहले से ही गुलमोहर जैसी खिली खिली…और राज सिंह पहले से ही किसी सूखी हुई डाल सा…थोड़ा सा काम करते ही वह थक जाता था। इतनी छोटी-सी उम्र में टीबी और सांस की बीमारी वह झेल रहा था। कई बार तो बैठे-बैठे ही उसकी सांस फूलने लगती। लाजो उसकी सेवा करती और खुद को धन्य मानती। पति का सुख तो सिर्फ बच्चा पैदा करने तक ही सीमित था। कई बार लाजो सोचती…उसे भी तो उसकी सहेलियों की तरह एक तंदुरुस्त पति मिल सकता था न…।

एक दिन अचानक खेत से राजसिंह जल्दी वापस आया…और घर की दहलीज पर ही गिर पड़ा…लाजो…लाजो।।

माँ…माँ…के नाम की चीख के साथ वह वही बेहोश हो गया। सब दौड़ प…पर लाजो न जाने क्यूं कुछ न बोल सकी, और एकटक राज सिंह को देखती रही। राज सिंह को सांप ने काटा था, बदन नीला पड़ने लगा था, मुंह से झाग निकल रहा था। गांव के वैद जी को तुरंत बुलाया पर… उनके आने से पहले ही…राज सिंह के प्राण पखेरू उड़ चले थे। घर में रोना पिटना शुरू हो गया। पलक झपकते ही जैसे पूरे घर का माहौल मातम में बदल गया था। घर का जवान बेटा जो मर गया था।

लाजो तो बिल्कुल ही जैसे पत्थर हो गई थी। लाजो दहलीज से जैसे चिपक ही गई थी। वह अपनी सुध-बुध खो चुकी थी, पथराई आंखों से बस राज सिंह को देखे जा रही थी। उसकी आंखों के सामने बट सवित्री पूर्णिमा का व्रत, बरगद पेड़ के चारो ओर के फेरे, पार्वती व्रत, पूर्णिमा व्रत, शिव मंदिर की झालरे…घूम रही थी। लाजो की सास छाती पीटते हुए कह रही थी… “इसे क्यों अकेले ही खेत जाने दिया…क्यों कोई इसके साथ नहीं था…मेरा जवान बेटा सबको छोड़ कर चला गया रे…” कौन किसकी सुने… कौन किसे आश्वासन दे…

लाजो की लाज का चूंघट खुला था, घर के मर्दो के सामने खुला मुंह लिए कोने में लाजो खड़ी थी…एकटक बस देखे ही जा रही थी। वहीं मर्दो की तरफ से कोई चिल्लाया… कोई इसका मुंह तो ढको…चूंघट उढ़ाओ… चूंघट…!!!!”

इस आवाज के साथ ही जेठानी ने आकर लाजो का पल्लू नाक से नीचे तक खींच दी। पत्थर हो चुकी लाजो को रुलाने जेठानी और ननद छाती पीटने लगी…“हे राम…बाप का कंधा गया, मेरा राखी बंधा गया…मेरा भाई फट पडा रे…लाजो तेरा बेटा अनाथ हो गया रे…तू विधवा हो गई, तेरी चूड़ियां, टिका लूट गया…री…अब तो तुझे उम्र भर रोना ही है…” यह बातें गरम सीसे की तरह लाजो के कानो में पड़ रही थी। वह चीख उठी…जमीन पर गिर पड़ी… “अब मैं जी के क्या करूंगी जीजी…मुझे नहीं जीना भाभीजी…”

सभी औरतें उसे पास के कमरे में ले गई। घर के मर्दो ने फैसला सुना दिया था, “लाजो सती होगी…।” जहां चूड़ियां तोड़ने की बात थी, सफेद धोती पहनने की बात थी, बाल उतरवाने की बात थी…वही घर की औरतें रोना धोना छोड़ उसे नहलाने और उसका साज श्रृंगार करने में लग गई।

एक घंटे बाद लाजो को दल्हन की तरह सजा कर बाहर लाया गया। दूसरी ओर राज सिंह को ले जाने की तैयारियां भी पूरी हो चुकी थी। लाजो पति की प्रदक्षिणा कर रही थी, और प्रणाम कर ही रही थी उसका बेटा एकदम से आकर उससे लिपट गया। गर्भ में पल रहा बच्चा भी जैसे हिलडूल रहा था। लाजो जैसे तंद्रावस्था से बाहर निकली, उसने बेटे को गले लगाया। खुद की ओर देखकर वह सुन्न रह गई। “अरे…यह क्या…मैं तो विधवा हो गई हुँ, फिर यह सोलह सिंगार…!!” उसकी मन की दशा शायद घरवाले समझ गए थे। पलक झपकते ही किसी ने उससे उसका बेटा ले लिया, और सभी उसके पैर छूने लगे, पूजने लगे…क्योंकि अब वह इस घर चूंघट में छुपी रहती बहु नहीं बल्कि सतीमाता बन चुकी थी। लाजो विचलित हो गई थी, उसे जीना था अपने बच्चे के लिए। बेटे को जवान होते देखना चाहती थी। और उसके अंदर से भी कोई कह रहा था… “मेरा क्या कुसूर…मैं तो दुनिया में जीने आया था…??” लाजो की अकुलाहट “सतीमाता की जय” के नारों में डूबकर रह गई। उसकी ममता कुचल दी गई।

राज सिंह की श्मशान यात्रा तो उसकी मौत के बाद चार कंधों पर निकली,जिसे वह देख नही सकता था। पर लाजवंती ने तो अपनी श्मशान यात्रा में खुद अपने पैरों से चलते हुए अपनी आंखों से देखते हुए पूरी की।

अब तो वह परिवार के हट्टे-कट्टे मजबूत बाहों वाले मर्दो के हाथो में थी। चिता तैयार थी। पंडितजी ने मंत्रोच्चार किए। लाजो से पति की चिता की प्रदक्षिणा करवाई गई, और सबने मिलकर उसे जिंदा ही चिता पर चढ़ा दिया। उसका विरोध कौन सुनता…!!! हजारों लोगों के सतीमाता की जय के जयघोष में उसकी चित्कार दबकर रह गई। चिता की ज्वाला से खुद को बचाने अपने हाथ उठाती लाजो के जयकारे के स्वर और ऊंचे हो गए… “सतीमता आशीष दे रही है…”

दूर खड़े बेटे ने माँ की तड़प देखी, उसने दादा, चाचा, मामा, ताया सबको गुहार लगाई की माँ को बचा लो। डूबती सांसों से लाजो यह दृश्य देख रही थी। पर लोगों ने, समाज ने, परिवार ने बच्चे की तड़प, मां की बेटे को पल्ल में छपाकर रखने की तमन्ना. हर एक चीज का अंतिमसंस्कार कर डाला।

अग्नि की ज्वाला से तो निश्चेष्ट राजसिंह का शरीर भी हिल गया था, तो जिंदा जली लाजो का क्या हाल हुआ होगा!!!? आज भी यह टीस नींद उड़ा देती है।

(आज सौराष्ट्र, राजस्थान की धरती पर परापूर्व में हो चुकी सतिमाता के स्थानक पूजे जाते है, उनके परिवार वाले माता की मन्नतें मांगते हैं, और मन्नत पूरी होने पर उनका आशीर्वाद लेते नजर आते हैं। और अक्सर गर्व से कहते हैं कि “हमारे भी सती मां है।” आज के दौर में शायद ऐसी चिताएं न हो…पर अब भी ऐसी कई चिताएं तैयार है, जिन पर रोज औरत बैठती है…रोज जलती है।)

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’