papi devta by Ranu shran Hindi Novel | Grehlakshmi

दिल्ली। मौसम गुलाबी। हल्की-हल्की ठण्डक पड़ रही थी। सुबह के लगभग ग्यारह बजे थे। आनन्द जोशी ने अपने बंगले के मुख्य द्वार पर पहुंचकर एक गहरी सांस ली और फिर पल भर रुककर खड़े-खड़े एक उड़ती हुई दृष्टि से बंगले का वातावरण देखा। पुराने ढंग का बंगला। मोटी-मोटी कलकतिया खपरैल पर काई जम रही थी। दीवारें कुछ पीली थीं। लॉन की चहारदीवारी पर तो मानो युग से सफेदी नहीं की गई थी। परन्तु इसके विपरीत अन्दर का लॉन काफी सुन्दर था।

पापी देवता नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

क्यारियां हरी-भरी थीं। फुलवारियां फूलों से लदी थीं। फिर भी सब कुछ सूना था-खामोश। उसे कोई भी नजर नहीं आया तो वह आगे बढ़ा, पोर्टिको के बाद बरामदे में पहुंचकर वह रुक गया। बरामदे में रखे गमलों में सुन्दर फूल पौधे थे। दीवारों पर कुछ लम्बी-लम्बी तस्वीरें थीं-पहाड़ी झरने तथा नदियां।

दरवाजे की ओर वह बहुत भारी पगों से आगे बढ़ा। अपने ही घर में जाने का साहस नहीं होता था। अपने दादा को वह क्या मुंह दिखाएगा ? क्या कहेगा उनसे ? उसने उनकी इच्छाओं पर पानी ही नहीं फेरा बल्कि जेल जाकर उस खानदान के मस्तक पर कलंक भी लगा दिया है जिसे अपनी मेहनत तथा ईमानदारी पर गर्व था। फिर भी वास्तविकता का सामना करना था। कब तक अपने दादा से मुंह छिपाता ? उसने एक गहरी सांस ली और फिर अन्दर पहुंच गया। बंगले की यह बैठक थी-एक बड़ा ड्राइंगरूम। फर्श पर मानो युगों पुरानी कालीन थी-चूहों के कतरने से कुछेक जगहों पर फट गई थी। काली लकड़ी के बने पुराने ढंग के फर्नीचर-स्प्रिंगदार मोटे तथा चौड़े सोफे। ‘कार्नर्स’ पर पीतल के लम्बे-लम्बे फूलदान। दीवारों पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें।

वह आगे बढ़ा और एक थके तथा हारे हुए जुआरी के समान बीच वाले लम्बे सोफे पर बैठ गया। पीठ उसने पीछे टेक ली। हाथ कन्धों से सीधे करके सोफे पर फैला लिए और अपने पैर सामने की मेज पर रख दिए। चुपचाप-बहुत खामोशी के बाद सामने की दीवार पर देखते हुए वह सोफे पर इस प्रकार धंस गया था मानो आराम कर लेना चाहता हो।

सहसा उसकी आंखों के परदे पर उसके दादा की तस्वीर पड़ी तो चौंक गया। अपने आप ही उसके पैर झट नीचे फर्श पर आ गए। फैले हाथ गोद में चले आए। वह बिल्कुल सीधा होकर बैठ गया-सतर्क-और ध्यान से उस तस्वीर को देखने लगा जो उसकी आंखों के दर्पण पर आकर स्थिर हो गई थी। उसके दादा की तस्वीर सामने दीवार पर टंगी हुई थी। तस्वीर के फ्रेम पर ताजा फूलों की माला लटकी हुई थी। उसका दिल धक से कर गया। अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं होता था। दादा तस्वीर में उसी की ओर देख रहे थे। उनकी आंखें उसे अपनी ओर आकृष्ट कर रही थीं। वह खड़ा हो गया। धीरे-धीरे चलता हुआ वह उनके समीप पहुंचा। बहुत गौर से उन्हें देखने लगा-आंखों में अपनी भूल का पश्चात्ताप लिए हुए मानो उनसे क्षमा मांग रहा हो। उसके होंठ अपने आप कांप उठे। उसके स्वर में आश्चर्य के साथ दर्द भी था। वह बोला, ‘‘दादा…क्या तुम भी…तुम भी…’’ उसे अपना वाक्य पूरा करते हुए डर लग रहा था।

