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एक्सक्यूज मी—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Excuse Me-Grehlakshmi ki Kahaniyan

एक्सक्यूज मी… ‘ मैं आपसे दोस्ती करना चाहता हूं।’ राह चलते एक अनजाने
नौजवान ने सुहानी को रोक कर यह इजहार किया था। गुस्से में तमतमाए, लाल
सुर्ख चेहरे के साथ सुहानी ने उसकी ओर कुछ यूं देखा कि वह दो कदम पीछे हट
गया। शायद इस मूक चेतावनी के लिए पहले से तैयार था। और कुछ पल के मौन के
बाद दोनों अपनी-अपनी दिशा में चल दिए…..

दिन बीता। अगली सुबह रोजाना की तरह सुहानी कॉलेज के लिए निकली। लेकिन
ज्यों ही गेट खोला…सामने वही नौजवान खड़ा मिला।  वह अवाक रह गई…..तुम
घर तक पहुंच गए !  क्या चाहते हो? क्या बिना जुबान खोले बात समझ में नहीं
आती ? सुहानी ने सवालों की बौछार कर डाली। लड़के ने दोबारा वही
दोहराया…‘ क्या मैं आपसे दोस्ती कर सकता हूं?’ सुहानी ने फौरन कहा,
‘नहीं। मेरे पास दोस्तों की कमी नहीं है। आप ये हल्की हरकतें करना छोड़
दें।’ लड़का खामोश रहा और कुछ दूर खड़ी अपनी गाड़ी में बैठ, निकल गया।
सुहानी गेट पर ही खड़ी सोचती रही, ‘अजीब इंसान है…कितनी हिम्मत है कि
घर की दहलीज तक पहुंच गया….न जाने यहां का पता कैसे मिला…..?’ मन में
हलचल-सी मची थी सुहानी के। फिर भी उसने खुद को संभाला और कॉलेज रवाना हो
गई।
इस घटना को हफ्ते से ज्यादा गुजर चुके थे। सुहानी कॉलेज की लाइब्रेरी से
किताबें लेकर बाहर आ रही थी। तभी सीढ़ियों पर नजर अचानक एक दुबले-पतले
से, लंबी कद काठी के लड़के पर गई। चेहरा जाना-पहचाना लगा। जब तक वह आगे
बढ़ती….वह नौजवान उसके करीब आ गया और पूछा, ‘क्या मुझसे दोस्ती
करेंगी?’  उसके शब्दों में कोई अनकही-सी बात थी….दरअसल,  सुहानी उसे
नहीं पहचानती थी, लेकिन अमन एक परछाई की तरह बीते एक वर्ष से उसके आसपास
ही रहता था। दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। सुहानी इकोनॉमिक्स में
आनर्स कर रही थी। अमन फिजिक्स में। पहले की तरह इस बार सुहानी ने कोई
जवाब नहीं दिया…न ही उसके हाव-भाव बदले। वह चुपचाप चल दी वहां
से….अमन के कदम  वहीं ठहरे रहे…
मौसम ने करवट ली…. दोनों ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष में पहुंच गए। एक दिन
कॉलेज की कैंटीन में सुहानी ने अमन को अकेले कॉफी पीते देखा। दोनों
आमने-सामने भी आए। लेकिन बीच में कोई सवाल नहीं था। दो पल के लिए नजरें
मिलीं और वे आगे बढ़ गए।
‘एक साल बाद मिला, लेकिन कोई सवाल नहीं?’ सुहानी के मन में अचानक से यह
खयाल आया, ‘ मैंने ऐसा क्यों सोचा और कैसे सोचा ? सामान्य-सी बात है, उसे
दोस्त मिल गए होंगे, इसलिए नहीं पूछा….।’  वह जैसे ही क्लासरूम में
पहुंची, तो साथी क्लासमेट  मृणल ने कहा, ‘जानती हो सुहानी, फिजिक्स ऑनर्स
का एक स्टूडेंट है अमन। बहुत इंटेलिजेंट है। प्रोफेसर ने सवाल पूछा नहीं
कि जवाब हाजिर होता है। लेकिन दो सालों में उसका कोई दोस्त नहीं बना
कॉलेज में, क्योंकि वह हिंदी मीडियम से है। उससे अपना उल्लू तो सभी साधते
हैं, लेकिन दोस्ती कोई नहीं करना चाहता।’ सुहानी को ये कहानी अजीब-सी
लगी। वह बेचैन हो गई। ‘अच्छा मृणल ये बताओ, अमन रहता कहां है हॉस्टल में
या उसका यहां घर भी है? ’ ‘ मैं पूछकर बताऊंगी,’ ये कहते हुए मृणल वहां
से चल दी। लेकिन सुहानी को चैन कहां आया था….उसने अमन के बारे में खुद
से पता करने का फैसला लिया….
अगली सुबह वह उसी समय कैंटीन पहुंची, जब अमन को देखा था। उसके अंतर्मन की
आवाज सही थी। वह कैंटीन के उसी कोने में गुमसुम-सा बैठा था। सुहानी उसके
पास गई। ‘हेलो अमन, मैं सुहानी। क्या हम दोस्त बन सकते हैं?’ अमन ने फौरन
कहा, ‘हां क्यों नहीं….मुझे मालूम था कि ये दिन जरूर आएगा, जब हम दोस्त
बनेंगे।’ इसके बाद तो मानो दोनों ऐसे मिले कि कितने जन्मों से जानते हों
एक-दूजे को। फाइनल ईयर पलक झपकते ही गुजर गया। सुहानी को दिल्ली की ही एक
कंपनी में अच्छी जॉब मिल गई, वहीं अमन स्कॉलरशिप पर मास्टर्स करने के लिए
यूएस चला गया। लेकिन दोस्ती बरकरार रही। हां, इसी दूरी ने दोनों को यह
एहसास करा दिया कि रिश्ते को अब नया रंग देने का समय आ गया है। सुहानी
अमन के लौटने का इंतजार करने लगी। स्काइप पर दोनों की बातें होतीं, तो
सुहानी एक ही सवाल पूछती, तुम्हारी छुट्टियां कब हो रही हैं अमन?
छह महीने गुजर चुके थे। सुहानी दफ्तर में थी, तो फोन बजा… ‘सुहानी मैं
दिल्ली एयरपोर्ट पर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।’ क्या? …. ‘तुम वहीं
रुको, मैं आ रही हूं।’  एक घंटे में दोनों फिर आमने-सामने थे। इस बार अमन
ने सवाल किया, ‘क्या मुझसे शादी करोगी? सुहानी का चेहरा फिर से लाल हो
गया….लेकिन खुशी से। जवाब दिया, ‘हां, करूंगी लेकिन घरवालों की इजाजत
से।’ ‘ठीक है, मैं तैयार हूं। कब मिलना है उनसे, ’ अमन ने पूछा।

