high functioning anxiety
High Functioning Anxiety

Summary: जब सब कुछ संभालना ही तनाव बन जाए: हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी की सच्चाई

हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें महिलाएं बाहर से आत्मविश्वासी और सफल दिखती हैं, लेकिन भीतर लगातार तनाव और डर से जूझती रहती हैं। रिसर्च बताती है कि सामाजिक दबाव और परफेक्शन की उम्मीदें इस चुप संघर्ष को और गहरा कर देती हैं।

High Functioning Anxiety: आज की महिला को अक्सर ‘स्ट्रॉन्ग’, ‘इंडिपेंडेंट’ और ‘सब कुछ संभाल लेने वाली’ कहा जाता है। वह अपने काम, परिवार और रिश्तों के बीच संतुलन बनाती हुई हर भूमिका को बखूबी निभाती दिखाई देती है। लेकिन मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इसी आत्मनिर्भरता के पीछे कई बार एक चुपचाप पलती हुई मानसिक परेशानी छिपी होती है, जिसे हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी कहा जाता है। यह ऐसी चिंता है जो दिखाई नहीं देती, लेकिन लगातार भीतर ही भीतर असर डालती रहती है।

हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी कोई आधिकारिक मानसिक बीमारी नहीं है, लेकिन मनोविज्ञान में इसे एक व्यवहारिक पैटर्न के रूप में समझा जाता है। इसमें महिला अत्यधिक चिंता और तनाव के बावजूद अपने दैनिक काम सामान्य या उससे बेहतर तरीके से करती रहती है। बाहर से उसकी ज़िंदगी व्यवस्थित और सफल लगती है, लेकिन भीतर लगातार बेचैनी, डर और असंतोष बना रहता है। यही वजह है कि इस स्थिति को पहचानना अक्सर मुश्किल हो जाता है।

शोध बताते हैं कि महिलाओं में एंग्जायटी से जुड़ी समस्याएं पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक पाई जाती हैं। इसकी एक बड़ी वजह सामाजिक अपेक्षाएं हैं। बचपन से ही महिलाओं को ज़िम्मेदार, समझदार और सबका ख्याल रखने वाला बनने की सीख दी जाती है। धीरे-धीरे वे अपनी चिंता को दबाकर काम में झोंक देती हैं। यह चिंता बाहर से मेहनत और परफेक्शन के रूप में दिखती है, लेकिन अंदर मानसिक थकान बढ़ती जाती है।

woman moods
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हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी से जूझ रही महिलाएं अक्सर खुद भी यह नहीं मानतीं कि उन्हें किसी तरह की मानसिक परेशानी है। क्योंकि वे अपना काम कर पा रही होती हैं, रिश्ते निभा रही होती हैं और जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटतीं। ऐसे में उन्हें लगता है कि यह सामान्य तनाव है। शोध बताते हैं कि महिलाएं अपनी भावनात्मक परेशानी को हल्के में ले लेती हैं और मदद मांगने से कतराती हैं।

मन की बेचैनी का असर धीरे-धीरे शरीर पर भी दिखने लगता है। नींद का ठीक से न आना, लगातार थकान महसूस होना, सिरदर्द या पेट से जुड़ी समस्याएं आम हो जाती हैं। कई बार महिला खुद नहीं समझ पाती कि यह शारीरिक लक्षण असल में मानसिक तनाव की अभिव्यक्ति हैं। रिसर्च के अनुसार, लंबे समय तक अनदेखी की गई एंग्जायटी आगे चलकर गंभीर मानसिक और शारीरिक समस्याओं में बदल सकती है।

woman anxiety
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हाल के अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि सोशल मीडिया महिलाओं की चिंता को और गहरा कर रहा है। ऑनलाइन दिखने वाली परफेक्ट ज़िंदगी, सफल करियर और खुशहाल परिवार की तस्वीरें महिलाओं को खुद से तुलना करने पर मजबूर करती हैं। इससे यह भावना जन्म लेती है कि वे कहीं न कहीं पीछे रह गई हैं। यह दबाव हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी को और मजबूत करता है।

हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी से निपटने का पहला और सबसे अहम कदम है इसे पहचानना। शोध बताते हैं कि जब महिलाएं अपनी लगातार बेचैनी को “नॉर्मल स्ट्रेस” मानकर नजरअंदाज करती रहती हैं, तब समस्या और गहरी होती जाती है। यह समझना ज़रूरी है कि बाहर से सब ठीक दिखना, अंदर के तनाव को खत्म नहीं करता। अपनी बेचैनी को नाम देना ही बदलाव की पहली सीढ़ी है।

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से जुड़े अध्ययनों के अनुसार, परफेक्शनिज़्म हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी का बड़ा कारण है। हर काम को बेहतरीन करने की मजबूरी महिलाओं को लगातार मानसिक दबाव में रखती है। समाधान यह है कि “परफेक्ट” की जगह “पर्याप्त अच्छा” को स्वीकार किया जाए। जब महिला खुद से अवास्तविक उम्मीदें कम करती है, तो चिंता अपने आप हल्की होने लगती है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के मुताबिक, लगातार व्यस्त रहना एंग्जायटी को छुपा देता है, लेकिन ठीक नहीं करता। दिनभर खुद को काम में झोंक देना कई महिलाओं की आदत बन चुकी है। समाधान यह है कि जानबूझकर खुद को रुकने की अनुमति दी जाए। बिना किसी लक्ष्य के आराम करना, कुछ देर अपने विचारों के साथ बैठना और शरीर के संकेतों को सुनना मानसिक संतुलन को बेहतर बनाता है।

भावनाओं को लंबे समय तक दबाए रखना एंग्जायटी को और मजबूत करता है। जर्नल ऑफ एंग्जायटी डिसऑर्डर्स में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, जब महिलाएं अपनी चिंता, डर या थकान को किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करती हैं, तो मानसिक बोझ कम होता है। अपनी भावनाओं के लिए जगह बनाना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-देखभाल का हिस्सा है।

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अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार, हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी में काउंसलिंग और खासतौर पर कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी प्रभावी मानी जाती है। यह महिलाओं को अपनी सोच के पैटर्न पहचानने और उन्हें बदलने में मदद करती है। थेरेपी यह सिखाती है कि हर स्थिति को नियंत्रित करना जरूरी नहीं और हर जिम्मेदारी अकेले उठाना भी आवश्यक नहीं है।

नींद की कमी, अनियमित दिनचर्या और लगातार थकान एंग्जायटी को बढ़ाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट्स बताती हैं कि पर्याप्त नींद, हल्की शारीरिक गतिविधि और संतुलित रूटीन दिमाग को शांत करने में अहम भूमिका निभाते हैं। जब शरीर को आराम मिलता है, तो मन भी खुद को सुरक्षित महसूस करता है।

हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी से जूझ रही महिलाओं के लिए सबसे बड़ा समाधान यह समझना है कि मदद मांगना असफलता नहीं है। इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, समय पर सहायता लेने से एंग्जायटी के लक्षण काफी हद तक कम किए जा सकते हैं। खुद को आखिरी प्राथमिकता बनाने की आदत बदलना ही असली सुधार की दिशा है।

सोनल शर्मा एक अनुभवी कंटेंट राइटर और पत्रकार हैं, जिन्हें डिजिटल मीडिया, प्रिंट और पीआर में 20 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने दैनिक भास्कर, पत्रिका, नईदुनिया-जागरण, टाइम्स ऑफ इंडिया और द हितवाद जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया...