एक बार की बात, सब्जीपुर के विशाल हरियल पार्क में सब्जियों की विशाल सभा हो रही थी। उसमें बातों-बातों में सवाल उठा कि सब्जीपुर में सबसे नाजुकमिजाज कौन है? वहाँ बहुत से लोग मौजूद थे—भिंडी चाची से लेकर धनिया चाची और बैंगन राजा तक। मिर्ची रानी थीं तो गाजर देवी और मूली रानी भी। टमाटरलाल जैसे हर दर्जे के नाजुक जीव भी थे, एकदम कोमल-सुकोमल।
फिर भी जब बात उठी तो बाकी सब तो चुप। सोच रहे थे, अपना नाम दें, न दें? मगर परवलचंद सबसे आगे बढ़कर बार-बार हाथ उठा रहे थे, “मैं हूँ मैं! मैं हूँ सबसे नाजुकमिजाज।”
“कैसे—कैसे भई, कैसे?” सभा के अध्यक्ष बैंगन राजा ने मुसकराते हुए पूछा। इस पर परवलचंद खूब जोश में आकर जवाब देते हुए बोले, “इसलिए कि राजा साहब, इसलिए राजा साहब…इसलिए…इसलिए…!”
और परवलचंद की बात तो कुछ बनी नहीं, पर वे वाक्य पूरा करने की कोशिश में इस बुरी तरह हकला गए कि बैंगन राजा ही नहीं, सभी में मौजूद सभी लोग बाकायदा गरदन हिलाकर परवलचंद का मजाक उड़ाते हुए बोले, “इसलिए कि राजा साहब, इसलिए…इसलिए…इसलिए…!”
इतनी बार लोगों ने ‘इसलिए’ दोहरा दिया कि बेचारे परवलचंद की घिग्घी बँध गई। कुछ बोलने की बजाय बेचारे ने चुपचाप बैठ जाना पसंद किया। और इस पर पूरे सभा-कक्ष में इस कदर जोर का ठहाका लगा कि परवलचंद एकदम पसीने-पसीने हो गए।
धनिया चाची मुसकराते हुए बोलीं, “बैंगन राजा, परवलचंद ने आखिर अपने आपको सबसे नाजुकमिजाज बताने की हिम्मत तो की, भले ही वह ‘इसलिए…इसलिए’ करके रह गया। तो मेरा तो यह कहना है कि इन्हीं को नाजुकमिजाजी का उपहार दे दिया जाए।”
इस पर जारों से फिर हँसी-ठट्ठा होने लगा और परवलचंद बेचारे और ज्यादा नर्वस हो गए।
अब बैंगन राजा ने पूरे सभा-कक्ष पर नजर डालते हुए काम की बात कही कि “अच्छा, आप लोग यहाँ मौजूद हैं और अच्छा प्रसंग छिड़ गया है, तो क्यों न बात को आगे बढ़ाया जाए? कुछ मजेदार किस्से और बातें ही सामने आएँगी। सुनाइए आप लोग, अपनी-अपनी नाजुकी का कोई एक मजेदार किस्सा तो सुनाइए!”
इस पर सभी गरदनें हिला-हिलाकर एक-दूसरे की ओर देखने लगे कि पहले कौन उठे, पहले कौन?
आखिर धनिया चाची ने ही फिर हिम्मत की और खड़ी होकर बोलीं, “देखिए, ‘पहले आप, पहले आप’ में तो सारा वक्त निकल जाएगा। चलिए, मैं ही शुरू हो जाती हूँ। जरा आप देखें कि मैं किस कदर नाजुक हूँ। वैसे तो देखने में ही बड़ी कोमल, छबीली लगती हूँ। लगती हूँ कि नहीं? और अंदर से भी कोई कम नाजुक नहीं हूँ। अरे, अभी थोड़े ही दिन पहले की तो बात है, मैं ऊँची एड़ी के सेंडल पहने घर से निकली थी। और भई, काहे को निकली थी? मैं तो भूल ही गई।…
“हाँ-हाँ, याद आ गया, रामलीला देखने जा रही थी। तो अभी घर से निकलकर चार कदम ही बढ़ाए होंगे कि पैरों में लचक…ऐसी बुरी तरह लचक आ गई कि मैं तो भई, खंबा पकड़कर बैठ ही गई। फिर बड़ी मुश्किल से सेंडिल हाथों में पकड़े-पकड़े घर गई। घर पहुँचने पर देखा, पैरों में तो छाले ही छाले। जैसे पैर बुरी तरह सूज गए हों। कमर अलग दुख रही थी, हाथ-पैर अलग दुख रहे थे। तो भैया, तुम्हारी धनिया चाची जैसा नाजुक तो कोई दुनिया भर में नहीं हुआ। फिर सब्जीपुर में भला कौन होगा?”
