दोपहर की चिलचिलाती धूप मे फेरी लगाने वालों को, कुछ देर सुस्ताने के लिए आश्रय देता था। परन्तु अब उसकी जरूरत किसी को नहीं थी। पतझड़ तो हर साल आता था, परन्तु इस पेड़ पर ठहर गया था।

“यहां खिड़की पर खड़े होकर क्या सोच रही हो मां ?”

“कुछ नहीं, सामने वाले पेड़ की स्थिति और अपनी स्थिति की तुलना कर रही थी।”

“क्या मां ….अच्छा चलो लेट जाओ थोड़ी देर …थक गयी होगी …”

“नहीं …..देख सूख गया बिलकुल ..अब ..”

“अब क्या मां ? भैया ने उसे काटने को बोल दिया है। आखिर हमारी ही जमीन है वह भी। कुछ लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम आ जाएगी और कुछ को बेच देगे। आखिर …”

“एक काम कर माधवी अपने भैया को बोल कुछ लकड़ी संभाल कर अलग रख ले।”

“क्यों भला ?”

“मेरी लाश को जलाने के काम आ जाएगी। लकड़ी का खर्चा भी बचेगा।”

“मां ….जब भी बोलोगी कड़वा ही बोलोगी। पूरा मोहल्ला भैया -भाभी की तारीफ करते नहीं थकता। उनकी सेवा भावना ने सबका मन मोह लिया है। परन्तु तुम …”

” उसके पीछे की मजबूरी क्या तू नहीं जानती ? …”

“जो भी हो, तुम्हारा समय तो अच्छा कट रहा है ना। कितने बुजुर्गो को यह सम्मान मिलता है।”

“ठीक ही कह रही है …आशा करती हूं तुम दोनों भाई -बहनों को ऐसा सम्मान न मिले।”

गुस्से से पैर पटकती हुई भाई की बहन चली गयी थी।

छोटा सा परिवार था प्रभा जी का . एक पुत्र विवेक तथा एक पुत्री माधवी। अपने जीवनकाल मे ही प्रभाजी के पति श्री नरेश प्रसाद जी ने सभी कर्तव्यों का निर्वाहन कर दिया था।

स्वयं शिक्षक होने की वजह से शिक्षा की महत्ता का उन्हें भान था, इसलिए  दोनों बच्चों को उच्च शिक्षा दिलायी। पुत्र विवेक मेधावी था, इन्जीनिरिंग की पढाई पूरी होते ही जल्द ही उसका चयन अभियंता के रूप मे हो गया था। बेटे को सरकारी नौकरी मिलने की ख़ुशी नरेश जी को बहुत हुई थी। नौकरी मिलने के बाद उसने अपनी पसंद से शादी भी कर ली, प्रभाजी थोड़ी विचलित जरूर हुई थी परन्तु नरेश जी ने उन्हें समझा लिया था। 

पुत्री माधवी भी अपने भाई से पीछे नहीं रही थी। बी एड की परीक्षा देने के कुछ समय बाद ही उसका चयन सरकारी शिक्षिका के रूप मे हो गया था।

माधवी के विवाह के समय हालांकि उसके ससुरालवालों की तरफ से कोई मांग नहीं रखी गयी थी। परन्तु उसकी कमी माधवी की स्वयं की मांगों ने कर दी थी। नरेश जी ने सदा से ही दहेज़ का विरोध किया था। परन्तु अपनी ही पुत्री की मांगो का वो क्या करते ? माधवी यह भी भूल गयी थी कि एक ईमानदार स्कूल शिक्षक अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के बाद अपने बैंक अकाउंट मे लम्बी – चौड़ी रकम तो जमा नहीं कर पायेगा। उनके लिए सबसे बड़ी पूंजी जो वो अपने बच्चों को दे सकते थे वह थी शिक्षा। जितना हो सका नरेश जी ने उसकी मांग पूरी करने की कोशिश की। यह बात और थी की वह माधवी को वह खुश नहीं कर पाए थे।

