कोई नियम है! अखबार के दफ्तर में काम करो और अपनी ही पत्रिका आप बगैर इजाजत के बाहर नहीं ले जा सकते । हर महीने यही दोहराया जाता । हर बार ऐसा करते हुए उसे यही महसूस होता कि उसकी ईमानदारी को कागज की एक चिट से आजमाया जा रहा है । फिर भी, संदेहास्पद स्थिति उस पर जारी है…

आधी सड़क पार कर वह सड़कों के बीचो-बीच बने डिवाइडर पर खड़ी हो बाईं ओर के यातायात को घूरने लगी ।

यातायात का सिलसिला टूटता नहीं दिखा । पार कर पाने का इस वक्त एक ही उपाय था कि सिग्नल पर ‘थांबा’ (ठहरो) के साथ लाल बत्ती जलती। यातायात रुकता तो गाड़ियों की रफ्तार धीमी पड़ने लगती और फिर ठहर जाती। जेबरा लाइन तक पहुंचकर सड़क पार करने की जहमत कौन उठाए। हालांकि यह तरीका यातायात नियम के विरुद्ध है और अचानक धाड़ पड़ने पर कई दफे कई लोग नियम तोड़ते पकड़े गए और बाकायदा उन्हें पुलिस चौकी ले जाकर जुरमाना वसूला गया । इस कड़ी चेतावनी के साथ छोड़ा गया कि आइंदा वे सड़क पार करने के लिए जेबरा लाइन का ही इस्तेमाल करेंगे । उसे इस बात पर हंसी आती है कि कायदे-कानून बना देने मात्र से क्या नागरिकों में जागरूकता पैदा हो जाती है?

वही हुआ । सिग्नल पर लाल बत्ती जलते ही यातायात रुक गया ।

पीछे तेजी से बढ़ी चली आ रही गाड़ियां चींटियों की रफ्तार में बदलती ठिठकने लगीं । वह गाड़ियों के बीच से निकलते-बचते सड़क पार कर फुटपाथ पर आ गई और तेजी से डग भरते हुए वी-टी स्टेशन पर । चलते हुए अचानक उठी मरोड़ ने उसकी चुस्ती शिथिल कर दी । चलती नहीं, अगल-बगल भागती भीड़ के संग होड़ करती वह रुकी नहीं । मरोड़ ने उसे असमंजस में डाल दिया । पीड़ा पेट में घुमड़ती, कुल्हों की ओर पसरती, थकी जांघों में टूटन-सी उतरने लगीं । चेहरे पर कसैला विषाद खिंच आया-मरोड़ की प्रतिक्रियास्वरूप नहीं, इस आशंका से त्रस्त हो कि कहीं… जांघों के रगड़ने से रिसता पसीना भी हो सकता है । मगर वह इतनी थुलथुल नहीं कि चलते हुए जांघें रगड़ खाएं । मरोड़ और कुछ नहीं, उन्हीं संकेतों को पुष्ट कर रही । ईश्वर! वह घबराई । छि: छि:! क्या तमाशा है यह! कैसी-कैसी इल्लतें लगी हैं उनके पीछे । क्यों हुई वह औरत जात! औरत होना नरक है, नरक! कार्यालय से छूटे इर्द-गिर्द चलते हुए मर्द थकन के बावजूद कितनी चुस्ती से लबरेज लोकल पकड़ने को आगे बड़े जा रहे । निश्चिंत! निर्द्वंद्व! एक वह…आशंकित, सहमी, चौकन्नी, दुखी! चलती नहीं, लिथड़ती, घिसटती! उसे लगा कि वह फुटपाथ पर नहीं, खेल के मैदान में सम्मिलित दौड़ में शामिल है जिसमें दौड़ते हुए पुरुष हवा में उड़ते हुए नजर आ रहे और सारी-की-सारी दौड़ती औरतें दौड़ती नहीं, लंगड़ाती ।

कार्यालय में मेज पर सिर गड़ाए अपने स्तंभ के ‘प्रूफ’ देखते हुए वह कुछ अतिरिक्त थकान निरंतर अनुभव करती रही । सोचने का समय नहीं था । दोपहर में खाना खाने की इच्छा ही नहीं हुई । उस समय लगा कि पेट कुछ भारी है । बदहजमी भी हो सकती है । रात में स्वादिष्ट बने छोले, बासी न बचें इस चक्कर में, ज्यादा ही खा लिये थे । हो सकता है पेट का भारीपन उसी वजह से हो । समस्या यह है आशंका सही हो या गलत, उस समाधान के लिए खुद को देखभाल कर तसल्ली करना बेहद जरूरी है । घर पहुंचते-पहुंचते उसे कम-से-कम डेढ़ घंटा लगेगा । स्टेशन पहुंचने के लिए भी अभी उसे आठ-दस मिनट और चलना होगा । विकल्प दफ्तर ही है । पलटी, तो बमुश्किल दो-तीन मिनट लगेंगे ।

दफ्तर ही लौटना बेहतर होगा । खतरा मोल नहीं ले सकती । कहीं साड़ी दाग धब्बों से भर गई तो रास्ता चलना दूभर हो जाएगा । औरतें चाहे भीड़ में चल रही हों या भीड़-भड़क्के से दूर, पुरुष उन्हें घूरने से नहीं चूकते । वैसे भी अधिकांश पुरुष उसे रावण के वंशज प्रतीत होते हैं, जिनकी दस जोड़ी भुजाएं ही नहीं, दस जोड़ी आंखें भी हैं जो राडार की भांति स्त्रियों की गतिविधियों को सूंघती बारीक-से-बारीक हरकत को दर्ज करती रहती हैं । ऐसी स्थिति में किसी ने उसे घूर भर दिया तो वह लज्जा से गड़ ही जाएगी । वैसे, वह बड़े मस्त स्वभाव की लड़की है, मगर अपने प्रति कहीं सतर्क भी । किसी समय उसे अपने ऊपर गड़ी नजरों का अहसास हो जाए, बस एकदम से असहज हो उठती है-हाथ-पांव ठंडे हो जाने की हद तक ।

दफ्तर लौट चले, पर अभी अधिकांश लोग दफ्तर से निकल रहे होंगे । उसकी आदत है, पांच बजने में कुछ मिनट शेष रहते ही वह अपनी मेज सरिया, दराजें बंद कर उठ देती है । उसे वापस घुसता हुआ देखकर उन्हें अचंभा होगा । मंशाराम जरूर चौंकेगा । चौंकेगा तो चौंके । लोगों की चिंता क्या उसे इस सीमा तक करनी चाहिए? यही सबसे बड़ी कमजोरी रही है उसकी । कुछ हो न हो, औरों का अच्छा-बुरा लगना पहले सताने लगता है । वैसे चिंता निर्मूल नहीं । चिंता करने के उसके पास प्रामाणिक आधार हैं । लड़कियों के मामले में उसका कार्यालय कुछ अधिक ही बदनाम है। लड़कियां भी कम त्रस्त नहीं । वह स्त्री होने के बावजूद महसूस करती है । कुछ कन्याओं ने पत्रकारिता को बतौर फैशन अपनाया हुआ है और मिजाज निर्धारित किया है-बोल्डनेस । किसी महिला पत्रकार से ही उसकी मुठभेड़ हो जाए और वह अर्थपूर्ण ढंग से जुमला उछाल दे, “भई, सब एडीटरों को तो ओवरटाइम करना नहीं पड़ता, “तो कोई आश्चर्य नहीं ।

भले ही संपादकीय विभाग की मानसिकता निहायत बदबूदार है, पर जहां तक उसके बॉस का सवाल है, अन्य संपादकों की अपेक्षा उसकी प्रतिष्ठा काफी उजली- धुली है । वह अंग्रेजी में होती और खुदा-न-खास्ता अखबार में कार्यरत होती तो निस्संदेह दफ्तर खतम होने के बाद उसके संपादकीय मेज पर बने रहने या वापस लौटने पर दूसरे रोज वह स्वयं सनसनीखेज खबर होती । उसके बॉस पर लड़कियों की अत्यंत निराशाजनक प्रतिक्रिया है, “ही इज स्मार्ट लल्लू ।” दाना जो नहीं डालता वह इन ‘कंधे उचकाऊ, हाव-भावों से चिकनी-चुपड़ी’ छोकरियों को । और तो और, वह अपनी साथिनों को ही नहीं समझ पाती । आखिर वे अपने साथ किस तरह के सुलूक की अपेक्षा करती हैं? जो उन्हें लिफ्ट देता ‘ वह चालू है’, और जो उनके लटकों-झटकों की गिरफ्त में नहीं फंसता वह ‘लल्लू’ ।

‘उफ ।’ विचारों की अनर्गल रस्साकशी से ऊबी वह । उसे तुरंत फैसला करना है, दफ्तर लौटे या आगे बड़े । उधेड़बुन में कुछ और आगे निकल आई है । पलटना ही होगा ।

…मगर यह हो कैसे गया । जहां तक उसका अनुमान है ‘तारीख’ में अभी समय है। यह भी हो सकता है, इधर कुछ ज्यादा ही व्यस्तता में वह सही तारीख याद रखना भूल गई हो । वरना ऐसी असावधानी होती नहीं । समय नजदीक होता है तो वह अपने दफ्तरी तामझाम के साथ-साथ पैड रखना नहीं भूलती ।

यह संयोग की बात है कि अब की न उसे तारीख याद रही न कपिल को ही । वरना वे उसे छिछले परिहास के साथ पहले से ही आगाह कर देते, “भई अपना लंगोट रख लो, आकांक्षा ।”

कपिल के परिहास पर वह अकसर खीज उठती, “इतना गंदा लफज क्यों इस्तेमाल करते हो । याद दिलाने के लिए तुम्हारे पास यही एक तरीका है?”

“कमाल करती हो तुम भी, “ढीठ मुसकराहट चेहरे पर लपेटकर वे हंस पड़ते “एक तो तुम्हें जहालत से बचाता हूं और तुम…खैर, मैं भी तो सुनूं कि इसे हिंदी में क्या कहेंगे?”

