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Hindi Story: istaqbal
Istaqbal

Hindi Story: सभी लोग चले गए, मैं चिता और अपने जीवन के अंत को देखने के लिए वहीं रुक गई। फिर अचानक भयंकर तूफान से न जाने कब चिता में से एक बड़ी लकड़ी का टुकड़ा उछल कर मुझ पर आ गिरा और उसने मुझे भी जला दिया। अमित का दिया हुआ आखिरी जख्म समझकर मैंने टुकड़ा झट से दूर फेंक दिया। यह उन शोहरतों का टुकड़ा था जिसे पाने के लिए अमित ने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी थी। अचानक मैंने देखा, यह वही शील्ड का टुकड़ा था, जो अमित ने मौत से तीन दिन पहले ही कॉन्फ्रेंस में डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजे जाने पर हासिल किया था। अमित की, देखते ही बन रही थी। उसने न जाने कितने वर्षों बाद मेरा हाथ पकड़ कर कहा था कि रेखा, डॉक्टरेट की उपाधि अब मुझे मिलने जा रही है, यही मेरा लक्ष्य था।
पूरी जिंदगी बस उसी शौहरत के पीछे भागता था न जाने मेरे कितने अरमानों का गला घुटता चला गया। अमित की मंजिल मैं नहीं बल्कि कुछ और ही थी। वो नजर मैं फिर कभी महसूस ना कर सकी, जो अमित से पहली बार मुझे मिलते समय महसूस हुई। अमित की और मेरी मुलाकात मेरे कॉलेज में हुई थी। वह कॉलेज में अपनी फ्रेंड के साथ एनुअल फंक्शन में आया था। मेरा स्टेज पर कत्थक डांस परफॉर्मंेस था। फंक्शन के बाद वह मेरे पास आया और बोला कि मैंने अभी-अभी आईएस क्लियर किया है और अपॉइंटमेंट होना बाकी है। आपका नृत्य देखकर मैं आपसे मिले बिना नहीं रह सका। मैंने अभिवादन कर दिया वह मुझे देखता रहा और कह गया आप मेरे दिल में बस गई हैं। फिर से मिलने का वादा कर अमित चला गया। मैं प्रपोजल्स से स्तब्ध रह गई थी।
करीब तीन महीने बाद अमित मुझसे फिर मिलने आया। फिर उसने मुझसे मेरा नाम पता पूछा और कहा कि वह अपनी पोस्टिंग लेने चेन्नई गया था इसलिए देर हो गई। मेरी चुप्पी में सहमति मान बैठा और अगले दिन मिलने के वादे के साथ चला गया। अगले दिन मैं भी मिलने गई पता नहीं कितनी जल्दी में यह सब हो गया था।
पढ़ाकू किस्म का होने की वजह से वह रोमांस में थोड़ा कंजूस निकला। अमित बस यही कह पाया कि तुम्हारे बिना मैं नहीं रह पाऊंगा। हमारा मिलन शायद रब ने बना रखा था। मेरी भी ग्रेजुएशन कंप्लीट हो गई। अमित ने मेरे पिता के पास जाकर प्रपोजल रखा। एक बाप घर आए आईएएस ऑफिसर के प्रस्ताव को कैसे मना कर सकता था। उन्होंने तुरंत मुझसे बिना पूछे ही हां भर दी। ससुराल में मैं ज्यादा नहीं रह पाई।
मैं, अमित के साथ चेन्नई चली गई। अलीशान बंगला नौकर-चाकर सब कुछ बहुत ही सुंदर था। वह अपने कार्य में व्यस्त रहते। मैं बहुत अकेलापन महसूस करने लगी। मैंने समय को काटने के लिए एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। अमित की व्यस्तता को देखकर मैं उससे कभी कुछ कह नहीं पाई क्योंकि वह बहुत महत्वकांक्षी इंसान था। मुझे प्यार वह बेहद करते थे, लेकिन वो एक स्त्री मन नहीं समझ पाए। शादी के तीसरे वर्ष मैंने एक बेटी को जन्म दिया। उससे भी मिले अमित को कई महीने हो जाते।
शायद वह भी मुझे ही मां-बाप दोनों समझने लगी। सौम्या कब बड़ी हो गई और कब स्कूल जाने लगी पता ही ना चला। मैं भी उसके स्कूल जाने के बाद अकेलापन महसूस करने लगी। घर में नौकर-चाकर सौम्या के लालन-पालन में कोई भी कमी नहीं रखते थे तो मैंने भी वापस से स्कूल को ज्वाइन कर लिया।
