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आधी अधूरी मां-गृहलक्ष्मी की कहानी: Mother story
Aadhi Adhuri Maa

Mother Story: जब से मैंने उसे स्कूल के प्रांगण में बिंदास खेलते देखा था तब से वह मुझे बहुत ही भा गई थी।चंपई रंग की,गोल शक्ल , छरहरा बदन और एक दम ही आत्मविश्वास से भरी चाल किसी का भी मन मोह लेती थी तो भला मैं कैसे बचूंगी।नई नई आई थी में शहर में,अभी बहुत कुछ जानना था स्कूल और शहर के बारे में,बस जान पाई थी तो कुछ शिक्षकों के नाम के साथ साथ कुछ सहाध्याईयों के नाम जिसमे रीया सब से अधिक अच्छी लगती थी।वर्ग में भी वही थी जो हाथ उठा के हर सवाल का जवाब देने को तत्पर रहती थी।सलीकेदार रिया सभी की ही चहेती थी चाहे अर्दली हो, शिक्षक हो या आचार्य,सब ही पसंद करते थे उसे।

  स्कूल पास कर लिया अच्छे नंबरों से तो बड़े और अच्छे कॉलेज में दाखिला भी हो गया रीया का।एक बार जिसे आगे रह कर काम करने की आदत बन जाती हैं वह सदा ही आगे ही रहता हैं।ठीक वैसे ही रीया का भी था इतने बड़े और ख्यातनाम कॉलेज में भी कुछ ही दिनों में वह स्थान पा लिया जो उसका अपने स्कूल में था।पढ़ाई के साथ साथ सभी ही प्रवृत्तियों में अग्रसर रहने वाली रीया कॉलेज के एक सितारे सी बन गई थी। इंटर कॉलेज प्रतियोगिता में अपने कॉलेज का नाम रोशन करने की वजह से सभी अध्यापक गण भी उसे काफी पसंद करते थे।ऐसे ही कब कॉलेज के चार साल निकल गए पता ही नहीं चला।कॉलेज में भी अच्छे नंबरों से पास होने वाली रीया को सभी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट से सामने से फोन आते थे,वजीफा देने का लालच भी देते थे लेकिन वह थी कि आगे पढ़ने के बजाय कोई नौकरी करना चाहती थी।

    इतनी ख्याति पाने वाली रीया अब कोई अच्छे काम की तलाश में थी और सही कहे तो नसीब की धनी थी वह,एक बहुत ही बड़े बिजनेस हाउस में एडमिनिस्ट्रेशन ऑफिसर की पोस्ट पर नियुक्ति मिल गई पहले तीन महीने अजमायीशी और बाद में पक्की नौकरी हो गई।दफ्तर में भी उसने बहुत ही ख्याति और मान पाया था।इतनी प्रमाणिकता और सच्चाई से काम करने वाली रीया एक के बाद एक तरक्की के सोपान चढ़ती गई और कैसे 5 साल बीत गए पता ही नहीं चला।इस दरम्यान उसकी दोस्ती उसकी सहकर्मवारी मोना से हो गई थी,पक्की वाली दोस्ती, आजकल जैसी क्षणिक या मतलब की नहीं।

मोना शादी शुदा थी,उसका तीन साल का बेटा भी था जो रीया को भी बहुत प्यार करता था,जब कभी भी मिलना होता था तो गले मिल बहुत प्यार करता था रीया को और रीया को भी  काफी लगाव हो गया था उससे।

