मनोरमा : एक परिचय
मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास “मनोरमा” एक दिलचस्प कहानी है जो समाज में जातिवाद और सामाजिक असमानता पर ध्यान केंद्रित करती है। कहानी का केंद्रीय पात्र ‘मनोरमा’ है, जो एक गरीब ब्राह्मण युवती है और उसके साथ होने वाली घटनाएं उसके जीवन को बदल देती हैं।
मनोरमा की शादी एक अमीर और बड़े जाति के व्यक्ति से होती है, लेकिन उसके साथ उसे जातिवाद और उसके सामाजिक स्थान की ताक़त का अहसास होता है। वह ब्राह्मण वंश की होती है, लेकिन उसे अपने पति के समाज में स्थान प्राप्त करने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
कहानी में यह बताया गया है कि कैसे मनोरमा अपने समाज के सामाजिक बनाम आर्थिक विभाजन को सहन करती है और अपने आत्मसमर्पण और संघर्ष से अपने लक्ष्य को हासिल करती है। इसके माध्यम से, प्रेमचंद ने समाज में जातिवाद के खिलाफ अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया और महिलाओं की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की है।
मनोरमा के लेखक : मुंशी प्रेमचंद

हिंदी साहित्य जगत में प्रेमचंद (31 जुलाई 1880- 8 अक्टूबर 1936) की लोकप्रियता इस कदर है कि उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि दी गई है। यह उनकी कलम का ही जादू है कि शायद ही कोई बच्चा उनके नाम और उनकी कहानी ‘ईदगाह’ के बारे में न जानता हो।
उनकी सभी रचनाएं समाज की विभिन्न पहलुओं, मनोदशाओं एवं विडम्बनाओं को दर्शाती हैं , फिर चाहे वह कहानियों के माध्यम से हो या फिर उपन्यासों के माध्यम से। गंवई पृष्ठभूमि, जमींदारी प्रथा, मानवीय संवेदनाएं उनकी रचनाओं में प्रमुख स्थान पाते हैं , जो तत्कालीन समाज का आईना लगती हैं।
उनकी कहानियों की चर्चा करें तो ‘ईदगाह’, ‘नशा’, ‘दो बैलों की कथा’ ,’नमक का दरोगा’, ‘कफ़न’ जैसे कई कहानियां और ‘सेवासदन’ ,’कायाकल्प’ ,’गबन’ और ‘गोदान’ आदि उपन्यास आज भी प्रासंगिक लगते हैं क्योंकि ये समाज की निम्न एवं मध्यवर्गीय सोच और रहन सहन को दर्शाते हैं। उर्दू और हिंदी दोनों ही भाषा में उन्होंने प्रसिद्धी पाई जो उनकी मृत्यु के बाद भी कम नहीं हुई है और उनकी रचनाएं हिंदी साहित्य की धरोहर हैं।
मनोरमा भाग – 1
मुंशी वज्रधर सिंह का मकान बनारस में है। आप हैं तो राजपूत पर अपने को ‘मुंशी’ लिखते और कहते हैं। ‘ठाकुर’ के साथ आपको गंवारपन का बोध होता है। बहुत छोटे पद से तरक्की करते-करते आपने अन्त में तहसीलदारी का उच्च पद प्राप्त कर लिया था। यद्यपि आप उस महान पद पर तीन मास से अधिक न रहे और उतने दिन भी केवल एवज पर रहे; पर आप अपने को साबित ‘तहसीलदार’ लिखते थे और मुहल्ले वाले भी उन्हें खुश करने को ‘तहसीलदार साहब’ ही कहते थे। यह नाम सुनकर आप खुशी से अकड़ जाते थे, पर पेंशन केवल 25 रु. मिलती थी। इसलिए तहसीलदार साहब को बाजार-हाट खुद ही करना पड़ता था। घर में चार प्राणियों का खर्च था। एक लड़की, एक लड़का और स्त्री। लड़के का नाम चक्रधर था। वह इतना जहीन था कि पिता के पेंशन के जमाने में घर से किसी प्रकार की सहायता न मिल सकती थी, केवल अपने बुद्धि बल से उसने एम.ए. की उपाधि प्राप्त कर ली थी। मुंशीजी ने पहले ही से सिफारिश पहुंचानी शुरू की थी। दरबारदारी की कला में वह निपुण थे। कोई नया हाकिम आये, उससे जरूर रब्त-जब्त कर लेते थे। हुक्काम ने चक्रधर का खयाल करने के वादे भी किये थे, लेकिन जब परीक्षा का नतीजा निकला और मुंशीजी ने चक्रधर से कमिश्नर के यहां चलने को कहा, तो उन्होंने जाने से साफ इनकार किया read more….
प्रकाशित: 29-01-2022
प्रकाशित: 29-01-2022
प्रकाशित: 31-01-2022
प्रकाशित: 01-02-2022
प्रकाशित: 02-02-2022
प्रकाशित: 03-02-2022
प्रकाशित: 04-02-2022
प्रकाशित: 05-02-2022
प्रकाशित: 06-02-2022
प्रकाशित: 07-02-2022
प्रकाशित: 08-02-2022
प्रकाशित: 09-02-2022
प्रकाशित: 10-02-2022
प्रकाशित: 11-02-2022
प्रकाशित: 12-02-2022
प्रकाशित: 13-02-2022
प्रकाशित: 14-02-2022
प्रकाशित: 15-02-2022
प्रकाशित: 16-02-2022
प्रकाशित: 17-02-2022
प्रकाशित: 18-02-2022
प्रकाशित: 19-02-2022
