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उधार की जिंदगी—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Udhar Ki Zindagi- Grehlakshmi ki Kahaniyan

उधार की जिंदगी जीने वाले राम प्रसाद जिंदगी और मौत से संघर्ष करते हुए अंततः मौत से ही हार गए। जीवन भर दूसरों से रिश्वत लेने वाले राम प्रसाद खाली हाथ इस संसार से विदा हो गए। उनकी लाश घर के आंगन में पड़ी हुई थी। दोनों बेटे अमित और अनिल उनके अंतिम संस्कार करने के बजाय कागजात और जेवर ढूंंढ़ने में लगे थे।

जीवन के अंतिम क्षणों में भी पानी – पानी करते एक हिचकी के साथ उनके प्राण – पखेरू उड़ गए। वे अभी मरना कहां चाहते थे, इसलिए तो डॉक्टर की महंगी से महंगी दवाइयां खाने के साथ भागवत गीता और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करवा रहे थे। लेकिन दवा के साथ दुआ भी काम न आई।

जीवन भर दूसरों से लेने की चाह रखने वाले रामप्रसाद ने काफी सारी संपत्ति अर्जित कर रखी थी। अपने सामने हर किसी को तुच्छ समझने वाले राम प्रसाद की लाश यूं ही बिना कफन के घर के आंगन में पड़ी थी और राम प्रसाद की आत्मा अपने “शरीर के आसपास मंडरा रही थी। लाश के पास मक्खियां भिन-भिना रही थी। लाश पर कफन डालना, तो दूर कोई उस पर चादर डालने वाला भी नहीं था। लाश के पास अगरबत्ती जलाने की भी किसी ने जहमत नहींं उठायी।

अपनी लाश की इस प्रकार दुगर्ति होते देख उनकी आत्मा को बहुत दुख हो रहा था। उन्होंने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी की मरने के बाद उनके नश्वर शरीर की यह फजीहत होगी।

उनकी आत्मा आगे बढ़ी। वे देखते हैं कि घर में रोने-धोने का कम्पटीशन चालू है। दोनों बहूएं आंसुओं के समंदर में गोता लगा रही थी। दोनों एक-दूसरे से आगे बढ़कर अपनी संवेदना प्रदर्शित करने की होड़ में शामिल हो चुकी थी। तभी उनका ध्यान अपने बेटों की ओर गया, जिसके लिए ही उन्होंने अपने ईमान को बेच डाला था। बिना रिश्वत लिए कोई काम नहीं करते थे। उनका उसूल था चाहे सौ रुपये दो लेकिन दो। बिना रुपये लिए कोई फाइल को नजर उठाकर देखते भी नहीं थे।

उसी संपत्ति की खोज में उनके बेटे अलमारियों का कोना – कोना छान मार रहे थे। हर एक कागज को वे बड़े ध्यान से देख रहे थे। इन कठिन परिस्थितियों में भी उनके बेटे अंतिम संस्कार की चिंता छोड़ भाई प्रेम का राग अलाप रहे थे। वे ध्यान मग्न होकर उनकी ओर देखने लगे। तभी अनिल बोल पड़ा – ” भैया ! पिता जी को जाना था सो चले गए। अब हम लोगों को आपस में मिल-जुलकर उनकी सारी जमा पूंजी की खोज करनी है। एफ.डी., पॉलिसी और न जाने क्या – क्या किया होगा? “

अमित मुस्कुराते हुए बोला – ” तुम ठीक कहते हो, भाई ! आखिर इतनी सारी संपत्ति तो हमारे लिए ही तो अर्जित की। लेकिन न तो कोई पॉलिसी का कागज मिल रहा है और न रुपये का। सोने व जवाहरात का तो कोई अता-पता ही नहीं। न जाने कहां इन चीजों को छुपा दिया है।“

अलमारी का कोना-कोना छान मार चुका अनिल बोला – ”भैया! कमाया तो हमारे लिए ही न ! कम से कम मरते समय तो यह बता देते कि हमारे खजाने को किस तिजोरी में छुपा रखा है। इस अलमारी में तो कुछ है ही नहीं। चलिए भैया, उस दूसरी अलमारी में देखते हैं।”