  इतना लगाव रीया से रियांश का कुछ आश्चर्यजनक तो था ही लेकिन भविष्य की परिस्थितियों का  इंजन था ये पता नहीं था।उदास रहने वाली मोना  ने एक दिन जब वे मिले तो अपने मन की बात बता ही दी और रो पड़ी रोते रोते बताया कि उसका पति उस को बहुत ज्यादा ही मानसिक और शारीरिक रूप से  प्रताड़ित करता था जो असहनीय था,लेकिन रेयांश की वजह से वह सब कुछ अब तक सह रही थी।लेकिन उसका सब्र खत्म हो रहा था और ममता की मारी आत्महत्या के लिए सोच भी नहीं सकती थी।रीना ने उसे सांत्वना दी और सही निर्णय लेने के लिए कहा और बताया कि वह उसके साथ होगी जो भी निर्णय वह लेगी।कुछ ढाढस बंधने से मोना भी थोड़ी आश्वस्त हुई थी और थोड़ा मन भी हल्का हुआ था, मोना का,और वह उठ कर चली गई।कुछ दिन ऐसे ही गुजर गए और रीना भूल भी गई थी उन सब बातों को और अपने काम  में व्यस्त हो गई थी।

एक दिन रात को १२ बजे उसके घर के दरवाजे की घंटी बज उठी।उसने अभी अपना लैपटॉप बंद कर लेटी ही थी,थोड़ा तो आश्चर्य हुआ कि इतनी देर से कौन आया था क्योंकि उसके दरवाजे की घंटी तो दिन में भी एकाध बार ही बजती थीं।वह उठी और दरवाजे के पास खड़ी हुई और पृच्छा की कौन था बाहर तो मोना की आवाज सुन उसने जल्दी से दरवाजा खोल दिया तो रेयांश के साथ उतरा हुआ चेहरा ले खड़ी थी वह।एक हाथ में एक बड़ा सा  सूटकेस था और दुसरे हाथ की उंगली थामे रेयांश खड़ा था।उसने उन्हे अंदर बुलाया,जट से पानी ले आई और उन लोगो के साथ बैठ गई।उसे देख मोना का सब्र टूट गया और फूट फूट कर रोने लगी।रीना ने भी उसे रो लेने दिया ,जब थोड़ी शांत हुई तो उसने बताया कि उसके पति ने आज उसके साथ मार पीट की  लेकिन जब रेयांश पर भी हाथ उठाया तो  उससे सहन नहीं हुआ और वह घर छोड़ चली आई थी।रीया ने उसे ढाढस बंधवाई और कुछ खाने के लिए ले आई क्योंकि इतना कुछ होने के बाद मोना कुछ खा नहीं पाई होगी।

 मोना तो कुछ खा ही नहीं पाई किंतु रेयांश ने थोड़ा खाया और रात ज्यादा हो गई थी तो बहुत देर हो गई थी तो रिया ने मोना से कहा कि पहले वह रेयांश को सुला दे वरना उसकी सेहत खराब हो सकती हैं।दोनों को अपने कमरे में सोने जाने का कह वह खुद बैठक वाले कमरे में लेट गई और सोचते सोचते कब नींद आ गई उसे पता ही नही चला।जब कुछ आवाजें आई तो उसकी नींद खुली तो सुबह के 7 बज चुके थे और रसोई में मोना चाय बना रही थी तो वह बाथरूम में जा दैनिक क्रिया से मुक्त हो मोना के पास पहुंची तो वह चाय और कुछ बिस्किट्स ले बैठक वाले कमरे में बैठी हुई थी। दोनों ने एक दूसरे को देख सर हिला क्षेमकुशल की सबिति दी और चुप चाप चाय पीने लगे,दोनों को भी कुछ बोलने का मन नहीं कर रहा था क्योंकि बोलेंगे तो वही दर्द की याद आ जायेगी जो मोना सहती आ रही थी।चाय पी और दोनों ने रसोई घर में जा कुछ खाना बनाया और मोना ने छुट्टी लेने के लिए दफ्तर में फोन कर दिया और रीया तैयार हो दफ्तर चली गई।

 कुछ दिन बाद मोना थोड़ी संभली तो उसने भी दफ्तर जाना शुरू कर दिया और रेयाँश को बेबी सिटर के घर रखना शुरू कर दिया था।

