उस दिन नए साल का उत्सव था। सब्जीपुर में सब्जियों की रौनक देखने लायक थी। हर कोई बन-ठनकर नए-नए कपड़ों में वहाँ आया था। बैंगन राजा की ऊँची पगड़ी दूर से नजर आती थी। ताजा महामंत्री बने आलू राजा की भूरी-बादामी अचकन भी दूर से चमक मार रही थी। बाकी सब्जियों के भी क्या ही ठाट थे। सब अपने-अपने सुर में थे। और कुछ तो इस कदर मुँह फुलाए बैठे थे कि सब्जीपुर में वो न हों, तो भला सब्जीपुर को कौन पूछे?
लोग इस कदर कीमती कपड़ों में, लेकिन साथ ही साथ अपनी अकड़ में कैद थे कि न कोई बोल रहा था, न चहक रहा था। न हँस रहा था, न मुसकरा रहा था। कोई गरदन हिलाकर बगल की कुर्सी पर बैठे पड़ोसी तक को देखने के लिए राजी नहीं था। सबकी गरदनें मानो मारे अकड़ के तख्ता हो चुकी थीं।
इसी तरह का रंगारंग मगर मनहूसियत भरा माहौल था, जब सभा भवन में हरी साड़ी पहने धनिया चाची का पदार्पण हुआ। धनिया चाची ने जैसे ही मुसकराते हुए सभा भवन में कदम रखा, मानो सब ओर रौनक सी छा गई। आते ही उन्होंने बड़ी अदा से मुसकराते हुए गरदन घुमाई। सब पर एक उड़ती हुई नजर डाली और आहिस्ता-आहिस्ता सबके पास से गुजरते हुए, अपनी मोहिनी मुसकान से सबको मोह लिया।
और जब मुसकराते हुए धनिया चाची ने बातें छेड़ीं, तब तो समारोह में बैठे सभी लोग बस धनिया चाची की बातों पर ही गौर कर रहे थे। अपने बड़बोलेपन के अहंकार में डूबे आलूराम के पास जाकर खुशबुएँ बिखरते हुए धनिया चाची ने कहा, “हैलो!”
आलूराम ताजे-ताजे महामंत्री हुए थे। अभी बातें बनाने की ज्यादा आदत न पड़ी थी। बड़प्पन झाड़ना एक बात है और समारोह में जाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना बिल्कुल दूसरी बात। उन्हें समझ में नहीं आया कि धनिया चाची की बात का क्या जवाब दें? तो धनिया चाची ने आखिर प्यार से किसी छुटके बच्चे की तरह उनके गाल थपथपाए और आगे बढ़ गईं।
ऐसे ही वे परवलचंद के पास गईं। बैंगन राजा, मूली रानी, लौकीदेवी, सबको नमस्ते की। सबसे खूब-खूब बातें कीं। और हाल यह हुआ कि नए साल के इस विशेष समारोह में दुबली-पतली, छरहरी सी धनिया रानी सबसे अलग और सबसे सुंदर नजर आ रही थीं।
सबसे मिलने के बाद धनिया चाची फिर बैंगन राजा के पास आईं और उनके स्वास्थ्य और राज-काज को लेकर बातें छेड़ दीं। महामंत्री आलू बार-बार उचक-उचककर कुछ कहना चाह रहे थे, मगर कह नहीं पा रहे थे। गोभी और कटहलराम भी कुछ कह नहीं पा रहे थे। कटहलराम ने सहायक मंत्री का पद हथिया लिया था और रोब झाड़ने के लिए खूब बड़ी सी दाढ़ी भी रख ली थी।
धनिया चाची ने बैंगन राजा को बधाई दी, “आपने दाढ़ीदार कटहलराम को सहायक बनाया, वह तो ठीक है, मगर आलूराम को महामंत्री बनाकर बहुत अच्छा किया। इनकी जरूरत भी थी और आदमी भी ये काम के हैं! बस, इनके साथ एक ही मुसीबत है कि मुस्कराना नहीं जानते। आप अपने महामंत्री से कहिए कि ये थोड़ा मुसकराना सीख लें, वरना सब्जीपुर में जो जाएगा, वो इनसे मिलकर बोर हो जाएगा और पूरे सब्जीपुर के बारे में क्या इंप्रेशन लेकर जाएगा, बताइए तो भला!”