तभी अमित बोला – ”अनिल ! जरा आंगन में जाकर देखो तो लाश पर किसी ने चादर डाली है कि नहीं। हां, अंतिम संस्कार के लिए कफन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी के लिए कोई गया भी कि नहीं। मोबाइल से जरा मीडिया वालों को कह दो। आखिर वे अपने जमाने के एक उच्च पद पर रहने वाले अधिकारी रह चुके हैं। इस बात की जानकारी मीडिया के माध्यम से लोगों को मिलनी ही चाहिए।”

अनिल अमित की मीठी-मीठी बातों के झांसे में कहां आने वाला था? वह  भी तो शातिर खिलाड़ी था। वह मन ही मन सोचने लगा कि मैं उधर गया और इधर कोई कागज या जेवर मिला गया तो भैया इस मौका का फायदा उठा लेंगे। वह मुस्कुराते हुए बोला- ”भैया ! इन कामों के लिए तो सारा दिन बचा है। पहले खजाने की खोज कर लेते हैं, फिर बाकी कामों को देखेंगे।”

यह सोचते हुए वे दोनों खजाने की खोज में लग गये। उन्हेंं यह एहसास भी नहीं हो रहा था कि उसके पिता की मृत्यु हो गयी। इस मुसीबत की घड़ी में शोक मनाने की अपेक्षा वे कागज और जेवरों की खोज लगे थे।

यह सब देखकर राम प्रसाद की आत्मा को बड़ा कष्ट हो रहा था। उन्हें अब एहसास हो रहा था कि जिन नालायकों के लिए अपने ईमान को बेच डाला। गरीब व्यक्ति से भी रिश्वत ली, किसी पर रहम नहीं किया। जीवन भर गरीबों की हाय ही लेते रहे। गरीबों के खून चूस-चूस कर इतनी सारी संपत्ति बनाई। आज उसी राम प्रसाद की लाश को एक कफन तो दूर, कोई उस पर एक चादर डालने वाला भी नहीं था। आज उनके नश्वर शरीर की दुगर्ति हो रही थी। आज उन्हें अपने किए पापों का पश्चाताप हो रहा था।

राम प्रसाद की आत्मा उस कमरे से बाहर निकल अपनी बहुओं की ओर हवा में मंडराने  लगी। हेली और डौली दोनों रोने के कम्पटीशन में होड़ लगा रखी थी। वे हर किसी के सामने यह प्रदर्शित करना चाहती थी कि उन्हें अपने ससुर के परलोक सिधारने का अपार दुख है। वे घड़ियाली आंसू बहाये जा रही थी।

बड़ी बहू हेली मन ही मन सोच रही थी कि बूढ़े की दिन-रात सेवा मैंने की और हिस्सा लेने के लिए डौली पटना से दौड़ी चली आयी। आखिर बुड्ढे की सेवा करने का फल तो मुझे ज्यादा मिलना ही चाहिए। बाबू जी का तो मुझसे ही विशेष लगाव रहा है। वे मेरी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। क्या मेरी सेवा निरर्थक हो जाएगी ? बराबर का हिस्सा लेने के लिए डौली भी आ पहुंची।

इधर डौली के मन में भी संदेह के अंकुर उपजने लगे थे। वह मन ही मन सोच रही थी – ”कहीं पिता जी ने सारी संपत्ति अपनी बड़ी बहू हेली के नाम तो नहीं कर दी है। है भी तो यह हेली बहुत चतुर। कहीं पिता जी के मरते समय सादे कागज पर हस्ताक्षर तो नहीं करवा लिया। अगर ऐसी बात हुई तो मैं भी गड़े मुर्दे उखाड़ने में माहिर हूं। एक-एक चीज का हिसाब लूंगी। यूं ही थोड़े छोड़ दूंगी। मेरा भी तो बराबर का अधिकार बनता है। मैं अपना पूरा हिस्सा लेकर रहूंगी।”

