Hindi Kahaniya: मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों से खबरें आ रही हैं कि काश्तकार डटकर टिड्डी दल का मुकाबला कर रहे हैं। हवाई जहाजों से टिड्डी के दलों पर जहरीली गैस का हमला किया जा रहा है। अपनी-अपनी खेतियों को इस दुश्मन से बचाने के लिए काश्तकार हर मुम्किन तदबीर कर रहे हैं। ढोल बजाकर, टीन के कनस्तरों को पीट-पीटकर टिड्डी दल को भगाया जा रहा है। लाठियों और डण्डों और झाडुओं से टिड्डी फौज का कलक कुमअ किया जा रहा है। बहुत जल्द उम्मीद की जाती है कि करोड़ों टिड्डियों में से एक टिड्डी भी जिन्दा न बचेगी।
खेत में गेहूँ की फस्ल तैयार खड़ी थी और रामू के मन में आशा की फुलवारी लहलहा रही थी।
देखने में एक छोटा-सा खेत था। उसमें जो फस्ल खड़ी थी उसमें कटाई, छटाई के बाद मुश्किल से पचास मन गेहूँ के दाने निकलेंगे। रामू ने दिल ही दिल में हिसाब लगाया। मण्डी में गेहूँ का भाव था पन्द्रह रुपय फी मन। कुल फस्ल के हुए साढ़े सात सौ रुपये। कोई खजाना उसके घर में नहीं आने वाला था। मगर फिर भी पकी हुई गेहूँ की बालियों को देख-देखकर रामू फूला नहीं समा रहा था। शाम के सूरज की रौशनी में खेती जगमगा रही थी जैसे वो सोना मल सुनार की दुकान हो जहाँ सोने-चाँदी के जेवर हमेशा शीशे की अलमारियों में सजे रहते हैं और जहाँ से इस बरस की फसल का सौदा करते ही रामू लाजो के लिए एक चाँदी की हँसली लाने वाला था। और ये सोचते ही रामू की नजरों में गेहूँ की तमाम बालियाँ सिमटकर एक चमकती हुई हँसली बन गई और उस हँसली में उसकी लाजो की लम्बी पतली गर्दन थी और उसका पके गेहूँ की तरह दमकता हुआ चेहरा था।
लाजो। उसकी बीवी। उसके दो बच्चों की माँ। छः बरस हुए जब वो उसे मुकलावा करके घर लाया था और पहली बार घूँघट उठाकर उसका मुँह देखा था तो उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे सच-मुच लक्ष्मी उसके घर आ गई हो। इतनी सुन्दर बहू तो उनके सारे गाँव में एक भी नहीं थी। कितने ही दिन तो वो खेत पर भी नहीं गया था। बस हर वक्त बैठा लाजो को घूरता रहता था। यहाँ तक कि माँ को उसे धक्के मारकर बाहर निकलना पड़ा।
“अरे बे- शरम। गाँव वाले क्या कहेंगे? अभी से जोरू का गुलाम हो गया।”
छ: बरस से रामू हर फस्ल पर लाजो के लिए हँसली बनवाने का प्रोग्राम बनाता था मगर हर बार उसका ये मन्सूबा मिट्टी में मिल जाता था या पानी में डूब जाता था। एक बरस बारिश इतनी हुई और ऐसे गैर वक्त हुई कि आधी पकी हुई फसल तबाह हो गई। अगले बरस सूखा पड़ा और खेतियाँ जल गई। तीसरे बरस बाढ़ आ गई और फसलें पानी में डूब गई। चौथे बरस गेहूँ को घुन खा गई। पाँचवें बरस ऐसा जबरदस्त पाला पड़ा कि फस्ल ठिठुरकर रह गई। छठे बरस ऐसी तेज आँधियाँ चलीं कि पकी- पकाई फस्ल को तबाह कर दिया। मगर इस बरस भगवान की कृपा से सब ठीक-ठाक था। नयी नहर से उनको पानी काफी मिला था। सरकार के महकमा – ए – जराअत से खाद भी मिली थी और फस्ल को खाने वाले कीड़ों को मारने की दवा भी मिली थी। बारिश न कम हुई थी, न ज्यादा। इस बरस रामू को ऐसा लगता था कि उसकी लाजो के नाजुक गले में वो चाँदी की हँसली जरूर जगमगाएगी जो कब से सोना मल की शीशे की अलमारी में उस घड़ी का इंतजार कर रही थी।