‘‘हां सरकार।’’ अचानक उसके कानों ने हरिया का स्वर सुना। उसने पलटकर उसे देखा-बहुत आश्चर्य के साथ। हरिया की आंखें सूनी थीं-स्वर गंभीर। वह कह रहा था, ‘‘बड़े सरकार का निधन तो तभी हो गया जब उन्होंने आपकी सजा के बारे में सुना। हृदय की गति बंद हो गई थी-तुरन्त ही। इस बात की सूचना मैं आपको अवश्य देना चाहता था परन्तु आपका दुख पहले ही इतना असहनीय था कि मैं इसे बढ़ाने का साहस नहीं कर सका।’’ हरिया का स्वर भर्रा गया। आंखें भी भी गईं तो वह अपने कन्धे पर पड़े गमछे के कोने से अपनी पलकें पोंछने लगा। बात उसने जारी रखी, ‘‘बड़े सरकार के कुछ मास बाद मेरे बापू का भी स्वर्गवास हो गया। तब से मैं अकेला इस घर की देखभाल कर रहा हूं।’’

‘‘ओह !’’ आनन्द जोशी के दिल को अन्दर ही अन्दर धक्का लगा। अब उसके सिर पर किसी की भी छाया नहीं थी। अपने आपको उसने इस संसार में बिल्कुल अकेला महसूस किया। उसके मुखड़े की उदासी बढ़ गई। होंठों से उसने कुछ भी नहीं कहा। कुछ पल दादा की तस्वीर को देखता रहा और जब उसकी पलकें भीगने लगीं तो वह दोबारा सोफे पर आकर बैठ गया। अपनी कुहनियां घुटनों पर टेककर दोनों हाथों को मोड़ते हुए उसने अपनी अंगुलियां आपस में बांध लीं और झुकते हुए इस पर मस्तक टेक दिया। अपनी आंखें बंद कर लीं और चुप्पी साध ली।

‘‘आप कब आए सरकार ?’’ कुछ पल बाद हरिया ने पूछा।

‘‘हूं ?’’ आनन्द जोशी मानो सपने से जागा। फिर आंखें खोलने के बाद सिर उठाते हुए बोला, ‘‘अभी ही आया हूं।’’

‘‘आप स्नान कर लें। तब तक मैं आपका नाश्ता तैयार करता हूं।’’

‘‘नाश्ता ?’’ आनन्द जोशी ने सोचा। फिर पूछा, ‘‘दादा के बाद तुम्हारा गुजर कैसे होता रहा ?’’

‘‘बंगले के पिछले भाग में साग-सब्जी का छोटा-सा खेत बना रखा है।’’ हरिया ने उत्तर दिया, ‘‘कुछ सब्जी मेरे काम आ जाती है, बाकी बेचकर किसी प्रकार अपना गुजारा कर लेता हूं। परन्तु अब आप आ गए हैं तो सब कुछ ठीक हो जायेगा।’’

उसने कोई उत्तर नहीं दिया। हरिया के बारे में सोचने लगा, जिसका खानदान उसके खानदान का नमक खाकर उसी के समान ईमानदार था। हरिया चाहता तो उसकी अनुपस्थिति में इस घर से क्या लाभ नहीं उठा सकता था ?

कुछेक दिन बीत गये। आनन्द जोशी किरण को भूल गया। उसे उससे कोई शिकायत नहीं थी। किरण को भूल गया तो सुधा भी उसके मस्तिष्क से उतर गई। परन्तु फिर भी उसके मन को वह सन्तोष नहीं मिला जिसकी उसे आशा थी। उसकी खामोशी, उदासी ऐसी थी मानो उसका कुछ खो गया हो। उसके रूखे-सूखे जीवन को मानो किसी की तलाश थी। किसकी ? यह वह स्वयं नहीं जानता था। उसका स्वभाव आरम्भ से ही गम्भीर था और गम्भीर हो गया। इन्हीं परिस्थितियों के अन्तर्गत उसका जीवन अपने अन्दर निराशा की कुढ़न लिए हुए सुस्त गति के साथ बीतने लगा। इतनी जल्दी किसी व्यापार को आरम्भ करने का उसका मन नहीं होता था।

