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अकेले हैं तो क्या ग़म है—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Akele Hai to Kya Gam Hai-Grehlakshmi ki Kahaniya

गृहलक्ष्मी की कहानियां-पिछले एक महीने से सविता के व्यवहार में आए परिवर्तन से सतीश जी काफी परेशान थे। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर बात क्या है..?,सारा दिन चहकने व होंठों पर मुस्कान लिए घर के कामों में व्यस्त रहने वाली सविता अचानक से शांत कैसे हो ग‌ई है। सविता का ईश्वर पर पहले भी श्रद्धा और विश्वास था लेकिन इस प्रकार वह सारा दिन ईश्वर आराधना में नहीं डूबी रहती थी,सभी से मिलती-जुलती थी बातचीत करती थी, इस तरह से खोई-खोई सी और शांत तो कभी नही रहती थी।
सविता कम से कम दिन में एक बार तो अपने दोनों बच्चे बेटी शुभांगनी और बेटे शुभम से जरूर फोन पर बात करती थी। बेटी शुभांगनी का ब्याह जबलपुर में हुआ था लेकिन वह सागर में रहती थी क्योंकि उसका पति हरिश और वह दोनों सागर विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर थे और उनकी एक बेटी भी थी हर्षिता। बेटा शुभम और उस की पत्नी आरती बेंगलुरु के एक आई.टी.कंपनी में थे, उनका भी एक बेटा था अंश।
इधर सविता की चुप्पी सतीश जी को बेहद बेचैन कर रही थी और उधर सविता इस दुविधा में थी कि वह किस प्रकार अपने मन की व्यथा सतीश जी के संग साझा करे। सविता नहीं चाहती थी कि वह सतीश जी को उस सच्चाई से अवगत कराए जिसे सुन कर उन्हें दुख हो या उनके मन को ठेस पहुंचे। सविता असमंजस में पड़ गई थी कि वह सतीश जी से कैसे कहे कि जिन बच्चों पर वह अपनी जान छिड़कती थी, उनके एक फ़ोन कॉल पर वह सब कुछ छोड़-छाड़ कर उनके पास दौड़ी चली जाती थी। आज उन्हीं बच्चों को अपने ही माता-पिता की उपस्थिति खलने लगी है। उनके प्यार और दुलार को वे सिरदर्द समझते हैं।
सविता अक्सर सतीश जी को अकेला छोड़ कर क‌ई दिनों के लिए अपने बेटे या फिर बेटी के पास उनके बच्चों को संभालने के लिए चली जाया करती थी और सतीश जी भी कभी मना नहीं करते थे, भले ही सविता की अनुपस्थिति में उनका काम बढ़ जाता था। ऑफिस के साथ ही साथ घर का भी काम उनके सिर पर आ जाता था।
सविता के बेटा-बहू व बेटी-दामाद दोनों वर्किंग थे और उन्हें जब भी सविता की मदद की आवश्यकता पड़ती बेटा-बेटी अपनी-अपनी जरूरत के हिसाब से सविता को अपने पास बुला लिया करते थे। पिछले महीने जब सतीश जी सेवानिवृत्त हुए थे तो पूरा परिवार इकट्ठा हुआ था। बेटा-बहू, बेटी-दामाद और उनके बच्चे सभी आये थे, यह देख सविता और सतीश जी दोनों को यह सोच कर अति प्रसन्नता हुई थी कि आज के जमाने में जहां बच्चे अपने माता-पिता को बोझ समझते हैं वहीं उनके बच्चे उनका कितना ख्याल रखते हैं। सविता अपनी सखियों के मध्य कभी भी यह कहने से नहीं चूकती थी कि मेरे बच्चे मेरा अभिमान है। सतीश जी से तो वह अक्सर कहती अभी तो मैं मेरे बच्चों के पास उनकी जरूरत के हिसाब से जाती हूं लेकिन आपके रिटायरमेंट के बाद हम दोनों बच्चों के पास ही चल कर रहा करेंगे।
