खुशियों की पोटली-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Khushiyon ki Potli

Hindi Kahani: रिया की चहकती हुई आवाज सुनकर मेरा मन खुशी से झूम उठा।
आज रिया की बरसों की तपस्या पूरी हो गई थी और मेरी भी।
वह मेरी गले से लगकर चहकती हुई बोली “ममा,मेरी जॉब लग गई है,मुंबई के एक बहुत ही प्रतिष्ठित कंपनी में…!
है ना ये बहुत ही अच्छी खबर…!”
उसकी खुशी और चहकती हुई हंसी देखकर मैं फूली नहीं समा पा रही थी मगर मेरे भीतर मां का एक दिल था जो घबरा रहा था।
अपनी जवान बेटी को इतनी दूर मुंबई अकेले कैसे भेज दूं। कहीं ना कहीं यहीं पर बेटे और बेटी का फर्क सामने आ जाता है। मगर मैं मन मसोसते हुए उसकी खुशी पर साथ दे रही थी।
उसने मेरी दोनों हथेलियां को पकड़कर अपनी हथेलियां से रगड़ते हुए कहा
“ ममा, आज मेरी तरफ से पार्टी…। सोनम कैफेटेरिया में।
ग्रैंड पार्टी तो तब दूंगी जब मेरे हाथ मेरी सैलरी आएगी।
ममा देखो ना मेरी आंखों के नीचे कैसे काले घेरे आ गए हैं। कितनी रातें जाग जाग कर मैं पढ़ाई की, इंटरव्यू की तरह तैयारी की।

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अब देखो मेरी मेहनत पूरी हो गई। मैं कितनी खुश हूं।”
“हां बेटा।पर इतने पैसे खर्च मत करो।मैं घर में ही कुछ बना लेती हूं।
“ममा प्लीज ऐसी बातें मत करो।
आज तो आपको पूरी तरह से रिलैक्स करने हैं। आप किचन में नहीं जाओगे।”
 सोनम कैफे हमारे एरिया का सबसे महंगा रेस्टोरेंट था।
मैंने उससे कहा
“अपने पापा को फोन कर दो।”
“ मैं फोन कर ही तो रही हूं।”
रिया की जॉब लग गई है, यह सुन कर अविनाश भी बहुत खुश हुए।
डिनर करते हुए भी मैं बहुत ही ज्यादा टेंशन में थी।
एक तो मुंबई और ऊपर से इतनी सुंदर जवान ,कमसिन लड़की का अकेली रहना मुझे ठीक नहीं लग रहा था।
पर रिया की खुशी में हम शरीक थे।
घर लौटने के बाद मैं अपने कमरे में खिड़की के पास बैठी बाहर देख रही थी।
मुझे उदास देखकर अविनाश ने मुझसे पूछा “क्या बात है  सोनाली, तुम रिया के इस सफलता  से खुश नहीं हो।”
“खुश तो हूं मगर मुझे डर लग रहा है। जवान लड़की अकेले मुंबई में कैसे रहेगी?”मैंने अपनी आशंका व्यक्त करते हुए कहा।
“वह बड़ी हो गई है। आखिर इतने सालों तक वह मैनेजमेंट की पढ़ाई अकेले रहकर की है ना..!”
“ मगर पढ़ाई की बात अलग है। वहां स्टूडेंट के ग्रुप होते हैं। यहां अकेले नौकरी करना और सब कुछ अकेले ही हैंडल करना है।”
“अरे सोना…, हमारी बिटिया बहुत स्मार्ट है।तुम्हें उसपर विश्वास करना चाहिए।”
 तब तक रिया दरवाजे से भीतर आ चुकी थी। वह प्रश्न सूचक निगाहों से मेरी तरफ देखते हुए बोली
“मॉम आपको अपनी बिटिया पर भरोसा नहीं है!
