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papi devta by Ranu shran Hindi Novel | Grehlakshmi

सुधा अचेत होकर फर्श पर गिरने लगी तो वह उसे संभालने का साहस भी नहीं कर सका।

सुधा फर्श पर गिर चुकी थी-अचेत-उसके पगों के बिलकुल समीप। तब भी उसने कुछ नहीं कहा-केवल उसे देखता रहा। सुधा की दोनों हथेलियां रक्त से तर थीं। रक्त सूखकर धीरे-धीरे जमता जा रहा था। उसने देखा, सुधा की आंखों पर से चश्मा छिटककर गिर पड़ा है। दोनों शीशे टूटकर टुकड़ों में एक तस्वीर थी-उसके पति की तस्वीर-जिसकी मृत्यु का वह जिम्मेदार था-इंस्पेक्टर जोशी। ऐसा लगता था मानो शीशे के हर टुकड़ों में झलकती तस्वीर ठहाके लगा रही हो-उसका मजाक बना रही हो-उससे कह रही हो, ‘देखा इंस्पेक्टर, एक स्त्री का सुहाग उजाड़ने पर क्या परिणाम होता है ? तुम जलोगे-सारी जिन्दगी अपनी भूल की आग में जलोगे-तुम बड़े से बड़ा पश्चाताप करोगे तब भी संसार की एक पतिव्रता स्त्री कभी क्षमा नहीं करेगी। हा-हा-हा-हा-हा…हा-हा-हा-हा-हा…हा-हा- हा-हा-हा।

General

सुधा के पति का ठहाका उसके कानों में गूंजने लगा तो उसने शीशे के टुकड़ों पर से दृष्टि हटा ली। उसने बाबा भगत राम जी को देखा। बाबा सहमे-सहमे खड़े थे। उसने सुधा की मां को देखा। उन्होंने सहमकर बच्चे को अपनी छाती में और भी सख्ती के साथ समेट लिया। परन्तु बच्चा उसके मुखड़े पर लाल रक्त देखकर मुस्करा रहा था। अपने अनजानेपन में शायद यह बच्चा भी उसका मजाक बना रहा था। इंस्पेक्टर जोशी की आंखों में आंसू आ गए-पश्चात्ताप के आंसू-सच्चे मोतियों समान। इन आंसुओं के बहने से पहले उसने एक पल सुधा को देखा। फिर पलटकर तेजी के साथ बाहर निकल गया।

गली में अंधकार था। दुकानें बन्द थीं। सड़क की चहल-पहल समाप्त हुई दिखाई पड़ रही थी। फिर भी उसने कीचड़ से लथपथ होकर जलते हुए अपने चेहरे तथा गर्दन का रक्त पोंछ कर कम कर लिया। ऐसा न हो कि रक्त में डूबा चेहरा देखकर कोई गलत अनुमान लगा बैठे।

लखनऊ ! सुबह का समय था।

इंस्पेक्टर जोशी अपने बंगले में सोफे पर धंसा हुआ खामोशी के साथ एक के बाद एक सिगरेट पीते हुए अपने भविष्य पर गौर कर रहा था-उसका भविष्य, जिसे बरबाद करने के लिए वह पहले ही पग उठा चुका था। उसकी परेशानी उन अधजले-बुझे सिगरेट के टुकड़ों से साफ प्रकट थी जो बगल की छोटी मेज पर रखे ऐश-ट्रे के अन्दर तथा बाहर पड़े हुए थे। परन्तु उसके दिल को एक सन्तोष भी था। उसने जो भी पग उठाया था ठीक ही था। वह अन्तरात्मा को धोखा नहीं दे सकता था। यही कारण था कि उसने इस घटना में किसी से कोई राय भी नहीं ली थी। केवल दिल की बात मानी थी क्योंकि जब दिल को सन्तोष नहीं मिलता है तो मस्तिष्क का सन्तुलन डगमगा जाता है।