प्रभा जी के लाख समझाने पर भी नरेश जी ने अपने बेटे के सामने हाथ फैलाना गवारा नहीं किया था। वैसे भी विवेक की पत्नी मोना  ने पहले ही महंगाई का रोना रो दिया था। दो बच्चों की पढाई, उनकी बढती मांगों के साथ बड़े शहर  के खर्चे भी तो बड़े होते है।

दो साल पहले प्रभा जी के पति का देहांत हो गया था। विवेक उन्हें अपने साथ मुंबई ले जाना चाहता था, परन्तु अपने घर की मालकिन बनकर रहने वाली प्रभाजी को आश्रित बनकर जाना मंजूर नहीं हुआ। परन्तु दूसरी बात यह भी थी कि विवेक ने कभी जोर भी नहीं डाला। खैर माधवी का तर्क यह था कि माता – पिता की जिम्मेदारी पुत्र की होती है, पुत्री की नहीं।

प्रभा जी ने कभी भी दोनों बच्चों से कोई उम्मीद नहीं रखी। छुट्टियों में माधवी तथा विवेक दोनों ही अपने बच्चों के साथ आते, अच्छा समय बिताते और फिर वापस चले जाते।

यह व्यवस्था सभी को ठीक लगी थी . कई रिश्तेदार नासिक मे घर के पास ही रहते थे . प्रभा जी की देखभाल के यमुना और उसका बेटा उनके साथ ही रहते थे . एक कमरा दोनों माँ बेटे को दिया हुआ था।

उनके शांत जीवन मे हलचल तब शुरु हुई जब विवेक ने अपना तबादला मुंबई से  नासिक  करा लिया। शुरुआत मे प्रभा जी बड़ी खुश हुई, आखिर बेटा – बहू, पोता -पोती के साथ रहने की ख़ुशी किसे नहीं होगी? आस – पड़ोस के लोगों ने भी विवेक के इस मातृभूमि प्रेम की भूरि – भूरि प्रशंसा की।

विवेक और उसकी पत्नी मोना दोनों ही उनका बहुत ध्यान रखने लगे थे, पहले से कहीं ज्यादा।

प्रभा जी अपने पुत्र मे आये इस बदलाव से बहुत खुश थी, परन्तु प्रभा जी की ख़ुशी को पहला धक्का यमुना ने लगाया था। इतने सालों से साथ रहते हुए यमुना काफी मुंहलगी हो गयी थी।

” अम्मा जी ….मोना बहू और विवेक भैया तो काफी बदल गए है। बुरा न मानना …पर बड़े बूढ़े कह गए है ज्यदा शहद जहां अचानक आ जाता है, वहां चीटिया भी जरुर आती है . कहीं कुछ मतलब तो ….”

“चुप कर ……..मुझे खुश देखकर जल रही है क्या तू ?”

यमुना को तो प्रभा जी ने चुप करा दिया, परन्तु उनके स्वयं के मन मे संदेह के बादल घुमड़ चुके थे। न चाहते हुए भी शक का बीज पनप चुका था।

सच्चाई सामने आने मे ज्यादा समय भी नहीं लगा था . विवेक ने अपने दोनों बच्चों नमन और रिया का दाखिला नासिक के ही एक अच्छे स्कूल मे करा लिया था। नमन तो नियामित रूप से स्कूल जाता परन्तु रिया महीने मे एक अथवा दो दिन के लिए ही स्कूल जाया करती थी। पता नहीं कौन सी बीमारी उसे अक्सर हो जाया करती थी। दिनबदिन उसका स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा था।  कई बार प्रभा जी ने पूछना चाहा भी तो मोना उन्हें टाल देती थी। परन्तु उस शाम वे टाल नहीं सके थे।

उस शाम रिया बैठे – बैठे ही बेहोश हो गयी थी , घर मे कोहराम सा मच गया था। डॉक्टर के जाने के बाद प्रभा जी ने विवेक से पूछ ही लिया था।

“क्या चल रहा है यह सब ? क्या हुआ है रिया को, कोई मुझे बताएगा ?”

“तुम्हे नहीं बताऊंगा तो किसे बताऊंगा मै मां ?” यह कहकर रोने लगा था विवेक।

“विक्की …बेटा रो मत ….मुझे बता ?”