आपने ही तो मुझे संस्कार दिए  हैं ना…! मैं आपकी कसम खाकर कहती हूं मैं कोई भी गलत काम नहीं करूंगी ।
प्लीज मुझ पर ट्रस्ट करो।”
उसके मुरझाए से चेहरे को देखकर मेरा मन कचोट गया।
मैंने उसे तुरंत ही अपने गले से लगाते हुए कहा
“मेरे कहने का मतलब यह नहीं था रिया।
मैं तो बस डर रही थी मुंबई जैसे आधुनिक शहर में तुम अकेले कैसे रह सकती हो… कोई भी डर जाएगा।”
“नहीं  मां ,कोई डरने की बात नहीं है और आज के जमाने में सब कुछ चुटकियों में होता है।
अगर मुझे जरूरत पड़ेगी तो मैं फ्लाइट लेकर यहां जाऊंगी अगर आपको आना हुआ आप भी फट से फ्लाइट पकड़ के आ सकती हैं।
इसमें सोचने वाली क्या बात है?” रिया की बातों में वजन था।
आखिर इतनी महंगी पढ़ाई पढ़ाने के बाद घर में बैठाने का कोई औचित्य भी नहीं था। और फिर अपने बच्चों पर भरोसा तो करना ही चाहिए।
भुवन,रिया का बड़ा भाई भुवनेश्वर में नौकरी कर रहा था।
पिछले साल ही उसकी नौकरी लगी थी। वह भी अकेला ही रह रहा था। अब बिटिया की जॉब लग गई है मगर वह लड़की है इसलिए उसे अकेले भेजते हुए जी घबरा रहा है।
देखते-देखते रिया के मुंबई जाने का समय हो गया।
अपने सामान लिए वह एयरपोर्ट के अंदर जा रही थी।
अपने हाथ हिलाते हुए उसने कहा
 “मॉम- डैड, आप लोग ठीक से रहिएगा और मेरी चिंता मत करना…!”
उसके जाने के बाद शुरू के एक-दो दिन तो मेरा मन ही नहीं लग रहा था।
रिया न जाने वहां कैसे रह रही होगी। दस तरह की बातें सुनने में आती है।
कोई नैतिकता तो रही नहीं गई ,आज के बच्चों में।
आज का जनरेशन पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुका है।
आए दिन न्यूज में की बातें सुनने में आतीं हैं।
अपनी बिटिया को लेकर मुझे वही डर लग रहा है।
देखते-देखते 6 महीने गुजर गए।
नई नौकरी थी। रिया को छुट्टी ही नहीं मिल रही थी।
कंपनी ने दिवाली में आने के लिए छुट्टी देने की बात कही थी मगर दिवाली के समय भी उसे छुट्टी नहीं मिली।
उसने फोन कर कहा
“ममा, मुझे तो छुट्टी मिल नहीं सकती आप और पापा यहां आ जाइए। भैया को भी यहीं बुला लेती हूं।”
“ठीक है। 6 महीने के बाद मैं अपनी रिया से मिलने जा रही थी।मेरे साथ अविनाश भी बहुत खुश थे।
भुवन डायरेक्ट फ्लाइट से मुंबई आने वाला था।
रिया के साथ दीपावली मनाने की खुशी दिल में लिए मैं मुंबई की फ्लाइट में बैठ तो गई।
हम मिडिल क्लास फैमिली के लोग हैं। अगर रिया ने किसी को पसंद कर लिया तो बात अलग है।
अगर नहीं किया तो अपने जात बिरादरी में शादी करना होगा।
अब लड़की नौकरी करने लगी है…तो अब लड़का भी खोजना होगा।
मैं अपनी चिंता जाहिर करते हुए अविनाश से कहा तो वह उसी तरह से बेफिक्र होकर बोले
“वह भी मिल जाएगा सोना, तुम चिंता मत करो।”
एयरपोर्ट पर रिया लेने के लिए आई हुई थी।
उसके फ्लैट में घुसते ही मन खुशी से भर गया।
 सामने  सजा संवरा ड्राइंग रूम था जिसे उसने बहुत ही करीने से सजा रखा था।
 “ममा यह मेरा ड्राइंग रूम और यह मेरा बेडरूम,यह तुम्हारा रूम और यह भैया का कमरा… कैसा लगा?.. और हां मैं तो भूल ही गई… यह तुम्हारा पूजा घर।
 मां मैं यहां रोज पूजा करके ही घर से निकलती हूं।” वह चहकती हुई अपना पूरा घर दिखाते हुए मुझे बता रही थी।
ताजे चढ़े हुए फूल इस बात की गवाही दे रहे थे।
यह देखकर मैं कृतज्ञता  भरी नजरों से रिया को देखने लगी।
“ बिटिया इतनी बड़ी हो गई है..  यह आज पता चला।
कल तक गुड्डे गुड़़ियों के लिए  मचलने वाली लड़की आज इतनी समझदार हो गई थी। मुझे बहुत अच्छा लगा।
 
दूसरे दिन गोवर्धन पूजा थी और उससे आगे छोटी दीपावली फिर बड़ी दीपावली।
तब तक भुवन भी आ चुका था।दोनों भाई बहन ने मिलकर  सारे प्रोग्राम तय कर लिए थे।
 दीपावली तक रिया का घर रंग बिरंगे फूल,लाइट की लड़ियों से सज चुका था।
रिया और भुवन ने कई तरह की मिट्टी की कलाकृति और रंगोली के सामान खरीद लिए थे।
तरह-तरह की कलाकृतियां घर की शोभा बढ़ा रही थीं।
शाम होते होते रिया ने कई पैकेट लेकर घर में आई।
 मैंने रिया से कहा
“इतने सारे पैकेट?इसमें क्या है?”