तब सविता को कहां पता था कि उसके अपने बच्चों का विचार उनके प्रति ऐसा है। सतीश जी के रिटायरमेंट पार्टी के बाद बेटी-दामाद अपने घर जा चुके थे, बेटा-बहू जाने की तैयारी में लगे थे. बहू आरती को नारियल के लड्डू बेहद पसंद है यही सोच कर जब सविता अपने हाथों से नारियल के लड्डू बनाकर एक टिफिन में ले कर उनके कमरे के करीब पहुंची ही थी कि वह दरवाजे पर ठिठक गई आरती अपने पति शुभम से कह रही थी –
“देखो अब हमें मम्मी जी की जरूरत नहीं है, अंश अब बड़ा हो गया है.तुम उन्हें साथ चलने को मत कहना क्योंकि अब वो अकेली नहीं उनके साथ पापा जी भी चलेंगे, पापा जी रिटायर जो हो ग‌ए हैं। तुमने देखा ना तुम्हारी बहन ने कैसे बड़ी चालाकी से मम्मी जी को यह कह कर टरका दिया कि मम्मी अब आप यहां पापा के ही साथ रहिए, पापा को आपके साथ की जरूरत है।” तभी शुभम बोला- “हां मुझे मालूम है मैं नहीं बोलूंगा मम्मी को साथ चलने के लिए ठीक है “
यह सब सुनकर सविता के पैरों तले जमीन खिसक गई, उसके दिल को धक्का लगा और वह पूरी तरह से टूट गई। बेटा-बहू और बेटी-दामाद ने उसके प्यार और जज्बातों का फायदा उठाया यह सोच कर सविता ने चुप्पी साध ली थी। एक रोज़ सुबह सुबह सविता ने सतीश जी से कहा – ” मुझे आश्रम ले चलिए मैं सत्संग में जाना चाहती हूं”
यह सुन कर सतीश जी ने भी बगैर कुछ कहे हामी भर दी, यह जानते हुए कि सविता को आश्रम और सत्संग में कोई खास रुचि नहीं है। दोनों तैयार हो कर शहर से दूर स्थित एक आश्रम में सत्संग एवं मन की शांति ढूंढने के लिए निकल पड़े। सविता अपने चित्त को शांत करने के लिए कार में भी भजन सुनने लगी। सतीश जी बिना कुछ कहे चुपचाप ड्राईव करते रहे. शहर से काफी दूर हाइवे पर निकल आने के बाद भी सविता चुप ही रही, तभी अचानक कार बंद हो गई, काफी कोशिशों के बावजूद वह स्टार्ट ही नहीं हुई। तब फिर सतीश जी ने कार सर्विशिंग सेन्टर में बात की तो उन्होंने बताया कि उनका एक ब्रांच हाइवे पर ही कुछ दूर में है, थोड़ी ही देर में मैकेनिक पहुंच जाएगा, तब तक वो वहां इंतज़ार करें.
हाइवे पर दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था। तभी सतीश जी ने देखा रोड की दूसरी तरफ घांस-फूस से बनी एक छोटी सी झोपडी दिखाई दे रही है। मेकेनिक के आते तक दोनों को वहीं रूकना था सो दोनों उस झोपडी की ओर बढ़ ग‌ए। झोपड़ी पर पहुंचे तो वहां एक बूढ़ी औरत मिली जो स्टोव में दूध उबाल रही थी। झोपड़ी के अंदर एक बैंच रखा था और सामने एक लकड़ी का पटिया जिस पर कांच की दो बर्नियां रखी थी जिसमें एक में कुछ बिस्किट्स रखे थे और दूसरे में कुछ रंग बिरंगी रेपर में बंधे टॉफी व चॉकलेट। सविता और सतीश जी को आया देख वह बुढ़िया खुश होती हुई बोली-
“आइए साहब…. आइए मैम साहब… आइए चाय पिएंगे…?मैडम अदरक-इलाइची वाली चाय बनाऊं.”
सविता उदासी भरे लफ़्ज़ों में बोली-
“हां अदरक-इलाइची वाली बना दो.”
