कथा-कहानी

बिस्तर से निकाल अभी शैली अनमने ढंग से कॉफी का कप हाथ में लिए बालकनी में बैठ पेपर देख रही थी। सोच रही थी कितना कुछ बदल गया बीते पलों में, कितनी रौनक हुआ करती थी कभी इन पहाड़ों में। शायद समय, मौसम और तूफान ने लोगों को समेट रखा है घर में।

कभी कितनी रौनक होती थी उसकी शॉप में, वही तो एक जरिया था उसकी जीविका और जीने का।

अचानक मां-पापा का चले जाना, छोटे भाई-बहन की जिम्मेदारी, कितना कुछ तो पूरा की बीते व$क्त में। व$क्त के साथ सब पूरे हुए, बस ठहर गई उसकी जिंदगी इनमें कहीं। उम्र की ढलान कब शुरू हो गई पता ही नहीं चला। चेहरे ने उम्र की छाप छोड़ दी।

खुद को आईने में देख कह उठी, कितना कुछ बदल गया बीते व$क्त में, होंठो की हंसी ने गंभीरता ले ली। बालों के गूच्छे ने सफेदी और दुनिया को देखने वाली नजर ने नजर का चश्मा ले लिया। बस अब रोज की यही जिंदगी। सुबह हाथ में कप पेपर और बालकनी। कुछ पल इनमें खुद को खो कर फिर दिन शुरू।

हां, मन में कसक थी शायद मौसम बदले। सुबह बालकनी में बैठी सोच रही थी सब कितने दूर हो गए। और इधर पहाड़ों से सैलानी भी कम होने लगे थे, जिनके संग उसका दिन गुजरता था। अभी उसी उधेड़ बुन में थी, तभी मौसम ने अपनी दस्तक दी।

सोच रही थी, चलो कोई तो साथ आया। आज बिल्कुल मन नहीं था शॉप खोलने का। यही सोच उठ घर को व्यवस्थित कर खुद को तैयार कर निकल गई इन पहाड़ों के टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी पर खुद की तलाश लिए। दूर पहाड़ों में न जाने कब तक खोई और गुमसुम सी खुद को तलाशती रही।

तभी महसूस हुआ शाम ने दस्तक दे दी। चल पड़ी घर की ओर। फिर कल नई सुबह आएगी। मौसम रुत बदलने लगा। और अगली सुबह की पहली किरण उसके चेहरे पर नई चमक लाई।

खुशनुमा मौसम और ब$र्फों से अपने सफेद आगोश में पहाड़ों को ढक लिया। चल पड़ी अपनी शॉप की ओर आज फिर रौनक होगी उसकी जिंदगी में, लोगों के बीच। दिन की शुरुआत करके शॉप में हाथों में पेपर लिए कोने में जा बैठी। आज काफी भीड़ सी थी। लोगो में मौसम का असर था। कितने जोड़े आज यहां मौजूद थे। कुछ प्यार मेें डूबे, कुछ नोकझोंक, कुछ बहस।

तिरछी नजर और होंठों पर हंसी लिए बस देख रही खुश थी कि सब कितने पास हैं। अभी वह खयालों में डूबी सोच रही थी। तभी एक आवाज उसके कानों में आई- ‘शैली, कैसी हो? पहचाना मुझे।’ नजर रुक सी गई। विवेक था, उसके बचपन का दोस्त। जो सालो पहले बाहर चला गया था और आज इतने साल बाद अचानक सामने उसको देख के सब पुरानी यादें ताजा हो रही थीं। पता नहीं कहां था कैसा था। कितना बदल गया है। शादी, बच्चे, हजारों सवाल एक साथ। तभी फिर आवाज आई, ‘कहां खोई हो?Ó

एक झटके में उठी जैसी कोई चोरी पकड़ी गई उसकी। ‘यहीं तो हूं, कैसे हो इतने दिन बाद अचानक कैसे आए यहां? सब ठीक तो हैं?’

‘हां बाबा, सब ठीक हैं। तुम अब भी नहीं सुधरी। पहले जैसी हो, सवाल खत्म ही नहीं होते।’

अब क्या कहती, उम्र के इस मोड़ पर खुद एक अकेली सवाल है।

आज मौसम सच में बदला है।

दिन गुजरने लगे। अब सुबह-शाम कब गुजर जाती पता ही नहीं चलता। रोज विवेक का शॉप में आना, घंटों बीती बातें करना, हर बात एक दूजे से करना। जि़ंदगी अब रफ्तार लेने लगी।

शैली ने एक दिन पूछा, ‘तुमने शादी की, कहां हैं संगिनी, तुम्हारे बच्चे उनको नहीं लाए।’

विवेक मुस्कुरा उठा, ‘नहीं की शादी। कोई पसंद थी जिंदगी में उसका ही इंतजार कर रहा था।’ और उठ के चला गया।

शैली सोचने लगी, पता नहीं कौन थी, इतना तो अच्छा है, क्यूं नहीं की शादी इससे। यही सब सोच लिए शॉप बंद कर घर की ओर चल दी।

पूरी रात यही सब बात सोचती कब नींद आई पता नहीं चला। सुबह जब आंख खुली दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। कौन होगा, इतनी सुबह। अलसाई आंखों से उठ कर दरवाजा खोली, सामने विवेक था। ‘तुम इतनी सुबह, सब ठीक हैं न बताओ।’

विवेक ने अंदर आकर उसके मुंह पर हाथ रख बोला, ‘चुप, कितना बोलती हो। कभी सुना भी करो। कुछ कहने आया हूं। शादी करोगी मुझसे, कब से इंतजार कर रहा हूं तुम्हारा।’

अपलक सी देखती रही विवेक को और वह बोल के चला गया। खुद को संभाल के, होंठों पर हल्की मुस्कान लिए आईने के पास जा कर खुद को देख  मुस्कुरा कर कह उठी, ‘अभी उम्र ही क्या हुई हैं। कुछ चीज जरूरत के लिए नहीं जिंदगी के लिए होती हैं।’

आज उसकी मुस्कान बता रही थी, उसके मन का बर्फ पिघल गया है। 

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