निर्मला-मुंशी प्रेमचंद भाग -9

भाल. – तुम भी कभी-कभी बच्चों की सी बातें करने लगती हो। अभी उससे कह आया हूं कि मुझे विवाह मंजूर नहीं। एक लम्बी-चौड़ी भूमिका बांधनी पड़ी। अब जाकर यह संदेश कहूंगा, तो वह अपने दिल में क्या कहेगा, जरा सोचो तो? यह शादी-विवाह का मामला है। लड़कों का खेल नहीं कि अभी एक बात की, अभी पलट गए। भले आदमी की बात न हुई दिल्लगी हुई।

निर्मला नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

रंगीली – अच्छा, तुम अपने मुंह से न कहो। उस ब्राह्मण को मेरे पास भेज दो। मैं इस तरह समझा दूंगी कि तुम्हारी बात भी रह जाए और मेरी भी। इसमें तो कोई आपत्ति नहीं है?

भाल. – तुम अपने सिवाय सारी दुनिया को नादान समझती हो। तुम कहो या मैं कहूं बात एक है। जो बात तय हो गई है। अब मैं उसे फिर नहीं उठाना चाहता। तुम्हीं तो बार-बार कहती थी कि मैं वहां न करूंगी। तुम्हारे ही कारण मुझे अपनी बात खोनी पड़ी। अब तुम फिर रंग बदलती हो। यह तो मेरी छाती पर मूंग दलना है। आखिर तुम्हें कुछ तो मेरे मान-अपमान का विचार करना चाहिए।

रंगीली – तो मुझे क्या मालूम था कि विधवा की दशा इतनी हीन हो गई है? तुम्हीं ने तो कहा था कि उसने पति की सारी संपत्ति छिपा रखी है और अपनी गरीबी का ढोंग रचकर काम निकालना चाहती है। एक ही छटी हुई औरत है। तुमने जो कहा, वह मैंने मान लिया। भलाई करके बुराई करने में तो लज्जा और संकोच है। बुराई करके भलाई करने में कोई संकोच नहीं। अगर तुम ‘हां’ कर आए होते और मैं ‘नहीं’ करने की कहती, तो तुम्हारे संकोच उचित होता। ‘नहीं’ करने के बाद ‘हां’ करने में तो अपना बड़प्पन है।

भाल. – तुम्हें बड़प्पन मालूम होता हो, मुझे तो लुच्चापन ही मासूम होता है। फिर तुमने यह कैसे मान लिया कि मैंने वकलाइन के विषय में जो बात कही थी, वह झूठी थी? क्या यह पत्र देख कर? तुम जैसी खुद सरल हो, वैसे ही दूसरों को भी सरल समझती हो।

रंगीली – इस पत्र में बनावट नहीं मालूम होती। बनावट की बात दिल में चुभती नहीं। उसमें बनावट की गन्ध अवश्य रहती है।

भाल. – बनावट की बात ऐसी चुभती है कि सच्ची बात उसके सामने बिल्कुल फीकी मालूम होती है। यह किस्से कहानियां लिखने वाले, जिनकी किताबें पढ़- पढ़कर तुम घंटों रोती रहो, क्या सच्ची बातें लिखते हैं? सरासर झूठ का तूमार बांधते हैं! यह भी एक कला है।

रंगीली – क्यों जी, तुम मुझसे उड़ते हो, दाई से पेट छिपाते हो? मैं तुम्हारी बात मान जाती हूं तो तुम समझते हो, इसे चकमा दिया; मगर मैं तुम्हारी एक-एक नस पहचानती हूँ। तुम अपना ऐब मेरे सिर मढ़कर खुद बेदाग बचना चाहते हो, बोलो, कुछ झूठ कहती हूं? जब वकील साहब जीते थे तो तुमने सोचा था कि ठहराव की जरूरत ही क्या है, वह खुद ही जितना उचित समझेंगे देंगे, बल्कि बिना ठहराव के और भी ज्यादा मिलने की आशा होगी। अब वकील साहब का देहान्त हो गया तो तरह-तरह के हीले हवाले करने लगे। यह भलमनसी नहीं, छोटापन है। इसका इलाज भी तुम्हारे सिर है। मैं शादी-विवाह के नगीच न जाऊँगी। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करो। ढोंगी आदमियों से मुझे चिढ़ है। जो बात करो, सफाई से करो, बुरा हो या अच्छा। हाथी के दांत दिखाने के और, खिलाने के और वाली नीति पर चलना तुम्हें शोभा नहीं देता। बोलो, अब भी वहाँ शादी करते हो या नहीं?