यह सब देखकर राम प्रसाद की आत्मा कचोटने लगी। उन्हें लगा कि जिन लोगों के जीवन सुखी बनाने के लिए गलत रास्ते को अपनाया। लोगों की नजरों में वे भले ही घमंडी और स्वाभिमानी था। लेकिन असल में तो वे एक नंबर के घूसखोर थे। वे अपने सामने किसी को मान -सम्मान नहीं देते थे। अपने से छोटे लोगों को घृणा की दृष्टि से देखा करते थे। जिनके लिए यह सब किया, वे उनसे नहीं उनकी दौलत से प्यार करते थे।
 
अब उन्हें एहसास होने लगा कि वे सारी जिंदगी तो उधार की जिंदगी जीते रहे। बेईमानी की अर्जित संपत्ति से महानगरों में कई फ्लैटों को खरीदा, सोना, चांदी, हीरा-जवाहरात और न जाने कितने रूपये निवेश किया। उनका अपना क्या था? वे तो उधार की जिंदगी जी रहे थे। उनके शरीर में दौड़ता खून भी उनका अपना नहीं था। वो भी तो किसी से जबरदस्ती लिया था। उनकी दोनों किडनी फेल थी। वह भी तो मुफ्त में ही लिया। न जाने क्या-क्या नहीं लिया? जीवन भर तो दूसरों से ही लेते रहे। अब कफन से लेकर अंतिम संस्कार के सारे सामान भी तो दूसरों के ही होंगे। आज उन्हें अपनी गलती का एहसास हो रहा था। गलत काम का परिणाम तो एक दिन भुगतना ही था। उनकी मृत्यु भी कितनी कष्टमय परिस्थितियों में हुई थी। मरने के बाद भी उनकी मिट्टी के शरीर पर कफन तो दूर कोई चादर भी डालने वाला नहीं था। आखिर यह सब तो उनके पापों का ही प्रतिफल था।

तभी राम प्रसाद की आत्मा की निगाह घर के नौकर महेश की ओर गयी। उनकी आत्मा उसके पीछे-पीछे चल पड़ी। महेश कमरे में आकर बोला – ”मालिक, बाहर पंडित सतीश शर्मा और बाबू जी के कई साथी आए हुए हैं। वे सभी आपको खोज रहे हैं।”

अमित बोला – ”तुम उन लोगों को बरामदे में बिठाओ। हम लोग अभी आते हैं। ”
महेश कमरे से बाहर निकल बरामदे की ओर बढ़ गया।

अमित अनमने ढंग से बोला – ”तो लोगों को आना प्रारंभ हो गया।”

अनिल मुस्कुराकर बोला – ”हां , भैया ! अब खजाने की खोज बंद करनी होगी। लोगों से मिलकर औपचारिकता निभानी ही होगी।”

अमित अनिल को अजीब निगाहों से देखने लगा। वह सोचने लगा कि यदि अनिल लोगों से मिलने की औपचारिकता निभा देता, तो क्या हो जाता? यही सोचकर  अमित ने कहा – ” अनिल ! ऐसा करो कि तुम जाकर लोगों से मिल लो। मैं खजाने की खोज करता हूं। ”

अनिल बहाना बनाते हुए बोला – ” भैया ! मैं तो हमेशा पटना में ही रहा। मेरी यहां के लोगों से कोई जान-पहचान थोड़े ही है। इस खजाने की खोज को अभी बंद कर दीजिए और जल्दी से लाश पर चादर डलवा दीजिए। अन्यथा लोग क्या कहेंगे?”