इस पर आसपास बैठे सब्जीपुर के विशिष्ट लोगों और दरबारियों ने वह जोरदार ठहाका लगाया कि बेचारे आलूराम शर्म के मारे पानी-पानी हो गए। उनके गाल इस कदर सुर्ख लाल हो गए कि लोगों को भ्रम होने लगा कि ये आलूराम ही हैं या टमाटरलाल।
सब्जीपुर के लोगों को बड़ा अच्छा लग रहा था कि धनिया चाची के आगे आलूराम की अकड़-फूँ गायब हो गई, वरना महामंत्री बनने के बाद से वे किसी को कुछ समझते ही नहीं थे।
अब के धनिया चाची फिर से आलूराम की ओर मुखातिब हुईं। बोलीं, “देखिए, सब्जीपुर के नए-नए महामंत्री जी, आजकल आपका रंग कुछ फीका-फीका सा लगता है। तबीयत कुछ गड़बड़ तो नहीं? जरूर होगी, जरूर होगी, क्योंकि आपने अपनी प्यारी धनिया चाची को जो भुला दिया है।” फिर हँसकर बोलीं, “कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने धनिया चाची के खिलाफ महामंत्री के कान भरे हों। हमारी पुदीना दीदी तो ऐसा कर नहीं सकतीं। और मूली रानी भी ऐसा क्यों करेंगी? तो फिर…?”
धनिया चाची की बातें सुनकर आलूराम बेचारे पसीना-पसीना हो रहे थे। उन्हें इस कदर परेशान देखकर सब दोस्तों के दोस्त कहे जाने वाले कचालूराम भी कुछ मदद नहीं कर पा रहे थे। तब बड़ी सी दाढ़ी, बड़े चोगे वाले कटहलराम आए आगे। भारी-भरकम रोबदार आवाज में बोले, “अरे भई धनिया चाची, ऐसी बातें न करो, हमारे आलूराम ऐसे थोड़े ही हैं। बेचारे इतने शरीफ हैं कि शराफत के पुतले ही समझो।”
इस पर धनिया चाची फिर से अपना व्यंग्य बाण फेंकतीं, इससे पहले ही राजा बैंगनमल और टमाटरलाल ने आगे आकर धनिया चाची की बात का समर्थन कर दिया। राजा बैंगनमल मुस्कराकर बोले, “भई, बात तो ठीक है। आलूराम जब तक महामंत्री नहीं बने थे, धनिया चाची की सबसे ज्यादा कद्र करते थे। कहीं मिल जाएँ तो सबसे आगे बढ़कर, सिर झुकाकर धनिया चाची को नमस्कार करते थे। मगर अब तो सब कुछ बदल गया है।”
टमाटरलाल ने झट उनकी बात लपक ली। बोले, “भई, आलूराम जब महामंत्री नहीं थे, तो सबसे मिलते थे और सबकी मदद करते थे। किस-किस के काम नहीं आए! बड़ी उम्मीदों से इन्हें महामंत्री बनवाया था, मगर क्या पता था कि इन्हें इस कदर चापलूसी पसंद आएगी कि दो-चार को छोड़कर किसी से मिलना ही पसंद नहीं करेंगे। अब तो इनके शासन में सिर्फ दो-चार की सुनी जाती है, जो हर वक्त इनके आगे-पीछे घूमते हैं और बस दिन भर तारीफ करते हैं। कोई इनके काम में जरा सा नुक्स निकाले तो थोबड़ा सूज जाएगा। अच्छा हुआ, जो धनिया चाची ने इनका पानी उतार दिया, वरना ये न जाने किस-किस का कितना अपमान करते!”