“जो भी कहते होंगे, बहरहाल तुम अंग्रेजी का ही शब्द इस्तेमाल किया करो । मुझसे नहीं बरदाश्त होता ये छिछोरापन-पति-पत्नी के बीच क्या कोई भद्रता नहीं बरती जानी चाहिए?”

“पति-पत्नी के बीच ।” कपिल गंभीरता ओढ़ने की असफल चेष्टा करते, “भला पति-पत्नी के दरमियान गंदा और अश्लील क्या होता है?”

“तुमसे तो बहस करना फिजूल है ।” वह निरुपाय-सी हथियार डाल देती ।

“चलो, नाराज मत होओ ।” वे उसकी तनी हुई भृकुटियों को सहज करने की मंशा से परिहास पर उतर आते, “आज से हम गंदी बातें नहीं करेंगे बस, गंदे काम करेंगे…अब तो कोई ऐतराज नहीं ।”

तुनक फिर भी नथुनों पर तनी रहती, “मुझे क्या…जो जी में आए, कहा करो…”

वह तुनकना न छोड़ती । कपिल की परिहास प्रवृत्ति में कोई अंतर न पड़ता । दो-तीन दिन मुश्किल से बीतते कि वे छेड़-भरे अंदाज में पूछ बैठते, “अरे भई, तुम्हारी स्वेज कैनाल का क्या हाल है?”

“बुरा ।” वह पिछली बातों को आज की मुसीबत से जोड़कर मन-ही-मन बुदबुदाई । यातायात ने फिर उसे दफ्तर के सामनेवाले फुटपाथ पर अटका दिया । दृष्टि ने दफ्तर के प्रवेश द्वार को टटोला । अनुमान सही था । लोग विरल भीड़ की शक्ल में बरामदा उतर रहे थे । किसी परिचित से मुठभेड़ हो जाने की आशंका ने उसे फिर असमंजस की स्थिति में ढकेल दिया । उनकी ओर से हुए किसी सवाल का उसके पास जवाब क्या होगा?

“किसी की प्रतीक्षा कर रही हो?”

आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा उसे था । आवाज पहचान ली उसने ।

बंधी हुई दिनचर्या में आपाद-मस्तक डूबी महीने में पच्चीस-छब्बीस दिन उसे आभास ही नहीं होता कि वह स्त्री है और उसकी नितांत भिन्न प्रकृति है । कूट-कूटकर स्त्री होने का बोध कराती! वितृष्णा पैदा करती । पीड़ा का इंच-इंच कतराता दुष्चक्र । सहिष्णुता को महीने-दर-महीने, साल-दर-साल खनन कर उसे गहरा, चौड़ा, पुख्ता करता । समर्थ बनाता इतना कि वह घोर-से-घोर कष्ट के संहारक प्रहार को कवच की भांति झेल जाए। उफ्, उसे अपने से घृणा होती है ।

एक घिनौना गिजगिजा एहसास अपने में लिथाड़ता, तमाम दर्द निवारक गोलियां गटक लेने के बावजूद उसे उस बोध से मुक्त नहीं करता ।

तनाव बिच्छू के विष-सा चढ़ने लगा । कला विभाग का सिराज था । कुछ तो कहना ही होगा । कह बैठी, “मालिनी कुछ भूल गई दराज में, लौटकर लेने गई है ।”

समझ में नहीं आया कि सरासर झूठ किसलिए और किस भय से बोल गई? वह भी सिराज से? कह देती कि जरा दफ्तर लौटकर बाथरूम जाना चाहती है । लोकल ट्रेनों में तो बाथरूम होता नहीं । सिराज भला क्या अनर्गल सोच लेता? पता नहीं मन में क्या आया सिराज से बोली, “चलिए स्टेशन चलते हैं…मालिनी बहुत वक्त लगा रही है…मेरी लोकल छूट जाएगी…देर हो जाने पर मिनी बहुत हुड़कती है…”

सिराज साथ-साथ चलने लगा । मिनी के प्रसंग पर उसने दिलचस्पी- भरी उत्सुकता दिखाई, “कितनी बड़ी हो गई है मिनी?”

“बहुत भई…डेढ़ साल पूरे करने वाली है इसी सात को ।”

जवाब दे रही सिराज को, मगर दिमाग चल रहा, क्या करेगी अब । एक और तिनका है स्टेशन पर बना महिला प्रतीक्षालय । तसल्ली हुई । वहीं जाकर खुद को देख लेगी । हालांकि महिला प्रतीक्षालय के नहानघरों और पाखानों की जो दुर्व्यवस्था है, स्मरण मात्र से ही रोंगटे खड़े हो गए । नथुनों में अजीब-सी दुर्गंध भर गई । फिनैल नहाई। मन हुआ कि गंदगी के स्मरण से जो कसैली मितलाहट मुंह के भीतर पनिया रही है उसे फुटपाथ पर थूक दे, नहीं तो सिराज से बातें नहीं कर पाएगी । रहा नहीं गया । बेचैन हो फुटपाथ के कोने की ओर बढ़ी और थूककर वापस सिराज के निकट लौट आई, “चलो ।”