“ममा,इसमें फुलझड़ियाँ और दीवाली के पटाखे हैं।”
“इतने सारे… तू छोड़ेगी?”
“अरे ममा,  मैं नहीं छोडूंगी यह सब मैं यहां रहने वाले बच्चों के लिए मंगाई हूं। यहां झुग्गियों में गरीब बच्चे रहते हैं। बेचारे दिवाली और होली के लिए तरसते हैं।
कहां उनके पास पटाखे और फुलझड़ियां छोड़ने के पैसे हैं… इसी कारण मैंने उन्हें सोसाइटी में बुलाया है। अब मैं किचन में जा रही हूं उनके लिए मिठाइयां और खाना बनाऊंगी।”
शाम होते पास के स्लम एरिया के कई बच्चे रिया को ढूंढते हुए उसकी सोसाइटी में पहुंच गए।
रिया ने सभी बच्चों के हाथों में मिठाई  और फुलझड़ियों और पटाखों के पैकेट्स दिए और उन सबके साथ खुद भी पटाखे छोड़ने लगी।
काफी देर तक पटाखे और फुलझड़ी छोड़ने के बाद उसने सभी बच्चों को खाना खिलाया।
उन बच्चों की खुशी देखते हुए ही बन रहा था जैसे कोई अपना मिल गया हो।
सभी बच्चे रिया को दीदी दीदी करते हुए उसके आगे पीछे घूम रहे थे और रिया उन बच्चों के हाथों में और फुलझड़ियां, अनार और रोशनी पकड़ाते हुई बच्ची बनी नाच रही थी।
तभी उसकी नजर मेरे ऊपर पड़ी।
उसने कहा
“ ममा इधर आओ ,देखो यह सब मेरे बच्चे हैं!” फिर वह जोर से हंसने लगी।
उसने फिर कहा
“ममा इन सब बच्चों को मैं अपने पैसे से पढ़ाती हूं। यह लोग यहीं नगरपालिका के स्कूल में पढ़ते हैं। उनके सारे पढ़ाई और उनके खर्चे मैं ही उठाती  हूँ।
अभी दिवाली आ रही थी तो मैंने उनसे कहा था कि तुम सब मेरे घर आ जाना साथ में दिवाली मनाएंगे और खाना खाएंगे।”
यह सब देखकर और सुनकर मेरी आंखें भर आईं।
मैं कभी रिया के घर को देख रही थी, कभी रिया को और कभी उसकी छोड़ी हुई फुलझड़ियों से आकाश में बनती हुई झड़ियां…!”
कौन कितना खूबसूरत था… पता नहीं पर खुशी से मेरी आंखें बहने लगीं थीं।
इतने अच्छे संस्कार तो मैं नहीं दिए थे…!! रिया वह कर रही थी जो करने की किसी को हिम्मत नहीं होती है।
उसने मेरे हाथ में एक रोशनी पकड़ा दिया और कहा
“ममा तुम भी छोड़ो।”
वह फिर उन बच्चों के बीच रम गई थी उनके बीच खुशियां बांटने ….!
उसकी हंसी के साथ मैं भी हंसने लगी और उन निश्छल खुशियों में खो गई।
मुझे सब कुछ मिल गया था।