   ऐसे ही साल खत्म हो गया  अब रेयांश भी दूसरी कक्षा में पढ़ने जाने लगा।एक और हादसा भी हुआ मोना अपने पुराने सहपाठी को मिली,उसे जानती तो थी ही और दो चार बार मिले उसके और नजदीक आ गई और कुछ दिनों बाद उससे शादी करने की सोची तो रिया ने उसे प्रोत्साहन दिया और उसकी हर हिसाब से मदद की।दोनों की शादी होते ही उन्हें मधुरजनी के लिए पहाड़ों पर आए प्रवासी जगह पर भेज भी दिया,रेयांश को अपने पास रखा और एक बहन कहो या सहेली कहो,का फर्ज निभाया था उसने। सात दिन बीत गए  थे,दूसरे दिन आने हो वाला था नवविवाहित जोड़ा ,रेयांश भी अपनी मां के आने की राह देख रहा था।शाम हो गई थी रिया टेलीविजन पर एक घरेलू धारावाहिक देख रही थी।बीच में विज्ञापन आया तो उसने चैनल बदल दी और उतनी देर समाचार देखने लगी।जो देखा वह उसके होश उड़ाने के लिए काफी था।

       मुख्य रास्ते में हुए एक दर्दनाक अकस्मात में मोना और उसके नए पति के सपनों की दुनिया  तार तार  हो गईं थी, सड़क पर बिखरे पड़े उनके मृत शरीर के अंगों की तरह।दोनों ने हनीमून के दौरान ही एक दूसरे को जान लिया था और उसके बारे में मोना ने रिया से फोन पर बात भी की थी और रीया ने उसको अभिनंदन के साथ आने वाले अच्छे दिनों के लिए शुभकामनाएं भी दी थी।क्या पता था ऐसा अंत होगा ये नई प्रणय कहानी का,जो शुरू होते होते ही खत्म हो गई!उदास सी  बैठी रही रीया,  अब सिर्फ और सिर्फ रेयांश के बारे में सोच आ रही थी।उसे कैसे बताना हैं उसकी मां के परलोक गमन के बारे में और आगे इसकी जिंदगी को कैसे संवारनी हैं यही खयाल आते गए।

 अब देखें तो रीया यकायक बहुत ही बड़ी और सयानी बन चुकी थी।उसने रेयांश को अपना लिया था शायद अपनी नौकरी के बाद रेयांश का महत्व उसकी जिंदगी बन चुका था।कुछ दिन बाद उसने दूसरे शहर में नौकरी ले ली और रेयांश को ले कर वह वहां चली गई। अब जाने कौनसा ऋणानुबंध था  जो रेयांश से उसे इतना लगाव होने लगा था।उसकी पूरी जिम्मेवारी ले उसे पढ़ाने के लिए ,उसके सर्वांगी विकास के लिए वह इतनी प्रयत्नशील रहती थी जैसे वह उसिका बच्चा हो।रेयांश भी धीरे धीरे मोना को भूल कर रीया का हो कर रह गया था।पूरे तीन साल हो गए थे रेयांश को रीया के साथ रहते और सभी जान पहचान वाले उसे रीया का ही बेटा समझते थे।

रीया के साथ दफ्तर में काम करने वाले लोग भी यही समझने लगे थे कि रेयांश उसीका बेटा हैं।

           देखते देखते रेयांश आठ साल का हो गया,पढ़ने में भी काफी होनहार था तो रीया भी उसके मानसिक और शारीरिक विकास का पूरा खयाल रखती थी।उसे प्रतिस्पर्धाओं में भी हिस्सा लेने भेजती थी,खेल प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेने भेजती थी।खुद व्यस्त होने के बावजूद वह रेयांश को किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने देती थी।लोग रेयांश को उसी का बेटा समझते थे,पहले वह स्पष्टीकरण करती थी लेकिन अब उसने भी स्वीकार कर लिया था कि जिसे जो समझना हैं समझते रहें।