उसके इस आचरण पर सिराज का विशेष ध्यान नहीं गया । गया भी हो तो वह अपनी सोच में डूबा-सा लगा उसे । वैसे, सिराज का एक पल के लिए भी प्रतिक्रियाविहीन होना उसके लिए अचरज की बात अवश्य थी । दो खूबियां हैं उसकी । चुप वह कभी रह नहीं पाता, और अपनी बहक में बोलते हुए कभी किसी के अच्छे-बुरे लगने की परवाह भी नहीं करता । खैर, चुप ही रहे तो ज्यादा बेहतर है । दफ्तरवालों की मानसिकता से वह बड़ा ऊबती है । वे चाहे दुनिया के किसी कोने में मिल जाएं, और चाहे जिस विषय से बातचीत आरंभ करें, घूम-फिरकर सूई वहीं अटक जाती । अबकी बोनस कितने प्रतिशत मिल रहा?…पालेकर एवार्ड का फैसला हो ही नहीं रहा । हो गया तो समझो लॉटरी खुल गई । नयों को कितना फायदा होगा, पुरानों को कितनी रकम एकमुश्त मिलेगी…कौन-सी लड़की किसपे ‘ फ्लर्ट ‘ कर रही है…फलाने संपादक ने तो हद ही कर रखी है, सरेआम केबिन का दरवाजा बंद कर लेता है । ऐन मौके पर अचानक कोई मिलने पहुंच जाए तो पीए, थपलियाल केबिन के बाहर से ही उसे टरका देता, “सा’ब जरूरी काम में बिजी हैं-पिच आव ।…”

आखिर अपनी तर्ज में सिराज का मुंह खुला ।

“कल तुम्हारे विभाग में काफी हंगामा हुआ?”

‘उतर आए न रंडी रोने पर, ‘ चिढ़कर वह आहिस्ता से अपने भीतर खुसखुसाई, मगर प्रत्यक्ष में विस्मित होती-सी बोली, “हंगामा?”

“क्यों…कल दफ्तर नहीं आई तुम?”

“आई, ओह! तुम्हारा मतलब है नलिनीवाला प्रसंग?” उसने जान-बूझकर याद न आने का नाटक किया । जैसे कलवाली घटना उसके लिए विशेष महत्त्वपूर्ण न हो । सिराज को अपनी बात का इस हद तक सामान्य लेना कुछ अखरा, “कल पूरे दफ्तर में सनसनी थी ।”

“दफ्तर में सनसनी का तो यह आलम है कि लोगों की छींक से भी पैदा हो जाती है ।” एकाएक उसे अहसास हुआ, वह सिराज से रूखी हो रही है। फौरन उदार हुई। स्वर को यथासंभव अपनत्वपूर्ण बनाया, “देखो सिराज, हंगामा कैसा । नलिनी और बतरा में जरा जमकर तनातनी हो गई।” फिर अपनी ही प्रतिक्रिया, ‘जरा और जमकर’ को स्पष्ट किया, “ऐसे मनमुटव तो अकसर हर विभाग में होते रहते हैं और कारण होते हैं व्यक्तिगत आक्षेप । तुम्हारे कला विभाग में भी ऐसी घटिया हरकतें करनेवालों की कमी नहीं । बतरा ने उसे नीचा दिखाने की कोशिश की । तुम शायद जानते हो या न भी जानते होओ, नलिनी को छिछोरापन बरदाश्त नहीं । फिर लोगों को क्या पड़ी है उसे कुरेदने की? जिन बातों से उसे चिढ़ है, जिनका जिक्र तक उसे बरदाश्त नहीं, उस दुखती रग पर उंगली रखने का अर्थ…?”

“देखो आकांक्षा, “सिराज ने बगैर किसी उत्तेजना के उसे टोका, “नलिनी को कुछ भी हो, इतना आक्रामक रुख नहीं अपनाना चाहिए था । मुंह से तकरार हो रही थी, हो रही थी, बतरा पर हाथ उठाने की क्या जरूरत थी? यही दिखाने के लिए न, मैं ईंट का जवाब पत्थर से दे सकती हूं?…दफ्तर की भी मर्यादा है ।”

वह तनिक उत्तेजित हो उठी, “माना, दफ्तर को अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए, पर किसी लड़की पर समलैंगिक होने का लांछन लगाया जाए और कहा जाए कि आपके पति आपसे तलाक लेने की ये ही वजह बतलाते फिर रहे हैं तो…मैं तो कहती हूं, नलिनी की जगह अगर कोई दूसरी लड़की होती तो मात्र एक थप्पड़ से ही अपने अपमान का बदला न लेती, सीधा सीडल उतारकर जुट जाती…सिराज! साथ काम करनेवाली औरत के लिए यह हक आपको कहां से मिल जाता है कि आप कुछ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर उनकी निजता को सरेआम उछालें? और मान लो इसमें सचाई भी हो तो उसे सबके सामने उजागर करने से आपका मंतव्य…? अच्छा ही किया उसने…औरों के लिए सबक हो गया ।”

सिराज को निराशा हुई । गरमागरम बहस में फंसने की उसकी कतई इच्छा नहीं थी । आकांक्षा का इस हद तक आक्रोशी हो उठना भी उसके लिए अप्रत्याशित था । उसे लगा था कि आकांक्षा जरूर कलवाली घटना पर कोई मसालेदार टिप्पणी व्यक्त करेगी, जो अधिकतर महिलाओं की कमजोरी होती है । वैसे वे चाहे आपस में कितनी ही गहरी दोस्त क्यों न हों, पर टीका-टिप्पणी का सुअवसर हाथ लगते ही उनके अपने ईर्ष्या-द्वेष प्रतिद्वंद्विता में उतर आते हैं ।

आकांक्षा ने अब तक अपने को संयत कर लिया । सिराज की चुप्पी खली । सोचा कि औरों के लफड़ों में पड़कर उन्हें आपसी संबंधों को कलहपूर्ण नहीं बनाना चाहिए ।

“चलो छोड़ो…बताओ, तुम अपने चित्रों की प्रदर्शनी कब कर रहे?”