यही कारण था कि मेरठ के समीप दिल्ली होते हुए भी वह अपने दादा से मिलने नहीं गया। वह जानता था कि उसके विवाह की आशा में प्रसन्नता से विभोर होकर वह इस समय उसका स्वागत इस प्रकार करेंगे कि उसे अपनी वास्तविकता प्रकट करना असंभव हो जायेगा। यदि वह उन पर अपने आने का भेद खोल देगा तो उनका दिल टूट जाएगा। शायद हृदय की गति भी बंद हो जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह अपने पोते को जीते जी बरबादी की आग में हर्गिज नहीं कूदने देंगे। यही सब सोच-समझकर उसने अपने दादा से मिलना उचित नहीं समझा था।

बैठे-बैठे उसे काफी देर हो गई-लगभग ग्यारह बज गए। परन्तु उसे अब समय की चिन्ता जरा भी नहीं थी। उसे प्रतीक्षा थी, अपनी ‘रिपोर्ट’ के अनुसार विभाग से ‘सस्पेन्सन आर्डर’ की। उसने भूल की है-एक बहुत बड़ी भूल-और इसलिए उसे अवश्य सजा दी जाएगी। यह न्याय की मांग थी। उसकी कनपटी तथा गर्दन की चमड़ी में जलन थी। कटे हुए निशान आड़ी-तिरछी लकीरों में उभरते हुए सूजकर लाल हो गये थे। रह-रहकर जब वह इन पर निर्ममता से अंगुलियां फेरता तो उसकी आंखों के सामने सुधा का मुखड़ा आकर खड़ा हो जाता। उसकी आंखों के बड़े-बड़े आंसू-उसकी सिसकियां-हिचकियां-तड़प और छाती पर भी रक्त के धब्बे थे। कुछ छींटे पैंट पर। वह अमिट तथा असीमित घृणा। शायद उसकी सजा के बाद सुधा के दिल को थोड़ा-बहुत सन्तोष मिल जाएगा। उसके दुख का बोझ कम हो जाएगा। शायद उसके दिल की घृणा भी कम हो जाए…शायद उसे अपने अन्तिम विचार पर संदेह था। एक नारी उस व्यक्ति को कभी क्षमा नहीं कर सकती, जो उसके सुहाग की मृत्यु का जिम्मेदार हो। जाने क्यों उसके मन में सुधा के लिए इतनी सहानुभूति समा गई थी कि उसके दिल की शान्ति के लिए वह अपनी जान भी देने को अन्दर ही अन्दर तड़प रहा था।

कहीं सुधा की मजबूर अवस्था देखकर उसे प्यार तो नहीं हो गया है ? नहीं-नहीं-ऐसा कैसे हो सकता है ? प्यार तो वह किरण से करता है-करता नहीं है, तो विवाह के बाद करने लगेगा। परन्तु क्या उसको सजा हो जाने के बाद किरण उससे इसी प्रकार प्यार करती रहेगी ? उसकी दीवानगी में अन्तर तो नहीं आयेगा ? नहीं-बिल्कुल नहीं। वह तो अपने जीवन की अन्तिम सांसों तक उसे प्यार करते रहने का दावा करती है। वह किरण को समझा देगा कि अदालत की दी हुई सजा से उसकी एक बहुत बड़ी भूल का प्रायश्चित हो जायेगा। यदि उसने अपनी भूल का प्रायश्चित नहीं किया तो एक निर्दोष की मृत्यु उसके दिल पर जीवन भर के लिए पाप का बोझ बन जायेगी। उसकी रातों की नींद हराम हो जाएगी, जीना कठिन हो जाएगा। एक अबला की आह कभी बेकार नहीं जाती।

सहसा उसके बंगले के पोर्टिको में कुछ आहट हुई। उसने वहीं से बैठे-बैठे गर्दन उचकाकर देखा-एक कांस्टेबल अपनी साइकिल को स्टैंड पर खड़ा कर रहा था। वह अपनी जगह से नहीं उठा परन्तु उसके चेहरे से साफ प्रकट था कि वह कांस्टेबल की ही प्रतीक्षा कर रहा था। उसे अपनी रिपोर्ट के अनुसार ‘सस्पेन्शन आर्डर’ मिलने की आशा थी। उसकी भूल पर मुकदमा चलाने के लिए विभाग को नौकरी से ‘सस्पेण्ड’ करना आवश्यक था परन्तु जब उसने ‘कांस्टेबल’ के हाथ में कोई ‘फाइल’ या लिफाफा नहीं देखा तो आश्चर्य हुआ।