चाय चढ़ाती हुई उस बुढ़िया ने कहा -“कहां जा रहे मैडम आप लोग.”
सविता ने अनमने ढंग से जवाब दिया-“आश्रम जा रहे हैं सत्संग के लिए “
“अच्छा…..!”कह कर वह बुढ़िया थोड़ी देर रूक गई फिर बोली-“मैडम वहीं आश्रम से कुछ ही दूर पर एक पिकनिक स्पॉट है वहां भी चले जाइएगा वह भी बहुत अच्छी जगह है”
अभी यह सब बातें हो ही रही थी कि कार सर्विस सेन्टर से मेकेनिक भी आ गया और सतीश जी उसके साथ कार की तरफ चले गए।
चाय बनाती हुई उस बुढ़िया ने फिर से कहा-“मैडम चाय के साथ कुछ बिस्किट भी दे दूं.”
” हां बिस्किट्स दे दो” तब तक सतीश जी भी आ गए। छोटे छोटे कांच के गिलास में चाय और एक चीनी मिट्टी के प्लेट में चार बिस्किट्स देते हुई वह बुढ़िया बोली -” लीजिए आप लोगों की गर्मागर्म चाय बिस्किट।”
झोपड़ी में बैठे रहने के दौरान सविता ने यह गौर किया कि सारा काम वह बुढ़िया अकेली कर रही है। चाय भी वही बना रही है, नाश्ता भी वही बना रही है और सर्व भी वही कर रही है, केवल बर्तन उठाने व मांजने धोने के लिए ही उसने एक लड़का रख रखा है। इतना सारा काम करने के बाबजूद उसके माथे पर ज़रा सा भी शिकन नहीं है ऊपर से उसके चेहरे पर आए पसीने की बूंदें उसके चेहरे के संग चमक रही थी। यह देख सविता चाय का घूंट लेती हुई बोली- ” तुम अपना सारा काम अकेली ही कर रही हो, तुम्हारा कोई नहीं है क्या..?”
इस पर वह मुस्कुराती हुई बोली-
“मैडम सड़क के उस तरफ एक बस्ती है जहां मेरा पूरा कुनबा रहता है मेरे चार बच्चे हैं दो लड़का,दो लड़की सब की शादी हो गई है और उन सब के भी बच्चे है। सभी बच्चे मेरी ही गोद में पले बढ़े हैं पर आज किसी को भी मेरी ज़रूरत नहीं है। पति को गुज़रे भी जमाना हो गया है”. फिर वह थोड़ी ठंडी सांस भरती हुई बोली-
“अब मैडम इस दुनिया में अकेले आए हैं और अकेले ही जाना है तो क्यों किसी के साथ की उम्मीद करना। अब बच्चों को मेरे साथ रहना पसंद नहीं है तो ना सही मैं क्यों इसका ग़म मनाऊं और इस बात पर रोऊं। दिन भर यहां काम करती हूं चाय-नाश्ता बेचती हूं और आराम से रहती हूं। अकेले हैं तो क्या ग़म”
उस बुढ़िया की बातें सुनकर सविता सोचने लगी जब ये अकेली इतना खुश रह सकती है तो वह क्यों नहीं..? उसके साथ तो उसका हमसफ़र भी है।
बुढ़िया की बातों के साथ-साथ सविता और सतीश जी ने चाय पी ली और तब तक कार भी ठीक हो गई। चाय और बिस्किट्स के पैसे दे जैसे ही सविता और सतीश जी कार में बैठे सविता ने कहा-
“आश्रम नहीं, आश्रम से आगे जो पिकनिक स्पॉट है वहां चलते हैं ऐसा कहते हुए सविता ने रेडियो पर एफ‌.एम का बटन दबा दिया जिस पर गाना बज रहा था “अकेले हैं…. तो क्या ग़म है…. चाहें तो हमारे बस में क्या नहीं..”
उस बूढ़ी औरत से मिल कर सविता के होंठों की मुस्कान लौट आई थी और चेहरे पर पिछले एक महीने से जो ग़म के बादल छाए हुए थे वह भी छंट गए।

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