दिल्ली में उसके परिचित लोग नहीं के बराबर थे क्योंकि अपने पिता की सरकारी नौकरी के समय वह उन्हीं के साथ रहता था-उत्तरप्रदेश में-एक जगह से दूसरी जगह, जहां कहीं भी उनका तबादला हुआ। इसी प्रकार उसकी पढ़ाई भी जारी रही। जवान हुआ तो नौकरी दिल्ली के बाहर ही मिली थी। इसलिए अब सजा काटने के बाद उसे दिल्ली में इधर-उधर जाकर किसी की चुभती दृष्टि का कोई भय नहीं था। फिर भी वह दिन भर अपने बंगले में पड़ा रहता-उदास-खामोश गम्भीर और कभी-कभी एक रोगी समान भी। हरिया उसकी अवस्था देखता-और बस, मन ही मन अपने मालिक के सुख की कामना करने लगता। कुछ कहने का साहस नहीं होता था।

परन्तु एक दिन आनन्द जोशी को जीवन की कुछ आवश्यकताएं शहर के खुले वातावरण में ले ही आईं। शहर की चहल-पहल में भटककर वह अपने दिल की गंभीरता को कुछ कम कर लेना चाहता था इसलिए पैदल ही निकल गया। तब दिन के लगभग ग्यारह बज रहे थे।

सहसा एक जगह पर उसके कानों में जानी-पहचानी आवाज पड़ी-ऐसी आवाज, जो सदा तड़प-तड़पकर उसके कानों में जहर घोलती रहती थी-और जिसे अब वह भूल चुका था। इस आवाज से पीछा छुड़ाकर वह एक बार फिर बहुत दूर भाग जाना चाहता था, परन्तु उसके पग जहां-के-तहां रुक गए।

‘‘अरे राजा-राजा बेटा-कहां चला गया राजा बेटा ?’’ एक अबला घबराई-घबराई चीख रही थी।

आनन्द जोशी ने पलटकर देखा तो ठिठक गया। उसके सामने सुधा खड़ी थी-सुधा, जिसकी बरबादी का वह अकेला जिम्मेदार था। कुछ ही दूरी पर थी वह। अपने आपको उसने छिपा लेना चाहा। पलटकर तुरन्त अपने रास्ते बढ़ जाना चाहा। कहीं ऐसा न हो कि सुधा उसे पहचान ले और भरे समाज में उसकी निन्दा करने लगे। दिल जला हो तो मानव किसी की परवाह नहीं करता है। नफरत-नफरत-नफरत-सुधा के मन में उसके प्रति और हो भी क्या सकता था ? परन्तु तभी अपना मुंह फेरने के बाद भी वह चौंक गया। पलटकर उसने फिर देखा। सुधा के पग भटके-भटके थे-तथा हाथ बहके-बहके। सुधा की स्थिति से साफ प्रकट था कि वह अन्धी है। अन्धी-वह सन्न रह गया। अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। सुधा अब तक भटकते पगों से चीख रही थी, ‘‘राजा-अरे राजा बेटा-कहां चला गया ?’’

सहसा सुधा घबराती हुई अनमनी-सी एक ओर यूं तेजी के साथ बढ़ी कि उससे जाकर टकराई। गिरती-गिरती बची। गिर पड़ती यदि वह उसे सहारा नहीं देता। सुधा ने उसकी परवाह नहीं की और आगे बढ़ते हुए पूरी ताकत से चीख पड़ी, ‘‘राजा…मेरा बेटा।’’ उसका स्वर कांप रहा था। उसकी चीख सुनकर कुछेक लोगों के बढ़ते पग धीमे पड़ गए। शायद इस अबला का बच्चा खो गया है

आनन्द जोशी ने झट इधर-उधर देखा। तभी सड़क के उस पार उसने सूट पहने दो व्यक्तियों को बहुत भेद भरी अवस्था में एक पुराने माडल की काली कार के अन्दर प्रवेश करते देखा। पुलिस की आंखें थीं इसीलिए वास्तविकता भांपने में चूक न सकीं। शरीर के अन्दर भी खानदानी चुस्ती थी। इससे पहले कि कार स्टार्ट हो, आनन्द जोशी हिरन के समान चौकड़ी भरकर ड्राइवर के समीप पहुंच गया। ड्राइवर कुछ भांप गया तो उसने तुरन्त कार स्टार्ट कर दी। जल्दी में कार ‘गियर’ पर एक झटका खाकर आगे भी बढ़ गई। परन्तु आनन्द जोशी का मस्तिष्क इससे भी अधिक तेज काम कर चुका था।

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