इस पर सभा में ऐसी हँसी हुई, ऐसी हँसी हुई कि हर कोई ही-हा, हा-हा करके हँस रहा था। आखिर धनिया चाची को ही खड़ा होकर कहना पड़ा कि अरे भैया, हँसी-ठट्ठा छोड़ो, अपनी-अपनी नाजुकी का कोई किस्सा सुनाओ, वरना आज का सारा नाम-दाम या प्राइज तुम्हारी धनिया चाची ही ले जाएँगी!
इसके बाद मिर्ची रानी खड़ी हुईं और उन्होंने अपनी नाजुकी के दो-चार मजेदार किस्से सुना दिए कि वे बेचारी इतनी नाजुक हैं कि खड़ी हो जाएँ, तो बैठने में जान निकलती है और अगर बैठ जाएँ तो खड़ा नहीं हुआ जाता। तो भला उनसे ज्यादा नाजुक कौन होगा?
मिर्ची रानी की बात पूरी होते ही बैंगन राजा ने फब्ती कसी, “भई, मिर्ची रानी की बातों को तो मैं वीटो करता हूँ। इसलिए कि ये नाजुक कहाँ हैं? ये तो दुधारी तलवार हैं, तलवार! मैंने बड़े-बड़े महाबली पहलवानों को देखा है कि जरा सी पतली मिर्ची खिला दो तो ऐसे कान पकड़कर, बिलबिलाकर भागते हैं कि क्या कहें। तो भई, मिर्ची रानी तो नाजुक हो नहीं सकतीं। इनके मारे दूसरे भले ही नाजुक हो जाएँ।”
इसके बाद खड़ी हुईं भिंडी चाची। थोड़ी अदा से उन्होंने सब ओर सिर घुमाया। बैंगन राजा और महामंत्री आलूराम पर उड़ती हुई नजर डाली। फिर बोलीं, “लोगों ने अपनी-अपनी नाजुकी के किस्से सुनाए हैं, मगर मेरी अर्ज है कि मेरी नाजुकी से उनकी तुलना न की जाए। कहाँ मैं, कहाँ वे…! अजी, आप इसी से समझ लीजिए कि कोई हफ्ता भर पहले की बात है, मैं जरा देर के लिए घर से निकली थी। सोचा था, जरा शॉपिंग कर आऊँ! तो नेलपालिश और सुरमेदानी खरीदकर लाई और फिर जैसे ही घर में घुसी, फ्रिज से निकालकर ठंडा पानी पिया। अब जाने भैया क्या हुआ कि ठंडा पानी पीते ही छींकें…छींकें! मार तमाम छींकें ही छींकें चालू हो गईं। आप यकीन मानो उस दिन सारे दिन बस मैंने छींकने के सिवाय कुछ और किया ही नहीं। यहाँ तक कि अब भी मैं पूरी तरह तो ठीक नहीं हुई। अब आप ही देखिए न कि आक्छी…!”
कहते-कहते भिंडी चाची ने एक बार फिर छींका तो सारे सभा-कक्ष में नकली ‘आक्छी-आक्छी’ शुरू हो गई।
अबके परवलचंद फिर खड़े हुए। इस बार उन्होंने जमकर बोलना शुरू किया, “भाइयो, पिछली बार तो मैं बैठ गया था और इसलिए…इसलिए कि अपनी ओर से कोई बात मैं सुझा नहीं पाया था। मगर इस बार मैं बोलूँगा और पूरी बात कहकर रहूँगा, आप चाहे सुनें या ना सुनें!”