  उसके दफ्तर में एक नई नियुक्ति हुई थी,कोई बड़ी कंपनी छोड़ उनकी कंपनी में आ रहा था।काफी चर्चे थे उसके जिसका नाम आर्यन था।कोई उसके व्यक्तित्व की चर्चा करता था तो कोई उसकी होशियारी का चर्चा करता था।महीने की पहली तारीख कब आई उसे भी पता नहीं चला और सब दफ्तर में कुछ कुछ चड भड़ चल रही थी,वह तो अपने काम में व्यस्त थी और किसी ने आके उसे बड़ी ही मधुर लेकिन रौबीली आवाज में गुड मॉर्निंग कहा तो वह चौक उठी और हड़बड़ा कर  खड़ी हो गई।घभराहट में उसका चेहरा लाल हो गया और उठते समय उसके घुंघराले बाल उसके चेहरे पर बिखर गए और नजर उठा के देखा तो एक गोरा चिट्टा,ऊंचा लंबा जवान उसके सामने खड़ा था।खिसीयाई सी मुस्कराहट दे उसने भी गुड मॉर्निंग कहा तो उसने अपना नाम दे परिचय दिया और बताया कि आज दफ्तर में  उसका पहला दिन था।फिर तो उसकी पास वाली कुर्सी पर रीया से इजाजत ले बैठ गया और अपना परिचय देने लगा और रीना से भी उसके बारे में पूछने लगा।कुछ तो दफ्तर और काम की भी बातें की और जब वह गया तो कुछ 20 मिनिट निकल चुके थे।रीया को भी उससे बात करके अच्छा लगा कुछ प्रभावित भी हुई और फिर कुछ सोच, अपने काम में व्यस्त हो गई।और अब ये सिलसिला रोज का हो गया और समय 20 से बढ़ कर 30 और 40 मिनिट का हो गया।और दोनों कब करीब आ गए दोनों को पता भी नहीं चला।अब तो कॉफी आदि के लिए बाहर भी मिलने लगे थे।रीया को भी अब जीवन में रेयांश के अलावा भी किसी की जरूरत महसूस होने लगी थी।शायद वह आर्यन के आने से पूरी हो रही दिखती थी।अब वह आर्यन की और से पहल की इच्छा रख रही थी।और वह दिन आ गया और आर्यन ने उसे शादी के लिए अपने माता पिता से बात की तो उन्होंने और रीया से मिलने की इच्छा जताई तो वह भी मिलने के लिए तैयार हो गई।एक अच्छे रेस्तरां में मिले तो उन्हे रीया भी पसंद तो आई लेकिन रीया के माता पिता से मिलने की इच्छा जताई,तो उसने उन्हे अपने माता पिता का फोन नंबर दे दिए और जब चाहें मिल सकते हैं ये भी बताया।

कुछ दिन बाद रीना के माता पिता भी आएं और आपस में काफी बातें हुई, रोके और शादी के मूहर्त भी निकलवाएं गए।अब तक किसी ने रियांश को देखा नहीं था, या उसके बारे में कोई बात हुई थी।शायद रीया उसके बारे में बताना भूल गई थी या वह उसके अस्तित्व में इतना रच गया था कि अपने जुड़ा होने का एहसास हो नहीं रहा था।