अमित अपनी उपलब्धि का कोई भी प्रतीक ट्रॉफी सबसे पहले मुझे ही लाकर देते और मैं उन्हें  शेल्फ में सजा देती थी। एक दिन पुरानी एल्बम हाथ लग गई वही तस्वीर, जो मेरी और अमित की पहली मुलाकात की थी। उस दिन के बाद आज तक अमित ने मेरा डांस देखने की तमन्ना नहीं की।
आज दिल ने फिर से एक आवाज लगाई, मैंने एक गाना लगाया और पैर वहीं थिरकने लगे। अब मैं रोजाना सौम्या के स्कूल जाने के बाद डांस की प्रैक्टिस करने लगी। एक दिन डांस एकेडमी में स्टेज परफॉर्मंेस के लिए अप्लाई कर दिया। मेरे प्रोग्राम की डेट फिक्स हो गई। यह बात मैंने अमित से शेयर की, तो उन्होंने कहा, मुझे कोई आपत्ति नहीं।
‘जुनून-ए-शोहरतÓ बस मेरे दिल पर सवार हो गया। शोहरत के पीछे मैं भी भागने लगी। मुझे भी लोगों की भीड़ भाने लगी। मेरे फोटो न्यूज पेपर में छपने लगे और एक पहचान बनती चली गई। सौम्या स्कूल से कब आती-जाती, इसका पता मुझको नहीं रहता था। उसे आया ही पालती थी। मैं भी अब धीरे-धीरे उससे दूर होती जा रही थी।
एक दिन अचानक आया ने कहा, मुंह मीठा करो। सौम्या के टेंथ के बोर्ड में 75 परसेंट मार्क्स आए हैं। मैंने सौम्या को बुलाया तो आया बोली मैम साहब! वो तो रात से ही दोस्तों के पास है। उन्होंने वहीं रहकर जश्न मनाने का सोचा। मैंने कहा, तुमने जाने क्यों दिया? वो बोली मैम साहब आप सब भी तो बाहर रहते हैं वह एक दिन बाहर रह लेगी तो क्या हो जाएगा? उस दिन मैं सो नहीं पा रही थी मुझे झटका लगा और मैं सौम्या का इंतजार करती रही लेकिन रात तक वह नहीं आई। मैंने आया से पूछा कि वह क्या पहली बार बाहर गई है? नहीं-नहीं मैम साहब दो-तीन बार गई है और अगले दिन आई है।
आज तक क्या मैंने पूछा कि वो कहां जाती है? कहां रहती है! कितने दिन बाद आती है? इतने सवाल आज ही क्यों मेरे मन में आए? आज तक मैं कहां थी? मैं तो उसकी मां थी न, फिर भी मैंने उससे ये सब पूछने का अधिकार क्यों खो दिया? मैंने उसके दोस्त के घर फोन किया। दोस्त ने कहा वह सो रही है शाम को घर आएगी।
मेरे कमरे में सन्नाटा और मेरे नृत्य की तस्वीरें और मैं, ही थे बस। जिन बच्चों के लिए माता-पिता अपनी सारी खुशी छोड़ देते हैं, हमने अपनी खुशी के लिए सौम्या को अकेला…।
हमने अपना मन बाहर लगाया, तो सौम्या ने भी तो वही किया। हमने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए बाहर की राह ली थी। वह तो बच्चा था। वह भी अपना अकेलापन दोस्तों के साथ दूर कर रही है तो क्या गलत कर रही है? मैं सौम्या के कमरे में गई, आज जाने कितने साल बाद। मुझे देख कर सौम्या ने अनदेखा कर दिया। कोई भाव नहीं थे उसके चेहरे पर, बिलकुल अमित की तरह। मुबारक हो बेटा। उसके थैंक्स का मैं इंतजार कर रही थी। लेकिन वो अजनबी की तरह लेटी रही। फिर बोली इतनी खुशी की कोई बात नहीं।
लेकिन सौम्या ने एक बार भी मम्मा कहकर लिपटने की कोशिश नहीं की। मुझे उस पर क्रोध की जगह प्यार आ रहा था। मैं इस बार इतना खालीपन महसूस कर रही थी, जितना शायद अमित से दूर रहने पर भी महसूस नहीं किया था। मैंने ‘गॉड ब्लेस यू बेटाÓ कहकर गुड नाईट के साथ अपने कमरे में आ गई।
आज मुझे अमित की बहुत याद आ रही थी। आज मैं नहीं मेरे कमरे की हर एक चीज मुझे चिढ़ा रही थी कि औरो को खुश करने वाली अपने बच्चों और पति को खुश नहीं रख सकी। मुझे अमित की चिंता नहीं थी क्योंकि मैंने अमित को नहीं खोया था। अमित ने मुझे खोया था, जैसे आज मैंने सौम्या को। आज मुझे, अमित में और मुझमे बिलकुल फर्क नहीं लग रहा था। अमित ने बेटी को बाप के नाम के अलावा अच्छा स्कूल, शानो-शौकत विरासत में दी थी। और मैंने? मैं तो उसकी मां भी न बन सकी। क्या जो अमित ने मेरे साथ किया, उसका बदला था वह जो मैंने सौम्या से लिया?
