बारिश में सब्जीपुर के हरियाले मैदान में हुआ सब्जियों का यह सालाना महा सम्मेलन तो इतनी भीड़ थी कि वहाँ तिल रखने की जगह तक नहीं बची। दूर-दूर के गाँवों की सब्जियाँ तरह-तरह के रंग-बिरंगे कपड़ों में सज-धजकर और खूब बनी-ठनी सी वहाँ आई थीं। कइयों ने तो इतना ज्यादा शृंगार-पिटार किया था कि देखने वालों को उलटा हँसी आ रही थी।
दूर-दूर तक सब्जीपुर के बाशिंदों का हँसी-मजाक और मिली-जुली बातों का शोर सुनाई दे रहा था। यहाँ तक कि कई अखबारों के विशेष संवाददाता और टीवी पत्रकार भी मौजूद थे। सब जानते थे कि सब्जीपुर का यह ऐतिहासिक महासम्मेलन है और इसे जैसे भी हो, ज्यादा से ज्यादा कवरेज देनी है।
सबको यह भी पता था कि इस बार खास कार्यक्रम होने हैं, इसलिए घरों में कोई नहीं बचा था। बच्चे हों या बूढ़े, सभी यहाँ मौजूद थे। मानो पूरा सब्जीपुर इस हरियाले मैदान में आकर समा गया हो।
और इस महासम्मेलन में सबसे अधिक आकर्षण की चीज थी, मिर्ची रानी का संगीत में निबद्ध अनोखा नाटक, जिसे पुदीना दीदी अपने खास अंदाज में पेश करना चाहती थीं।
इतने दिनों में पुदीना दीदी और उनकी संगीत पाठशाला ने बहुत बड़े-बड़े काम किए थे और इसलिए बच्चे-बच्चे की जबान पर उनका नाम था। सच तो यह है कि पुदीना दीदी की धुन देख, पूरे सब्जीपुर के लोग उन्हें प्यार करने लगे थे।
लोग नाटक देखने तो आए थे, पर नाटक से भी ज्यादा मिर्ची रानी और पुदीना दीदी का कमाल देखने आए थे।
आसपास के हर गाँव के प्रधान और खास-खास लोग मौजूद थे। किस्म-किस्म की सब्जियों का इतना बड़ा मेला उन्होंने कभी नहीं देखा था। जाने कितनी तरह के आलू, शलगम, मूलियाँ, गाजरें और यहाँ तक कि सफेद बैंगन भी थे। तोरई, टिंडे, भिंडी और कद्दू की भी तमाम किस्में।
एक कद्दू तो इतना बड़ा था कि उस महाकद्दूराज को उठाने के लिए क्रेन मँगवानी पड़ी। लोगों ने देखा तो हँसते हुए कहा, “यह कद्दू नहीं, कद्दू जी का पर्वताकार रूप है!” इस पर इतनी हँसी हुई कि सब हँसते-हँसते पागल हो गए।
कुछ मटर ऐसे छोटे और नाजुक थे कि हथेली पर टिकते ही न थे और टिके भी तो दिखते न थे। पर कुछ मटर इतने बड़े कि छोटी-मोटी गेंद समझो। ऐसे ही फूलगोभी बड़े से बड़े तो छोटे से छोटे भी, जैसे चमेली का फूल। सचमुच सब्जियों की यह अजब-गजब नुमाइश थी।
कुछ लोग तो इस सम्मेलन में लोगों का ध्यान खींचने के लिए तरह-तरह का वेश और बाना बनाकर आए थे। इनमें करमकल्ला जी तो एकदम खास थे। उनका नीला कुरता और नीली टोपी गजब ढा रही थी और वे बड़ी दूर से अपनी उजली मुसकान बिखेरते हुए नजर आ जाते थे।
लौकीदेवी और पालक रानी तो अपने उसी परिचित रूप में थीं, मगर धनिया चाची का जलवा कुछ अलग था। वैसे तो वे अब भी अपने गर्व और अभिमान के घेरे से निकल नहीं पाई थीं, पर थोड़ा सा फर्क उनके व्यवहार में दिखाई पड़ा था।
इस बार वे सम्मेलन में पूरी तरह मदद कर रही थीं पुदीना दीदी की। देखकर सब्जीपुर के लोग कह रहे थे, “धनिया चाची हैं तो होशियार और सयानी भी हैं, पर उनमें घमंड थोड़ा कम होता, तो ज्यादा अच्छा था।”
पुदीना दीदी सरल थीं और हर किसी से प्यार और विनम्रता से बोलती थीं। इसलिए पूरा सब्जीपुर उन्हें प्यार करने लगा था। इसी बात ने आखिर धनिया चाची की अकड़ कुछ ढीली कर दी।
सब्जीपुर की राजधानी में इतना बड़ा सम्मेलन पहली बार हो रहा था। इसलिए बैंगन राजा और आलू जी ने भी अपनी ओर से पूरी तैयारी की थी।
ठीक समय पर कार्यक्रम शुरू हो गया। हरी पगड़ी बाँधे बैंगन राजा ने मुसकराते हुए फीता काटकर और इक्कीस रंग-बिरंगे गुब्बारे आसमान में छोड़कर उद्घाटन किया।
महामंत्री आलूराम ने मंच पर आकर सबका भावभीना स्वागत किया। फिर बड़ी विनम्रता से झुककर कहा, “आप सबकी मेहनत से ही सब्जीपुर इतना हरा-भरा है और रात-दिन फल-फूल रहा है। मैं सब्जीपुर की मेहनती प्रजा का अभिनंदन करता हूँ, जिसने आज चारों ओर इतनी खुशियाँ बिखरा दीं।”
फिर स्वागत-गान हुआ, जिसमें विशेष मेहमान करमकल्लाराम और अध्यक्ष पालक रानी का गुणगान किया गया, जिनके कारण सब्जीपुर में संगीत और खुशियाँ बिखर गईं और वह हर तरह से फल-फूल रहा है।
इसके बाद बड़ा मधुर सामूहिक गान हुआ, जिसने सबका मन मोह लिया। उस गीत के बोल थे—
हम सब्जियाँ हैं, सब्जियाँ हैं सब्जियाँ।
हरियाली की फिरकियाँ, हम फिरकियाँ, जी फिरकियाँ।
बदले हुए जहान की हम खिड़कियाँ,
हम खिड़कियाँ, हम खिड़कियाँ।
देखो मियाँ, देखो मियाँ, देखो मियाँ,
खुलकर हमें देखो जरा, देखो मियाँ,
देना न गलती से कभी भी झिड़कियाँ,
हम सब्जियाँ हैं, सब्जियाँ हैं सब्जियाँ…!
