Hindi Social Story: “तुम आ गई मुझे तो लगा नहीं आओगी।” बड़ी उम्मीद भरी नजरों से देख सुहानी की बड़ी बहन मालती उससे बोली थी जो उसे कुछ सालों से हिकारत भरी नजरों से देखा करती थी।
गले में सोने की चेन और कान में हीरे के टॉप्स से ज्यादा उसके चेहरे पर चमक थी उसके बच्चों की अपार सफलता पर । जिन बच्चों की अच्छी परवरिश और शिक्षा के लिए उसने आभाव भरी जिंदगी जीना स्वीकार किया था।
अपने पति सुहास की मौत के बाद फैक्ट्री में नौकरी करते हुए अकेले बच्चों को पालना आसान नहीं था। प्रेम विवाह किया था उसने अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर दूसरी जाति के लड़के से।
दोनों ही परिवार से उसे जरा भी मदद नहीं मिली। किसी ने नहीं सोचा कि कैसे वो अकेली अपने बच्चों को पालेगी। पर जिसका कोई नहीं होता उसे कोई ना कोई सहारा मिल ही जाता है। सुहानी को भी रम्या मिल गई थी जिसे उसके बच्चों ने बेघर कर दिया था। वो रम्या का सहारा बनी और रम्या उसका। उसके दोनों बच्चे उसे अम्मा कहकर ही बुलाते थे। अपने बच्चों की तरह उसने सुहानी के बच्चों को गले से लगा लिया था। सुहानी फैक्ट्री में काम करने जाती तो दिन भर बच्चों को रम्या ही संभाला करती। सुहानी भी तो उसे अपनी मां की तरह ही समझती थी।
अपनी मां ने भले उससे मुंह मोड़ लिया था पर भगवान ने उसे मां के रूप में रम्या को भेज दिया था।
सुहानी अपनी बहन के घर उसके जन्मदिन के अवसर पर आई थी। मालती ने ऊपर से नीचे उसे बड़े ध्यान से देखा। उसे सुहानी बदली बदली सी नजर आ रही थी।
अब उसके दोनों जुड़वां बेटे अच्छा कमाने लगे थे उसकी हर इच्छाएं पूरी कर रहे थे। बहन के लिए भी वो बहुत ही कीमती उपहार लाई थी।
अब तक का उसका जीवन बहुत ही संघर्ष में बीता था पर अब संघर्ष की वो बेला समाप्त हो गई थी। सालों की उसकी तपस्या का फल उसे मिल रहा था।
“अरे वाह सुहानी तुम्हारी साड़ी तो बड़ी प्यारी लग रही है। आज पहली बार तुमको इतनी महंगी साड़ी पहने देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है। वरना तुम्हारे कपड़ों के कारण तुमको अपनी बहन कहते हुए भी शर्म आती थी।”
सुहानी चुपचाप अपनी बहन की बातें सुनती रही। क्या कपड़ों की कीमत के अन्तर के कारण ही हम दोनों बहनों के रिश्ते में दूरियां आ रही थीं।
दोनों में तो एक ही मां बाप का खून दौड़ रहा है फिर ऐसा होना स्वाभाविक तो नहीं था। वो जानती थी कि उसकी बहन और उसके सभी रिश्ते दार उसे हीन दृष्टि से देखा करते थे।
सुहानी अनभिज्ञ नहीं थी लोगों के उसके प्रति हीन व्यवहार से।
“हैसियत देखकर ही पैर पसारने चाहिए थे तुमको। इंजिनियर बनाने के जो सपने देख रही हो उसे भूल जाओ। इन दोनों की पढ़ाई में इतना खर्च कहां से करोगी सोचा है कभी? इनके सिर पर तो पिता का साया भी नहीं है और तुम भी तो मामूली सी नौकरी करती हो और हां मुझसे कोई उम्मीद मत रखना।”
अपनी बहन की इसी बात ने तो उसमें एक जिद्द भर दी थी कि उसे वो करके दिखाना है जो अभी कठिन लग रहा है।
अपने बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य के लिए पैसे जोड़ने जरुरी थे इसलिए फैक्ट्री में काम करने के बाद घर के लिए भी काम लाया करती थी जो वो अपने बच्चों को संभालते हुए किया करती थी। कपड़े की एक फैक्ट्री में दिन भर सिलाई का काम ही तो करती थी।