अनिल थोड़े ही मूर्ख था जो सारी संपत्ति अमित को हड़पने का मौका देता। वह अमित की चाल को समझ गया था। वह अपने मन की शंका के निवारण का हल ढूंढ़ रहा था।

न चाहते हुए भी अमित अलमारी में ताला जड़ दिया। बाहर से भी कमरे में ताला जड़ दिया और अपना चेहरा बनावटी तौर पर गमगीन कर बरामदे की ओर बढ़ने लगा।

रामप्रसाद की आत्मा यह देखकर कराह उठी। इसी संपत्ति के कारण दोनों भाइयों  के मन में शंका के बीज उत्पन्न हो गये थे। अब उन्हें लग रहा था कि यह जो सारी संपत्ति लूट – खसोट कर बनाई थी, सब व्यर्थ और निरर्थक है। इन दोनों को उनकी मृत्यु का कोई दुख नहीं। इन्हें चिंता थी, तो बस खजाने की। राम प्रसाद की आत्मा सोचने लगी- ”अभी तो बहुत कुछ देखना शेष है। अपने जीवन काल में किए एक-एक पाप का हिसाब देना शेष है।”

उनकी आत्मा उन दोनों के पीछे-पीछे चलने लगी। तभी उनकी निगाह अपने ऑफिस में साथ काम करने वाले कर्मचारियों पर गयी। वे हाथ जोड़े उनके दोनों बेटों से कहने लगे – ”क्या करोगे, भाई ! एक दिन तो सबको इस संसार से विदा होना ही पड़ेगा। सही कहा गया है कि अच्छे विचार वालों को ईश्वर जल्दी बुला लेता है। वे हमेशा गरीब और जरूरतमंदों की सेवा मेें तत्पर रहते थे। सबके सुख – दुख  में शामिल होते थे। कितने मिलनसार प्रवृत्ति के थे।”

वे ऊपर – ऊपर तो जरूर सहानुभूति दिखला रहे थे, लेकिन मन ही मन सोच रहे थे – ”अच्छा  हुआ जो बुड्ढा मर गया। बिना रिश्वत के कोई काम नहीं करता था । विचार तो इतना गंदा था कि आज तक किसी के सुख-दुख  में शामिल नहीं हुआ। अपने आपको बहुत बड़ा समझता था। कमीशन खोरी में तो अव्वल था ।

एक – एक पैसे का हिसाब रखता था। अपने कर्मचारियों तक को भी नहीं बख्शा। हर किसी से कमीशन लिया। लो अब सारी संपत्ति यही रह गई। कैसे तड़प – तड़प कर मरा। कभी किसी की शव यात्रा या शुभ काम में शामिल नहीं हुआ। अब इसकी लाश को कौन कंधा देगा! बड़ा घमंड था इसे अपने आप पर।”

पंडित सतीश शर्मा दोनों भाइयों को सांत्वना देते हुए कह रहे थे – ”इस  संकट की घड़ी में ईश्वर तुम लोगों को सहनशक्ति प्रदान करें एवं ईश्वर उनकी आत्मा को  शान्ति प्रदान करें। शरीर तो नश्वर है। आत्मा अजर और अमर है। आत्मा तो अपने जर्जर शरीर को त्याग कर पुनः नये शरीर में प्रवेश कर जाती है। आत्मा को न कोई रोग होता है और न कष्ट, वह सदा  है और सदा रहेगी। आत्मा के लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है ।

एक दिन तो सभी को इस नश्वर शरीर का त्याग करना ही पड़ेगा। ” लेकिन वह मन ही मन कह रहे थे – ”अच्छा हुआ यह चांडाल मर गया। अपने जीवन में न कभी सत्यनारायण कथा करवाई और न कभी किसी ब्राह्मण को दान – दक्षिणा दी। एक नंबर का कंजूस था यह राम प्रसाद। जीवन भर तो दूसरों का ही खून चूसता रहा। कभी दान-पुण्य नहीं किया। इसे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। सारा धन तो यही रह गया। बाल – बच्चों के लिए जीता रहा। घुट-घुट कर मर गया यह नर पिशाच।”