मैं, अमित के फोन का इंतजार कर रही थी। तभी फोन की घंटी बजी, मैं लपक कर फोन की तरफ भागी, शायद अमित का हो लेकिन प्रोड्यूसर का था। परफॉर्मंेस की डेट डिसाइड करने के लिए कह रहा था।
रात के 1:00 बजे तक मैं अमित के फोन का इंतजार करती रही। सोच कर बैठी थी कि आज मैं वह सब कुछ बता दूंगी कि हम क्या खो चुके हैं? आज होने वाली नई सुबह का इस्तकबाल मैं अपने टूटे संसार को जोड़कर करना चाहती थी। घड़ी में सुबह के 4:00 बज रहे थे, तभी फोन की घंटी बजी और मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, आज अमित ने याद रखा। अकसर वो कॉल बैक करना भूल ही जाते थे।
लेकिन हमेशा की तरह फोन पर अमित नहीं उनका पीए ही बोला कि साहब देर से आए। मुझे आपको बताने के लिए कह कर सोने चले गए। मैंने कहा कि साहब जब उठे तो मेरी बात करवा देना। तभी अचानक फिर से फोन की घंटी ने मुझे जगा दिया। अमित का फोन था। मैंने फोन उठा कर अनवरत बोलना जारी कर दिया।
अमित इतना क्यों काम करते हो कि मुझे भी फोन पर बात करने के लिए पीए से अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है। मैं बहुत अकेला महसूस कर रही हूं। अमित आ जाओ, हमारे पास क्या कमी है? क्यों ना हम फिर से साधारण सी जिंदगी शुरू करें और अपनी बेटी के साथ खुशहाल जिंदगी जिएं। अमित तुम भी तो कुछ बोलो? और उधर से कोई आवाज नहीं आ रही थी। फिर एक आवाज ने मुझे रोक दिया। मैं बोल रहा हूं मेमसाहब। मैम वो आई सी यू में है। उन्हें कार्डियेक अटैक आया है। मेरे हाथ से फोन एकदम से गिर गया।
ये क्या हुआ, जब मेरी आंख खुली तो ये अंधकार क्यों? ईश्वर इससे बड़ी सजा क्या दे सकते थे मेरी गलतियों की। जब भी मैं खुशी का इस्तकबाल करने की कोशिश करती हूं, एक नई पहेली मेरी जिंदगी में आ जाती है, जिसे सुलझाने में कई चीजों को दांव पर लगा देती हूं। मैं कपड़े डालकर बेंगलुरु जाने की तैयारी में लग गई। सौम्या बोली, ‘मम्मा आज आप कहां जा रही हैं, इतनी सुबह-सुबह?Ó तो मैंने कहा बेटा आज तेरे पापा को घर वापस लेने जा रही हूं। तभी फोन फिर से बजा, फोन उठाते ही पीए ने कहा मैम ‘ही इज नो मोर।Ó
हम ही दिल्ली आ रहे हैं साहब को लेकर। मैं एकदम बुत बनकर खड़ी थी। सौम्या समझ नहीं पाई। मुझे बाहों में भर कर बोली मम्मा क्या हुआ पापा नहीं आ रहे हैं। मैंने कहा आज सब कुछ छोड़ कर तेरे पापा घर आ रहे हैं उनका इस्तकबाल करना है। चल एयरपोर्ट चलें।
सौम्या बोली आज तक हम पापा को लेने नहीं गए, आज क्यों जा रहे हैं? मैंने कहा बेटे आज उन्हें हमारे कंधे की जरूरत है, वह अब अकेले नहीं आ पाएंगे। वह बोली मां, पापा इतना काम क्यों करते हैं? मैंने कहा, बेटा अब वो काम नहीं करेंगे। अब वह सारा काम छोड़ कर आ रहे हैं। एक आंसू मेरी आंख से नहीं निकला। सौम्या समझ गई थी, उसने मुझे पहली बार आलिंगन में लिया और फूटकर रोने लगी।