इसके बाद धनिया चाची ने मंच पर आकर घोषणा की, साहेबान, अब आप यह खासमखास नाटक देखिए, जिसे लिखा है मिर्ची रानी ने और संगीत-रचना पुदीना दीदी की। एक वाक्य में कहूँ तो दोनों ने ही इसमें जान छिड़क दी है। इसलिए यह ऐसा नाटक है, जिसे आप आज देखेंगे तो सालोंसाल याद करेंगे। और बस करते ही रहेंगे।
इसके बाद नाटक शुरू हुआ, तो मंच पर इस गीत के बोल गूँज उठे। गीत क्या था, पुदीना दीदी ने पूरे सब्जीपुर की आत्मा को इसमें उँड़ेल दिया था—
सुनो-सुनो हम तुम्हें सुनाते किस्सा सब्जीपुर का
किस्सा सब्जीपुर का भाई, किस्सा सब्जीपुर का।
इस सब्जीपुर के राजा हैं बैंगन प्यारे-प्यारे,
और महामंत्री आलू हैं सब आँखों के तारे।
दोनों मिलकर करते हैं जी भले-भले से काम,
सब्जीपुर का इसीलिए है दूर-दूर तक नाम।
अगले पद में सब्जीपुर के उस कुहराम का जिक्र था, जिसने हर ओर हड़कंप मचा दिया—
लेकिन हवा चली फिर उलटी, मचा खूब कुहराम,
मचा खूब कुहराम, सुनो जी मचा खूब कुहराम।
हवा चली कुछ ऐसी भाई, बढ़ा यही कुहराम,
जहाँ प्यार था होता था अब लातों से सब काम।
लातों से सब काम रे भैया, लातों से सब काम,
कहते सब, ये हुआ अरे क्यों, यह तो उलटा काम?
हाय-हाय यह हुआ है कैसा इकदम उलटा काम,
रूठ गया है हाय विधाता, बिगड़ गए सब काम…!
आलू को भड़काया सबने, भड़के आलूराम,
बोले, बैंगन का कर दूँगा मैं तो काम तमाम।
मैं तो काम तमाम रे भैया, मैं तो काम तमाम…!
उसके बाद बैंगन राजा और आलू के इतने दिलचस्प संवाद हुए कि जनता हँसते-हँसते पागल हो गई। और फिर आलू से नाराज जनता ने उसे खूब बुरा-भला कहा—
यह आलू बड़ा है चालू जी,
हम तो कहते थे आलू जी,
पर निकला एकदम चालू जी।
इतने में करौंदाकुमार जी बाहर निकलकर आए और फिर एकदम फिरकी की तरह चकरी-नाच नाचते हुए आलू को चिढ़ा-चिढ़ाकर गाने लगे—
यह आलू ससुरा गोल-गोल।
इसके अंदर है पोल-पोल…
इसके भीतर है बड़ी झोल,
कंधे पर इसके ढोल-ढोल।
बजा रहा है ढोल-ढोल…
यह आलू एकदम गोल-गोल
यह किस्सा पूरा गोलमोल,
कुछ समझे भैया चालू जी?
फिर जनता में भी खूब प्रतिक्रियाएँ हुईं। एक ने कहा, “जिसने किया धोखा, वह चैन न पाएगा।”
दूसरे ने कहा, “अपने ही दुख की आग में वह झुलस जाएगा।”
तीसरे ने कहा, “पछताएगा वो, दूसरों को जो सताएगा।”
अंत में आलू आया गरदन झुकाए हुए। उसने सच्चे मन से पश्चात्ताप करते हुए कहा—
अब गलती मैंने मानी है,
मैंने यह सचमुच मानी है…
माफ करो जी माफ करो,
अब मुझको माफ करो।
हेल-मेल का रस्ता भाई
जल्दी साफ करो।
मुझको प्राणों से प्यारी है
सब्जीपुर की जनता,
आज उसी के चरणों में मैं
यह विनती करता।
फिर धीरे-धीरे राजसी शान से चलते हुए बैंगन राजा आए तो सबने मिलकर उनकी वंदना की—
सबसे प्यारे अपने राजा, बैंगन राजा,
जग से न्यारे अपने राजा, बैंगन राजा।
जनता के हैं प्यारे राजा, बैंगन राजा!
सब पर प्यार लुटाते आए, बैंगन राजा,
सबका मन महकाते आए, बैंगन राजा,
हँस-हँस प्यार लुटाते आए, बैंगन राजा।
इसके बाद खूब ढोल-ढमक्के के साथ बैंगन राजा का स्वागत हुआ और फिर थोड़ी देर नाश्ते-पानी के लिए सम्मेलन स्थगित कर दिया गया।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