“मुझे यह भी नहीं पता कि वह तलाकशुदा है ।” वह अभी उसी प्रकरण में फंसा हुआ था । चित्रों की प्रदर्शनीवाली जिज्ञासा पर उसका ध्यान ही नहीं गया ।

उसने महसूस किया । इस वक्त सिराज का पूरा-का-पूरा ध्यान इस ओर लगा हुआ है कि इन बातों से उसके मन में सिराज के प्रति धारणा न बिगड़ जाए । वह उसे घटिया न शुमार करने लगे । सिराज की बरसों पुरानी आदत है। उसके द्वारा झिड़क दिए जाने या फटकार दिए जाने को वह बड़ी अहमियत देता और अपने समझदार, शालीन और अलाहदा होने के पक्ष में बतौर सफाई दलीलें प्रस्तुत करने लगता । वह समझती है, उसके प्रति बरसों पुराना सिराज का आकर्षण अभी भी जिंदा है । जिस साथ उठने-बैठने को वह कार्यालयी मित्रता की व्यावहारिकता के रूप में लेती रही, सिराज के लिए ‘मुहब्बत और जिंदगी’ जैसे मायनों से खुनकदार हो उठे थे…

अपने प्रति उनकी गलतफहमी तोड़ने, के बावजूद सिराज को वह अब भी मोहाविष्ट पाती है…

पिछले दिनों नलिनी ने उससे सिराज की शिकायत की थी, “यह सिराज क्या चीज है भई?…तुम्हारा काम तो फटाफट कर देता है, मुझसे क्या खुन्नस है भाई को? मामूली-मामूली-सी साज-सज्जा के लिए भी परेशान करता है…”

प्रतिक्रिया में वह मात्र मुस्कराकर रह गई थी । नलिनी जो एक बार शुरू हुई तो बंद होने से रही ।” ऐसे-ऐसे ऊदबिलाव पल रहे हैं इस दफ्तर में जिन्हें काम-धाम से कोई मतलब नहीं । बस जी-हुजूरी खाने की आदत पड़ गई उन्हें । अपन तो आकांक्षा, बड़े अनफिट हैं इस म्यूजियम में…पापी पेट का सवाल है जी, वरना कब की राम-राम कर लेते…” हाथ जोड़ दिए नलिनी ने ।

दफ्तर में दूसरा या तीसरा दिन था नलिनी का । ठीक से याद नहीं । पर उसकी वह धाकड़ मुद्रा याद है अब तक-“मैं उस मेज पर नहीं, तुम्हारी मेज पर तुम्हारे सामने ही बैठूंगी ।” कहकर वह जैसी आत्मविश्वासी मुसकराहट में मुस्कराई थी, वह उसके बेबाकपने पर रीझ उठी थी, “शौक से!”

“कश्यप राजी है कि आप…” उसने संकोच से भरकर कहा था । नलिनी के बैठने की व्यवस्था कश्यप की मेज पर की गई थी ।

“वे कौन हैं?…” हमने बॉस से कह दिया, “काम समझने में मैं समझदार व्यक्ति की सहायता लेना चाहती हूं…”

“धन्यवाद ।” अपनी प्रशंसा ने उसे मुदित किया था ।

उसके तराशे हुए दबंग व्यक्तित्व पर वह मोहित हो उठी थी । विभाग में महिलाएं बहुत थीं, मगर उनमें से कोई भी उसे ऐसी नहीं लगी, जिनसे बराबरी के स्तर पर मिला जा सके । थोड़ी ही देर में अनुमान हो गया कि नलिनी की धारणा पुरुष सहकर्मियों के प्रति रुक्ष ही नहीं, कुंठा की हद तक दुराग्रही है । कारण उसे मात्र यही लगा-उसका कड़ुवाहट भरा अतीत!

उसे याद है, आए दिन नलिनी के विरुद्ध होनेवाली टीका-टिप्पणी और उन्हें बॉस तक पहुंचाने की घटिया प्रवृत्तियों से ऊबकर उसने उसे समझाना चाहा था, “वरिष्ठों को महत्व दिए बिना तुम न सहजता से विभाग में काम कर सकती हो, न तुम्हें इसकी सहूलियत ही दी जाएगी । स्वयं को थोड़ा सा व्यवस्थित कर लो…दफ्तर तो दफ्तर ही है..फिर कोई तुम्हारी धौंस में आए ही क्यों? या कायदे से तुम उन पर अपने को थोपो ही क्यों?”

