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एक थे मनुभाई-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात
Ek The Manubhai-Balman ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

एक बंदर का बच्चा था। बाल दोस्तों, उसका नाम था मनुभाई। मनुभाई स्वभाव से ही बहुत शरारती थे। बंदर की जात इसलिए पेड़ पर चढ़े फिर उतरे, शाखा पर झूले और उल्टा सिर लटके भी। मनु भाई को आसपास की प्रकृति देखना, जीव-जंतु और पशु-पक्षी को देखना तथा उसके साथ बातें करने में बड़ा मजा आता था।

एक दिन की बात है। मनु भाई पेड़ के नीचे खेल रहे थे। वहां उसने देखा कि चींटिओं की लाइन लगी हुई थी। हर एक चींटी के मुह में अन्न का कण था। एक के पीछे दूसरी ऐसी कतार में चलकर चीटियाँ क्या कर रही हैं? कहां जा रही हैं? ऐसे कई प्रश्न उसके मन में उठने लगे। मनु भाई ने एक चींटी को खड़ी रखकर पूछाः “चींटी बहन, चींटी बहन, तुम कहां चली? “चींटी बहन बोली “मेरे दर में चली।”

मनु भाई ने कहाः “तुमने मुंह में क्या पकड़ा है?”

चींटी: “यह खुराक का कण है। हमारे सबके मुंह में ऐसे कण हैं और इसे हमारे दर में ले जाकर हम उनका संग्रह करते हैं।”

मनुभाईः “यह खुराक तुम कहाँ से ढूंढ निकालती हो?”

चींटी: “खुराक की खोज में हम सभी चीटियाँ अलग-अलग दिशा में कूच करती हैं। जैसे खुराक मिलती है वैसे ही एक दूसरी को बता देती हैं। साथ में मिलकर उस खुराक को हमारे (किदियारू) दर में पहुंचा देती हैं। चलो, अब मैं जाती हूँ, मुझे तो बहुत काम करने हैं।”

मनुभाईः “चींटी बहन, रुको तो, मुझे तुमसे अब भी कई सवाल पूछने हैं।” पर चींटी बाई खड़ी न रही! वह तो चलने लगी।

मनु भाई सोचने लगे कि अब मैं किसके साथ बात करूँ? ऐसे में पेड़ पर सररर करती गिलहरी उतरी और मनु भाई तो देखते ही रह गए।

उसको बुलाए, इतने में तो गिलहरी बहन दौड़ गई। थोड़ी देर में वही गिलहरी बहन वापस लौटी। इस वक्त उसके मुंह में एक मंगफली का दाना था।

मनु भाई ने देखा तो गिलहरी बहन पेड़ पर चढ़ गई और वहां एक दरार में मूंगफली रखकर वापस नीचे उतरी। अब तो मनुभाई ने उसको रोक ही दिया और उसके साथ बातें करने लगे।

मनुभाईः “गिलहरी बहन, तुम्हारा नाम क्या है?”

गिलहरीः “मेरा नाम खुशी है। तुम्हारा नाम क्या है?”

मनुभाईः “मेरा नाम मनु भाई है। तुम उस मूंगफली को कहां से लाई हो और कहाँ रखी है?”

गिलहरीः “यह तो मैंने अपने घर में रखी है। वहाँ दूर एक मूंगफली का ठेला है। वहाँ नीचे थोड़ी मूंगफली बिखरी है उसमें से लेकर आती हूँ।”

मनु भाईः “यह सभी मूंगफली तुम खाने के बजाय दरार में क्यों रखती हो?”

खुशी बहनः “हम खुराक का संग्रह करते हैं।”

पेड़ की दरार में हम फल, बीज जैसी भांति-भांति की वस्तुएं इकट्ठी करते हैं। “ऐसा बोलकर खुशी बहन चली गई और डार पर बैठकर पूंछ ऊँची करके टिक-टिक् आवाज करने लगी।

मनु भाई सोच रहे थे कि अब मैं क्या करूँ? उसी वक्त गुन-गुन करती एक मधमक्खी उसके कान के पास से पसार हई। मन भाई ने देखा कि मधुमक्खी फूलों के पास जाकर फिर उड़कर अपने छत्ते में जा पहुँची, फिर से आकर उसने वैसा ही किया। इसलिए मनु भाई को फिर से कुतूहल हुआ और उसने मधुमक्खी को पूछाः “मधुमक्खी, थोड़ी देर मेरे पास बैठ, तेरा नाम क्या है? यह तो बताती जा।”

मधुमक्खी ने कहाः “मेरा नाम है मधु। मैं फूलों का रस इकट्ठा करके उसमें से खुराक बनाकर मेरे छत्ते में इकट्ठा करती हूँ।”

मनुभाई: “अरे, वाह! तुम भी चींटी और गिलहरी की तरह खुराक का संग्रह करती हो?”

मधुः “हां, तुम्हारी बात सही है। चूहा, चींटी, गिलहरी जैसे थोड़े प्राणि अपने घर में खुराक इकट्ठा करते हैं। हमारे छोटे बच्चों के काम में तो आता ही है और कई बार बारिश में भी काम में आता है। “ऐसा बोलकर मधु बहन ‘बाय-बाय, टाटा’ करती हुई चली गई।

मनु भाई तो ऐसी बातें सुनकर उसकी मां के पास दौड़कर चले गए। अब उसके मन में उत्सुकता होने लगी कि सबकी तरह हम क्यों खुराक का संग्रह नहीं कर सकते हैं?”

मनु भाई तो मां के पास जाकर पूछने लगे: “मां, मां, ये चींटी, गिलहरी और मधुमक्खी की तरह हम भी खुराक का संग्रह करें तो कैसे!”

मनु भाई की बात सुनकर मां हंस पड़ी। मा बोली : “मनु, हमारा कहाँ घर-बार है? हम तो फिरते राम है। आज इस पेड़ पर तो कल दूसरे पेड़ पर।

इसलिए हम कहाँ खुराक इकट्ठा करके रखे? यदि हममें से कुछ बंदर घर बनाकर खुराक का संग्रह करने लगें तो वे मनुष्य की जाति में ही पलट जाएंगे।” यह जवाब सुनकर मनुभाई तो सिर खुजलने लगे।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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