यह सब सुनकर अब उनको अपनी गलती का एहसास हो रहा था। स्वर्ग और नर्क कहीं और नहीं, वह तो इसी धरती पर है। अच्छे-बुरे कर्माें का फल तो इंसान को इसी धरती पर भोगना पड़ता है। कर्मों के आधार पर ही तो इंसान की छवि बनती है। उनके कर्म ही बुरे थे कि आज उनके मरने के बाद भी लोग उन्हें अच्छा कहने के बजाय मन ही मन कोस रहे थे।

पंडित सतीश शर्मा ने अमित का ध्यान भंग करते हुए बोले- ”अब उनके अंतिम संस्कार की तैयारी करो। लाश को ज्यादा समय तक यूं ही घर पर मत रखो। उन्हें अग्नि को समर्पित कर दो। वरना उनकी आत्मा दुखी होगी।”

अमित बनावटी उदासी के साथ बोला – ”आप ठीक कह रहे हैं, महाराज ! अब इस नश्वर शरीर का जल्दी से जल्दी अंतिम संस्कार कर देना चाहिए।”

वह अनिल से बोला – ”क्या अंतिम संस्कार की तैयारियां पूरी हो गई?”

वह उदास स्वर में कहना चाहता था कि आपकी खजाने की खोज पूरी होती तब न। वह अपना सिर झुकाए बोला – ”नहीं !”

अमित बोला – ” जाओ महेश को कहो कि वह अंतिम संस्कार की व्यवस्था अति शीघ्र करे। शाम होने वाली है, आखिर कब होगा अंतिम संस्कार?”

महेश अंतिम संस्कार की सामग्री लाने के लिए बाजार चला गया और रास्ते में मन ही मन सोचने लगा – ” अच्छा हुआ जो बुड्ढा मर गया। एक-एक पाई का हिसाब लेता था। एक दिन की भी छुट्टी नहीं देता था। घर जाता था, तो उसका भी हिसाब कर तनख्वाह से काट लेता था । बहुत सताया था इसने मुझे। यही कारण है कि मरने के बाद भी इसके शरीर की दुगर्ति हो रही है। अभी तो इस चांडाल की लाश की और भी दुगर्ति होनी शेष है। जीवन भर घमंड में चूर रहा।   अब इसकी लाश को कौन कंधा देगा ! गाड़ी पर लदकर जाएगा “शमशान। “

ये सारी बातें सुनकर राम प्रसाद की आत्मा असहनीय पीड़ा से कराह उठी। लेकिन अपने किए कर्मों का फल तो उनके नश्वर शरीर को भोगना ही था। उनके बारे में लोग मन ही मन क्या-क्या नहीं कह रहे थे? अब उनको अपने किये कर्माें पर पश्चाताप हो रहा था।

लोग आकर दोनों भाइयों के सामने सहानुभूति प्रकट कर अपने-अपने घर की ओर जा रहे थे । अब दोनों भाइयों के सामने यह समस्या खड़ी हो गयी कि उनकी लाश को शमशान कैसे ले जाएंगे? सारे लोग तो जा चुके थे। बचे तो सिर्फ पंडित सतीश शर्मा, नौकर महेश और दोनों भाई।

पंडित सतीश शर्मा मन ही मन सोचने लगे – ” जीवन भर तो यह बुड्ढा उधार की जिंदगी जीता रहा। लोगों का खून चूसता रहा। अब इसकी लाश उठाने की भी कीमत चुकानी होगी।”

यही सोचकर पंडित सतीश शर्मा ने कहा – ”अमित ! अब क्या सोच रहे हो? जल्दी से लाश को उठाकर शमशान लेकर चलो। अन्यथा फिर रात को लाश यहीं पड़ी रह जाएगी और सड़न शुरू हो जाएगी। ”