वह एकाएक आवेशमय हो उठी थी और इतने तेज-तेज स्वर में बोलने लगी थी कि पूरे विभाग के कान खड़े हो गए, “मुझे दफ्तर में किस तरह से रहना चाहिए, यह तुमसे नहीं सीखना होगा । नौकरी मैं पहली दफे नहीं कर रही… ।”

उसने खिसियाकर मेज पर फैले हुए कागजों के ढेर में चेहरा गड़ा लिया और अपनी आहत मनःस्थिति को व्यस्तता में डुबो लेने की कोशिश की । मगर अपने से कहीं ज्यादा दु:ख उसे नलिनी की आंखों के कोरों पर सहसा तैर आए जलकणों को देखकर हुआ…

“आई एम ए साइकिक केस…प्लीज! मेरी बातों को अन्यथा न लेना, आकांक्षा!” उसने “कागजों के ऊपर रखे उसके हाथ पर अपनी हथेली रख दी थी ।

प्लेटफॉर्म के सीढ़ीदार बरामदे पर पांव रखते ही वह प्लेटफॉर्म की ओर पीठ करके खड़ी हो गई, “चलती हूं ।”

“अच्छा!…”

सिराज ने संक्षिप्त प्रत्युत्तर दिया और आगे बढ़ गया । वह उसके आगे बढ़ते ही उसकी ओर मुड़कर खड़ी हो गई। आश्वस्त-सी कि सिराज उसकी पिछाड़ अब किसी हालत में नहीं देख सकेगा, पलटकर उसे देखे तब भी । अपने लंबे पल्लू से उसने अपनी पीठ को सावधानीपूर्वक आवृत्त कर लिया । इस तरह से कि पीठ के नीचे का हिस्सा भी ढका रहे ।

प्लेटफॉर्म पुर पहुंचकर आदतन दृष्टि सूचनापट की ओर उठ गई । अपनी गाड़ी लगी देखकर वह गाड़ी पकड़ने का मोह त्याग नहीं पाई । मिनी का खयाल प्रबल हो आया । उसके देरी से पहुंचने पर कैसे जार-जार रोती है । महिला प्रतीक्षालय के पाखाने की दुर्गंध ने भी उसके मन को हुसका दिया । फिर इस भीड़-भड़क्के में भला कौन किसको देखता है? वह नाहक तिल को ताड़ बनाकर चिंतित हो रही है । ठीक छः बजे उसे ‘शिशु विकास केंद्र’ से मिनी को ले लेना होता है । इस लोकल के छूट जाने से वह भी संभव नहीं होगा ।

दफ्तर में अगर जरा-सी भी उसे इस इल्लत का पूर्वाभास हो जाता तो वह तत्काल कपिल को उसके कार्यालय फोन कर देती कि वह कुछ कारणवश सीधी घर पहुंचेगी । इसलिए कपिल कार्यालय से जरा जल्दी निकल और ‘शिशु विकास केंद्र’ ठीक समय पर पहुंचकर मिनी को घर ले आएं । अब…अजीब असहाय स्थिति में फंस गई। दूसरे दरजे के महिलाओं वाले डिब्बे में फुरती से दाखिल होते हुए अनायास बायां हाथ पीछे पहुंचकर कमर के निचले हिस्से को मुस्तैदी से टटोल आया । कहीं कोई…

बैठने के लिए सीट मिल गई उसे । तीन स्टेशन भी पार नहीं हुए थे कि उसे अपने नीचे किसी तरलता के अहसास ने कुछ अनमना कर दिया । उफ्, दिमाग पर हथौड़े-से लगे ।

“क्षमा कीजिए”…अपनी सीट पर से वह एकाएक उठ खड़ी हुई । उसने अपनी पड़ोसन महिला से झिझकते हुए ‘फुसफुसाकर पूछा, “देखिए, जरा कहीं मेरी साड़ी तो नहीं भर गई?”

उसकी बात सुनकर महिला चौंकी, किंतु अगले ही पल उसका आशय भांपकर मुसकाई । दूसरों की पकड़ में न आए इस सतर्कता से निरीक्षण किया उन्होंने, फिर उसे बैठ जाने का संकेत कर झुककर उसके कानों में फुसफुसाई, “हलका-सा स्पॉट है…”

उच्छवास निकल गया मुंह से । जिसका भय था आखिरकार वही हुआ ।

“कहां जाएंगी?” महिला का स्वर सहानुभूति से भर आया ।

“सांताकुज ।”

“उतरकर टैक्सी पकड़ लें…स्टेशन से घर दूर है?”