” माँ …रिया की दोनों किडनी ख़राब हो गयी है। डॉक्टर ने कहा है किडनी प्रत्यारोपण करना होगा।”

सुनकर चक्कर आ गया था प्रभा जी को। कोई भी सोच नहीं सकता था  दस साल की बच्ची के साथ ऐसा कुछ हो सकता है।

“अब क्या होगा ……..विक्की ?”

“तुम चिंता मत करो …..डोनर ढूंड रहे है . और कुछ नहीं तो मैं हूं न, मैं अपनी किडनी दे दूंगा।”

इतना कहकर विवेक वहां से चला गया।

रात मे जब मोना प्रभा जी के पास ढूध लेकर आई, उन्हें चिंता मे डूबा हुआ ही पाया।

” मां ….सोयी तो नहीं। दूध लाई थी आपके लिए। लाईये पहले आपके पैर दबा दू।”

“अरे नहीं मोना , ठीक हूं मै ….बस रिया और विवेक का सोच सोच कर परेशान हूं।”

“हां मां, आप ही सोचिये ….क्या उम्र है हमारी रिया की।”

“ह्म्म्म …..और विवेक, उसे तो कोई खतरा नहीं होगा ऑपरेशन के बाद …सब सामान्य ही रहेगा ना।”

” ऑपरेशन तो रिस्की ही है मां ……….और सामान्य तो क्या हो पायेगी जिंदगी। मैंने तो कहा भी मैं दे देती हूं किडनी। तुम्हारे रहना हम सब के लिए जरूरी है। तुम्हे कुछ हो गया तो मां का क्या होगा ? तुम पर ही तो सब जिम्मेदारी है। मेरा क्या है ?”

“अरे ऐसा क्यों बोल रही है बेटा, मां के बिना बच्चे पलते है क्या ?”

” आप दोनों मां बेटे एक जैसा सोचते हैं।”

इतना कहकर मोना रो पड़ी।

प्रभा जी भावनावों के उद्वेग मे आकर बोल पड़ी …..

” न – न रोते नहीं ….मेरी किडनी दे देना मेरी पोती को। इस उम्र मे मै और जी कर क्या करूंगी ? मेरी जिंदगी मेरे बच्चों के काम आ जाएगी।”

“नहीं माँ बिलकुल नहीं। वैसे आपकी किडनी मैच हो गयी है रिया से, मतलब हो ही जाएगी आखिर आप दादी है उसकी।”

उसकी आवाज़ मे सकपकाहट को प्रभा जी ने भी महसूस किया था परन्तु ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर चुप रहकर वो आगे बोली।

” परन्तु  इस उम्र मे आपके ऑपरेशन मान्य नहीं है, और होता तो भी विवेक तैयार नहीं होते। आपका शरीर नहीं झेल पायेगा यह ऑपरेशन मां। हां अगर आपकी मृत्यु हो जाये तो …….”

इतना कहकर वह चुप हो गयी थी।

थोड़ी देर बाद मोना चली गयी। प्रभा जी अब उनके यहां आने का कारण जान चुकी थी। प्रतिदिन सुबह विवेक के पूछे जाने वाले उस प्रश्न का कारण भी जान गयी थी।

“मां, कुछ तकलीफ हो रही है ? तबियत ठीक तो है ना ?”

प्रभा जी सोचतीं, बेटा कितनी चिंता करता है, परन्तु बेटा तो मां की तबियत बिगड़ने का इंतज़ार कर रहा था।

कुछ दिन पहले ही विवेक ने उसका फुल बॉडी चेकअप कराया था। अब पता चला वह चेकअप क्यों कराया गया था ? शायद उसी मे पता चला होगा कि प्रभा जी की किडनी रिया को दी जा सकती है।

अपनी पोती के लिए कुछ भी करने को प्रभा जी सहर्ष तैयार थी, परन्तु अपनी पुत्र के व्यवहार ने उन्हें आहत कर दिया था।

रिया के लगातर गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए पुरे परिवार के साथ स्वयं प्रभा जी अपनी मृत्यु का इंतज़ार करने लगी थी।

हर सुबह उन्हें सही सलामत देखकर घर के लोगो के चेहरों पर आई मायूसी प्रभा जी को भी मायूस कर जाती थी।

माधवी भी कई चक्कर लगा चुकी थी, ढके छुपे शब्दों मे उसे जल्द ही मृत्यु को गले लगाने का सुझाव भी दे चुकी थी।

अब मरना तो प्रभा जी भी चाहती थी, परन्तु इन सांसों पर क्या अपनी मर्ज़ी चलती है ?