भाल. – जब मैं बेईमान, दगाबाज़ और झूठा ठहरा, तो मुझसे पूछना ही क्या! मगर खूब पहचानती हो आदमियों को। क्या कहना है, तुम्हारी इस सूझबूझ की बलैया ले लें।

रंगीली – हो बड़े हयादार, अब भी नहीं शर्माते। ईमान से कहो, मैंने बात ताड़ ली कि नहीं!

भाल. – अजी जाओ, वह दूसरी औरतें होती हैं, जो मर्दों को पहचानती है। अब तक मैं यही समझता था कि औरतों की दृष्टि बड़ी सूक्ष्म होती है; पर आज यह विश्वास उठ गया और महात्माओं ने औरतों के विषयों में जो तब की बातें कहीं है, उनको मानना पड़ा।

रंगीली – जरा आइने में अपनी सूरत तो देख आओ, तुम्हें मेरी कसम है! जरा देख तो, कितना झेंपे हुए हो।

भाव. – सच कहना, कितना पा हुआ हूं?

रंगीली – उतना ही, जितना कोई भलामानस चोर चोरी खुल जाने पर झेंपता है।

भाल. – खैर, मैं झेंपा ही सही; पर शादी वहां न होगी।

रंगीली – मेरी बला से, जहाँ चाहो करो। क्यों, भुवन से एक बार क्यों नहीं पूछ लेते?

भाल. – अच्छी बात है, उसी पर फैसला रहा।

रंगीली – जरा इशारा न करना।

भाल. – अजी, मैं उसकी तरफ ताकूँगा भी नहीं।

संयोग से ठीक इसी वक्त भुवनमोहन भी आ पहुंचा। ऐसे सुन्दर, सुडौल, बलिष्ठ युवक कालेजों में बहुत कम देखने में आते हैं। बिल्कुल मां को पड़ा था, वही गोरा-चिट्टा रंग, वही पतले-पतले गुलाब की पत्ती के से ओठ, बही चौड़ा माथा, वही बड़ी-बड़ी आंखें, डील-डौल बाप का सा था। ऊँचा कोट, ब्रीचेज टाई, बूट हैट उस पर खूब खिल रहे थे। हाथ में एक स्टिक थी। चाल में जवानी का गुरूर था, आंखों में आत्मगौरव। रंगीली ने कहा – आज बड़ी देर लगाई तुमने। यह देखो, तुम्हारी ससुराल से यह खत आया है। तुम्हारी सास ने लिखा है। साफ-साफ बतला दो, अभी सवेरा है। तुम्हें वहाँ शादी करना मंजूर है या नहीं?

भुवन – शादी करनी तो चाहिए अम्मा, पर मैं करूंगा नहीं।

रंगीली – क्यों?

भुवन – इसमें शर्म की कौन-सी बात है? रुपये किसे काटते है? लाख रुपये तो लाख जन्म में भी न जमा कर पाऊंगा। इस साल पास भी हो गया, तो कम-से-कम पाँच साल तक रुपये की सूरत नजर न आयेगी। फिर सौ-दी सौ रुपये महीने कमाने लगूंगा। पांच-छः सौ तक पहुँचते-पहुँचते उम्र के तीन भाग बीत जायेंगे। रुपए जमा करने की नौबत न आएगी।। दुनिया का कुछ मजा न उठा सकूंगा। किसी धनी लड़की से शादी हो जाती, तो चैन से कटती। मैं ज्यादा नहीं चाहता, बस एक लाख नगद हो या फिर कोई जायदादवाली बेवा मिले, जिसके एक ही लड़की हो।

रंगीली – चाहे औरत कैसी ही मिले।

भुवन – धन सारे ऐबों को छिपा देगा। मुझे वह गालियां भी सुनाए, तो भी चूं न करूं। दुधारू गाय की लात किसे बुरी मालूम होती है।

बाबू साहब ने प्रशंसासूचक भाव से कहा – हमें उन लोगों के साथ सहानुभूति है और दुःख है कि ईश्वर ने उन्हें विपत्ति में डाला; लेकिन बुद्धि से काम लेकर ही कोई निश्चय करना चाहिए। हम कितने फटेहाल हो जायें, फिर भी अच्छी-खासी बारात हो जायेगी। वहाँ भोजन का ठिकाना नहीं। सिवा इसके कि लोग हंसे, और कोई नतीजा न निकलेगा।

रंगीली – तुम बाप-पूत एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो। दोनों उस गरीब लड़की के ऊपर छुरी फेरना चाहते हो।

भुवन – जो गरीब है, उसे गरीबों ही के यहाँ सम्बन्ध करना चाहिए। अपनी हैसियत से बढ़कर……………