“जुहू चर्च के पास ।”

महिला बातें करने के मूड में लगीं । उसे इस पूछताछ से ऊब हो आई । उसने बैग से पत्रिका निकाल ली । पढ़ने का उपक्रम करने लगी । हालांकि पढ़ने का मन कतई नहीं हो रहा था । पर फिजूल की बातों से बचने का अन्य कोई उपाय भी नहीं । मन-ही-मन समय का हिसाब-किताब लगाने लगी । तकरीबन पैंतीस मिनट उसे बांद्रा पहुंचते लगेंगे । बांद्रा से ट्रेन बदलने और सांताकुज पहुंचने में लगभग पांच मिनट और । इतनी देर में निस्संदेह उसकी हालत खराब हो जाएगी । वैसे स्टेशन से लगा हुआ ही जुहूवाला बस स्टॉप है, पर आज…आज तो इस स्थिति में बस स्टॉप पर खड़े रहना उसे खासी नुमाइश बना देगा ।

पड़ोसन यात्री का सुझाव दुरुस्त है । खैर… अगर वह सुझाव न भी देती तब भी वह ऐसी हालत में टैक्सी ही पकड़ती । आठ-दस रुपयों का सत्यानास करने की हैसियत तो रखती ही है । दरअसल मेहनत से कमाए गए रुपयों का इस तरह जाया होना उसे तर्कसंगत नहीं लगता । जहां बस द्वारा बीस पैसों से काम निकलता हो, वहां आठ-दस रुपए निकल जाना अखरेगा ही । कपिल ऐसे मौकों पर उससे पूरी तरह से असहमत होते हैं । उन्हें लगता है, मुसीबत में फंस जाने पर जो पैसा खर्च होता है, वह जाया होना नहीं, पैसों का सदुपयोग है ।

उसने पैसा पुराण को दिमाग से झटका और सोचने लगी कि इस इल्लत को लिये हुए ही वह ‘शिशु विकास केंद्र’ जाकर मिनी को ले या पहले सीधी घर निकल जाए? उचित यही लगा कि घर पहुंचकर पहले नहा-धो ले । तब मिनी को लेने ‘शिशु विकास केंद्र’ जाए । ऐसे कुछ नहीं होने का उससे ।

…अगर सीधे ही घर निकल जाती है तो निश्चय ही ‘शिशु विकास केंद्र’ पहुंचने में कम-से-कम आधा घंटा लेट हो जाएगी । छः से सवा छः होते ही मिसेज हबेवाला की त्योरियां आसमान छूने लगेंगी ।

“अपने को पन घर-गिरस्ती करने कूं होता…तुम लोग सोच के रक्खेगा कि अपना बच्चा है मजा में हय अऊर जबी मरजी आएगा तबी लेकर आने में वांदा नई, पिच्छू सोचो, अमेरा क्या हालत होएगा! तुमेरा सरखा दो-चार मदर लोग ऐइसाच करेगा न तो अपना तो भरा बैइठ जाएंगा । अबी कैइसा बोलना…ये जो आया लोग है ना, बोत हरामी है । दस मिनट पन ऊपर रुकने को बोलेगा न तो सिद्धा ओवरटैम मांगते…क्या करने का, अबी बोलो?”

खैर…मिसेज हबेवाला के गुस्से को तो छोड़ो, मिनी क्या कम संवेदनशील है? पिछले दिनों की ही घटना है । वडाला के आसपास लोकल दुर्घटना की वजह से हारबर ब्रांच की लगातार तीन-चार लोकलें लेट हो गई। निरुपाय उसने चर्चगेट पहुंचकर लोकल पकड़ी । सारी हबड़ा-तबड़ी के बावजूद मिनी के पास वह घंटे-भर देरी से पहुंची । जैसे ही उसने ‘शिशु विकास केंद्र’ वाली इमारत की पहली सीढ़ी पर पांव रखा, मिनी की किकियाती चीखें सुनकर उसका दिल दहल गया…

“ये डेढ़ साल का छोकरी तुमेरा आने का टेम बोत पेचानती…सामसेच बोमा-बोम करके रखी है..नई आया मंगता, नई मैं…” हबेवाला ने तौबा करनेवाले अंदाज में कानों को हाथ लगाया ।

मिनी उसे देखते ही कैसी छाती से चिपक गई थी!…

मिनी सचमुच उसकी प्रतीक्षा करती रहती है । दफ्तर से छूटकर वह मिनी के पास भागी-भागी जैसे ही पहुंचती है, खिलौनों के ढेर को नकार कर डगडग करती भागती है उसकी ओर । फिर लाख मिसेज हबेवाला उसे अपनी गोदी में आने के लिए फुसलाएं…तरह-तरह के प्रलोभन दें मगर वह जो गलबहियां डालकर उससे चिपटती है, हरगिज नहीं पलटती । जैसे आशंकित हो कि एक क्षण के लिए भी वह पलटी तो कहीं मम्मी उसे दोबारा हबेवाला की गोद में टिकाकर न चल दें । अबोध बच्ची की समझदारी पर दोनों पति-पत्नी चकित हो उठते । उनकी मजबूरी का अहसास कहीं उसके नन्हे मन को भी है तभी…सुबह वह शाम से बिलकुल विपरीत मिनी होती है ।

…वह और कपिल दफ्तर के लिए निकलते समय मिनी को उसके तामझाम सहित ‘शिशु विकास केंद्र’ पहुंचाने जाते । मिनी बिना किसी हील-हुज्जत के हबेवाला की गोद में उतर जाती । उनके आग्रह पर उसे और कपिल को कई पप्पियां देती । मिसेज हबेवाला उनके नीचे उतरते ही उसे बालकनी में ले आतीं । वे नीचे ठमककर ऊपर देखते-सुनते हैं । मिसेज हबेवाला प्रशिक्षणी अंदाज में कहतीं, “ममा-पापा को एक फ्लाइंग किस तो दो मिनी! फौरन चाभी वाली गुड़िया-सी मिनी अपनी गुलाब की पंखुड़ी-सी हथेली सीप-से होंठों से छुलाकर हौले-से उनकी ओर उछाल देती ।