मशीन पर झुक कर दिन रात काम करने से कमर में दर्द तो होता पर बच्चों की एक मुस्कान के आगे वो सारे दर्द को भूल जाती।
बच्चे जब कहते…
“मां थोड़ा आराम भी कर लिया करो। दिन भर काम करती हो और रात में भी देर रात तक मशीन के पास कपड़े सिलने ही बैठी रहती हो। आंखे भी कमजोर हो जाएंगी।”
वो मुस्कुरा दिया करती थी।
” तुम दोनों मेरी दो आंखों की रोशनी हो। तुम बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। खूब मन लगाकर पढ़ाई किया करो।”
“हां मां हम खूब मन लगाकर पढ़ेंगे और जब बड़े हो जाएंगे तो आपको कोई काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
उसके कानों में अपने बच्चों की वो बातें आज भी मिश्री की तरह मिठास भरी लग रही थी।
उसकी तपस्या पूरी हो गई थी। दोनों बच्चे सरकारी अफसर जो बन गए थे और दोनों अपनी अपनी पसंद की लड़की से शादी करने वाले थे। उसे अपने बच्चों की खुशी सबसे प्यारी थी। जैसे ही बच्चों ने अपनी पसंद बताई उसने तुरंत हां कर दी।
दोनों ने ही सिविल सर्विस की परीक्षा जब पास की तब भी ये उसके लिए सपना ही लग रहा था।
“अरे सुहानी कहां खो गई। देख चाय ठंडी हो रही है।” उसके सामने ड्राई फ्रूट्स और ढेर सारी मिठाई और स्नैक्स रखे हुए थे।
“तूने अभी तक कुछ खाया नहीं।”
ये सुहानी की वही बहन थी जिसने उसके कठिन समय में अपना पल्ला झाड़ लिया था और उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहा था।
“अपनी मर्ज़ी से शादी की है तो अब उसकी सजा भी तो तुझे अकेले ही भुगतनी होगी।”
यही शब्द तो कहे थे सुहास की मौत के बाद मालती ने सुहानी से।
भगवान जब परीक्षा लेते हैं तो शायद ऐसा ही करते हैं। अपने भी पराए बन जाते हैं।
सुहानी ने भी तो कठोर तपस्या करके आखिर वो मुकाम हासिल कर ही लिया था जिसकी वो हकदार थी।
वो फैक्ट्री भी उसने खरीद ली जिसमें उसने सालों काम किया था।
जिस तरह सोने को जितना तपाया जाता है उसकी चमक उतनी ही निखरती है उसी तरह तो सुहानी का जीवन भी था।
पार्टी में आई मातली की सहेलियां कानाफूसी कर रहीं थीं जो सुहानी के कानों तक भी पहुंच रही थी।
“देख यार! आज अपनी बहन के ठाट बाट देखकर मालती कैसे उसके पास बैठ कर बातें कर रही है और पहले तो रास्ते में कभी देख लेती तो पहचानती भी नहीं थी।”
“समय का फेर है कब किसका साथ दे जाए पता नहीं। “
“कुछ भी कहो सुहानी की तपस्या का फल ही उसे मिल रहा है। दोनों बच्चे बड़ा अच्छा कर रहें हैं।”
केक काटने और डिनर के बाद सब अपने अपने घर जा रहे थे। सुहानी के दोनों बेटे अंश और वंश भी आ गए थे अपनी मम्मी को घर ले जाने।
दोनों ने अपनी मौसी के पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया।
“तुम दोनों तो कितने बड़े हो गए।”
“हां दीदी।”
सुहानी मुस्कुरा कर मन ही मन सोचती रही थी…
‘इन्हें बड़े होते देखने से तो आप बचतीं रहीं। कहीं बच्चों की पढ़ाई या उनके किसी खर्च के लिए मैं आपसे मदद मांगने ना आ जाऊं।’
“अच्छा दीदी चलती हूं अब।”
“आती रहा करो। अच्छा लगता है।”
जो अपने पराए हो गए थे उन्हें फिर अपना बना लिया था सुहानी ने अपनी तपस्या से।