आज बहुत देर हो गई थी, हमें अपनी जिंदगी की नई सुबह का इस्तकबाल करने में। पर मैंने अब पूरी तरह जिंदगी को जीने का मन बना लिया था। जो बचे हैं उनके लिए। जिसे अभी अपनी जिंदगी शुरू करनी है उसके लिए। मैं एयरपोर्ट पहुंच चुकी थी। अमित की बॉडी दिल्ली आ चुकी थी। सारी औपचारिकताएं पूर्ण करके मैं अमित को लेकर, कभी ना वापस जाने के लिए, घर ले कर आ गई। अमित की बॉडी को संस्कार के लिए ले जाने की तैयारी थी। अमित भी शांत थे। कुछ नहीं कहा उसने मुझसे। इस बात का ही तो अफसोस रहा कि कुछ तो कहता बस सफर-सफर… और यह अंतिम सफर। तभी अमित का पीए आया एक शील्ड और सर्टिफिकेट लेकर। बोला साहब का अंतिम सपना, कल डॉक्ट्रेट की उपाधि मिली थी। आप रखिए। जैसे ही उसने मुझे थमाई, सामूहिक आवाज गूंजी, ‘राम नाम सत्य है।Ó
शायद यही जीवन की सच्चाई है। शोहरत हम हमारे साथ ही ले जाते हैं कोई याद नहीं रखता उस अवॉर्ड, शोहरत को लेकिन प्यार यदि दे जाए तो मरने के बाद भी अपनों के दिलों में बसे रहते हैं। सौम्या के आंसू अब नहीं निकल रहे थे। जैसे वो एकदम से बड़ी हो गई हो। तभी पीछे से गाड़ी आई जिसमें सौम्या का दोस्त था जिसे सौम्या ने हाथ से गाड़ी साइड लगाने को कहा। फिर सौम्या ने गाड़ी की डिक्की खोली और उसमें से दो ब्रीफकेस निकाले और चिता की तरफ चल दी मैं सकपका गई कि बेटी क्या करने जा रही है। मैं भागी, सौम्या ने चिता पर लगी लकड़ियों में वह सारी ट्रॉफियां, अवॉर्ड्स, सर्टिफिकेट्स, न्यूजपेपर जो अमित ने आज तक पानी के लिए जिंदगी दांव पर लगा दी थी, अग्नि को सुपुर्द कर दी। सौम्या चीख कर रोते हुए बोली नहीं चाहिए थी मुझे ये सब। मुझे केवल मेरे पापा चाहिए थे, केवल पापा-पापा…।
कब रात बीत गई मुझे पता ही नहीं चला। आज नई सुबह का इस्तकबाल हो रहा था, मैंने कई साल से उगता सूरज नहीं देखा था। मेरी जिंदगी की आज नई सुबह हो रही थी। मैं घर पहुंची, मेरे बिस्तर पर सौम्या सोती हुई नजर आई। मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा। अमित के खोने के गम के साथ सौम्या को पाने की खुशी को मैं क्या नाम देती समझ ही नहीं पा रही थी। मेरी बेटी का आज मेरे दिल और मेरे घर में इस्तकबाल हुआ था।

मेरी जिंदगी की आज नई सुबह हो रही थी। मैं घर पहुंची, मेरे बिस्तर पर सौम्या सोती हुई नजर आई। मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा। अमित के खोने के गम के साथ सौम्या को पाने की खुशी को मैं क्या नाम देती समझ ही नहीं पा रही थी।

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