अपने खेत में खड़ा – खड़ा रामू सोच रहा था कि अब एक-आध दिन में कटाई शुरू ही कर देनी चाहिए। इतने में उसने धूप में जगमगाते हुए खेत पर एक साया पड़ता हुआ देखा और न जाने क्यों दफअतन उसका दिल खौफ से भर गया। नजर उठाकर देखा तो आकाश पर पच्छिम की तरफ से आता हुआ एक बादल दिखायी दिया। उसने सोचा ये बे वक्त की बरखा कैसी। इन दिनों तो कभी बादल नहीं देखे। उसके बराबर के खेत में उसका पड़ोसी गंगुआ भी यही सोच रहा था।
“अरे रामू। इस बरस बे बखत की बरखा होने वाली है क्या? ”
“यही मैं सोच रहा हूँ, भइया। “और अभी वो कुछ और न कह पाया था कि बादल जो बड़ी गैर – मामूली रफ्तार से उड़ रहा था अब उनके सर पर ही आ गया और बरखा की पहली बूँद रामू की नाक पर से फिसलती हुई गेहूँ की एक पकी हुई बाली पर गिरी। मगर ये ‘बूँद’ पानी की नहीं थी। वो बूँद ही नहीं थी। एक जहरीला भूखा कीड़ा था जो देखते ही देखते गेहूँ के कितने ही दाने चट कर गया।
रामू चिल्लाया, “टिड्डी!”
गंगुआ चिल्लाया, “टिड्डी!’
“आस-पास के खेतों से आवाजें आयीं। “टिड्डी! टिड्डी! ’
इससे पहले भी ये आसमानी मुसीबत उनके खेतों पर नाजिल हुई थी। उन्होंने मन्दिरों में घण्टे बजाए थे और मस्जिदों में दुआएँ माँगी थीं और खेतों में खड़े होकर शोर मचाया था मगर वो टिड्डी की यलगार को न रोक सके थे और देखते ही देखते उनकी साल भर की मेहनत मिट्टी में मिल गई थी और वो जमींदार और साहूकार से गिड़गिड़ाकर मदद माँगने पर मजबूर हो गए थे।
मगर इस बार वो बदल चुके थे। उनका मुल्क और उनके खेत बदल चुके थे। जमींदारी खत्म हो चुकी थी। अब काश्तकारों के अपने खेत थे। उनकी अपनी सरकार थी जो ऐसे मौके पर उनकी सहायता के लिए तैयार थी। सो इस बार सिर्फ चन्द बड़े बूढ़ों ने ही मन्दिर में घण्टे बजाकर भगवान से फरयाद की। बाकी जितने काश्तकार थे सब अपनी मेहनत से उगायी हुई फस्ल को दुश्मन से बचाने के लिए तैयार हो गए। पहले सैंकड़ों ढोल और टीन के कनस्तर पीट-पीटकर टिड्डी को डराया और भगाया गया। फिर भी दुश्मन पसपा न हुआ तो किसानों की फौज की फौज लाठीयाँ और डण्डे ले-लेकर उन पर पिल पड़े। औरतें और बच्चे भी पीछे नहीं रहे। झाडुएँ ले-लेकर टिड्डी दल का सफाया करने लगे। मगर दुश्मन इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। हजार टिड्डियाँ मारी जातीं तो दस हजार और आ जातीं। ऐसा लगता था कि आसमान में एक सूराख हो गया है और उसमें से टिड्डियों की मुसलसल बारिश हो रही है। लाखों टिड्डियाँ, करोड़ों टिड्डियाँ। फिर भी मुकाबला करने वालों ने हार नहीं मानी। रात के अन्धेरे में भी मशालें जला – जलाकर दुश्मन पर हमला करते रहे।