कहकर उन्होंने बड़े जोर से हाथ फटकारा, जैसे पूरी सभा को ललकार रहे हों। इस पर बड़े गजब का शोर हुआ। मगर फिर अच्छी बात यह हुई कि लोगों ने बड़े गौर से परवलचंद की ओर देखना और उनकी बात सुनना शुरू किया।
परवलचंद में भी अब खासा आत्मविश्वास आ गया था। उन्होंने कहा, “भैया, किस्सा कुल-मिलाकर यह है कि एक बार मुझे जुकाम हुआ था। अब नाजुकमिजाज तो बहुत हूँ और आप जानते हैं, नाजुक लोगों को जुकाम भी जरा तगड़ा होता है। लिहाजा जुकाम ने सच्ची-मुच्ची हालत खराब कर दी तो बार-बार नाक सुड़कते देखकर मेरे दोस्त टिंडामल ने कहा, ‘अरे भाईजान, जरा रूमाल ले लो।’
“मैं झटपट-झटपट दौड़ा-दौड़ा बाजार गया। वहाँ तरह-तरह के रूमाल थे। खादी के भी, सूती भी। रेशमी भी, मलमल के भी। मैंने मलमल का एक बड़ा प्यारा-सा, मुलायम छींटदार रूमाल अपने लिए छाँटा और जब भी मुश्किल आती, रूमाल निकालकर नाक पोंछ लेता। मगर इसी में हो गई आफत…! आप जरा सुनिए तो, दो-चार बार नाक पोंछने के बाद लगा कि नाक थोड़ी सूज गई है और लाल फोड़े जैसी बन गई है। मगर मैंने सोचा कि इसकी क्या परवाह करनी? लिहाजा अगली बार मैंने रूमाल निकालकर और थोड़ा जोर से पोंछा तो भैया, देखता क्या हूँ कि मेरी पूरी की पूरी नाक ही गायब…! मैं ढूँढ़ता ही रह गया और सच्ची पूछो तो आज तक ढूँढ़ रहा हूँ।
“आप देखें और जरा गौर से देखें, सबके चेहरे पर नाक है, मगर मेरी तो नाक ही नहीं है। गायब, एकदम गायब…! मेरा कसूर बस यह था कि रूमाल से चार-पाँच बार रगड़कर उसे पोंछा ही था। तो भैया, ऐसी नाजुकी भी किसी-किसी में होगी! मैं समझता हूँ धनिया चाची, पुदीना रानी और मिर्ची रानी में भी ऐसी नाजुकी तो नहीं हो सकती।”
“वाकई…वाकई…लाजवाब।” धनिया चाची ने खड़े होकर कहा, “बैंगन राजा से मेरी सिफारिश है कि इस बार नाजुकी का पुरस्कार परवलचंद को ही दिया जाए। बेचारों को नाक गँवाने के बाद यह छोटा-सा पुरस्कार पाने का हक तो है ही! और जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं इस प्रतियोगिता से अपना नाम वापस लेती हूँ!”
और धनिया चाची के यह कहते ही भिंडी चाची ने भी अपना नाम वापस ले लिया और मिर्ची रानी ने भी।
परवलचंद अब भी हाथों में मलमल का छींटदार रूमाल लिए अपने चेहरे पर फिरा रहे थे, मगर नाक कहाँ थी? नाक तो गायब ही हो चुकी थी।
हँसते-हँसते लोगों का बुरा हाल था।
महामंत्री आलूराम बोले, “बैंगन राजा, मुझे लगता है, परवलचंद स्वयं ही नाजुकी के सबसे बड़े उदाहरण हैं। पुरस्कार इनको ही मिलना चाहिए।”
बैंगन राजा मुसकराए। बोले, “ठीक है, आप सभी का निर्णय है तो मुझे मंजूर है।”
उन्होंने परवलचंद को पुरस्कार में सौ सेवक दिए और कहा कि ये बेचारे इतने नाजुक हैं कि न चल-फिर पाएँगे, न घर और बाहर के काम कर पाएँगे। तुम हर पल इनकी निगरानी रखना। कहीं ऐसा न हो कि जैसे नाक गायब हो गई, वैसे ही बेचारे के हाथ-पैर भी गायब हो जाएँ।
तब से परवलचंद कहीं भी आएँ-जाएँ, सौ सेवक हमेशा उनके आसपास बॉडीगार्ड की तरह खड़े रहते हैं। उन्हें नरम बिछौने वाले पलंग पर ढोकर लाते हैं, ले जाते हैं। हालाँकि लाते-ले जाते हुए राह चलते हुए लोग परवलचंद की ओर देखकर खड़े हो जाते हैं और मुसकराते हुए कहते हैं, “यह एक बेचारा अभागा प्राणी है, जिसके पहले कभी नाक होती थी। मगर नाजुकी के मारे बेचारा नाक खो बैठा।” इस पर कुछ लोग हँसते हुए परवलचंद की सपाट नाक की ओर इशारा करते हैं और बाकी लोग हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते हैं।
परवलचंद बिन बताए समझ जाते हैं कि लोग क्यों हँस रहे हैं या उनकी इस गुपचुप हँसी का क्या राज है! लिहाजा जब और हँसते हैं तो सबके साथ-साथ वे खुद भी हँस पड़ते हैं।
और अब सब्जीपुर के बाकी सब नाजुकमिजाज लोग इस चक्कर में हैं कि अगली बार जब नाजुकी का पुरस्कार देने के लिए सम्मेलन होगा, तो भला वे कौन सा किस्सा सुनाएँ कि ‘अली दा पहला नंबर’ बन जाएँ। सुना है, भिंडी चाची कोई बहुत तगड़ा किस्सा ढूँढ़ने की फिराक में हैं, मगर अभी ढूँढ़ नहीं पाई हैं।…खुदा खैर करे!
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