  शादी तय हो गई तो अब आर्यन भी उसके घर आने की सोच रहा था लेकिन व्यस्तता के कारण नहीं आ पाया।वैसे भी दफ्तर में तो दोनों मिलते ही थे।एक बार रात के 9 बजे बेल बजी तो रीया ने सोचा पता नहीं कौन होगा और रेयांश को दरवाजा खोलने के लिए बोला।जैसे ही रेयांश ने दरवाजा खोला तो सामने आर्यन खड़ा था लेकिन दोनों एक दूसरे को पहचानते नहीं थे तो उसने अंदर आके बताया कि कोई अजनबी आया था।जैसे रीया उठी और दरवाजे के पास गई उसके मुंह से उदगार निकले,” अरे आर्यन तुम?” लेकिन उसके उदगार से ज्यादा आर्यन का ध्यान रेयांश की और ज्यादा था।वह हैरान था कि कौन था वह,और रीना को मॉम कहकर क्यों बुला रहा था।शायद यहीं पर गुत्थी उलझना शुरू हो गई थी।रीया भी रेयाँश के सामने कोई स्पष्टीकारण नहीं करना चाहती थी और असमंजस में पड़ा आर्यन जल्दी से उठ बिना कुछ खाएं पिएं निकल लिया।दूसरे दिन जब वह रीया से मिला तो कुछ उदास सा था।उसने कुछ जबान से पूछा नहीं पर आंखे लगातार यही पूछ रही थी कि रेयांश कौन था।दफ्तर का समय पूरा हुआ तो रीना ने ही उसे चाय के लिए कहीं जाने के लिए बोला और दोनों एक रेस्तरां जाने की सोची।

     जब रिया रेस्टोरेंट पहुंची तो आर्यन वहां पहले से उसका इंतजार कर रहा था।दोनों एक टेबल पर बैठे और चाय के साथ कुछ सैंडविच ऑर्डर कर दिए। अब दोनों कौन बोलने की पहल करे उस इंतजार में मौन हो खिड़की के बाहर ताकते रहे, उस मौन को वेटर ने तोड़ा,“और कुछ सर, मेम?“ तो दोनों ने ना में सर हिला दिया और अपना अपना चाय का कप होंटो से लगा प्रश्न भरी नजर से एक दूसरे को देखते रहे और रिया ने ही पूछा,“ क्या बात थी आर्यन?” तो कप को टेबल पर रख आर्यन ने जवाब में ही सवाल कर दिया,” ये रेयांश तुम्हारा बेटा हैं क्या? तुमने  मुझे कभी बताया ही नहीं!” थोड़ी शिकायत भी झलक रही थी उसकी बात से।अब रिया को समझ आया उसकी असमंजस का।हंस दी वह प्यारी सी हंसी और शरारत भरी  हां में सर हिला दिया तो आर्यन को काटो तो भी खून न निकले ऐसी शक्ल बना कर एकटक रिया की और देखता रहा जहां सिर्फ और सिर्फ शरारत ही थी।अब आर्यन के प्रश्नात्मक भाव पर गुस्सा हावी होने लगा था और रिया को भी ये दिख रहा था तो वह फटाक से बोली,”हां भी और ना भी!“अब प्रश्न और गुस्से में आश्चर्य भी शामिल हो चुका था।अब रिया को जल्दी से बतानी ही थी हकीकत ।उसने संक्षिप्त में पूरी बात बताते हुए बोल भी दिया कि अब वह रेयाँश से जुदा नहीं रह सकती।उसका पिता भी अब इस दुनिया में नहीं हैं और वह भी नहीं चाहेगी कि वह मोना या उसके पति के किसी रिश्तेदार या दूर के रिश्तेदारों के घर पले बढ़े।वैसे भी आज तक किसी ने भी उसे ढूंढने की कोशिश नहीं की थी।पूरी बात सुन कर आर्यन का मन भर आया और रिया के प्रति प्यार के साथ साथ एक मान सम्मान की भावना उभर आई।वह कुछ भी बोल नहीं पाया सिर्फ रिया की और देख अपना सर जुका उतना ही बोल पाया, “मेरे लिए भी रेयांश एक फरिश्ते से कम नहीं होगा,सलाम हैं आधी अधूरी किंतु मां को!” दिनों एक दम हल्के फुल्के मिजाज में रेस्टोरेंट से बाहर आएं और हाथों में हाथ डाल गाड़ी की और चल दियें।

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