Posted inउपन्यास

निर्मला-मुंशी प्रेमचंद भाग -4

भाल. – तुम भी कभी-कभी बच्चों की सी बातें करने लगती हो। अभी उससे कह आया हूं कि मुझे विवाह मंजूर नहीं। एक लम्बी-चौड़ी भूमिका बांधनी पड़ी। अब जाकर यह संदेश कहूंगा, तो वह अपने दिल में क्या कहेगा, जरा सोचो तो? यह शादी-विवाह का मामला है। लड़कों का खेल नहीं कि अभी एक बात […]

Posted inउपन्यास

निर्मला – मुंशी प्रेमचंद

आज का हिन्दी उपन्यास विश्व की किसी भी भाषा के उपन्यास-साहित्य के समक्ष रखा जा सकता है। कलात्मक प्रौढ़ता और विषय-विविधता की दृष्टि से हिन्दी उपन्यास को गौरवमयी परम्परा प्रदान करने में प्रेमचन्द का योगदान सर्वप्रमुख है। उन्होंने अपने भौतिक अनुभवों और प्रखर चिंतन से हिन्दी उपन्यास को कीर्ति के उच्चतम शिखर तक पहुंचाया है। […]

Gift this article