रंगीली – चुप भी रह, आया है वहां से हैसियत लेकर। तुम कहां के ऐसे धन्नासेठ हो? कोई आदमी द्वार पर आ जाए, तो एक लोटे पानी को तरस जाए। बड़ी हैसियत वाले बने हो! यह कहकर रंगोली वहाँ से उठकर रसोई का प्रबन्ध करने चली गई।

भुवनमोहन मुस्कुराता हुआ अपने कमरे में चला गया और बाबू साहब मूंछों पर ताव देते हुए बाहर आए कि मोटेराम को अन्तिम निश्चय सुना दें, पर उनका कहीं पता न था।

मोटेरामजी कुछ देर तक तो कहार की बाट देखते रहे, जब उसके आने में बहुत देर हुई, तो उनसे बैठा न गया। सोचा यहाँ, बैठे-बैठे काम न चलेगा, कुछ उद्योग करना चाहिए। भाग्य के भरोसे यहाँ अड़ी किए बैठे रहे तो भूखों मर जाएंगे। यहाँ तुम्हारी दाल नहीं गलने की! चुपके से लकड़ी उठायी और जिधर कहार गया था, उसकी तरफ चले। बाजार थोड़ी दूर पर था, एक क्षण में जा पहुँचे। देखा तो बुड्ढा एक हलवाई की दुकान पर बैठा चिलम पी रहा था। उसे देखते ही आपने बेतकल्लुफी से कहा – अभी कुछ तैयार नहीं है क्या महरा? सरकार वहाँ बैठे बिगड़ रहे हैं कि जाकर सो गया या कहीं ताड़ी पीने लगा। मैंने कहा – ‘सरकार यह बात नहीं, बुड्ढा आदमी है, आते-ही-आते तो आएगा।’ बड़े विचित्र जीव हैं। न जाने, इनके यहाँ कैसे नौकर टिकते हैं।

कहार – मुझे छोड़कर आज तक दूसरा कोई टिका नहीं, और न टिकेगा। साल भर से तलब नहीं मिली। किसी को तलब नहीं देते। जहाँ किसी ने तलब मांगी और वे लगे उसे डांटने। बेचारा नौकरी छोड़कर भाग जाता है। वे दोनों आदमी जो पंखा झल रहे थे, सरकारी नौकर हैं। सरकार से दो अर्दली मिले है न! इसी से पड़े हुए हैं। मैं भी सोचता हूं जैसा तेरा ताना-बाना, वैसी मेरी भरनी। दस कट गये हैं, साल दो साल और इसी तरह कट जाएंगे।

मोटेराम – तो तुम्हीं अकेले हो? नाम तो कई कहारों का लेते हैं।

कहार – यह सब इन दो-तीन महीनों के अन्दर आये और छोड़-छाड़ कर चले गए। यह अपना रोब जमाने को अभी तक उनका नाम जपा करते हैं। कहीं नौकरी दिखाइएगा, चलूं?

मोटेराम – अजी, बहुत नौकरी हैं। कहार तो आजकल ढूँढ़े नहीं मिलते। तुम तो बहुत पुराने आदमी हो। तुम्हारे लिए नौकरी की क्या कमी है। यहाँ कोई ताजी चीज है? मुझसे कहने लगे, खिचड़ी बनाइएगा या बाटी लगाइएगा? मैंने कह दिया, सरकार बुड्ढा आदमी है, रात को उसे मेरा भोजन बनाने में कष्ट होगा। मैं कुछ बाजार से ही खा लूंगा। इसकी आप चिंता न करें। बोले, अच्छी बात है, कहार आपको दुकान पर मिलेगा। बोलो साहजी, कुछ तर माल तैयार है। लड्डू तो ताजे मासूम होते हैं। तौल दो एक सेर-भर, आऊँ वहीं ऊपर न?

यह कहकर मोटेरामजी हलवाई की दुकान पर जा बैठे और तर माल चखने लगे, खूब छककर खाया। ढाई-तीन सेर चट कर गए। खाते थे और हलवाई की तारीफ करते थे। साहजी, तुम्हारी दुकान का जैसा सुना था, वैसा ही माल पाया। बनारसवाले रसगुल्ले नहीं बना पाते, कलाकन्द अच्छी बनाते हैं। पर तुम्हारी उनसे बुरी नहीं। माल डालने से अच्छी चीज नहीं बन जाती, विद्या चाहिए।