‘कांस्टेबल’ ने दरवाजे पर आकर अन्दर आने की आज्ञा ली। उसके समीप आकर खड़ा हो गया और सलाम किया। फिर बोला, ‘‘डी.आई.जी. साहब ने आपको तुरन्त याद किया है।’’

‘‘क्यों ?’’ अपने मस्तक पर बल डालकर उसने उसी प्रकार बैठे-बैठ पूछा।

‘‘मुझे नहीं मालूम सर !’’ कांस्टेबिल ने लाचारी प्रकट की।

इंस्पेक्टर जोशी ने पल भर सोचने के बाद एक गहरी सांस ली और फिर बोला, ‘‘ठीक है-तुम चलो, मैं आता हूं।’’

कांस्टेबिल सलाम करके चला गया तो इंस्पेक्टर जोशी कुछ देर तक उसी प्रकार बैठा सिगरेट फूंकता रहा और सोचता रहा कि आखिर अब डी.आई.जी. साहब ने उसे क्यों बुलाया है ? क्यों नहीं अब तक उसका सस्पेंशन आर्डर जारी किया। परन्तु फिर वह एक अनुमान लगाकर हल्के से मुस्करा दिया। उसका इरादा अटल था। डी.आई.जी. साहब तो क्या संसार की कोई ताकत भी उसको अपने पाप का प्रायश्चित करने से नहीं रोक सकती। उसने वर्दी नहीं पहनी। बंगला नौकर के सुपुर्द किया और साधारण शहरी वेश-भूषा में वह उनके बंगले की ओर निकल गया।

डी.आई.जी. साहब के बंगले के मुख्य द्वार में प्रवेश करते हुए उसने इधर-उधर देखा-शायद किरण कहीं दिखाई दे जाए। परन्तु वह कहीं नहीं थी। उसकी मम्मी भी नजर नहीं आईं। शायद अन्दर किसी कमरे में हों। डी.आई.जी. साहब का दफ्तर उनके बंगले के कोने वाले कमरे में था। वहां कुछेक कांस्टेबिल इधर-उधर खड़े थे। एक कांस्टेबिल द्वारा उसने डी.आई.जी. साहब को अपने आने की सूचना भेजी। डी.आई.जी. साहब ने उसे तुरन्त बुला लिया। वह अन्दर पहुंचा। डी.आई.जी. साहब को सलामी देने के बजाए नमस्ते किया तो वह अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे कुछ रुष्ट से हो गये। रुष्ट होने का एक कारण यह भी था कि इस समय वह बिना वर्दी के उनके दफ्तर में उपस्थित हुआ था। धड़कते दिल के साथ वह उनकी मेज के समीप जाकर खड़ा हो गया। परन्तु जब उनकी दृष्टि से अपनी दृष्टि मिलाने का साहस नहीं कर सका तो वह इधर-उधर देखते हुए उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगा। बंगले के अन्दर जाने के लिए इस कमरे में दो दरवाजे और थे। दोनों दरवाजों पर ही परदे टंगे हुए थे। परन्तु एक परदे की लहर साफ बता रही थी कि कोई इसके पीछे छिपा खड़ा है। वह समझ गया यह कौन हो सकता है ? किरण तथा उसकी मम्मी !

डी.आई.जी. साहब ने अपनी कुर्सी पर पीछे आराम के साथ पीठ टेक ली थी। उनके हाथों में सिगार सुलग रहा था। उन्होंने इंस्पेक्टर जोशी के चेहरे पर अनेक खराशें देखीं तो गौर किए बिना नहीं रह सके। ऐसा लगता था मानो किसी बिल्ली ने उसे अपने पंजों द्वारा नकोट लिया हो। परन्तु जब वह कोई उचित अनुमान नहीं लगा सके तो उन्होंने पूछा, ‘‘यह खराशें कैसे लगीं ?’’