दूसरे दिन मिलना तय हो गया। सुहानी की खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी। लेकिन
पापा को लेकर मन की शंका को कैसे दूर करे….वे तो इतने रूढ़ीवादी हैं कि
कहीं मिलने से ही इंकार न कर दें। शाम ढली। अंधेरा छाया….दिल के किसी
कोने में भी रात ने दस्तक दी। हालांकि उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। सुबह
छह बजे ही सूरज की किरणों ने नींद से जगा दिया। सुहानी ने सीधे अमन को
फोन लगाया, ‘ठीक 12 बजे पहुंच जाना। पापा समय के बहुत पाबंद हैं।’

 ‘ओके, जैसा हुकुम।’

इधर घड़ी की दोनों सुइयां 12 पर पहुंची नहीं कि दरवाजे पर घंटी बजी। उस
पार अमन खड़ा था। पापा उसे सीधे अपने स्टडी रूम में ले गए। एक बजे दोनों
बाहर निकले। सामान्य दिखने व व्यवहार करने की कोशिश कर रहे थे दोनों।
लेकिन कुछ तो बात हुई थी। हम सभी ड्राइंग रूम में बैठे। इधर-उधर की बातें
हुईं और अमन चला गया। बिना कुछ कहे और बोले…! वो दिन था और आज का दिन
है। 14 साल हो गए। अमन और सुहानी नहीं मिले। हां, दोनों ने एक-दूसरे की
जिंदगियों पर नजर जरूर रखी। अमन अमेरिका में बस गया। वह एक नहीं, कई
कंपनियों का मालिक बन चुका था। वहीं एक अंग्रेज से शादी भी कर ली थी।
इधर, सुहानी की शादी तो हुई, लेकिन दूल्हे ने पहले दिन ही कह दिया कि वह
किसी और से प्यार करता है। सुहानी विदाई के तीसरे ही दिन मायके लौट आई।
दो साल लगे, पति से तलाक भी मिल गया। जिन्दगी अपनी रफ्तार से चल रही थी।
सुहानी ने काम में खुद को डुबो लिया था। दिल्ली पीछे छूट गई थी। मुंबई
नया बसेरा बन गया था। तभी अचानक 15 साल बाद एक दिन फोन आया, ‘ क्या मैं
सुहानी जी से बात कर सकता हूं?’

 ‘हां, बोल रही हूं। आप कौन?’

….मैं अमन….। फोन पर दो मिनट का सन्नाटा छा गया। फिर आवाज
आई, ‘मैं मुंबई में हूं, मिलना चाहता हूं।‘ ‘क्यों? झट से सुहानी ने
पूछा।‘ अमन बोला, ‘मिलकर बताऊंगा।’

 ‘ ठीक है, पहली और आखिरी बार,’ सुहानी ने पलट कर जवाब दिया।

‘ओके, अमन ने जवाब दिया।‘

दरअसल, सुहानी सालों पहले अमन के चुपचाप घर से चले जाने और फिर कोई
संपर्क न रखने से अंदर तक आहत हुई थी। वह उस घटना को भुला नहीं पाई थी।
खैर, दोनों तय समय पर मिले। अमन के सच से सुहानी हैरान रह गई। अमन ने
कहा, ‘तुम्हारे पापा चाहते थे कि मैं अमेरिका जाऊं और रिसर्च पूरी कर
इंडिपेंडेंट बनूं। फिर तुम्हारा हाथ मांगने आऊं। ये हम दोनों के बीच का
सीक्रेट था। लेकिन तुमने मुझे गलत समझ लिया। शादी भी कर ली। तब मैंने भी
मारिया को हां कह दी। लेकिन हम दोनों एक-दूजे के लिए नहीं थे। इसलिए
तुमसे तुम्हारा साथ मांगने आया हूं। पापा तैयार हैं।’

सुहानी मौन थी। ‘किस्मत में जीवन का वनवास यूं खत्म होगा, इल्म नहीं था
इसका। एक सीक्रेट और छोटी-सी गलतफहमी जिंदगियों को यूं बदल देगी। सुहानी
ने कभी सोचा न था।’ और मन में इन्हीं बातों को दोहराते हुए उसने अमन का
प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

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