हलवाई – कुछ और लीजिए, महाराज! थोड़ी-सी रबड़ी मेरी तरफ से लीजिए।

मोटेराम – इच्छा तो नहीं है, लेकिन दे दो पाव-भर।

हलवाई – पाव-भर क्या कीजियेगा? चीज अच्छी है, आधा सेर तो लीजिए।

खूब इच्छापूर्ण भोजन करके पंडितजी ने थोड़ी देर तक बाहर की सैर की और नौ बजते-बजते मकान पर आये। यहाँ सन्नाटा सा छाया हुआ था। एक लालटेन जल रही थी। आपने चबूतरे पर बिस्तर जमाया और सो गए।

सवेरे अपने नियमानुसार कोई आठ बजे उठे, तो देखा कि बाबू साहब टहल रहे है। इन्हें जगा देखकर पालागन कर बोले – महाराज, आप रात कहां चले गए? मैं बड़ी रात आपकी राह देखता रहा। भोजन का सब सामान बड़ी देर तक रखा रहा। जब आप न आये तो रखवा दिया गया आपने कुछ भोजन किया था या नहीं?

मोटेराम – हलवाई की दुकान से कुछ खा आया था।

भाल. – अजी, पूरी-मिठाई में वह आनन्द कहां जो बाटी और दाल में है। दस-बारह आने खर्च हो गये होंगे, फिर भी पेट न भरा होगा। आप मेरे मेहमान हो, जितने पैसे हों, ले लीजिएगा।

मोटे. – आप ही के हलवाई- की दुकान पर खा आया था, वह जो नुक्कड़ पर बैठता है।

भाल. – कितने पैसे देने पड़े?

मोटे. – आपके हिसाब में लिखा दिए है।

भाल. – जितनी मिठाइयाँ ली हों, मुझे बता दीजिए, नहीं तो पीछे से बेईमानी करने लगेगा। एक ही ठग है।

मोटे.- कोई ढाई सेर मिठाई थी और आधा सेर रबड़ी।

बाबू साहब ने विस्फारित नेत्रों से पंडितजी को देखा, मानो कोई अचम्भे की बात सुनी हो। तीन सेर तो कभी यहाँ महीने-भर का टोटल भी न होता था और यह महाशय एक बार में कोई चार रुपये का माल उड़ा गए। अगर एक-आधा दिन रह गए, तो बधिया बैठ जायेगी। पेट है या शैतान की कब्र? तीन सेर! कुछ ठिकाना है। उद्विग्न दशा में दौड़े हुए अन्दर गए और रंगीली से बोले – कुछ सुनती हो, यह महाशय कल तीन सेर मिठाई बड़ा गए। तीन सेर पक्की तौल।

रंगीलीबाई ने विस्मित होकर कहा – अजी नहीं, तीन सेर भला खा जाएगा! आदमी है या बैल?

भाल. – तीन सेर तो अपने मुंह से कह रहा है। चार से कम न खायी होगी पक्की तौल!

रंगीली – पेट में सनीचर है क्या?

भाल. – आज और रह गया, तो छह सेर पर हाथ फेरेगा।

रंगीली – तो आज रहे ही क्यों, खत का जो जवाब देना हो, देकर बिदा करो। अगर रहे, तो साफ कह देना कि हमारे यहाँ मिठाई मुफ्त नहीं आती। खिचड़ी बनाना हो बनावे, नहीं तो अपनी राह ले। जिन्हें ऐसे पेटुओं को खिलाने से मुक्ति मिलती हो तो खिलावें, हमें ऐसी मुक्ति न चाहिए। मगर पंडितजी विदा होने को तैयार बैठे थे, इसलिए बाबू साहब को कौशल से काम लेने की जरूरत न पड़ी। पूछा – क्या तैयारी कर दी महाराज?

मोटे. – हां सरकार, अब चलूंगा। नौ बजे की गाड़ी मिलेगी न?

भाल. – भला आज तो रहिए।

यह कहते-कहते बाबू साहब को भय हुआ कि कहीं यह महाराज सचमुच न रह जाएं, इसलिए वाक्य को यों पूरा किया – हां, वहाँ भी लोग आपका इन्तजार कर रहे होंगे।

मोटे. – एक दो दिन की तो कोई बात न थी। विचार भी यही था कि त्रिवेणी का स्नान करूंगा, पर बुरा न मानिए तो कहूं आप लोगों को ब्राह्मणों के प्रति लेशमात्र भी श्रद्धा नहीं है। हमारे यजमान हैं, जो हमारा मुँह जोहते रहते हैं कि पंडितजी कोई आज्ञा दें, तो उसका पालन करें। हम उनके द्वार पर पहुंच जाते हैं, तो अपना धन्य भाग्य समझते हैं और सारा घर- छोटे से बड़े तक – हमारे सेवा-सत्कार में मग्न हो जाता है। जहाँ अपना आदर नहीं वहाँ एक क्षण ठहरना असहाय है। जहाँ ब्राह्मण का आदर नहीं, वहाँ कल्याण नहीं हो सकता।

