Hindi Kahani:मॉनसून में पत्नी से चाय-पकौड़े मांगने का साहस उन्हें ही करना चाहिए, जो विलायतीयराम जी जैसे वायदे नहीं करते। जानिए, क्या था वह वायदा-
गर्मी के जाते-जाते और मॉनसून के आते-आते तन-बदन में जैसे चिपचिपी आग-सी लग जाती है, मगर हमारे विलायतीराम ठहरे लेखक मिज़ाज, रोमानी से। उड़ते बादलों के साथ उनके ज़ेहन में भी रोमांस की घटाएं छाने लगती हैं, मगर क्या करें कि इस मौसम की नमी विलायतीराम जी के हिस्से चली गई और गर्मी मिसेज़ रामप्यारी के दिमाग पर चढ़ गई।
Also read: किराए की कोख-गृहलक्ष्मी की कहानियां
पांडेय जी के प्यार के जवाब में उनकी चेतावनी तुरंत पति-हित में जारी हो जाती है, ‘देखो जी, चिपटो-विपटो मत। कहे देती हूं। मायके चली जाऊंगी तो बनाते रहना अपने पकौड़े! उनकी इस धमकी ने पेटपूजा के परम-पुजारी विलायतीराम पर मारक असर किया और तत्काल प्रभाव से उन्हें पत्नी जी की दिखती नाराज़गी का छिपता कारण समझ आ गया कि ऐसे मौसम में कहीं घुमाने ले जाने का उनका वायदा उतना ही झूठा साबित हुआ, जितना हमारे देश के नेताओं का चुनावी अवतार होता है।
बात भी सही थी। कितने समय से बोल रखा था पत्नी जी ने कि जानू पहाड़ पर ले जाओ। देखो न राधेलाल भी ले गया है अपनी मिसेज़ को। एक तुम हो, जब देखो अपनी कविता-शविता में लगे रहते हो। इससे पैसा-वैसा तो कुछ आता भी नहीं, अपने पल्ले से और खर्च कर आते हो। कुछ हासिल नहीं होगा। समय की बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं इसमें।
बात में दम था, आखिर कविताई से मिलती तालियों की गड़गड़ाहट मॉनसूनी गड़गड़ाहट में पकौड़ी की जुगलबंदी तो करा नहीं सकती। घर में इतनी जगह भी नहीं थी कि मोमेंटो का ढेर सजा कर रखा जा सके। पत्नी इन सबसे वैसे ही तंग आ चुकी थी और ऊपर से दे ताना, ‘बना रही हो चाय या मायके चली गई। वैसे यह प्यार का ताना था। अक्सर पांडेय जी प्यार इसी टाइप का किया करते थे, पर ‘मैं मायके चली जाऊंगी की ये धमकी वाकई ज़ोरदार थी।कहने लगे, ‘मेरे दोस्त का फॉर्महाउस है, रामगढ़ में। इस बार तुम को वहीं ले चलता हूं। साथ-साथ कुछ दिन भी बिता लेंगे और हां भाग्यवान कुछ खाने की $फर्माइश भी नहीं करूंगा। प्रॉमिस!
‘बोलिए न, क्या खाने का जी चाह रहा है! इतने-भर से देवीजी खुश। खुशी में सबको सूचना भी दे डाली। फेसबुक पर पोस्ट भी अपलोड। ‘मैं चली अपने पिया के संग पहाड़ों पर।
जैसे-तैसे उधार कर पांडेय जी ने कार बुक की और चल पड़े रामगढ़। पहाड़ों के सौंदर्य को देखते हुए दोनों के भीतर का प्रेम उबाल मारने लगा। आखिर एक पहाड़ ही हैं, जो अतृप्त कामनाओं को पूर्ण करने का माद्दा रखते हैं। बारिश वहां पहुंचते ही शुरू। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा तो लगा कि किसी पुरानी िफल्म का सीन $फ्लैश बैक में चला गया हो। हाथों में हाथ सुरमई-मस्त शाम और ऊपर से मॉनसून का मज़ा।
ये पल ऐसे होते हैं, जैसे जीएसटी आपके जीवन से लगभग उतना ही दूर हो, जैसे पड़ोसी के घर में बज रही कुकर की सीटी। इतने वर्षों बाद मिसेज़ रामप्यारी के चेहरे पर छाई इस खुशी ने वाकई उन्हें जीत लिया था। मानो आज पांडेय जी ने एक अच्छे पति की भूमिका निभाई हो।
इसका कुछ-कुछ आभास पांडेय जी को भी लग रहा था। फिर भी उन्होंने रामप्यारी से पूछ ही लिया, ‘बताओ न, बेस्ट हसबैंड अवॉर्ड के लिए कितने नंबर दे रही हो दस में से?
रामप्यारी ने किसी नवयौवना-सी मुस्कान के साथ अपनी अस्सी किलो की काया को बलखाते हुए कहा, ‘भौंदू पिया, पहाड़ पर आकर भी नंबर मांगते हों। कुछ और मांगो न!
विलायतीराम पांडेय का नाम ही फॉरेन रिटर्न की-सी सौंधी महक देता है। ज़ेहन तो ठहरा सीधा-सादा देसी। अब इधर जैसे ही इस रोमांस की हरी झंडी उन्हें दिखी, पहली प्रतिक्रिया दी नाक ने, ज़ोरदार छींक के साथ। एक…दो…तीन… फिर तीन छींकों ने बिल्ली के भाग्य से टूटते छींके को पहले ही लपक लिया और बांहें फैलने की बजाय रूमाल तक सिकुड़कर रह गई, मगर वह दिल ही क्या जो अपनी मुहब्बत के रास्ते में किसी को आने दे। दोनों का प्रेम फूट-फूट कर व्यक्त होने लगा। जीवन के चंद पहलुओं को जीने का सुख वाकई निराला है, जो इस समय पांडेय जी रामगढ़ में ले रहे हैं, फॉर्महाउस में लगे सेब, आड़ू और बाबुगोशे के संग।