टिड्डी का मुकाबला करने वालों में सबसे आगे-आगे रामू था। दिन-भर, रात-भर उसने न खाया, न पिया, न पल-भर आराम किया। उसके पड़ोसियों में कोई भी हिम्मत हार जाता और कहने लगता कि “इस आसमानी बला का हम मुकाबला नहीं कर सकते। भगवान ही हमें इससे निजात दिला सकता है।” तो रामू ललकारकर कहता, “अरे मर्द होकर एक जरा से कीड़े से हार मान गए। पूरे छः महीने खून पसीना एक करके तो ये फसल उगायी है अब इसे दुश्मन के हवाले कर दें? चलो उठो। हिम्मत न हारो।”
रामू को तो ऐसा लग रहा था कि ये टिड्डी उसकी जाती दुश्मन है जो उससे उसकी खेती ही नहीं उसकी जिन्दगी की सारी खुशियाँ और कामयाबियाँ छीनना चाहती हैं। उसको ऐसा लगता कि ये टिड्डी उसकी उगायी हुई फसल ही को नहीं चट करना चाहती बल्कि उस चाँदी की हँसली को भी दीमक की तरह खाए जा रही हैं जो वो लाजो के गले में देखना चाहता है और कभी-कभी तो उसको ऐसा महसूस होता कि एक बहुत बड़ी टिड्डी अपने मनहूस पंजे लाजो की नर्म-नर्म गर्दन में पैवस्त करके उसका खून पी रही है। और ये सोचते ही वो लाठी लेकर टिड्डी दल पर टूट पड़ता और लोग हैरत से देखते कि रामू में ये बला की ताकत और अनथक हिम्मत कहाँ से आ गई है।
और फिर रात – भर की मेहनत के बाद सुबह-सवेरे जब उन्होंने देखा कि पूरब से एक और टिड्डी दल उड़ता चला आ रहा है तो एक बूढ़े ने लाठी फेंकते हुए कहा, अब तो भगवान ही हमारी सहायता करे तो हम बच सकते हैं। “और उसी लम्हे में उन्होंने आसमान से आती हुई एक घूँ-घूँ की आवाज सुनी जैसे कोई जिन्नाती जसामत की शहद की मक्खी करीब आ रही हो। मगर ये शहद की मक्खी नहीं थी एक हवाई जहाज था जो सरकार ने टिड्डी का मुकाबला करने के लिए भेजा था। देखते ही देखते हवाई जहाज ने हवा में एक डुबकी लगायी और उनके खेतों पर से नीचे-नीचे उड़ने लगा और उसकी दुम में से निकलकर एक भूरे रंग का बादल सारे खेतों पर छा गया। अब उन्होंने देखा कि गेहूँ पर बैठी हुई टिड्डियाँ टप -टप जमीन पर गिर रही हैं, दम तोड़ रही हैं।
सो रामू की खेती बच गई। उस जैसे और हजारों काश्तकारों की खेतियाँ बच गईं। रामू कटाई करता जा रहा था और सोच रहा था कि ये नयी ताकत जो अब हमारे पास है, इसके मुकाबले में सौ टिड्डी दल भी आएँ तो हम उनको शिकस्त दे सकते हैं।
और फिर अनाज को गाड़ीयों में लादकर वो मण्डी ले गया।
सरकारी भाव पन्द्रह रुपये मन था। मगर लाला किरोड़ी मल आढ़ती ने अपनी तोंद सहलाते हुए कहा, फस्ल टिड्डी से बच गई इसलिए मण्डी में अनाज जरूरत से ज्यादा हो गया है और कीमतें गिर गई हैं।”
“तो क्या आप चाहते थे टिड्डी हमारी फसल को खा जाती तो बेहतर होता?”
“ये तो मैं नहीं कहता। मगर कीमतें जरूर बढ़ जातीं। अब तो इतना अनाज मण्डी में आ गया है कि मैंने तो चन्द रोज के लिए खरीद ही बन्द कर दी है।” और फिर किसी कदर धीमी आवाज में कहा, “वैसे बारह रुपये मन देना चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ….”