आंसू जो निकलते नहीं , उन्हें पोंछु कैसे ?

दर्द जो दीखता नहीं, उसे बताऊं कैसे ?

जीने की चाह तो मुझमे अब बची ही नहीं..

पर  सांस जो रूकती ही नहीं, उसे रोकूं कैसे ?

“मां, अभी तक यही खड़ी हो ……तबियत तो ठीक है ना तुम्हारी ?”

” माफ़ करना बेटा ….तबियत ठीक है अभी भी मेरी।”

” मां ……”

“अब तू जा ………थोडा सोऊंगी।”

“क्या बात कर रही हो मां? शाम मे सोना चाहती हो ? फिर रात मे क्या करोगी ?”

” पता नहीं रात देख भी पाऊंगी या नहीं ?”

“मां…मै भैया को बुलाती हुं…..”

“नहीं ….थोड़ा सोऊंगी तो ठीक ….चल जा।”

“ठीक है मां, तुम सो जाओ ….मै जाती हूं”

लाख चाहने पर भी माधवी अपनी आवाज़ मे प्रसन्नता के पुट को छुपा नहीं पा रही थी। बाहर निकल कर अपने भाई के साथ कानाफूसी मे लग गयी थी, परन्तु वह कानाफूसी भी इतनी तेज़ थी की प्रभा जी के सुप्त होते कानों ने भी सुन लिया था।

“भैया ,मां की तबियत ठीक नहीं है ….मुझे लगता है अब ज्यादा समय नहीं है।”

” चुप कर माधवी, 6 महीने पहले भी तूने यही कहा था। तेरे कहने पे ही हम यहां आये थे। “

“अरे भैया …..नहीं …अब कुछ समय तो लगेगा ही। पर इस बार पक्का है।”

“माधवी …तीन दिन पहले भी यही कहा था तुमने …” मोना भी आ गयी थी।

“नहीं भाभी वही तो कह रही हूं …..मां आज बड़ी बहकी- बहकी बात कर रही थी। आज की रात तो …..”

“माधवी मेरी बहन …..” ख़ुशी से चीख पड़ा था विवेक।

“चुप भी करो विवेक ..तुम भी थोडा धीरे बोलो माधवी।”

“भैया रिया के ऑपरेशन के बाद …अपना वादा याद है न आपको ?”

” हां भाई …याद है मुझे …..घर का सौदा तो विरेन जी ही करा रहे है ना। तेरे ही पति है न वो, फिर तेरा हिस्सा कहां जा रहा है ?”

“क्या भैया ?”

आज नरेश जी द्वारा सुनाई  कहानी याद आ रही थी प्रभा जी को। कुछ लोग चाहते थे कि एक पेड़ सूख जाये। उन्हें उस पेड़ की लकड़ी चाहिए थी, परन्तु वे उसे काट तभी सकते थे जब वह सूख जाये। उन्होंने आपस मे कुछ सलाह की और झुण्ड बनाकर रोज़ उस पेड़ को गालियां देने लगे। धीरे – धीरे पेड़ सूखने लगा और आखिरकार पूरी तरह सूख गया।

स्वयं को अवांछित पाए जाने का एहसास कितना भयानक होता है, यह प्रभा जी अच्छी तरह जान गयी थी।

लेटे- लेटे ही प्रभाजी खिड़की की तरफ ताकने लगी थी। चांदनी रात मे पेड़ साफ़ दिख रहा था।

ठहरा हुआ पतझड़ ………..

उस पर ठहरी हुई प्रभा जी की आंखें ……..

और फिर अंततः ठहर गयी थी उनकी सांसें…….

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