काफी सोच -विचार के बाद भाड़े पर आदमी लाये गये। तब जाकर उनकी लाश उठी। राम प्रसाद की आत्मा अपने इस मृत शरीर की यह दुर्दशा देखकर  भयानक पीड़ा से कराह उठी। अब जब उनकी लाश का अंतिम संस्कार हो गया, तो उनकी आत्मा परम सुख की अनुभूति महसूस करने लगी। वे कितने वर्षों तक इस उधार के शरीर में मौजूद रहे। इस रोगी काया में उनकी आत्मा को कितनी तकलीफ झेलनी पड़ी। अब जाकर उनकी आत्मा अपने आपको हल्का महसूस कर रही थी। उन्हें अब जाकर एहसास हो रहा था कि कैसे लोग इस नश्वर शरीर पर अभिमान करते हैं, जो उनका अपना नहीं है। इस नाशवान शरीर पर लोगों को कितना अभिमान होता है, जो एक दिन पंचतत्व में विलीन हो जाता है।

उनकी आत्मा अब अपने आपको आजाद महसूस कर रही थी और हवा में इधर-उधर मंडरा रही थी। अब उसे दुख नहीं था, शोक नहीं था, बीमारी का कष्ट नहीं था, वह हल्का और पारदर्शी था। आकार विहीन हवा में इधर-उधर उड़ रहा था। तभी उनकी आत्मा की निगाह एक और मृत शरीर पर टिक गई। उस लाश पर भी न तो कफन था और न चादर डाला गया था। लोग उसके करीब भी जाने से कतरा रहे थे। लाश पर मक्खियां भिनभिना रही थी। लाश मानो सूखकर ऐंठ गयी थी। उनकी आत्मा उस लाश के करीब गयी।

यह लाश किसी और की नहीं बल्कि उस नगर सुंदरी की थी, जिसकी एक झलक पाने के लिए लोग अपनी पलकें बिछाये रहते थे। उसकी एक मुस्कान के लिए अपनी सारी संपत्ति उस पर न्योछावर करने को तैयार रहते थे। इस सुंदरी को अपनी जवानी, खूबसूरती और अदाओं पर कितना घमंड था। अपनी खूबसूरती के मोहपाश में फंसाकर न जाने कितनी जिंदगियां बरबाद कर दी और आज उसकी लाश पर कोई कफन डालने वाला नहीं था।

इसे अपने रूप और यौवन पर कितना घमंड था। आज उसकी सारी अकड़ निकल गयी। लोग कैसे नजरें चुराकर जा रहे थे। इस नश्वर शरीर पर लोगों को कितना घमंड होता है। किसी को दौलत का, किसी को शोहरत का और किसी को अपने हुस्न का। न जाने किस-किस चीज का घमंड इस भाड़े के शरीर पर होता है, जो एक दिन मिट्टी मेंं मिल जाता है।

उनकी आत्मा को जीवन की वास्तविकता का एहसास हो गया था। अब जाकर उनकी आंखें खुलीं , लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

आज उनकी आत्मा आजाद पक्षी की तरह हवा में मंडरा रही थी। कभी वह आत्मा अपने खेत की हरियाली पर मंडराने लगती , तो कभी अपने आलीशान बंगले में। वह कहना चाह रहा था कि यह सब तो मेरा है। लेकिन वह ऐसा नहीं कह पा रहा था। क्योंकि यह सब अब उनका नहीं रहा। यह सब तो गरीबों के खून-पसीने की कमाई को लूटकर बनाई गयी थी। यह उनका कैसे हो सकता है !

वह आजाद ख्यालों में डूबा पानी के ऊपर चल रहा था। दीवारों के आर-पार हो रहा था। वह अदृश्य होकर लोगों को देख रहा था। अग्नि भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ रही थी। वह आकार विहीन जरूर था, पर अपने आपको बहुत शक्तिशाली महसूस कर रहा था। हां, इतना शक्तिशाली होने के बावजूद अपने स्वरूप को नहीं देख पा रहा था।

