छह घंटों की यात्रा करने के बाद बस बंबई से दूर एक पिकनिक स्पॉट पर पहुंचने लगी तो अजय ने देखा, एक चट्टान के ऊपर ऊंचे-ऊंचे घने वृक्षों के मध्य डाक बंगला नारंगी रंग के फूल समान लग रहा है।
कुछ ही देर बाद बस इस डाक बंगले की चारदीवारी से सटकर रुक गई। लड़के-लड़कियां बस से उतरने लगे।
तभी वहां डाक बंगले के कुछेक चौकीदार तथा माली आ गए। उन्होंने बस के ऊपर से सामान उतारा। कुछ सामान नवयुवकों ने स्वयं संभाल लिया।
बगल में चारदीवारी से बंगले के लॉन में जाती हुई सीढ़ियां बनी हुई थीं। लड़के-लड़कियां लॉन में चले आए।
बंगले के सामने लॉन अधिक बड़ा नहीं था, परंतु सुंदर बहुत था। फूलों की क्यारियां तथा पत्थर की नीची-नीची अनेक बैंच थीं। बंगले के ठीक सामने लॉन के बाद सीढ़ियां गई थीं, कुछ आड़ी-तिरछी होकर बहुत दूर तक, नीचे तक, जहां अनेक छोटे-बड़े पत्थरों के बाद चट्टान का किनारा लिए पानी एक झील के समान फैला हुआ था। पानी में चट्टान के टुकड़े बीच-बीच में भी उभरे हुए थे।
लगभग एक फर्लांग बाद, झील के उस पार बहुत ऊपर से दो चट्टानों को काटते हुए एक झरना अपने संगीत के पूरे जोश के साथ नीचे गिर रहा था। झरने का झाग सूर्य के प्रकाश में चांदी समान चमक रहा था।
लड़के-लड़कियां बहुत देर तक आंखें बिछाए प्रकृति के इस दृश्य को देखते रहे।
अंशु ने सारा सामान डाक बंगले के अंदर रखवाया। अपने प्रोग्राम के अनुसार वह यह डाक बंगला पहले ही बुक करा चुकी थी।
बंबई से दूर, जंगल के इस किनारे मौसम बहुत सुहाना था, हल्का गुलाबी जाड़ा। लंच एक बजे के बाद लेने का विचार था, इसलिए लड़के-लड़कियां सीढ़ियां उतरकर झील की ओर चल पड़े।
कुछेक मनचले लड़कों ने सीढ़ियों की बजाय ऊबड़-खाबड़ तथा झाड़-झंखाड़ वाले रास्ते अपना लिए। किसी के हाथ में दरी थी तो किसी के हाथ में फलों की टोकरी। कोई कैमरा लिये था तो कोई रेडियोग्राम या अन्य साज।
जो नहाने या तैरने का शौक रखते थे, उनके हाथ में अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएं थीं। सीढ़ियां पार करने के बाद झरने के समीप जाने का रास्ता कठिन नहीं था। जगह-जगह पानी के मध्य छोटी-छोटी चट्टानें उभरी हुई थीं, जिनके द्वारा पानी फलांग कर बहुत आसानी के साथ झरने के समीप पहुंचा जा सकता था।
कुछेक जोड़े पानी के मध्य इन चट्टानों पर ही दरी बिछाकर बैठ गए थे।
मीना ने भी डाक बंगले में अपनी आवश्यकतानुसार कुछ कपड़े निकालकर एक एयरबैग में डाले। फिर तैराकी के कपड़े उठाकर दूसरे कमरे में बदलने के लिए जाने से पहले अंशु से पूछा, ‘क्या तेरा इरादा तैरने का नहीं है?’
‘इरादा तो था,‘ अंशु ने उत्तर दिया, ‘परंतु अब लाज आ रही है। अजय बाबू क्या सोचेंगे?’
‘अरे पगली, वह सोचेंगे-वोचेंगे कुछ नहीं। उल्टे तुझ पर दीवाने हो जाएंगे।’ मीना ने एक पल रुककर सोचा। फिर बोली ‘तू एक काम कर। पानी में तैरते-तैरते तू अजय बाबू के समीप से निकलना और फिर दो डुबकी लगाकर चीख पड़ना- बचाओ। यदि अजय बाबू को तुझसे प्यार होगा तो वे तुरंत ही तुझे बचाने के लिए छलांग लगा देंगे। बस, तू वहीं उनकी छाती से लिपट जाना। फिर तेरे तथा उनके प्यार के मध्य संकोच की दीवार जरा भी नहीं रहेगी। क्या समझी?’
अंशु लजाकर हल्के से मुस्करा दी। मीना की तरकीब तो वास्तव में बड़ी अच्छी है, परंतु इसे अपनाने के लिए उसका दिल तैयार नहीं हो सका।
‘शरमाती क्यों है? चल कपड़े बदल।’ मीना ने मानो आज्ञा देते हुए उसके सूटकेस से स्वयं ही तैराकी का वस्त्र निकाला और उसकी बांह पकड़कर खींचते हएु उसे अपने साथ दूसरे कमरे में ले गई।
दोनों ने तैराकी का वस्त्र पहना। फिर शरीर पर कंधों से घुटने तक झोलदार गाउन पहनकर दोनों डाक बंगले से बाहर आईं। मीना ने लॉन में से एक फूल तोड़कर अंशु की लटों में टांक दिया। एक फूल अपनी लटों में भी टांक लिया।
दोनों सीढ़ियां उतरीं। पीछे-पीछे अंशु का नौकर था, एक हाथ में एयरबैग तथा दरी लिये। दूसरे हाथ में रेडियोग्राम था।
अजय दूर, पानी के मध्य एक उभरी चट्टान पर खड़ा सिगरेट पी रहा था। उसकी दृष्टि अंशु पर ही चिपकी हुई थी। धूप में अंशु की सफेद पिंडलियां बिजली समान चमक रही थीं।
अंशु ने अजय को देखा तो लजा गई। चेहरा और गुलाबी हो गया। बोझिल पलकों का बोझ बढ़ गया। अजय से वह किस प्रकार दृष्टि मिलाए!
जारी…
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