इस पर आलूराम की हालत देखने लायक थी। उन्हें लग रहा था कि इस समय सुबह-सुबह धनिया चाची की हलकी-फुलकी हँसी ने सौ डंडे मारकर उनका भुर्ता बना दिया है।
इतना तो उनके दोस्त कचालूराम ने भी उन्हें शर्मिंदा नहीं किया था, जब उन्होंने कचालूराम की बेकद्री करनी शुरू कर थी और कचालूराम उनसे टूटकर अलग हो गया था।
गोभीकुमार हँसते हुए बोले, “धनिया चाची, आज हम सभी नए साल का मजेदार उत्सव मनाने आए थे। सोचा था गप्प-गोष्ठी होगी और खूब बातें होंगी। मगर ऐसा तो कुछ नहीं हुआ। हाँ, तुम्हारी बातों से आलूराम के गाल जरूर लाल हो गए। थोड़ा थोबड़ा भी सूज गया। मगर यह भी कुछ बुरा नहीं है। लगता है, अब जल्दी ही ये धरती पर उतर आएँगे।”
महामंत्री आलूराम की ऐसी बेकद्री देख कटहलराम रह-रहकर कंधे उचका रहे थे, जैसे आलूराम की ओर इशारा करके कह रहे हों, “तुम कहो तो मैं इन सभी को एक मिनट में सीधा कर दूँ।”
मगर आज धनिया चाची की जीभ पर तो सरस्वती सवार थी। उन्होंने कटहलराम को आलूराम की ओर इशारा करते हुए देख लिया था। लिहाजा कँटीली नजरों से कटहलराम की लंबी दाढ़ी और भारी शेरवानी की ओर निशाना साधते हुए बोलीं, “अरे, कटहल दादा, अब तुमसे ज्यादा बोलते तो अच्छा नहीं लगता, तुम जरा ऊँचे खानदानी जीव हो। तुम भी कुछ वैसे ही राजदरबारी लगते हो, जिन्हें चापलूसी सबसे ज्यादा पसंद है। मगर कटहल दादा, मैं तुमसे एक बात जरूर कह दूँ कि सब्जीपुर में भले ही तुम्हारी ऊँची शान रहे, मगर लोग तुमसे कभी घुलेंगे-मिलेंगे नहीं। सब्जीपुर के ज्यादातर प्राणी तुमसे दूर-दूर रहेंगे। बस, थोड़े से लोगों की सेवा भले ही कर लो, पर जनता के नेता तुम कभी नहीं कहलाओगे।”
बात कुछ और बढ़ती, मगर इससे पहली ही बैंगन राजा ने मामले की नजाकत को समझा और बड़े नाजुक अंदाज में हँसते हुए कहा, “अरे भैया आलूराम और कटहलराम! देखो, धनिया चाची की बातों में कितना बड़ा सच है कि सब्जीपुर में हर कोई उनका मुरीद हो गया है। इस समारोह में इस वक्त सिर्फ धनिया चाची ही नजर आती हैं, कोई और नहीं। इसलिए कि उनकी आवाज जनता की आवाज है। उनके भीतर छल नहीं है, भीतर-बाहर से एक हैं, इसलिए उनकी मुसकान ऐसी मोहिनी है, जो सबको भाती है। और धनिया चाची आती हैं तो हर ओर खुशबू सी बिखर जाती है।”
“इसीलिए भई, मेरा तो यह कहना है कि…” बैंगन राजा शरारती हँसी हँसते हुए बोले, “आलू में जब मिलेगा धनिया, तो सारी दुनिया में अमीर-गरीब सभी को खुशी होगी और खुशबूदार हो जाएगी यह सारी दुनिया!”
इस पर आलूराम हँसने लगे। कटहलराम का दाढ़ीदार चेहरा भी कुछ मुलायम हो आया। गोभीकुमार के सूजे हुए चेहरे की सूजन कुछ कम हुई और नए साल के उस समारोह में हँसी-खुशी का ऐसा माहौल छा गया कि धनिया चाची और पोदीना दीदी को थोड़ा ठुमककर दो-चार नए ताजे फिल्मी गीत सुनाने पड़े। बीच में न जाने कब मिर्ची रानी भी कूदीं और फिर पूरे समारोह का माहौल ऐसा खुशगवार हुआ कि…बल्ले-बल्ले!
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