भाल. – महाराज हमसे तो ऐसा अपराध नहीं हुआ।

मोटे. – अपराध नहीं हुआ! और अपराध कहते किसे हैं? अभी आप ही ने घर में जाकर कहा कि यह महाशय तीन सेर मिठाई चट कर गए। पक्की तौल! आपने अभी खानेवाले देखें कहां? एक बार खिलाइए तो आंखें खुल जाएं। ऐसे-ऐसे महान पुरुष पड़े हुए हैं, जो पसेरी-भर मिठाई खा जाएं और डकार तक न लें। मिठाई खाने के लिए हमारी चिरौरी की जाती है। हम भिक्षुक ब्राह्मण नहीं है, जो आपके द्वार पर खड़े रहें। आपका नाम सुनकर आये थे, यह न जानते थे कि यहाँ मेरे भोजन के भी लाले पड़ेंगे। भगवान आपका भला करे।

बाबू साहब ऐसा झेंपे कि मुंह से बात न निकली। जिन्दगी भर में उन पर कभी ऐसी फटकार न पड़ी थी। बहुत बातें बनायी – आपकी चर्चा न थी, एक दूसरे महाशय की बात थी, लेकिन पंडितजी का क्रोध शांत न हुआ। वह सब-कुछ सह सकते थे। पर अपने पेट की निन्दा न सह सकते थे। औरत से रूप की निन्दा जितनी अप्रिय लगती है, उससे कहीं अधिक अप्रिय पुरुष को अपने पेट की निन्दा लगती है। बाबू साहब मानते तो थे, पर यह धड़का भी समाया हुआ था कि यह टिक न जाएं। उनकी कृपणता को छिपाने के लिए उन्होंने कोई बात उठा न रखी, पर होने वाली बात होकर रही। पछता रहे थे कि कहीं से घर में इसकी बात करने गया और कहा भी तो उच्च स्वर में। यह दुष्ट भी कान लगाए सुनता रहा; किन्तु अब पछताने से क्या हो सकता था! जाने किस मनहूस की सूरत देखी थी कि यह विपत्ति गले पड़ी। अगर इस वक्त यहाँ से रुष्ट होकर चला गया, तो वहाँ जाकर बदनाम करेगा और मेरा सारा कौशल खुल जायेगा। अब तो इसका मुँह बन्द कर देना ही पड़ेगा।

यह सोच-विचार करते हुए घर में जाकर रंगीलीबाई से बोले – इस दुष्ट ने हमारी-तुम्हारी बातें सुन ली। रूठकर चला जा रहा है।

रंगीली – जब तुम जानते थे कि द्वार पर खड़ा है, तो धीरे से क्यों न बोले?

माल. – विपत्ति आती है, तो अकेले नहीं आती। यह क्या जानता था कि द्वार पर कान लगाए खड़ा है।

रंगीली – न जाने किसका मुँह देखा था।

भाल. – वही दुष्ट सामने लेटा हुआ था। जानता तो उधर ताकता ही नहीं। अभी तो इसे कुछ दे दिलाकर राजी करना पड़ेगा।

रंगीली – ऊँह, जाने भी दो। जब तुम्हें वहां विवाह ही नहीं करना है, तो क्या परवाह है? जो चाहे कहे।

भाल. – यों जान न बचेगी। लाओ, दस रुपये विदाई के बहाने दे दूं। ईश्वर फिर इस मनहूस की सूरत न दिखाए। रंगीली ने बहुत पछताते-पछताते दस रुपये निकाले और बाबू साहब ने उन्हें ले जाकर पंडितजी के चरणों पर रख दिए। पंडितजी ने दिल में कहा – धत्तेरे मक्खीचूस की – ऐसा रगड़ा कि याद ही करोगे! तुम समझते हो कि दस रुपये देकर उसे उल्लू बना दूंगा। इस फेर में न रहना। यहाँ तुम्हारी नस-नस पहचानते हैं। रुपये जेब में रख लिये और आशीर्वाद देकर अपनी राह ली।

बाबू साहब बड़ी देर तक खड़े सोच रहे थे – मालूम नहीं, अब भी मुझे कृपण ही समझ रहा है, या पर्दा ढक गया। कहीं ये रुपये भी तो पानी में नहीं गिर पड़े।