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छींक का पेड़-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात: Story of Tree
Sneeze Tree

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Story of Tree: सर्दियों की सुबह थी। सूरजदादा आसमान से फूल जैसी कोमल धूप की वर्षा कर रहे थे। रुत्वी घर के बाहर बरामदे में बैठी थी।

उसकी टीचर ने एक बार कहा था कि “सूरजदादा की कोमल धूप बहुत अच्छी होती है। उससे विटामिन डी मिलती है और हड्डियाँ मजबूत बनती है। उस दिन से, रुत्वी रोज सुबह सूरजदादा की कोमल धूप में बैठती थी।

रुत्वी ने सूरजदादा के सामने देखा। उसे छींक आई। “आ…आ…” उसी वक्त उसकी दोस्त खुशी ने आवाज दी, “रुत्वी…”

उसी के साथ रुत्वी के रंग में भंग पड़ा। छींक आते-आते रुक गई।

“तुम भी ना यार! मेरी छींक आते-आते चली गई।”

“ओरी मोरी मैया! अब तुम्हारे पेट में छींक का पेड़ ऊगेगा।” खुशी ने अपना ज्ञान रुत्वी के सामने प्रकट किया!

“हैं…! यार, सही-सही बता ना, क्या सच में मेरे पेट में छींक का पेड़ ऊगेगा?”

“हाँ, और है ना, जैसे पतझड़ में पेड़ से पत्तियाँ झड़ती है वैसे ही छींक के पेड़ से छींके झड़ने लगेगी।

“अब क्या होगा?” रुत्वी घबराने लगी।

“जब होगा तब देखा जाएगा। अभी तो मेरे साथ मेरे घर चल।”

“अंह…मैं…मुझे नहीं आना। मुझे तो अभी छींक के पेड़ के बारे में कुछ करना है।”

“क्या तुम मेरी बर्थडे पार्टी में नहीं आना चाहती? कल ही तो मैंने तुम्हें बताया था, क्या तुम भूल गई?”

पार्टी की बात सुनते ही रुत्वी छींक के पेड़ के बारे में भूल गई और खुशी-खुशी वो खुशी के साथ उसके घर के लिए रवाना हो गई।

पार्टी में रुत्वी ने जी भर के बहुत सारी चॉकलेट, केक, जलेबी, श्रीखंड वगैरह खाया। बहुत मजा किया। बाद में देर शाम वो अपने घर जाने के लिए निकल पड़ी।

घर जाते समय फिर से उसे छींक के पेड़ वाली बात याद आ गई। मन ही मन में वह व्याकुल होने लगी। “अगर पेट में छींक का पेड़ ऊगेगा तो? बाप रे-ऐसा हुआ तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी।” ऐसे ख्यालों ने उसकी नींद हराम कर दी। बड़ी मुश्किल से उसे नींद आई।

सपने में उसने देखा कि उसके पेट में एक बहुत बड़ा छींक का पेड़ ऊग निकला था। उसकी हर एक टहनी पर पत्तियों की तरह बहुत सारी छींके लगी हुई थी। पतझड़ में सभी छींके पत्तियों की तरह गिरने लगती है।” आ…क…छी…आ…क…छी…आ…क…छी…”

उठते-बैठते, खाते-पीते, घूमते-फिरते रुत्वी को छींक पर छींक आने लगी। छींकने से उसे बिलकुल फुरसत ही नहीं मिलती थी। नाक से लिट्टी भी निकलने लगी। उसकी सारी सहेलियाँ उसकी खिल्ली उड़ाने लगती है।

“रुत्वी को आती है छींक, आ…क…छी…

रुत्वी को आती है लिट्टी…आ…क…छी…!”

रुत्वी तो परेशान हो गई। उसे रोने का मन हो गया। थककर उसने आखिर चादर लेकर बिस्तर पर लेटे रहने का सोचा। चादर लेकर बिस्तर पर लेटने के लिए तैयार होती है, उसी वक्त किसी ने उसकी चादर खींच दी।

“रुत्वी बेटा! चलो अब उठ जाओ। सात बज चुके हैं। आज शनिवार है। आज स्कूल नहीं जाना है क्या?”

रुत्वी की माँ उसे जगा रही थी। यह देखकर रुत्वी को बहुत सुकून मिला। “हाश! यह तो सिर्फ एक सपना था।”

रुत्वी नहा-धोकर स्कूल गई। पर उसका मन तो छींक के पेड़ पर ही लटका हुआ था। ऊपर से उसे सुबह से ही बार-बार छींके आ रही थी। इसलिए उसके मन में ज्यादा डर पैदा हुआ। “छींक का पेड़ तो पेट में बढ़ रहा नहीं होगा न?”

धीरे-धीरे रुत्वी को अधिक छींके आने लगी। छींक-छींक के उसकी नाक भी लाल हो गई थी।

घर जाकर वह रोने लगी। रोते-रोते वह अपनी माँ से कहने लगी,” मम्मी…मुझे है ना…मुझे है ना…आ…क…छी…”

“हाँ, बेटा बोल! क्यों रो रही हो? सर्दी लग गई है क्या?” उसकी माँ ने उसके सिर पर हाथ सहलाते हुए कहा।

रुत्वी रोती रही, छींकती रही और कहती रही, “मम्मी…है ना…मेरे पेट में छींक का पेड़ ऊग गया है।”

“पगली! क्या कभी छींक का पेड़ भी हो सकता है? किसने कहा तुमसे ये?”

“वो तो है ना…खुशी ने मुझे बताया। कल मुझे छींक आ रही थी, उसी वक्त उसने चिल्लाकर मुझे आवाज दी। इसलिए छींक वापस चली गई और इसलिए…”

“घत्तेरे की! मेरी समझदार बेटी! ऐसा कुछ नही होता। और हाँ, कल तुम खुशी की बर्थडे पार्टी में गई थी ना? पार्टी में क्या-क्या खाया था?”

“वो तो है ना… मम्मी… बहुत सारी चॉकलेट्स, श्रीखंड, केक, जलेबी…”

“बस-बस। आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। अब मुझे पता चल गया है कि तुम्हें इतनी ज्यादा छींके क्यों आ रही हैं। इतनी सारी मिठाई खाने के बाद सर्दी तो होनी ही थी! कोई बात नहीं बेटे! ये तो कौवे का बैठना और डाली का टूटना जैसी बात हुई। तुम्हें सर्दी हो गई है इसलिए छींके आ रही है। अन्यथा, छींक का पेड़-वेड कुछ भी नहीं होता। बेमतलब की चिंता करना बंद कर दे। दवाई ले लेंगे, तो सब ठीक हो जाएगा।” यह सुनकर रुत्वी की जान में जान आई।

“आ…क…छी…आ…क…छी…” रुत्वी को एक साथ दो-तीन छींके आई। उसी के साथ ही हर कोई हँसने लगा। रुत्वी भी हँसने लगी और सबके साथ रुत्वी भी गाने लगी…

“रुत्वी बहन के पेट में उगा पेड़

छींक का पेड़, भाई! छींक का पेड़।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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