अचानक रामप्रसाद की आत्मा की इच्छा अपने द्वारा अर्जित संपत्ति देखने की हुई। उन्होंने एकाएक अपने आपको खजाने में खड़ा पाया। माया अभी छूटी नहीं थी। सारी तिजोरियों में ऑटोमेटिक ताले थे। इन सबके बावजूद उसे सब कुछ स्पष्ट रूप से नजर आ रहा था। उसने हीरों के हार को देखा, लेकिन इन हीरों के हार को अपने जीवन में कभी गले से नहीं लगाया। अब उसे प्रतीत हो रहे थे कि ये हीरों के हार नहीं। ये तो मामूली पत्थर हैं, जिसको प्राप्त करने के लिए इंसान अपने ईमान को बेच डालता है। इन पत्थरों को पाकर कोई इंसान कैसे धनवान हो सकता है? मैं भी कैसा मूर्ख था, जो पत्थरों को संग्रह करने के लिए गरीबों का गला घोंटता रहा । इसका हिसाब चुकाना अभी शेष है।

उसने सोना देखा, जो धातु के टुकड़े प्रतीत हो रहे थे। इस धातु की चाह में लोग क्या कुछ नहीं कर देते? आखिर  इन धातुओं को प्राप्त कर लेने पर इंसान घमंडी क्यों हो जाता है? उसने नोटों की गड्डियों पर निगाह डाली। वे अब कागज प्रतीत हो रहे थे। कमीशन खोरी करके इन कागज की गड्डियों को एकत्र किया था।

इन कागज की गड्डियों के कारण ही कितनी गालियां सुननी पड़ी थी। उसने बैंक की पास बुक देखी, पालिसी के कागज और भी न जाने कितने कागज तिजोरियों में नजर आये। इन सबके कारण ही उन्हें पाप की भारी गट्ठरी ढोनी पड़ी। गरीबों की हाय लेनी पड़ी। वे साथ क्या ले गए? सब कुछ तो यही रह गया। उन्हें मिला क्या? मिली तो बस लोगों की बद्दुआ !

तभी कमरे का दरवाजा खुला। दोनों भाई अलमारियों को खोलकर खजाने की खोज में जुट गये। लेकिन उन्होंने खजाने को कहां छिपा रखा था, यह बात उन दोनों भाइयों की समझ से परे थी?

अमित बोला – ”कुछ तो मिल ही नहीं रहा है। न जाने कहां छिपा कर रखी है। न रुपये मिल रहे हैं, न जेवर और न कोई कागजात ! आखिर किस गुप्त तिजोरी में छिपा कर रखी है। “

” आपने सही कहा, भैया ! पिताजी ने तो इतनी सारी संपत्ति हम लोगों के लिए ही न अर्जित की थी। कम से कम बताकर तो जाते कि किस गुप्त तिजोरी में छुपा कर रखी है।” अनिल उदास स्वर में बोला।

यह सब देखकर राम प्रसाद की आत्मा मुस्कुरा रही थी। आज वो इस उधार की जिंदगी से मुक्त हो जाना चाहते थे। वो सारी अर्जित काली कमाई की संपत्ति उनकी थोड़े ही थी। यह सब तो गरीबों के खून-पसीने की कमाई थी। अब वे माया से मुक्त होना चाहते थे। जिंदगी भर तो दूसरों से लेकर ही इतनी सारी संपत्ति एकत्र की। अब वे इस माया के झांसे में नहीं आना चाहते थे। जिसके लिए उन्होंने गलत काम किया, वे उनसे नहीं बल्कि उनकी दौलत से प्रेम करते थे।

वे कहना चाह रहे थे – ”मुझे इस जीवन की वास्तविकता का ज्ञान हो गया। जीवन भर तो गलत करता रहा, अब तो इस माया से मुक्ति का समय आ गया है। तिजोरी कहां और तिजोरी की चाबी कहां? वो तो किसी को बताकर गए कहां? अब यह खजाना तुम लोगों के हाथ आने वाला नहीं है , क्योंकि यह मेरी मेहनत की कमाई नहीं थी। ” और वे जोर से जोर हंसना चाहते थे। लेकिन वे हंस नहीं पा रहे थे। अब अपने किये पापों के प्रायश्चित का समय आ गया था। माया से मुक्त होने का समय आ गया था। और उनकी आत्मा मुस्कुराते हुए उधार की जिंदगी से मुक्त हो अनंत आकाश की ओर उड़ चली।      

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