“मगर सरकारी रेट तो पन्द्रह रुपये मन है। ”
“सो तो है। मगर मैंने कहा नहीं अनाज ज्यादा पैदा हो गया है। हमें जरूरत ही नहीं रही।”
“तो मैं लाला बंसी धर के यहाँ ले जाता हूँ।” रामू ने कहा और उधर गाड़ी हाँक दी।
मगर लाला बंसी धर ने भी वही कहा जो किरोड़ी मल ने कहा था और जो बंसी धर ने कहा वही लाला शगुन चन्द ने कहा।
“फिर वो लाला किरोड़ी मल के यहाँ वापस आया। वो बोले, “घण्टा भर में भाव और गिर गया है। आस्ट्रेलिया से कई जहाज आ गए हैं। अमरीका में भी फसल बहुत अच्छी हुई है। सारी दुनिया में गेहूँ की कीमत गिर गई है। अब तो मैं ग्यारह रुपये मन दे सकता हूँ।”
और सौ रामू को ग्यारह रुपये मन पर ही अनाज बेचना पड़ा। कभी कुछ हो, उसने सोचा, लाजो के लिए हँसली जरूर लूँगा। बस सेठ मक्खन लाल से बीज के लिए जो कर्जा लिया था वो चुका दूँ।
सेठ मक्खन लाल का नाम होना चाहिए था सेठ सोखन लाल। दुबले – पुतले, सूखे हुए, पिचके हुए गाल। मगर रुपये देखते ही उनकी मुरझायी हुई आँखों में चमक आ गई। दो सौ रुपये अस्ल और चौबीस रुपये सूद सरकारी और छब्बीस रुपये नजराने के, गैर सरकारी।
जेब हल्की करके आगे रामू चला ही था कि चौधरी मलखान सिंह मिल गया जो नहर का पटवारी था और काश्तकारों के जीवन में भगवान का दर्जा रखता था। जिसको चाहे पानी दे, जिसको चाहे न दे। चाहे कम पानी दे, चाहे ज्यादा पानी दे।
मलखान सिंह की बड़ी-बड़ी मूँछें खिजाब से काली की हुई थीं और तेल में डूबी रहती थीं और किसी काश्तकार जिससे रुपया मिलने की उम्मीद हो, उसे देखते ही ये मूँछें लालची कुत्ते की तरह दुम हिलाने लगती थीं। चौधरी मलखान सिंह का कौल था कि “जितना गुड़ डालोगे उतना ही मीठा होगा।” जिसका मतलब था कि जितना रुपया नहर पटवारी की जेब में डालोगे, उतना ही पानी तुम्हारे खेत में पहुँचेगा। सो रामू ने अगली फस्ल के लिए पानी का इन्तेजाम कर लिया। मगर उसकी जेब और भी हल्की हो गई। और जब वो सोना मल की दुकान के सामने से गुजरा और शीशे की अलमारी में लटकी हुई हँसली नजर आयी तो उसने दिल ही दिल में कहा, अगली फसल पर जरूर लूँगा।” और नजर झुकाकर गुजर गया।
रात हुए घर वापस पहुँचा तो देखा लाजो उसका इंतजार करते-करते चूल्हे के पास बैठी – बैठी ही सो गई है। चंगीर में रोटी पकी रखी थी। चूल्हे पर साग की हण्डिया धरी थी। वो लाजो को आवाज देने वाला ही था कि उसने देखा कि एक परों वाला कीड़ा दीवार पर रेंगता हुआ लाजो की तरफ बढ़ रहा है। उसने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया।
“टिड्डी!” उसने सोचा। “तो अभी सारे टिड्डी दल का खातमा नहीं हुआ?”
उसकी उंगलियों में दबी हुई टिड्डी कुलबुला रही थी, फड़फड़ा रही थी, शायद दम तोड़ रही थी मगर अभी तक जिन्दा थी। चिराग की रौशनी में लाया तो उसने देखा कि टिड्डी का पेट न जाने किसका अनाज खाकर फूला हुआ है, उसकी छोटी-छोटी आँखें चमक रही हैं और उसकी लम्बी नुकीली मूँछें लालची कुत्ते की तरह दुम हिला रही हैं।
ये कहानी ‘हिन्दी की 21 सर्वश्रेष्ठ कहानियां’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hindi Ki 21 Sarvashreshtha Kahaniya (हिन्दी की 21 सर्वश्रेष्ठ कहानियां)