कपिल के डग भारी हो उठते, “छोड़ो भी यह नौकरी-फौकरी का चक्कर, घर बैठो…जैसे भी चलेगा, चलाएंगे…सच! इस गुड़िया को यूं छोड़कर जाना अखरता है…”

वह कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती । कहे भी क्या? भावुकता बड़ी दयनीय होती है, सचाई तंगदिल । यही सोचकर चुप्पी साधे रहती है ।

घर के सामने टैक्सी से उतरते ही उसने सोचा, नहाते-धोते अगर कपिल आ गए तो फौरन उन्हें ही ‘शिशु विकास केंद्र’ मिनी को लिवाने दौड़ा देगी । जितना परेशान वह पूरे रास्ते आन पड़ी इस मुसीबत को लेकर थी, उससे कहीं ज्यादा उद्वेलित हो उठी मिनी के समय पर न पहुंच जाने की प्रतिक्रियास्वरूप पैदा होनेवाली हुड़कन को लेकर । व्यवस्थित होकर घर से निकलने तक कपिल घर नहीं पहुंचे । आमतौर पर वे साढ़े सात से पहले कभी घर नहीं पहुंचते ।

सड़क पर आते ही एक खाली टैक्सी पर दृष्टि पड़ते ही हाथ दिखाकर टैक्सी रोक ली उसने । पैदल भी जा सकती है । मुश्किल से पांच-छः मिनट का पैदल रास्ता है ‘शिशु विकास केंद्र’ का । मगर देर-में-देर करने से क्या फायदा?

टैक्सीवाले से उसे बीस पैसे वापस लेने थे । न उसके पास छुट्टे थे न अपने पास । कोई दूसरा समय होता तो वह आसपास की दुकानों से छुट्टा करवाकर ही उसे पैसे देती । बीस पैसे कम नहीं होते । एक तरफ का बस का किराया निकल आता है ।

पहली सीढ़ी पर पांव रखते ही उसने थमककर आसपास तैर रही ध्वनियों को टोहा । मिनी के रुदन का कोई कतरा उस तक नहीं पहुंचा । लेकिन धीरज था कि वह उससे छूटकर पसीज रही हथेलियों में बर्फ-सा पिघल रहा था ।

उसने तीन-तीन सीढ़ियां एक साथ फलांगीं और दुमंजिला इमारत में लिफ्ट न होने की कमी को कोसा । अपनी शारीरिक अवस्था पर भी खयाल अटका कि ऐसी नाजुक स्थिति में उसे एक साथ इतनी सीढियां नहीं फलांगनी चाहिए। बैठे-बिठाए किसी और संकट में भी फंस सकती है वह!…

दरवाजे पर पहुंचकर कॉलबेल पर लगातार अंगूठा दबाए रही । अपनी अधीरता का आभास उसे स्वयं हुआ । प्रत्युत्तर में हबेवाला का अत्यंत खीज भरा स्वर दरवाजे की आड़ को चीरता उस तक दौड़ा आया, “अरे बाबा, कोन हय! काय के वास्ते इतना धांधल? दरवाजा तो खुलेगाच न पन बेल जलेगा कि नईं?”

वह बगैर उनसे मुखातिब हुए बच्चोंवाले हॉल की ओर बेतहाशा लपकी । उसे आशंका ही नहीं विश्वास था कि उसकी प्रतीक्षा में रो-रोकर बेहाल हुई मिनी हबेवाला की गोद में मिलेगी और त्रस्त मिसेज हबेवाला का पारा सातवें आसमान पर होगा । अवश्य ही वे उसे आखिरी नोटिस थमा देंगी, ‘कल से अपना बच्चा का कोई दूसरा प्रबंध करो, हम बच्चा संभालने का जिम्मेदारी लिया है, मां-बाप का संभालने का नई ।’ न मिसेज हबेवाला त्योरियां चढ़ाए हुए मिलीं, न उन्होंने उससे अन्यथा कहा-सुना ।

हॉल का परदा हटाते ही वह भीतर के दृश्य को अवाक् देखती रह गई । खिलौनों के ढेर से घिरी मिनी खेलने में व्यस्त थी । उसके पास बैठी थी मिसेज हबेवाला की बड़ी लड़की ग्रेस किसी पत्रिका में डूबी हुई । उससे रहा नहीं गया। अपराधबोध और खिसियाहट में मिले-जुले भाव से आक्रांत हो उसने पुकारा, “मिनी..”

मिनी ने खिलौनों के ढेर से सिर उठाया । विहंसते हुए उसे देखा । फिर अपनी नन्ही हथेलियों में दबे रबड़ के कुत्ते को उसकी ओर उठाकर, उसका पेट दबाकर छोटी आवारा थूथन-सी गोल बना तुतलाई, “बोब्बो…बोब्बो…”

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