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पति-पत्नी के रिश्ते -गृहलक्ष्मी की लघु कहानियां
Pati-Patni ke Rishte

पति-पत्नी के रिश्ते -विवाह के बंधन में बंधने वाले स्त्री -पुरुष जब एक होने का अहसास लिए सात फेरे लेते हैं तो अनजाने में ही वो इस परिभाषित रिश्ते से परे एक दूसरे को अपना हमदर्द, दोस्त बनाने की राह पर निकल पड़ते हैं
मैं स्त्री की नज़रिए से देखूं तो
लगता है शायद वो जानती है कि
न तो वो उसकी हो सकती है
और न ही वो उसका हो सकता है
उसने अभी तक जिसे पाया भी नही है उसे खोना भी नही चाहती..
इस रिश्ते को वो अपने मन की डोर से बांध लेती है….
तो क्या वो इस समाज में बंधे बँधाये नियमों के विरुद्ध विद्रोह कर रही है?
क्या उसने अपनी मन और सामाजिक नियमों के बीच की सीमा रेखा को मिटा दिया है?
जी नहीं
वो समाज के बंधन और नियमो को बखूबी जानती भी है और मानती भी है
और वो महीन सी गहरी सीमा रेखा अभी भी वहीं है
मगर कुछ पलों के लिए ही सही वो नियम और जिम्मेदारियोँ के बोझ को नजरअंदाज कर देना चाहती है
कुछ खट्टे – मीठे …अहसास, जज़्बात अपने नये दोस्त से बांटना चाहती है
जो वो शायद कही और किसी के पास नही बांट सकती
अपने इस दोस्त के ऊपर अपने भीतर उमड़ रहे जज़्बातों के बादल बरसा देना चाहती है
जो बीते वक्त के साथ उसके अंतर्मन के भीतर खो से गये थे
वो खुलकर हँसना चाहती है, खिलखिलाना चाहती है
वो चाहती है की कोई उसे भी समझे, बिन कहे
सारा दिन सबकी फिक्र करने वाली चाहती है की कोई उसकी भी फिक्र करे…
वो बस अपने मन की बात कहना चाहती है
जो रिश्तो और जिम्मेदारी की डोर से बंधी गांठ को एक झटके में खोलकर आज़ादी के कुछ पल बिताना चाहती है
जिसमे न दूध उबलने की फिक्र हो,न राशन का जिक्र हो….न ईएमआई की कोई तारीख हो
आज क्या बनाना है, ना इसकी कोई तैयारी हो
बस ऐसे ही मन की कुछ बातें करना चाहती है
कभी उल्टीसीधी ,बिना सरपैर की बाते
तो कभी छोटी सी हंसी और कुछ पल की खुशी…
बस इतना ही तो चाहती है
आज शायद हर कोई इस रिश्ते से परे एक दोस्त एक हमदर्द ढूंढता है
जो कही-अनकही जिम्मेदारियों से मुक्त हो..

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