‘‘यह सुधा के नाखूनों के निशान हैं।’’ अपने आप पर काबू करते हुए उसने कहा।

‘‘बेवकूफ।’’ डी.आई.जी. साहब सुधा का नाम सुनते ही भड़क उठे। सिगार को सख्ती से मुट्ठी में बांधकर खड़े होते हुए उन्होंने कहा, ‘‘क्या तुम पिछले दिनों इसीलिए गायब थे कि तुम्हें सुधा से मिलना था ? यदि यह फाइल मेरे पास तुरन्त आ जाती तो मैं तुम्हें वहां हर्गिज नहीं जाने देता।’’ उन्होंने सामने मेज पर रखी एक फाइल की ओर इशारा किया और दो पग कुर्सी से बाहर हटते हुए बात जारी रखी। बोले, ‘‘मैंने कई बार तुम्हारे पास कांस्टेबिल भेजा, परन्तु तुम एक बार भी नहीं मिले। मुझे नहीं मालूम था कि तुम इतने मूर्ख हो। अवश्य तुमने उसे बता दिया होगा कि उसका पति निर्दोष था मगर खैर।’’ उन्होंने एक सांस ली, ‘‘अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। मैं हर्गिज ऐसा नहीं होने दूंगा। मुझे इस मामले को दबाना ही पड़ेगा। इसी में तुम्हारी भलाई है…और इसी में मेरे खानदान की इज्जत है। भूल जाओ कि तुमने सुधा से मिलकर कभी इस सत्य को प्रकट भी किया है।’’

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इंस्पेक्टर जोशी ने बीच में कुछ कहना चाहा। परन्तु डी.आई.जी. साहब उसे बिना कोई अवसर दिए उसी प्रकार कहते रहे, ‘‘अगर यह बात नहीं दबाई गई तो पुलिस विभाग की भी बहुत बदनामी होगी। जनता कहेगी कि पुलिस की लापरवाही के कारण अदालत ने एक निर्दोष को मृत्यु-दण्ड दे दिया।’’

‘‘सर।’’ इंस्पेक्टर जोशी ने बहुत गम्भीर मुद्रा में कहा, ‘‘अपनी इस भूल की सजा के लिए ही तो मैंने यह रिपोर्ट भेजी है। मुझे सजा मिलनी ही चाहिए- अवश्य-वरना सारा जीवन मेरी अन्तरात्मा मुझे धिक्का- रती रहेगी। मैं अपने-आपको कभी क्षमा नहीं कर सकूंगा।’’

‘‘बेटा।’’ डी.आई.जी. साहब ने अचानक सब्र के साथ नम्रता बरती। उसके समीप आए। प्यार से उसके कन्धे पर हाथ रखा और बोले, ‘‘पुलिस के आदमी को इतना भावुक नहीं होना चाहिए। मैं तुम्हें अवश्य इस भूल की सजा उठाने की आज्ञा दे देता परन्तु जरा सोचो, क्या तुम्हें सजा हो जाने के बाद सुधा का पति जीवित होकर उसे वापस मिल जायेगा ? जिस हत्यारे ने सेठ गोविन्द प्रसाद की हत्या की है वह पेशेवर हत्यारा है। उसे तो हर अवस्था में ही मृत्यु दण्ड मिलेगा।’’

‘‘सर।’’ इंस्पेक्टर जोशी ने उसी गंभीरता से कहा, ‘‘इससे मेरी अन्तरात्मा को ही नहीं बल्कि उस दुखिया के दिल को भी सन्तोष मिल जायेगा जिसके पति की मृत्यु का मैं जिम्मेदार हूं-केवल मैं…।’’

डी.आई.जी. साहब ने इंस्पेक्टर को समझाना चाहा। उनके होंठ खुले भी परन्तु जब शब्द नहीं मिल सके तो अपने होंठों को भींचते हुए उन्होंने अपना हाथ झटककर उसके कन्धे पर से हटा लिया। सख्ती से मुट्ठी बांधकर सिगार का कश लेते हुए कुछ खिसियाये-से कमरे में इधर-उधर टहलने लगे, इस प्रकार मानो इंस्पेक्टर जोशी को समझाने का हल ढूंढ़ रहे हों। परन्तु अन्त में वह समझ गए कि इंस्पेक्टर जोशी का धर्म उसके पिता का धर्म है-सत्य-और यह सत्य है कि इंस्पेक्टर जोशी ने भूल की है और उसे इसकी सजा अवश्य मिलनी चाहिए। इंस्पेक्टर जोशी की जिद्द के आगे वह हार गये तो जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गए-पीठ पीछे टेक ली और इंस्पेक्टर को गौर से देखा। फिर सख्ती के साथ बोले, ‘‘तुम जा सकते हो।’’

इंस्पेक्टर जोशी ने उन्हें नमस्ते किया और उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना कमरे से बाहर निकल गया। लॉन में पहुंचकर मुख्य द्वार के लिए उसने अभी कुछेक पग बढ़ाए ही थे कि तभी किरण उसके सामने आ गई। इंस्पेक्टर जोशी के पग स्थिर हो गए।

‘‘आनन्द।’’ किरण ने उसके समीप रहकर भी इस प्रकार कहा मानो बहुत दूर से पुकार रही हो। उसके स्वर में दर्द था। आंखों में निराशा आंसुओं का रूप लिए झिलमिला रही थी। निश्चय ही उसने परदे की आड़ में खड़े होकर उसकी बातें सुन ली थीं। उसने कहना चाहा, ‘‘आनन्द…’’ परन्तु फिर इसके आगे उसके होंठ थरथराने लगे तो वह चुप हो गई।

इंस्पेक्टर जोशी के दिल को धक्का लगा। परन्तु वह अपने कर्तव्य से पीछे हटने वाला नहीं था। किरण पर उसे दया आई। किरण को उस पर कितना विश्वास था-और वह उसका संसार बसाने से पहले ही बरबाद करके चला जा रहा है। वह किरण का हाथ पकड़ते-पकड़ते रह गया। उसकी आंखों में झांककर भीगे स्वर में बोला, ‘‘किरण, यदि मुझसे जरा भी प्यार हो तो उस दिन की प्रतीक्षा अवश्य करना जब मैं अपनी भूल की सजा समाप्त करके वापस लौटूं। फिर मैं तुम्हें यहां से लेकर दिल्ली चला जाऊंगा। वहां हमारा एक छोटा-सा घर होगा-बहुत सुन्दर घर। तुम देख लेना किरण, मेरी सजा की पूर्ति के बाद हमारे घर पर उस विधवा की आह कभी बिजली बनकर नहीं गिर सकेगी। तब मुझे अपने पाप से मुक्ति भी मिल चुकी होगी। हम खुश रहेंगे-सदा-सदा के लिए।’’

किरण के आंसू बहकर गालों पर चले आए। परन्तु सत्य के पुजारी पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। शायद वह उसके दिल का दोष था। यदि उसे किरण से प्यार होता तो वह उसकी प्रसन्नता, उसके सुख के लिए अपने ध्येय से हट जाता। प्यार के पीछे जो भी बलि दी जाए कम है। बल्कि इस समय किरण के आंसू देखकर उसे सुधा के आंसू याद आ गए-मोटी-मोटी बूंदों वाले आंसू। उन्हें याद करके उसके दिल पर छाले पड़ने लगे तो उसने किरण की आंखों की गहराई में झांककर फिर पूछा, ‘‘मेरी प्रतीक्षा करोगी ना ?’’

किरण के होंठों पर एक सिसकी उभर आई तो वह अपने आपको संभाल नहीं सकी। उसने अपना चेहरा हथेलियों में छिपा लिया और पलटकर रोती हुई बंगले के अन्दर भाग गई। जिस व्यक्ति से उसने प्यार किया, वह कितना निर्दयी है-कठोर। शायद उसके पास दिल नहीं है वरना उसे तो उसके एक इशारे पर अपनी जान भी दे देनी चाहिए थी।

इंस्पेक्टर जोशी किरण की इस बात से कोई अनुमान नहीं लगा सका। परन्तु उसने मन ही मन एक इरादा अवश्य कर लिया था। यदि किरण ने उसकी प्रतीक्षा की तो वह अपने आपको तुरन्त उसके हवाले कर देगा। सजा के बाद उसे प्यार की आवश्यकता पड़ेगी-सख्त आवश्यकता। यह आवश्यकता निश्चय ही उसके मन में किरण के लिए ऐसा प्यार उत्पन्न कर देगी जैसा वह स्वयं भी चाहता है।

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